बुधवार, 7 जून 2017

संस्कृत में संख्यावाचक शब्द के प्रयोग

स्मरणीय तथ्य

संख्याओं का वचन निर्धारण
1  1.    एक शब्द नित्य एकवचनान्त होते हैं।
परन्तु जब इसका संख्या के अतिरिक्त अन्य अर्थ में प्रयोग होता है, तब इसका द्विवचन तथा बहुवचन रूप भी होता है,क्योंकि एक शब्द के कई अर्थ होते हैं।
     एकोऽन्यार्थे प्रधाने च प्रथमे केवले तथा।
    साधारणे समानेऽल्पे संख्यायाञ्च प्रयुज्यते।।
2    2.    द्वि शब्द नित्य द्विवचनान्त होते हैं।
3. त्रि (3) से लेकर अष्टादशन् (18) संख्यावाची शब्द बहुवचनान्त होते हैं।
संख्याओं का विशेषण और विशेष्य निर्धारण
4. अष्टादशभ्य एकाद्याः संख्या संख्येय गोचराः । विशत्याद्याः सदैकत्वे सर्वाः संख्येयसंख्ययोः। 1 से 18 तक की संख्या केवल विशेषण के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। 20 से लेकर आगे की संख्या विशेषण और विशेष्य दोनों में प्रयुक्त होते हैं।
 विशेषण के रूप का उदाहरण-  यथा एकः पुरुषः, दश बालकाः।
विशेषण और विशेष्य रूप का उदाहरण- एकविंशतिः ग्रामाः, ग्रामाणामेकविंशतिः।
संख्याओं का लिंग निर्धारण
5. एक से अष्टादशन् पर्यन्त संख्या तीनों लिंग में प्रयुक्त होती है तथा उनविंशतिः (19) से नवनवति (99)तक की संख्या स्त्रीलिंग होती है।
संख्या के अर्थ में संख्याओं के प्रयोग में लिंग निर्धारण
6. जब विंशति आदि संख्या का प्रयोग संख्या के लिए किया जाता है तब उसमें द्विवचन और बहुबचन भी होते हैं। यथा- द्वे विंशती ( दो बीस अर्थात् 40 ) यहाँ द्वे द्विवचन तथा विंशती द्विवचन का रूप है।
संख्याओं का शब्द रूप
7. द्विवचनान्त द्वि शब्द
पुल्लिंग-                     द्वौ   द्वाभ्यां   द्वयोः
स्त्रीलिंग एवं नपुंसक -    द्वे    द्वाभ्यां   द्वयोः
8. बहुवचनान्त त्रि शब्द
पुल्लिंग-            त्रयः  त्रीन्   त्रिभिः    त्रिभ्यः   त्रयाणाम्  त्रिषु
स्त्रीलिंग -          तिस्रः  तिसृभिः  तिसृभ्यः  तिसृणाम् तिसृसु
नपुंसक -         त्रीणि  त्रिभिः  त्रिभ्यः   त्रयाणाम्  त्रिषु
9. पञ्चन् से अष्टादशन् तक तीनों लिंगों में समान रूप होते हैं।
 शेष संख्याओं का शब्द रूप देखें।
संख्याओं का लिंग परिवर्तन तथा पूरणार्थक शब्द
10. प्रथमः द्वितीयः तृतीयः में आ (टाप् ) प्रत्यय लगाकर स्त्रीलिंग रूप बनाते हैं। यथा- प्रथमा द्वितीया आदि।
11. पञ्चमः षष्ठः में ई  (ङीप्) लगाकर पञ्चमी षष्ठी आदि पूरणार्थक शब्द बनाते हैं।
12. विंशतिः से आगे तमप् लगाकर विंशतितमः पूरणार्थक शब्द बनाते हैं।
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रविवार, 4 जून 2017

विभक्ति-ज्ञानाय श्लोकाः

प्रथमा विभक्तेः पद्यानि
सन्तोषः परमो लाभः सत्सङ्गः परमा गतिः ।
विचारः परमं ज्ञानं शमो हि परमं सुखम् ।। योग वाशिष्ठ

मुखं पद्मदलाकारं वाणी चन्दनशीतला ।
हृदयं क्रोधसंयुक्तं त्रिविधं धूर्तलक्षणम् ।।

धनिनोपि निरुन्‍मादा युवानोपि न चंचलाः।
प्रभवोप्यप्रमत्‍तास्‍ते महामहिमशालिन: ।।

अर्थागमो नित्यमरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च ।
वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन् ।।

कुग्रामवासः कुनरस्य सेवा कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या।
मुर्खश्च पुत्रो विधवा च कन्या षड्जीवलोकस्य दुःखानि राजन्।।

अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते ।
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः ।।

अधमा धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमा:।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्।।

मातेव रक्षति पितेव हिते नियुङ्क्ते
कान्तेव चाभिरमयत्यपनीय खेदम्।
कीर्तिं च दिक्षु वितनोति तनोति लक्ष्मीं
किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या।।

केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः
न स्नानं न विलोपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजाः।
वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्।।

मही रम्या शय्या विपुलमुपधानं भुजलता
वितानश्चाकाशो व्यजनमनुकूलोऽयमनिलः ।
स्फुरद्दीपश्चन्द्रो विरतिवनितासंगमुदितः
सुखी शान्तः शेते विगतभवभीतिर्नृप इव ।।

सत्यानृता च पुरूषा प्रियवादिनी च
हिंस्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या।
नित्याव्यया प्रचुरनित्यधनागमा च

वाराङ्गनेव नृपनीतिरनेकरूपा।।