शनिवार, 16 सितंबर 2017

आधुनिक संस्कृत साहित्य की प्रवृत्तियाँ

आधुनिक संस्कृत साहित्य में आज  धाराएं प्रवाहित हो रही है। 1. देव स्तुति तथा राजस्तुति वर्णन परक पारंपरिक प्रवृत्ति 2. आधुनिक प्रवृत्ति । आधुनिक प्रवृत्ति में मुक्तबंध कविता, सहज बोधगम्य भाषा शैली में तात्कालिक घटना पर लिखते हुए उसका विश्लेषण भी किया जा रहा है। सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दे पर कवि अपनी रचना में अपना अभिमत भी रख रहे हैं।                       
      आधुनिक काव्य के वर्ण्य विषय में सेरोगेसी मदर, भ्रूण हत्या, बलात्कार, विद्यालयीय शिक्षा, विदेश भ्रमण,सांस्कृतिक पुनर्जागरण सहजता से उपलब्ध हैं। अन्य साहित्य की अपेक्षा संस्कृत में लेखन की संभावना एवं फलक अति विस्तृत है। यहां हजारों साल की परंपरा का पुनर्लेखन के साथ वर्तमान समाज के चित्रण का भी अवसर है। अतः संस्कृत की प्रत्येक विधा में विश्व के प्रत्येक हलचल को व्यक्त करने की आधुनिक दृष्टि विकसित हो चुकी है। संस्कृत में लेखन का क्षेत्र इतना विस्तृत हो चला है कि प्रत्येक काल, क्षेत्र, स्थानीय भाषा को आत्मसात् करने लगा है। संस्कृत यह सामर्थ्य रखती है कि हर भाषा में लिखित साहित्य को आत्मसात् कर ले। प्रत्येक भाव को व्यक्त करने का सामर्थ्य रखने के कारण अनुदित साहित्य का विशाल भंडार पाठकों तक पहुँच पा रहा है। अतीत के उदाहरण को समसामयिक घटना से जोड़ने का उदाहरण सिर्फ संस्कृत में प्राप्त होता है, अन्यत्र नहीं।

नए शब्दों का सृजन, स्थानीयता का वर्णन जिसमें हिन्दी के आंचलिक कहानी का प्रभाव दिखता है, संस्कृत के गद्य में अधिक लेखन हो रहा है। 
  नए उन्नसवीं शती के उत्तरार्ध में विभिन्न प्रकार के भावों, स्थितियों पर वैचारिक निबन्ध लेखन का आरम्भ हुआ,जो गद्यात्मक शैली में था। ज्ञातव्य यह है कि इस समय संस्कृत को स्कूली पाठ्यक्रम का अमलीजामा पहनाया गया। परीक्षा में गद्य / निबन्ध लेखन का प्रश्न पूछा जाने लगा था। इसके पूर्व धर्मशास्त्रों में मानव व्यवहार की व्यवस्था करने के लिए निबन्ध साहित्य की रचना की गयी। इस दौड़ में कुछ परीक्षा की दृष्टि से तो कुछ निबन्ध साहित्य तात्कालिक उद्येश्यों को ध्यान में लिखा गया। 
अन्य प्रवृत्तियाँ
हास्य रस पर आधारित नूतन साहित्य का लेखन
 प्रशस्य मित्र शास्त्री, भगीरथ प्रसाद शास्त्री
सम्बन्धित विषय को विस्तार पूर्वक पढ़ने के लिए हास्य काव्य परम्परा पर चटका लगायें।

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

भर्तृहरि का स्फोट सिद्धांत

शंकर वेदांत के पूर्व अद्वैतवादी सिद्धान्त में भर्तृहरि का शब्दाद्वैतवाद प्रमुख स्थान रखता है। भर्तृहरि ने सर्वप्रथम स्फोट सिद्धांत की सुव्यवस्थित आधार शिला रखी। शब्द को ब्रह्म स्वीकार करते हुए इसे मोक्ष का साधन कहा। इनके पूर्व शब्दब्रह्म की चर्चा उपनिषदों में भी की गयी है।  स्फुटति अर्थः यस्मात् अर्थात् जिस शब्द द्वारा स्फोट (ध्वनि) अर्थबोध होना। वाक्यपदीय का मंडन मिश्र की स्फोटसिद्धि पर विशेष प्रभाव लक्षित होता है। इनकी गणना एक वैयाकरण के रूप में किया जाता है। विद्वानों ने इनका समय 65 ईसवी के आसपास निर्धारित किया है। इत्सिंग ने इन्हें बौद्ध प्रमाणित करने का प्रयास किया. किंतु यमुनाचार्य के सिद्धित्रय, सोमानंद और उत्पल देव की शिवदृष्टि तथा उनकी वृत्ति और प्रत्यग्रूप की चित्सुखी टीका में इन्हें अद्वैतवादी कहा गया है। वाक्यपदीयम् और नीति, श्रृंगार, वैराग्य शतक के अध्ययन से भी यही बात प्रमाणित होती है। वाक्यपदीयम् के प्रारंभ में भर्तृहरि ने अनादि निधन शब्द ब्रह्म को प्रणाम किया है।
            अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम्।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः। ।वाक्यपदीयम्।1।।
नीति शतक के प्रारम्भ में भी उन्होंने दिक्कालाद्यनवच्छिन्न, अनन्त, चिन्मात्र मूर्ति, स्वानुभूतिगम्य, शांत तेजस् रूप ब्रह्म तत्व को नमस्कार किया है।
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये।
स्वानुभूत्येकमानाय नमः शान्ताय तेजसे ॥ नीतिशतक।
वैराग्य शतक में भर्तृहरि के दर्शन का वेदान्त स्वरुप अधिक स्पष्ट हुआ है।
उत्खातं निधिशङ्कया क्षितितलं ध्माता गिरेर्धातवो
निस्तीर्णः सरितां पतिर्नृपतयो यत्नेन सन्तोषिताः ।
मन्त्राराधनतत्परेण मनसा नीताः श्मशाने निशाः
प्राप्तः काणवराटकोऽपि न मया तृष्णे सकामा भव ।। वैराग्य - 3 ।।
 इन श्लोकों में जगत् की अनित्यता का प्रतिपादन किया है। नित्य शब्द के उपासना से ही नित्य विवेक द्वारा संसार की निस्पृहता और वैराग्य का उत्पादन कर उस वैराग्य द्वारा ज्ञान और उसे मोक्ष की लब्धि का वर्णन किया है।
 भर्तृहरि शब्द अद्वैत वाद के समर्थक हैं। इन्होंने अपने ग्रन्थों में शब्द को ही ब्रह्म माना है, जो अर्थ रूप में विभाजित होता है और इसी से संपूर्ण जगत प्रक्रियाएं चलती है। कुछ विद्वानों के मत के अनुसार भर्तृहरि परिणामवादी हैं। वे विवर्त का अर्थ परिणाम करते हैं। वस्तुतः यह स्फोटवादी हैं और स्फोट को ही शब्द का वास्तविक स्वरुप मानते हैं। नादों द्वारा बुद्धि में बीज का आधान हो जाने पर, आवृत्ति से क्रमशः बीज परिपक्व होता है और अन्त्य ध्वनि द्वारा स्फोटात्मक शब्द का स्वरूप निर्धारित होता है-
            नादैराहितबीजायामन्त्येन ध्वनिना सह ।
आवृत्तिपरिपाकायां बुद्धौ शब्दोऽवधार्यते ॥ वा॰प॰ १.८४.
अनुपाख्येय तथा ग्रहणानुग्रह प्रत्ययों द्वारा ध्वनि प्रकाशित शब्द बुद्धि में अवधृत अर्थ होता है,यही स्फोट है। भर्तृहरि के इस सिद्धांत का दहराधिकरण भाष्य में शंकराचार्य ने खंडन किया है।
भर्तृहरि के अनुसार परमार्थ में एकत्व नानात्व प्रभृति के भेद घात निरस्त हो जाते हैं। सभी शक्तियों से एक ही सत्व सर्वत्र व्याप्त है। द्रष्टा, दृश्य और दर्शन परमार्थ में ही विकल्पित है। आगम से ही सर्वाधिक प्रमाण है। ऋषियों का ज्ञान भी आगम हेतुक है। एक ही शब्द शक्ति व्यापाराश्रय से अनेक रूपों में विभाजित होता है और उपायों से परमार्थ की शिक्षा दी जाती है।
उपायाः शिक्षमाणानां बालानां उपलापनाः ।
असत्ये वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते ॥ वाक्यपदीय, ब्रह्मकाण्ड- 53

 भर्तृहरि पश्यन्ती वाक् को परब्रह्म मानते हैं। मध्यमा और वैखरी इसी की क्रमशः स्थूल अभिव्यक्तियां है। इस प्रकार भर्तृहरि शब्दाद्वैतवादी आचार्य हैं। 

बुधवार, 23 अगस्त 2017

लिंगानुशासन (शब्दों के लिंग ज्ञान करने का शास्त्र)

जैसे हिन्दी के वाक्य प्रयोग में लिंग का ज्ञान आवश्यक हो जाता हैं वैसे ही संस्कृत भाषा के वाक्य प्रयोग में भी लिंग का ज्ञान आवश्यक है। यह प्रश्न तब और जटिल हो जाता है जब किसी वस्तु का लिंग ज्ञान शारीरिक विशेषताओं से नहीं हो पाता। प्राणियों में लिंग का ज्ञान करना सरल होता है, परंतु निर्जीव वस्तुओं में लिंग का ज्ञान अत्यंत ही कठिन होता है। प्राचीन काल में मानव जड़ पदार्थ में भी चेतन पदार्थ के समान लिंग का व्यवहार करते थे। वैदिक ग्रंथों में एक ही शब्द के लिए अनेक लिंगों के प्रयोग किए गए। बाद के संस्कृत ग्रंथों में लिंगों का निर्धारण शुरू हुआ। इसके लिए अनेक लिंगानुशासन ग्रंथों की रचना की गई। लिंग ज्ञान के लिए आज मुख्यतः तीन स्रोत उपलब्ध हैं।1.  व्याकरण ग्रंथों के साथ खिल भाग में लिंगानुशासन का पाठ।
2. अमरकोश जैसे ग्रंथों में शब्दों के साथ ही लिंग का ज्ञान।
3. स्वतंत्र रूप से पुस्तकों की रचना।
पाणिनि का लिंगानुशासन अष्टाध्यायी के खिल भाग में प्राप्त होता है। महाभाष्य के चतुर्थ अध्याय प्रथमपाद में शब्दों के लिंग निर्धारण पर रोचक चर्चा मिलती है। स्त्रियाम् इस पाणिनि सूत्र पर लिखित श्लोक वार्तिक पर महाभाष्य में विचार किया गया।
                                   स्तनकेशवती स्त्री स्याल्लोमशः पुरुषः स्मृतः।
                                   उभयोरन्तरं यच्च तदभावे नपुंसकम्।
                                   लिंगात् स्त्रीपुंसयोर्ज्ञाने भ्रुकुंसे टाप् प्रसज्यते।
                                   नत्वं खरकुटीः पश्य खट्वावृक्षौ न सिद्यतः।।
                                   नापुंसकं भवेत् तस्मिन् तदभावे नपुंसकम्।
स्तन और केश वाली स्त्री तथा रोएँ (रोम) वाला पुरुष कहा जाता है और जिनमें इन दोनों का भेद का अभाव हो वह नपुंसक कहलाता है। शब्दों में लिंग निर्धारण करने के लिए यदि इस प्रकार का आधार माना जाए तब  वेशधारी नट में स्तन आदि शारीरिक चिह्न होता है। अतः इस शब्द को स्त्रीलिंग मानते हुए टाप् प्रत्यय होना चाहिए। नटा इस प्रकार का स्त्री वाचक शब्द हो जाएगा। अतः अचेतन पदार्थों में इस आधार पर लिंग का निर्धारण नहीं किया जा सकता। इस प्रकार की समस्या के समाधान के लिए पाणिनि ने प्रकृति तथा प्रत्यय के आधार पर लिंग का निर्णय कर इस विषय को स्पष्ट किया। इन्होंने 5 प्रकार के अधिकार सूत्रों की रचना की।
                                      संख्या
1 स्त्री अधिकार                34
2 पुलिंग अधिकार             83
3 नपुंसक अधिकार            52
4 स्त्रीपुंस अधिकार            5
5 पुंनपुंसक अधिकार          14

पाणिनि ने टाप् डाप् और चाप् यह तीन आकारान्त तीन ईकान्त एक ऊकारान्त ऊङ् तथा एक ति स्त्री वाचक प्रत्यय का विधान किया। आकारान्त से अश्वा,क्षत्रिया ईकारान्त से मानुषी, देवी,तरुणी,नर्तकी,कुमारी,हयी ऊकान्त से कुरूः,श्वश्रूः  प्रत्यय एवं ति से युवति शब्द बनाया गया। यहाँ कृदन्त का शतृ प्रत्ययान्त तद्धित का ईयसुन् प्रत्ययान्त शब्दों के स्त्री वाची शब्द का भी स्त्री प्रत्यय प्रकरण में विधान गया है। पुमान् इस अधिकार सूत्रों के द्वारा अधिकतर कृदन्त तथा तद्धित प्रत्ययों को रखकर पुलिंगवाची शब्दों का पार्थक्य दिखाया गया है। अधिकतर पुलिंगवाची शब्द नामबोधक तथा भावबोधक होते हैं।

लिंगानुशासन के अन्य ग्रन्थकार

लिंगानुशासन के बारे में अमर सिंह का अतुलनीय योगदान है। कहा जाता है कि इन्होंने एक व्याकरण ग्रंथ की रचना की थी। अमरकोश के तीसरे कांड के पञ्चम वर्ग में लिंगादि संग्रह किया गया है। अमर सिंह के अमरकोश को यदि व्याकरण के रूप में देखा जाए तो यह एक व्याकरण ग्रन्थ भी सिद्ध होता है। यहां पर्यायवाची शब्दों के साथ-साथ शब्दों के लिंग का भी ज्ञान कराया गया है।
समाहृत्यान्यतन्त्राणि संक्षिप्त्यैः प्रतिसंस्कृतैः।
सम्पूर्णमुच्यते वर्गैर्नामलिङ्गानुशासनम्।
प्रायशो रूपभेदेन साहचर्याच्च कुत्रचित्।
स्त्रीनपुंसकं ज्ञेयं तद्विशेषविधेः क्वचित्।
लिंगानुशासन पर पद्यबद्ध रचनाएं प्राप्त होती है। इनमें से कुछ रचनाकारों की रचनाएं पूर्ण मिलती है, परंतु अधिकतर की रचनाएं पूर्ण प्राप्त नहीं होती है। इस प्रकार देवनन्दी, शंकर, हर्षवर्धन, दुर्गसिंह, वामन, पाल्यकीर्ति, बुद्धिसागर, हेमचंद्रसूरी, वोपदेव, हेलाराज, रामसूरि, वेंकटरंग ये लिंगानुशासन के प्रमुख प्रवचनकर्ता रहे हैं।
         वामन तथा हर्षवर्धन लिंगानुशासन के सर्व प्राचीन आचार्य हैं। इन दोनों ने शब्द निर्माण प्रक्रिया के स्थान पर शब्दों का लिंग बोध कराने के लिए लिंगानुशासन की रचना की।

क्रमशः-


गुरुवार, 17 अगस्त 2017

धर्मशास्त्रों में वर्णित यौन जीवन (Sexual life in theology)

          संपूर्ण धर्मशास्त्र धर्म अर्थ काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थ चतुष्टय की अवधारणा पर खड़ा है। यहां पर काम की महत्ता को स्वीकार किया गया है तथा इसका नियमपूर्वक उपभोग करने की स्वीकृति दी गई है। धर्मशास्त्रों में संभोग या मैथुन एक घृणास्पद वस्तु न होकर नियंत्रित एवं प्रतिबंधित विषय रहा है। इसका लक्ष्य उन्मुक्त एवं वासना पूर्ण यौन जीवन नहीं था। मैथुनेच्छा की स्वाभाविक प्रवृत्ति को नियमित करने के लिए श्वेतकेतु का एक आख्यान महाभारत में प्राप्त होता है। ॠषि उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु ने सर्वप्रथम पति- पत्नी के रुप में स्री - पुरुष के संबंधों की नींव डाली। श्वेतकेतु ने अपनी माँ को अपने पिता के सामने ही बलात् एक अन्य व्यक्ति के द्वारा उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने साथ चलने के लिए विवश करते देखा तो उससे रहा न गया और वह क्रुद्ध होकर इसका प्रतिरोध करने लगा। इस पर उसके पिता उद्दालक ने उसे ऐसा करने से रोकते हुए कहा, यह पुरातन काल से चली आ रही सामाजिक परंपरा है। इसमें कोई दोष नहीं, किंतु श्वेतकेतु ने इस व्यवस्था को एक पाशविक व्यवस्था कह कर, इसका विरोध किया और स्रियों के लिए एक पति की व्यवस्था का प्रतिपादन किया। यौन व्यवहार गृहस्थाश्रम के मूल आधार के रूप में प्रतिष्ठ्त होने लगा। यहां विवाह से गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर यौन जीवन का आरंभ होता था। किसी अन्य प्रकार का यौनाचार अपराध एवं पाप की श्रेणी में माना जाता था। धर्मशास्त्रों में स्त्रियों के यौन जीवन पर सतर्क दृष्टि देखी जाती है। धर्मशास्त्रों में स्त्रियों के साथ यौन संबंध के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा मिलती है।

धर्मसूत्रों में वर्णित अप्राकृतिक यौनाचार

      अप्राकृतिक यौनाचार के बारे में धर्मसूत्रों में पर्याप्त मात्रा में चर्चा मिलती है। उस समय भी मनुष्य अप्राकृतिक क्रिया और असामान्य यौनाचार करता था। अतः प्रायः सभी धर्मसूत्रों में पुरुष द्वारा किए जाने वाले पशु मैथुन की निंदा की गई है। इस प्रकार के मैथुन के लिए दंड एवं प्रायश्चित्त का विधान किया गया है। गौतम ने गाय से यौन सम्बन्ध स्थापित करने वाले के लिए गुरुपत्नी गमन के समान पाप कर्म माना है।
सखीसयोनिसगोत्राशिष्यभार्यासु स्नुषायां गवि च गुरुतल्पसमः।। गौतमीयधर्मशास्त्र 3.23.12
वशिष्ठ ने इसे शुद्र वध के तुल्य माना है। गाय के अतिरिक्त अन्य मादा पशु से दुराचरण हेतु होम का प्रायश्चित निर्धारित किया है।
         अमानुषीषु गोवर्जं स्त्रीकृते कूश्‍माण्डैर्घृतहोमो घृतहोमः। गौतमीय धर्मशास्त्र मिताक्षरा 3.12.36
 धर्मसूत्रों में स्त्री की योनि से भिन्न स्थानों पर वीर्य गिराने को मना किया गया। इसे दुष्कर्म और दंडनीय एवं पाप पूर्ण कार्य माना गया है। वशिष्ठधर्मसूत्र में इस अप्राकृतिक यौनाचार को एक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करते हुए कहा है कि जो अपनी पत्नी के मुख में मैथुन करता है उसे पितृगण उस माह वीर्य को पीते हैं । पुरुषों के समलिंगी यौन कर्म का भी निषेध किया है।
        यथा स्तेनो यथा भ्रूणहैवमेष भवति यो अयोनौ रेतःसिञ्चति।। हरदत्त की व्याख्या।
इस प्रकार हम पाते हैं कि वैदिक काल से ही मानव उन्मुक्त यौन व्यवहार करता था। वेद तथा वेदोत्तर काल के स्मृतिशास्त्र, धर्मसूत्र ग्रन्थों के अनुसार यौन जीवन का आरंभ माता और पिता के द्वारा कन्यादान करने के पश्चात् शुरू होता है। पुत्र पैदा करने तथा स्त्री सहवास के नियमों के विस्तार इतना अधिक होता चला गया कि स्त्री भोग्या की श्रेणी में आ गयी। हो सकता है कि इस समय आते आते ये ग्रन्थ भी सांस्कृतिक रूप से प्रदूषित होने लगे हों। वशिष्ठधर्मशास्त्र ने तो स्त्री में मैथुन की अद्भुत क्षमता होती है तक कह डाला। वे आगे कहते हैं कि इंद्र द्वारा उसे इस हेतु वरदान दिया है और प्रसव के 1 दिन पूर्व भी वह अपने पति के साथ शयन कर सकती है।
 अपि च काठके विज्ञायते । अपि नः श्वो विजनिष्यमाणाः पतिभिः सह शयीरन्निति स्त्रीणामिन्द्र दत्तो वर इति। 12.24
इससे सिद्ध होता है यौनेच्छा की तृप्ति या यौनचर्या का दायरा अब केवल संतान उत्पत्ति तक ही सीमित नहीं रह गया था। गौतम, आपस्तम्ब जैसे कुछ ऋषियों ने यौन प्रवृत्ति की स्वाभाविकता को समझा और वह भोग करने के लिए निषेध के दिनों को छोड़कर किसी भी काल में पत्नी से यौन संबंध स्थापित करने की स्वीकृति प्रदान करते हैं। आपस्तम्ब ने भी ऋतुकाल के मध्य भी पत्नी की इच्छा को देखकर संभोग करने की अनुमति देते हैं।
धर्मसूत्र पत्नी गमन का आदेश देते हुए कहता है कि जो पुरुष मासिक धर्म हुए पत्नी से 3 वर्ष तक सहवास नहीं करता वह भ्रूण हत्या का के पाप का भागी होता है। जो पुरुष जिसके रजोदर्शन के उपरांत १६ दिन न बीतें हों और फलतः गर्भ-धारण के योग्य हो ऐसी पत्नी के निकट रहते हुए भी उस से संभोग नहीं करता, उसके पूर्वज उसकी पत्नी के रज में ही पड़े रहते हैं।
                    त्रीणि वर्षाण्ययृतुमतीं यो भार्यां नोधिगच्छति।
                    स तुल्यं भ्रूणहत्यायै दोषमृच्छत्यसंशयम्।।
                    ऋतुस्नाता तु यो भार्यां सन्निधौ नोपगच्छति।
                   पितरस्तस्य तन्मासं तस्मिन् रजसि शेरते।। बौधायन धर्मसूत्र 4.1.23
विष्णु धर्मसूत्र ने पर्वों एवं पत्नी की अस्वस्थता के दिन को छोड़कर अन्य दिनों में संभोग न करने पर 3 दिन के उपवास का प्रायश्चित बताया है। संतान उत्पत्ति के इस पवित्र कर्तव्य पालन में सहयोग न देने वाली पत्नी के लिए बौधायन धर्मसूत्र ने सामाजिक तिरस्कार एवं परित्याग का भी विधान किया है। जो स्त्री पति की इच्छा रहते हुए भी पति के साथ सहवास नहीं करती है और औषधि द्वारा संतान उत्पत्ति में बाधा पहुंचाती है उसे गाँव के लोगों के समक्ष भ्रूण को मारने वाली घोषित कर घर से निकाल देने का विधान किया।

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बुधवार, 16 अगस्त 2017

वैदिक ऋषिका रोमशा ः एक रोचक संवाद

                                                                 अहमस्मि रोमशा 
     ऋग्वेद के प्रथम मंडल 126 वें सूक्त 7वें मंत्र की ऋषि रोमशा हैं। इन्हें भी अपनी पहचान स्थापित करने के लिए आवाज बुलंद करनी पड़ी थी। भाष्यकार सायण ने इन्हें बृहस्पति की पुत्री तथा ब्रह्मवादिनी कहा है। 
     सिंधु नदी के तट पर स्थित सिंधु देश में एक अत्यंत पराक्रमी एवं यशस्वी शासक उत्पन्न हुए, जिनका  नाम था स्वनय भावयज्ञ। इनके पिता का नाम भव्य था। भावयव्य का विवाह गंधार देश की कन्या रोमशा के साथ हुआ था। राजा भावयव्य ने हजारों सोम यज्ञ में याजकों को प्रचुर मात्रा में दान देकर द्यूलोक तक अपनी कीर्ति का विस्तार किया। ऐसे दानशील राजा की प्रशंसा में ऋषि कक्षीवान् ने स्तोत्र की रचना की। इसी स्तोत्र के अंतर्गत सातवां मंत्र रोमशा के नाम से लिखित है। युवती होते हुए भी संभवतः रोमशा के शरीर में यौवन की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं हुई थी। अतः भावयव्य उन्हें बालिका समझते हुए अभिगम योग्य अथवा गृहस्थ धर्म के पालन योग्य नहीं समझते थे। पति की उपेक्षा से व्यथित होकर रोमशा को अपनी अस्मिता को स्पष्ट करने के लिए स्त्रियोचित लज्जा और संकोच का परित्याग कर ऊंचे स्वर में प्रमाण के साथ अपनी योग्यता को सिद्ध करना पड़ा था। ऋग्वेद के इस मंत्र में अपने पति को संबोधित करते हुए रोमशा का उद्गार इस प्रकार व्यक्त हुआ-
                  उपोप मे परा मृश मा मे दभ्राणि मन्यथा।
                   सर्वाहमस्मि रोमशा गन्धारीणामिवाविका।।
     मेरे समीप आकर मुझ से परामर्श लो। मेरे कार्यों और विचारों को छोटा मत समझो। मैं अपरिपक्व बुद्धि वाली नहीं, अपितु गंधार देश की भेड़ के समान सर्वत्र रोम वाली अर्थात पूर्ण विकसित बुद्धि और परिपक्व विचारों वाली हूँ। 
     ब्रह्मवादिनी रोमशा ने अपने इसी एक मंत्र के द्वारा जीवन के गंभीर सत्य को रेखांकित किया। रोमशा का स्पष्ट कथन है कि मा मे दभ्राणि मन्यथा। मुझे छोटा मत समझना। अहमस्मि रोमशा। मैं रोमशा हूँ। यह वाक्य प्रत्येक स्त्रियों के आत्मविश्वास की सशक्त अभिव्यक्ति है।

इस लेख पर फेसबुक पर संवाद-
राजकुमार हिरणवालकथानक वेद में इतिहास को स्पष्ट इंगित कर रहा है,जो ठीक नहीं है। इससे वेदो का काल परिमित हो जायेगा। जो वैदिकों के मत से बहि: है। वेद में इतिहास को ढूंढना या काल्पनिक कथानकों के द्वारा वेद को समझाना, वेदों को दूसरे ग्रन्थों की तरह ही सरल समझना है। जो वेद के साथ अन्याय है। वेद के संदर्भ में इस तरह की सरलता किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। सायणादि की वेदार्थ में संगति आंशिक ही है समग्रता में सायण ग्राह्य नहीं है। वेदों के अर्थ वे ही ठीक कर सकते हैं, जो यमी-नियमी हों ,जो विदेहता को प्राप्त कर गये हों,जिन्होंने जीव-प्रकृति-ईश्वर को समझ लिया हो ! यह स्थिति सबको प्राप्त नहीं हो सकती अर्थात कोई भी वेदार्थ करने में समर्थ नहीं हो सकता।
हमारे यहाँ संकट यह है कि जिनकी प्रमाणिकता संदेहरहित होती है,उसे कभी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं होती ! ऋषिवर दयानन्द के संदर्भ में वेदार्थ जिज्ञासाओं ने बड़ी भारी रूक्षता का परिचय दिया है,जो बहुत दुखद है। उनके यथार्थ वेदार्थ को कोई देखना क्यों नहीं चाहता,सामान्य विद्वानों के वेदार्थों पर उनके होते भी क्यों चर्चा-परिचर्चा होती हैं ? यह हमारे सनातनधर्म की बडी विडम्बना है। आप्तों को छोड़ हम अपने सामान्यों से क्यों काम चलाना चाहते हैं। यह हमारे वाङ्मय के इतिहास का सबसे बौद्धिक दारिद्रय नहीं तो क्या कहा जाये ? कृपया ऋषियों को देखें,समझें और पढे, उनके आशय सच्चाइयों से भरे पडे हैं। वेद के संदर्भ से उन्हें अलग करके हम वैदिक सच्चाइयों से बहुत दूर चले जायेंगे। इति शम्।
जगदानन्द झा  कथानक में पौर्वापर्य संबंध जोड़ा गया है। मूल मंत्र का अनेक अर्थ हो सकता है, उसमें से एक अर्थ मैंने उद्धृत किया है। राजकुमार हिरणवाल जी सन्दर्भ लें –
रोमशा नाम ब्रह्मवादिनी। ऋग्वेद 1. 126.7 सायण भाष्य
वृहस्पति की पुत्री रोमशा का विवाह भावयव्य से हुआ था- बृहद्देवता 3.156 वैदिक इन्डेक्स भाग 2 पृष्ठ 254
भावयव्य का यज्ञ - ऋग्वेद 1.126. 1,2

Lalit Mishra वेदों मे इतिहास नहीं जैसा अनर्गल प्रलाप आप क्यों कर रहे हैं, इस तरह की बेसिरपैर की बातें करने से अधिक अच्छा होता कि आप वेदों का कुछ अध्ययन कर अपने ज्ञान का स्तर कुछ बढा लेते, इतिहास व्यक्ति और उस व्यक्ति के काल एवं उसके भू-भाग की घटनाओ का स्मन्वित अध्ययन है, सभी ऋषि मनुष्य थे जो किसी न किसी काल में पैदा हुए तथा ज्ञान प्राप्त किया, अपने द्वारा द्र्ष्ट मंत्रो में उन्होने समकालीन समाज की घटनाओ का प्रचुर वर्णन किया हुआ है, क्या उसे आप झुठला सकते हैं, और यदि नहीं तो आप स्वयं भी झूठ के कुचक्र से बाहर निकल आइए।
Lalit Mishra - झा जी, कथानक तो आपने ठीक लिया है किंतु मंत्र के अर्थ में परिवर्तन क्यों किया, रोमशा अपने मन के रोमांश को अभिव्यक्त कर रही है। रोम रोम में भरा हुआ यौवन, इसमें आप ज्ञान क्यों प्रविष्ट कर रहे है, यह अनुचित है।
जगदानन्द झा - मैंने राजकुमार जी के उत्तर में लिखा है। इसके अनेक अर्थ किये गये। आप जिसका कथन कर रहे हैं वह अर्थ भी मेरे पास प्रस्तुत है,परन्तु इस प्रसंग में मैं रोमशा को एक ज्ञानी, ब्रह्मवादिनी की तरह देख रहा हूँ।

संस्कृत आयोग का प्रतिवेदन 1956-1957 पर भूमिका

संस्कृत शिक्षा की समस्याओं के अध्ययनार्थ तथा इस भाषा के विकास के सम्बन्ध में सुझाब देने के लिए डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी की अध्यक्षता में 1956 में संस्कृत आयोग का गठन किया गया था। इस समिति ने 1957 में अपना प्रतिवेदन अंग्रेजी भाषा में प्रस्तुत किया। हिन्दी में अनुदित प्रतिवेदन पर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति तथा उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के अध्यक्ष बद्रीनाथ शुक्ल ने अपनी भूमिका लिखकर उ. प्र. सं. सं., लखनऊ से प्रकाशित किया। यह भूमिका आयोग के सुझावों का सार संकलन है। उस आयोग की संस्तुतियों पर साररूप में लिखित यह भूमिका आपके अध्ययनार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है। हम इसका अध्ययन कर पाते हैं कि 50 वर्ष  बीत जाने तथा इस सुझाव पर छिटपुट कार्य होने के पश्चात् भी संस्कृत की स्थिति यथावत् है। प्रस्तुत है  आयोग के प्रतिवेदन पर लिखी-

भूमिका

जनता तथा लोक सभा के आग्रह पर केंद्रीय शासन ने 1 अक्टूबर सन 1956 को भारत के सुविख्यात शिक्षाविद् स्वर्गीय डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी की अध्यक्षता में संस्कृत के पठन-पाठन तथा संस्कृत संबंधी प्रशासन एवं जनसंपर्क के निष्णात यशस्वी विद्वानों से विभूषित एक संस्कृत आयोग का संगठन किया था। इन विद्वानों ने अपने देशव्यापी पर्यटन द्वारा पारंपरिक तथा आधुनिक दोनों प्रकार की संस्कृत शिक्षा का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया तथा साक्षियों एवं अपनी प्रश्नावली के उत्तरों को अपने परिपक्व ज्ञान, अनुभव और विचारों से समन्वित करते हुए अक्टूबर 1957 में अपना सर्वांगपूर्ण प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। 12 अध्यायों के अपने इस प्रतिवेदन में सम्मानित सदस्यों ने संस्कृत शिक्षा के ऐतिहासिक विवेचन के साथ उसकी वर्तमान स्थिति का रोचक चित्रण किया है तथा वर्तमान स्थिति के परिपेक्ष्य में संस्कृत शिक्षा एवं भारतीय संस्कृति के प्रचार तथा उसकी लोकप्रियता स्थापित करने की अनिवार्यता पर भी अपने विचारों की अभिव्यक्ति की है। प्रतिवेदन में पारंपरिक तथा आधुनिक दोनों ही संस्कृत के पठन-पाठन की सरणियों को सुदृढ़ बनाने की अनेकानेक मार्गों का केवल निर्देश ही नहीं किया गया है, बल्कि संस्कृत शिक्षा के राष्ट्रीय संगठन इत्यादि पर भी विचारोद्बोधक सुझाव समुपस्थापित किए गए हैं। यही नहीं, संस्कृत वाङ्मय के माध्यम से राष्ट्रीय एवं अंताराष्ट्रिय जगत् में भारत का व्यक्तित्व कैसे समुज्ज्वल किया जा सकता है तथा स्वतंत्र भारत की आकांक्षाओं की पूर्ति किन - किन उपायों से की जा सकती है, इस संबंध में भी आयोग का प्रतिवेदन कतिपय मौलिक, ठोस तथा व्यावहारिक दिशाओं की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है।
इस तथ्य को स्वीकार करना ही पड़ेगा कि संस्कृत भाषा में एकता स्थापित करने की तथा चरित्र निर्माण की अद्भुत शक्ति विद्यमान है। अतः आधुनिक विद्यालयों के पाठ्यक्रम में उन छात्रों को छोड़कर जिनकी मातृभाषा अंग्रेजी है, भाषा के अध्ययन के प्रसंग में ऐसा प्रावधान किया जाना चाहिए जिससे भाषा के रूप में संस्कृत का स्थान सुरक्षित हो जाए तथा सभी छात्र संस्कृत ले सके। जो छात्र संस्कृत लेना चाहते हैं उन्हें किसी प्रकार की कठिनाई अथवा रुकावट का सामना न करना पड़े। त्रिभाषा सूत्र के विधान में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि मातृभाषा तथा क्षेक्षीय भाषा और अंग्रेजी के साथ संस्कृत या विशेष स्थिति में  किसी अन्य समकक्ष प्राचीन भाषा का अध्ययन कर सकें। इस प्राविधान से हम राष्ट्रिय हित की दृष्टि से माध्यमिक शिक्षा को अधिक से अधिक लोकोपकारी बना सकते हैं।
संस्कृत विद्यालयों में निरंतर छात्र संख्या की गिरावट तथा प्रतिभासम्पन्न छात्रों के उत्तरोत्तर अभाव की स्थिति चिन्ताजनक होती जा रही है। इस स्थिति को  संभालने के लिए आवश्यक है कि इन विद्यालयों से निकले हुए छात्रों को वही सम्मान, प्रतिष्ठा तथा जीविकोपार्जन के अवसर उपलब्ध हो, जो किसी कला, विज्ञान या अन्य प्रकार के आधुनिक विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के छात्रों को प्राप्त है। संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना से इस प्रश्न का हल भी संभव हो गया है, किंतु इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पर्याप्त जनजागृति, संस्कृत के पठन पाठन के प्रति निष्ठा, विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं में संस्कृत की विशेषता एवं सर्वोपरि संस्कृत शिक्षा को सर्व साधन संपन्न बनाने के लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता है, जिससे चुने हुए संस्कृत विद्यालयों को हम आकर्षक वेतन पर अध्यापक दे सके तथा उनके भवनों, छात्रावासों और पुस्तकालयों को समुचित रूप से सुसज्जित कर सकें। इस दिशा हमारा प्रयत्न चल रहा है तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग हमारे एतद्विषयक चेष्टाओं के अनुकूल है। प्रतियोगिता परीक्षाओं में शास्त्रीय विषयों के समावेश की भी चेष्टा हम कर रहे हैं तथा इस संदर्भ में भी केंद्रीय और प्रादेशिक शासनों ने हमारे प्रस्तावों के प्रति अनुकूलता प्रकट की है।
पारंपरिक संस्कृत शिक्षा के संदर्भ में संस्कृत आयोग ने इस प्रणाली को प्रचलित तथा संरक्षित रखने का सर्वथा उचित समर्थन किया है। आयोग का सुझाव है कि इसे सर्वमान्य शिक्षा की मान्यता दी जाए। इस संस्तुति का आंशिक कार्यान्वयन संस्कृत परीक्षाओं की समानांतर अंग्रेजी परीक्षाओं से समकक्षता तथा संस्कृत विश्वविद्यालयों की स्थापना से हो चुका है। आयोग ने यह सुझाव दिया है कि वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय की सफलता देखकर देश में और भी संस्कृत विश्वविद्यालयों की स्थापना की जाय। हमारा अनुरोध है कि अब वह समय आ गया है कि देश के अन्य संस्कृत केंद्रों में भी संस्कृत विश्वविद्यालय खोले जायें। आयोग ने सर्वप्रथम दक्षिण भारत में संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना की संस्तुति की है। हमारी सूचना है कि दक्षिण भारत में इस प्रकार की चेष्टा चल भी रही है। संस्कृत विश्वविद्यालयों की स्थापना से निश्चय ही संस्कृत की मान्यता बढ़ेगी तथा संस्कृत के पठन-पाठन की पारंपरिक तथा अर्वाचीन पद्धतियों के समन्वयन से संस्कृत का पठन-पाठन लोकोपयोगी बन सकेगा। यही नहीं, हमारे इस अनुष्ठान से संस्कृत के विद्वानों तथा छात्रों को भी अपने कार्यव्यापार में विश्वास और लोकसम्मान प्राप्त हो सकेगा। वर्तमान स्थिति में हम आयोग के इस प्रस्ताव का समर्थन करना चाहेंगे कि पारंपरिक तथा अर्वाचीन संस्कृत के पठन-पाठन का समन्वयन एवं सामंजस्य राष्ट्रीय हित की दृष्टि से सहायक सिद्ध होगा। इस समन्वयन के द्वारा संस्कृत वाङ्मय के विशाल भंडार का भारतीय ढंग से प्रकाशन किया जा सकेगा एवं संस्कृत का रचनात्मक और सर्जनात्मक क्षेत्र, जो इस समय अविरुद्ध तथा उपेक्षित ही कहा जाएगा, उसे भी गति प्राप्त होगी। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए यह आवश्यक है कि संस्कृत विद्यालयों में अर्वाचीन पद्धति के प्रशिक्षण को प्रोत्साहित करने के लिए संबद्ध पाठ्यक्रम में इस सारिणी का समावेश किया जाए तथा आधुनिक पद्धति से प्रशिक्षित विद्वान् इसके निर्वाह के लिए संस्कृत विद्यालयों में नियुक्त किए जाएं।
इस प्रकार आधुनिक अंग्रेजी महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों एवं शोधसंस्थानों में पारंपरिक पाठ्यक्रम प्रणाली के शास्त्रीय प्रशिक्षण का प्राविधान किया जाना चाहिए तथा एतदर्थ पारंपरिक संस्कृत के विद्वानों की नियुक्ति इन विद्यालयों तथा संस्थाओं में की जानी चाहिए। कतिपय विश्वविद्यालय इस दिशा में कार्य भी कर रहे हैं। उदाहरणार्थ हमारा संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय तथा काशी हिंदू विश्वविद्यालय आदि।
भारतीय शिक्षा व्यवस्था को राष्ट्रीय दृष्टि से अधिकाधिक सुदृढ़, आकर्षक, प्रभावशाली तथा ज्ञानार्जन के लक्ष्य से अधिक लोकोपयोगी बनाने के लिए आयोग का यह सुझाव सर्वथा समर्थनीय है कि विज्ञान संबंधी विषयों के अध्ययन में उनसे संबद्ध संस्कृतवाङ्मय की भूमिका का भी तुलनात्मक ढंग से अध्ययन किया जाना चाहिए तथा उन विषयों से संदर्भित हमारे शास्त्रों के इतिहास का भी छात्रों को तुलनात्मक ज्ञान कराया जाना चाहिए। इसी प्रकार समस्त विद्यालयों, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालयों के छात्रों को अपने देश के पैतृक संपत्ति का ज्ञान कराने के लिए विभिन्न स्तरों के अनुकूल संस्कृत साहित्य, भारतीय चिंतन, दर्शन, धर्म, नीतिशास्त्र, कला-कौशल एवं वास्तुविधा की भूमिका देते हुए भारतीय संस्कृति के एक क्रमिक पाठ्यक्रम का अनिवार्य प्राविधान भी आवश्यक होना चाहिए। संस्कृत-शोध के क्षेत्र को सुव्यवस्थित तथा राष्ट्रीय दृष्टि से लाभप्रद एवं उपयोगी बनाने के लिए यह आवश्यक है कि देश में प्रचलित विभिन्न शोध संस्थानों को पर्याप्त स्थान, उपकरण तथा योग्य प्रशिक्षित कर्मचारी उपलब्ध कराये जायें। हमारे अधिकांश बड़े-बड़े शोध संस्थान भी धनाभाव से अपनी योजनाओं के यथासमय कार्यान्वयन में अपने को असमर्थ पा रहे हैं। विश्वविद्यालयों के अनेक उपयोगी शोधप्रबंध अप्रकाशित पड़े हुए हैं। बड़ी-बड़ी शोध योजनाएं बाधित हैं। इस संदर्भ में आयोग के इस विचार को हम उपयोगी समझते हैं कि शोधकार्य के प्रारंभ की स्वीकृति में कठोरता बरती जानी चाहिए। विषयों की पुनरावृत्ति न हो। कम परिश्रम साध्य अनुपयोगी तथा सरल विषय स्वीकृत न किए जाएं। वेद, वैदिक संस्कार, कर्मकांड, कल्पसूत्र, भाषाविज्ञान, पुराण, शब्दार्थ विकास विज्ञान, नाट्यशास्त्र, प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र, भारतीय मनोविज्ञान तथा आचारशास्त्र, भारतीय समाजशास्त्र, लोकसंस्कृति, सौंदर्यशास्त्र, संगीत, वास्तुकला, चित्रकला, मूर्तिकला तथा भारतीय विज्ञान और ज्योतिष की संहिता-शाखा आदि रोचक विषय अत्यंत उपेक्षित हैं। इन पर शोध कार्य किया जाना चाहिए। इस प्रकार भारत के अन्य देशीय संपर्क के क्षेत्र में भारतीय शोध कार्य नहीं के समान है। जो कुछ है वह भी विदेशी विद्वानों की खोज पर आधारित है। स्वतंत्र भारत में अब अन्य राष्ट्रों से राजनीतिक संबंध भी स्थापित किए जा चुके हैं। हमारे शोधकर्ताओं का यह परम कर्तव्य हो गया है कि वह मिस्त्र, मध्य पूर्व, मध्य एशिया, तिब्बत, चीन तथा जापान संबंधी प्राचीन भारतीय संपर्क के मौलिक शोध कार्य को अपने हाथों में लें। हमारे शोध छात्र केवल दर्शन या साहित्य पर ही दत्त चित्त न रहें। इन तथ्यों पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए देश में प्रचलित शोध संस्थानों की सहायता तथा व्ययसाध्य योजनाओं को संपन्न करने के लिए आयोग ने एक केंद्रीय भारतीय ज्ञान संस्थान की स्थापना का प्रस्ताव किया है। उनकी यह संस्तुति शोध कार्य को सुदृढ़ बनाने में अवश्य ही उपकारक सिद्ध होगी।
भारतीय इतिहास, विचार परंपरा तथा संस्कृति के क्षेत्र को भारतीय दृष्टिकोण से चिंतन के विषय में आज का विद्वत्समाज अधिक चिंतित प्रतीत होता है। पुरातत्व सामग्री के समान हमारा एतत्संबंधी कार्य बहुत कुछ उपयोगी तथा बहुमूल्य ग्रंथों पर भी निर्भर है, जो देश के विभिन्न भागों में पांडुलिपियां के रूप में बिखरे पड़े हैं। इन सामग्री का एक विशाल अंश विदेश में भी जा चुका है। हमारी पांडुलिपियों का विदेशों में ले जाए जाने का क्रम विगत तीन शताब्दियों से प्रचलित है। हमें इस हस्तलिखित सामग्री का संग्रह, संरक्षण, सूचीकरण एवं संपादन मात्र ही नहीं करना है, किंतु राष्ट्र के हित में विदेश जाने से भी उन्हें रोकना है तथा जो सामग्री विदेश जा चुकी है उसे पुनः प्राप्त करना है। पांडुलिपियों की देखभाल तथा उनकी व्यवस्था को सुसंघटित करने के लिए आयोग ने केंद्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण विभाग की योजना का सुझाव दिया है। इस संस्तुति के अनुसार इस विभाग की शाखाएं प्रत्येक प्रदेश में होंगी तथा अपने सुसंघटित रूप में यह विभाग पांडुलिपियों की खोज, उनका सर्वेक्षण, एकत्रीकरण, विवरणात्मक सूचीकरण एवं संपादन का कार्य स्थानीय शासकीय तथा शासकीय संघटनों के सहयोग से करेगा। हमारा यह सुझाव है कि यह विभाग विभिन्न सरकारी तथा गैर सरकारी शोध संस्थाओं एवं संस्थानों को पांडुलिपि-संग्रह तथा उनके वैज्ञानिक संपादन कार्य के लिए अपेक्षित आर्थिक सहायता देने का भी कार्य करे एवं उनकी एतत् संबंधी अन्यान्य कठिनाइयों को दूर करने में उन्हें हस्तावलम्ब दे। इससे हमारे देश के इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्य को अत्यधिक बल प्राप्त होगा। शासन का कर्तव्य है कि वह हमारी पांडुलिपियों को विदेशों में विक्रय या अन्य किसी भी प्रकार से बाहर ले जाने पर रोक लगाने के लिए उपयुक्त कानून बनावे तथा विदेशों के विभिन्न पुस्तकालयों एवं संग्रहालयों में हमारे ज्ञान-विज्ञान के जो बहुमूल्य दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथ संग्रहित हैं, उनका सर्वेक्षण करके उनकी माइक्रोफिल्म प्रतिलिपि तैयार करावे तथा उसे पांडुलिपि सर्वेक्षण विभाग में संचित करें। भूतपूर्व रजवाड़ों के राज महलों की पांडुलिपियों के संग्रह अब भी विद्वानों की पहुंचकर बाहर है, उन्हें जनता के लिए खोल देना चाहिए। आयोग ने इन सभी बातों पर अपने सुझाव तथा विचार प्रस्तुत किए हैं। 
       मूलतः संस्कृत के सांस्कृतिक मूल्य पर ही हमारे देश की एकता निर्भर है। क्षेत्रीय भाषाबाद जैसी अनेक घटनात्मक प्रवृतियों से हमारे देश की एकता खतरे में है। इन तत्वों को निष्क्रिय तथा निष्फल बनाने के लिए शासकीय तथा शैक्षिक स्तर पर संस्कृत का प्रश्रय आवश्यक जान पड़ता है। जैसे-जैसे हम संस्कृत को अपनाएंगे उसकी एकीकरण की शक्ति बलवती होगी तथा ये विघटनात्मक प्रवृत्तियां क्षीण एवं शिथिल होती जाएंगीं। इस संदर्भ में आयोग का यह सुझाव है कि सार्वजनिक अवसरों पर हिंदी, क्षेत्रीय भाषाओं अथवा अंग्रेजी के साथ संस्कृत का भी व्यवहार किया जाना चाहिए। हमारे विचार से केवल अपने देश ही में नहीं अपितु विदेशों में भी भारतीय दूतावासों तथा भारतीय छात्र संगठनों के बीच विशेष आयोजन, उत्सवों एवं इस प्रकार के अन्य समारोह के अवसर पर विभिन्न राष्ट्रभाषाओं एवं हिंदी के साथ संस्कृत का भी प्रयोग केवल इन अवसरों की शोभा एवं गौरव का ही संवर्धन नहीं करेगा, अपितु अन्य देशों में भारतीय व्यक्तित्व को समुज्जवलित करने में भी यह प्रक्रिया सहायक सिद्ध होगी।
       विद्यालयों में अनुशासन एवं नैतिक शिक्षा का प्रश्न आज हमारे सामने है। हमारा संस्कृतवाङ्मय लोकोक्तियां, सुभाषितों एवं कहावतों का एक विशाल भंडार है। यह सुभाषित तथा नीति के श्लोक प्राचीन भारतीय छात्रों को सच्चरित्र तथा व्यवहार कुशल बनाने के महत्वपूर्ण साधन थे, क्योंकि मस्तिष्क पर इनका गंभीर तथा स्थायी प्रभाव पड़ता है। बाल्यकाल के कंठस्थ नीति श्लोक बालक के जीवन में सदा उत्तम विचारों, कार्यों तथा व्यवहारों से संबद्ध एक मित्र के समान प्रेरणा के स्रोत बने रहते हैं। अपनी शिक्षा व्यवस्था में यदि शिशु कक्षाओं से ही हम बालकों को इन सुभाषितों की योजनाबद्ध शिक्षा दें तो हम अपने भावी नागरिकों के चरित्र निर्माण द्वारा राष्ट्र की अनुपम सेवा कर सकेंगे। इस संदर्भ में हम आयोग के विचारों का स्वागत करते हैं।
        स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत विश्व के समस्त राष्ट्र भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के जिज्ञासु बन गए हैं तथा उसका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के लिए उत्सुक हैं। यही नहीं, हमारी भारतीय जनता भी राष्ट्रप्रेम से प्रभावित होकर अपनी प्राचीन संस्कृति को श्रद्धा की दृष्टि से देखने लगी है। दासतायुग के वातावरण एवं शासन व्यवस्था की विदेशी स्वार्थमयी प्रवृतियों के प्रति भी उनकी अरुचि स्पष्ट है। अतः राष्ट्र के हित में यह आवश्यक हो गया है कि हमारा अधिकारी वर्ग, विदेश जाने वाले हमारे छात्र, विदेश स्थित हमारे छात्र संगठन एवं दूतावास भारतीय संस्कृति की वास्तविकता, भारतीय चिंतन के यथार्थ स्वरुप तथा भारतीय सभ्यता के रहस्य से भलीभांति परिचित हों तथा उन्हें तत्संबंधी अच्छा ज्ञान प्राप्त हो। ऐसा होने पर ही वह देश तथा विदेश में यथार्थ भारतीय व्यक्तित्व का प्रकाशन एवं प्रतिनिधित्व कर सकेंगे। भारतीय जनता का विश्वास, सम्मान तथा सहयोग प्राप्त कर सकेंगे तथा बाहर जाकर उन राष्ट्रों के उत्सुक जनवर्ग को भारत का वास्तविक सांस्कृतिक संदेश दे सकेंगे। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए आयोग ने यह संस्तुति की है कि भारतीय प्रशासन एवं विदेशी सेवाओं के प्रशिक्षणार्थी को भारतीय संस्कृति, सभ्यता एवं संस्कृतचिंतन का भी यथोचित ज्ञान कराया जाना चाहिए। केंद्रीय शासन के विदेश विभाग को हमने भी एक इसी प्रकार का प्रस्ताव भेजा है,जिसे शासन का अनुमोदन प्राप्त हो चुका है। इस क्रिया की सफलता के लिए आयोग की यह संस्तुति उपयोगी सिद्ध होगी कि प्रत्येक दूतावास में एक सांस्कृतिक अनुभाग खोला जाए तथा उसमें विद्वान् सांस्कृतिक अधिकाररियों की नियुक्ति की जाए जो भारतीय संस्कृति एवं संस्कृत चिंतन के संबंध में विदेशी जनता के जिज्ञासाओं का समाधान कर सके। वहां के विश्वविद्यालयों के छात्रों की सहायता कर सके तथा भारतीय सांस्कृतिक क्रियाकलापों का भी प्रदर्शन कर सकें।
        इस समय प्रौढ शिक्षा संबंधी अभियान एक राष्ट्रीय आंदोलन का रुप धारण कर चुका है तथा केंद्रीय एवं प्रादेशिक शासन एतत्संबंधी विभिन्न योजनाओं के सक्रिय कार्यान्वयन में तत्पर हैं। भारतीय परंपराओं तथा भारतीय संस्कृति के प्रति हमारा जनवर्ग अभी हृदय से सम्मान तथा श्रद्धा की भावना से ओतप्रोत है। प्रौढ शिक्षा को सांस्कृतिक रूप देने के लिए क्या ही अच्छा होता कि इस कार्यक्रम में पुराण, रामायण, महाभारत, गीता, उपनिषद् इत्यादि पर मनोरंजक व्याख्यानों एवं प्रदर्शनों की व्यवस्था की जाती, जिससे हमारी जनता अपने प्राचीन सांस्कृतिक आदर्श एवं आचार-व्यवहारों का उपदेश प्राप्त कर सकती। इस योजना में देश के प्रतिभाशाली व्यास परिवारों की सेवा से लाभ उठाया जा सकता है। कतिपय प्रदेशों के सामुदायिक विकास तथा राष्ट्रीय प्रसार कार्य में इन व्यासों की सामयिक नियुक्ति भी की जा सकती है।
          हमारे देश में इस समय संस्कृत शिक्षा संबंधी अनेक न्यास तथा समर्पित निधियां विद्यमान हैं। इनमें से कुछ ऐसे भी ट्रस्ट है जो या तो निष्क्रिय है या दाता की इच्छा के विरुद्ध उनका धन अंग्रेजी शिक्षा में लगाया जा रहा है। यह एक गंभीर प्रसंग है जिसकी हम उपेक्षा नहीं कर सकते। शासन का कर्तव्य है कि संस्कृत शिक्षा के हित में वह अपने स्रोतों एवं साधनों से ऐसे अपराधी प्राभूतों का सर्वेक्षण कराएं तथा ऐसा कानून बनाए जिससे संस्कृत के लिए समर्पित इन निधियों की आय समुचित रुप से संस्कृत शिक्षा में ही लगाई जा सके। आयोग की संस्तुति का कार्यान्वयन संस्कृत शिक्षा के समुन्नयन तथा उसके सम्मान के संवर्धन की दिशा में निश्चय ही उपकारक सिद्ध होगा।
        केंद्रीय तथा प्रादेशिक शासन अपने विभिन्न विभागों की व्यवस्था में अत्यंत व्यस्त है। ऐसी स्थिति में एक ऐसे राष्ट्रीय संगठन का होना आवश्यक है, जो प्रशासन का ध्यान संस्कृत की ओर आकर्षित करता रहे, संस्कृत संबंधी संस्थाओं, संस्थानों तथा संगठनों को समन्वित करता रहे तथा समस्त देश की पारंपरिक शिक्षा को एक सूत्र में संबद्ध कर सके। इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के प्रथम कुलपति स्वर्गीय डॉक्टर आदित्यनाथ जाने यह केंद्रीय संस्कृत शिक्षा परिषद् का सुझाव रखा था। संस्कृत आयोग ने भी इस प्रकार की संस्कृत शिक्षा परिषद् की संस्कृति की है। इस संगठन के माध्यम से देश में व्याप्त पारंपरिक संस्कृत शिक्षा के क्षेत्र में प्रचलित विभिन्न परीक्षाओं के नाम, उनके तथा पाठ्यक्रम एवं मान्यता में आज जो विभिन्नता विद्यमान है वह दूर की जा सकती है तथा उसमें एकरूपता लायी जा सकती है। इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के समान यह परिषद् देश के संस्कृत महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों एवं शोध संस्थानों को विकास अनुदान भी दे सकेगी। यह आवश्यक होगा कि इस परिषद् के सदस्य ऐसे ही व्यक्ति होंगे जो संस्कृत शिक्षा के समस्त पहलुओं के पारंपरिक तथा आधुनिक शैक्षिक एवं प्रशासनिक अनुभव रखते हो।
        आयुर्वेद की शिक्षा के संदर्भ में आज यह प्रश्न विवादास्पद बना हुआ है कि विशुद्ध आयुर्वेद की पारंपरिक शिक्षा दी जाए या अर्वाचीन चिकित्सा के कुछ उपयोगी अंश भी उस में सम्मिलित किए जायें? इस संदर्भ में हम संस्कृत आयोग के इस विचार का समर्थन करते हैं कि यद्यपि आधुनिक ज्ञान तथा प्रशिक्षण का कुछ थोड़ा सा अंश आयुर्वेद के पाठ्यक्रम में मिला देना आवश्यक प्रतीत होता है, किंतु इसकी मात्रा अधिक हो जाने पर आयुर्वेद की विशिष्टता नष्ट हो जाएगी। आयुर्वेद की शिक्षा को सजीव तथा विशेष जनोपयोगी बनाने के लिए विश्वविद्यालयों में आयुर्वेद शोध विभागों की स्थापना की जानी चाहिए तथा आयुर्वेद के पाठ्यक्रमों में सम्मिलित होने वाले अभ्यर्थियों के लिए संस्कृत का यथेष्ट पूर्वज्ञान अनिवार्य किया जाना चाहिए। आयुर्वेद के प्रशिक्षण को अत्यधिक प्रभावशाली तथा स्वाभाविक बनाने के लिए यह भी आवश्यक है कि आयुर्वेद की पाठ्यपुस्तकें भी संस्कृत में लिखी जाए।
          भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता से संबद्ध विभिन्न संदर्भ अनेक मंत्रालयों में बिखरे पड़े हैं। यह मंत्रालय अपने अपने ढंग से इन संदर्भों पर सोचते विचारते हैं। इस व्यवस्था से एक ही संदर्भ का दो या अधिक मंत्रालयों में दोहराए जाने तथा विभिन्न-विभिन्न रूप से कार्यान्वित किए जाने की भी संभावना रहती है। इन विभिन्न क्रियाओं का एकीकरण आवश्यक प्रतीत होता है। यह भी आवश्यक है कि देश के सांस्कृतिक विकास की नीति सुदृढ़ बनाई जाए तथा एतत् संबंधी विभिन्न क्रियाकलापों का केंद्रीकरण किया जाए। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए आयोग ने एक पृथक् संस्कृति मंत्रालय स्थापित किए जाने की संस्कृति की है, जिसके अंतर्गत देश के समस्त सांस्कृतिक संदर्भ कार्य करेंगे। हमारा विश्वास है की इस मंत्रालय की स्थापना से देश में संस्कृत तथा संस्कृति के क्षेत्र में संपन्न होने वाले क्रियाकलापों को विशेष शक्ति प्राप्त हो सकेगी।
        संस्कृत को समुन्नत करने की दिशा में आयोग ने अनेकानेक सुझाव प्रस्तुत किए हैं, उनमें से कुछ थोड़े से अत्यंत महत्वशील सुझावों के कतिपय अंशों पर ही हमने दृष्टि डाली है। 
 वाराणसी
 गंगा दशहरा संवत् 2036                                            बद्रीनाथ शुक्ल
(5 जून, 1979 ई. मंगलवार)                       अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी तथा
                                                            कुलपति संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय

सोमवार, 14 अगस्त 2017

संस्कृत सप्ताह 2017

परिचय
संस्कृत दिवस रक्षाबंधन के दिन श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है। संस्कृत दिवस एक परम्परा है। वैदिक साहित्य में यह श्रावणी के नाम से लिखा गया है। इसी दिन वैदिक विद्वान् उपाकर्म करते हैं,।इसमें हेमाद्रि संकल्प लेने के साथ यज्ञोपवीत का परिवर्तन किया जाता है। अन्य त्यौहारों की तरह ही यह एक त्यौहार है। यही भाषा हमें पर्वों एवं त्यौहारों से परिचय करकार जीवन को नवगति देती है। जीवन में उल्लास का वातावरण तैयार करती है। अतः यह त्यौहारों का त्यौहार है। सभी पर्वों एलं त्यौहारों की जन्मदातृ। संस्कृत दिवस के दिन संस्कृत भाषा के प्रति प्रेम तथा अनुराग रखने वाले लोग इसे उल्लास पूर्वक मनाते हैं।
उद्देश्य
संस्कृत दिवस मनाने के पीछे मुख्यतः तीन उद्येश्य हैं-
1. वर्ष भर में संस्कृत के लिए किये गये कार्यों के मूल्यांकन ।
2. आगामी वर्ष के लिए कार्य योजना का निर्माण ।
3. इस अवसर पर विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों को आयोजित कर संस्कृत के प्रति जनाकर्षण पैदा करना ।
         संस्कृत दिवस के बारे में संस्कृत के कुछ बुद्धिजीवियों को मैंने कहते सुना है कि एक दिन में बहुत कुछ नहीं बदला जा सकता। यह सच है, परंतु 1 दिन भी कुछ नहीं किया जाए, इससे यह बेहतर है कि एक दिन तो कुछ किया जाए। कोई भी दिवस प्रेरणा दिवस का कार्य करता है, जिसके आयोजनों के द्वारा हम प्रेरित होते हैं। उन आयोजनों के द्वारा समाज को जोड़ने की कोशिश करते हैं। उत्सव के बहाने जोड़े गए लोगों को साथ लेकर सालों साल काम किया जाता है। इसीलिए एक दिन को उत्सव का रूप देकर सामुहिक आयोजन किया जाता है। संस्कृत दिवस पर हम जन संवाद करते हैं। इस प्रकार हम जनता की नब्ज टटोलते हैं। जनता की नब्ज टटोलने तथा उनसे संस्कृत के वारे में राय जानने का अवसर हमें किसी विद्यालय में नहीं मिल पाता है। किसी भी भाषा की उन्नति के लिए विचार विमर्श आवश्यक होता है। संस्कृत से जो नहीं जुड़े हैं, उन्हें जोडने के लिए संस्कृत दिवस हमें अवसर भी देता है और उपाय भी। बच्चे और युवा सामूहिक आयोजन से सक्रिय हो उठते हैं।                संस्कृत शिक्षा केंद्रों पर सिर्फ पाठ्यपुस्तकें ही पढ़ाई जाती है, जबकि संस्कृत दिवस पर हम संस्कृत के व्यापक सामाजिक, ऐतिहासिक संदर्भ को जानते और समझते हैं। संस्कृत की विकास गाथा की चर्चा हम सुनते हैं। इसकी समस्याओं से रुबरु होते हैं। भविष्य में आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए कार्य योजना तैयार करते हैं। इस प्रकार संस्कृत के बारे में पाठ्यपुस्तकों के अतिरिक्त हमारा सोच व्यापक होता है। यही संस्कृत दिवस की प्रासंगिकता है और यथार्थ भी।
           संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति, परंपरा तथा आदर्श की रक्षा कवच है। प्राचीन काल में इसी दिन से शिक्षण सत्र आरंभ होता था। रक्षाबंधन के दिन संस्कृत दिवस मनाने के पीछे उद्देश्य यह है कि जिस तरह यह भाषा अन्य भाषाओं का लालन-पालन, पोषण तथा संवर्धन की है, उसी तरह हमारा भी दायित्व बनता है कि हम इस भाषा को संरक्षण प्रदान करने का संकल्प लें। इस भाषा के प्रति आत्मीय भाव को पुनर्जागरण कराने में संस्कृत दिवस की अहम भूमिका है। यह दिवस हमें प्रेरणा देता है तथा संकल्पबद्ध होने का सुअवसर भी।
इतिहास
भारत सरकार ने 1956 में प्रथम संस्कृत आयोग का गठन किया। इस आयोग के अध्यक्ष प्रोफेसर सुनीति कुमार चटर्जी थे। इस कमेटी ने संस्कृत को आधुनिक शिक्षा प्रणाली से जोड़ने के साथ अन्य कई सिफारिशें की। उसमें एक दिन संस्कृत दिवस के रूप में मनाने की भी सिफारिश की गयी। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के आदेश से केन्द्रीय तथा राज्य स्तर पर संस्कृत दिवस मनाने का निर्देश 1969 में जारी किया गया। तब से प्रतिवर्ष श्रावण पूर्णिमा के दिन से संस्कृत दिवस मनाना आरम्भ हुआ । संस्कृत भाषा स्वयं में हजारों वर्षों का इतिहास समेटे है, इसका उसी के अनुरूप में कार्य विस्तार भी हुआ। इसमें इतने अधिक विषय वस्तु है कि मात्र 1 दिन में लोगों के परिचित करा पाना संभव नहीं था। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश को एक ही दिन संस्कृत के समस्त पक्षों से परिचित कराना असंभव होता था। अतः इसका आयोजन सप्ताहव्यापी किए जाने की घोषणा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में किया गया। भारत में अब तक संस्कृत शिक्षा के उत्थान के लिए 2 संस्कृत आयोगों का गठन किया जा चुका है। जनता तथा लोक सभा के आग्रह पर केंद्रीय शासन ने संस्कृत भाषा के पठन-पाठन, अनुसंधान एवं संस्कृत शिक्षा की समस्याओं के अध्ययन आर्थिक तथा स्वतंत्र भारत में संस्कृत भाषा के चतुर्दिक विकास एवं उसके पुनः संगठन की जानकारी के लिए विश्वविख्यात भाषा वैज्ञानिक डॉक्टर सुनीति कुमार चटर्जी की अध्यक्षता में 1 अक्टूबर सन 1956 को प्रथम संस्कृत आयोग का गठन किया था। इस आयोग ने अक्टूबर 1957 में अपना सर्वांगपूर्ण प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। 12 अध्यायों के अपने इस प्रतिवेदन में सम्मानित सदस्यों ने संस्कृत शिक्षा के ऐतिहासिक विवेचन के साथ उसकी वर्तमान स्थिति का रोचक चित्रण किया है। प्रथम संस्कृत आयोग के 58 साल बाद 2013 में द्वितीय संस्कृत आयोग का गठन यूपीए-2 सरकार के समय में पद्मभूषण प्रो. सत्यव्रत शास्त्री की अध्यक्षता में किया गया। इसमें 13 सदस्य थे। इस आयोग ने 407 पृष्ठों की अंतिम रिपोर्ट मानव संसाधन विकास मंत्रालय मंत्रालय को सौंप दी। भारत सरकार ने इस आयोग द्वारा किये गये सिफारिश को लागू करने के लिए  एन. गोपालस्वामी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया, जो संस्कृत भाषा के लिए दसवर्षीय कार्ययोजना प्रस्तुत कर सकें। उक्त समिति ने विजन एंड रोड मैप फॉर द डेवलपमेंट ऑफ संस्कृत 10 ईयर पर्सपेक्टिव प्लान बनाकर भारत सरकार को सौंप दिया।
आवश्यकता
            सर्वविदित है कि संस्कृत भाषा से ही अन्य अधिकांश भाषाओं की उत्पत्ति हुई है भाषाओं की उत्पत्ति के साथ ही इसमें ज्ञान-विज्ञान का सृजन तथा परस्पर आदान प्रदान भी हुआ संस्कृत अन्य भाषाओं की जननी होने के साथ हैं अन्य भाषाओं को विभिन्न भावों, व्यवहारों आदि को व्यक्त करने के लिए आवश्यक शब्द उपलब्ध कराती रही है। वहीं अनुवाद परंपरा से उन्हें पुष्टि भी करती रही है। आज समस्त भारोपीय भाषाएं तथा इन भाषाओं का व्यवहार करने वाला मानव संस्कृत भाषा का ऋणी है। उनका जीवन भाषाओं के माध्यम से चलता है। संस्कृत ने ही मानवीय भाषाओं को अतीत से वर्तमान तक प्रत्येक रूप में पालन पोषण तथा संरक्षण दिया है। इस भाषा के अवदान एवं अनिवार्यता से जन-जन को परिचित कराने के लिए संस्कृत भाषा को एक त्यौहार के माध्यम से पहुँचाने तथा उन तक संपर्क बढ़ाने के लिए संस्कृत सप्ताह की आवश्यकता है।
वर्तमान स्थिति
             आज संस्कृत सीखने के मुख्य तीन स्रोत हैं। 
1. विद्यालय 
2. पत्राचार, रोडियो, टेलीविजन, इन्टरनेट, समाचार पत्र तथा पत्रिका 
3. स्वयंसेवी संगठनों, भाषा शिक्षण हेतु केन्द्र सरकार द्वारा संचालित अौपचारिक शिक्षण केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा संचालित संस्कृत सम्भाषण, पौरोहित्य आदि के प्रशिक्षण कार्यक्रम।
विद्यालय
 विद्यालयों में संस्कृत की शिक्षा देने के तीन उपक्रम है।
      (क) वह विद्यालय जिन्हें हम संस्कृत माध्यम का अथवा परंपरागत विद्यालय तथा महाविद्यालय कहते हैं। देश में कुल 14 संस्कृत विश्वविद्यालय। संस्कृत माध्यम से उच्चतर माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा देने के लिए उत्तर प्रदेश माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद् से उत्तर प्रदेश में 1192 विद्यालय संबद्ध हैं।
             उत्तर प्रदेश माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद् का गठन वर्ष 2001 में तत्कालीन रामप्रकाश गुप्त के शासन काल में किया गया। आपने गठन काल से ही यह परिषद् बदहाल स्थिति में है। इस परिषद को संचालित करने के लिए अभी तक इसका अपना भवन तथा कर्मचारियों की व्यवस्था नहीं हो पायी है। यहां का पाठ्यक्रम भी अत्यंत पुराना है। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा संचालित पाठ्यक्रम को ही यहाँ भी स्वीकार किया है, जिसे 50 से अधिक वर्षों से भी बदला नहीं गया है। परिषद् के नवीन पाठ्यक्रम के निर्माण के लिए गत वर्ष प्रयास किए गए, लेकिन कुछ परंपरागत पंडितों के विरोध के कारण उसे लागू नहीं कराया जा सका। वर्ष 2005 में जहां यहां पर 200000 छात्रों की संख्या थी जो अब घटकर मात्र 80000 तक सीमित हो गई है। इस परिषद् के पाठ्यक्रमों का ट्यूटोरियल बनाने की घोषणा पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा की गई, परंतु यह योजना सरकारी फाइलों में उलझ कर रह गई ।  यह कुछ आंकडे हैं,जो संकेत करने के लिए काफी हैं कि उत्तर प्रदेश में परम्परागत माध्यमिक संस्कृत शिक्षा की स्थिति लगातार अधोमुखी होती जा रही है।
           उत्साहवर्धक बात रही कि मायावती के शासनकाल में जहां कुछ विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति की गई, वहीं समाजवादी पार्टी के सरकार में 100 से अधिक नए विद्यालयों को अनुदान सूची में सम्मिलित किया गया। इस प्रकार एक आशा की किरण परम्परागत माध्यमिक संस्कृत शिक्षा से भी दिखायी दे रही है।  बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड,पटना छत्तीसगढ़ संस्कृत विद्या मंडलम्,रायपुर जैसे अनेक राज्यों के बोर्ड भी परंपरागत संस्कृत के विद्यालयों को संचालित करने के लिए अलग से गठित है।
            (ख) वेद के सस्वर कण्ठस्थ पाठ परंपरा को संरक्षित रखने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन महर्षि सांदीपनि वेद विद्या प्रतिष्ठान तथा शंकराचार्य, महर्षि महेश योगी जैसे अन्य संतों के द्वारा वेद विद्यालय खोले गए हैं। वहां पर वेद के मूल भाग को कंठस्थ कराया जाता है।
       (ग) तीसरे उपक्रम में राज्य सरकारों के बोर्ड, CBSE तथा ICSC बोर्ड, विभिन्न विश्वविद्यालय तथा उससे संबद्ध महाविद्यालय आते हैं, यहां अन्य पाठ्यक्रमों के साथ एक विषय के रूप में संस्कृत शिक्षा भी दी जाती है। इसे संस्कृत की आधुनिक धारा कहा जाता है। इन सबी स्थानों पर विद्यालय के माध्यम से संस्कृत की शिक्षा दी जाती है।
पत्राचाररोडियोटेलीविजनइन्टरनेटसमाचार पत्र तथा पत्रिका 
      जो लोग किन्ही कारणों से विद्यालय में आकर संस्कृत शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकते, उनके लिए राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान एवं संस्कृतभारती जैसी संस्थाएं पत्राचार के माध्यम से संस्कृत की शिक्षा उपलब्ध करा रही है। दिव्य वाणी जैसे निजी रेडियो चैनल, टेलीविजन पर वार्तावली, CEC- UGC टीवी के व्यास चैनल पर Learn sanskrit Be Modern नामक संस्कृत सिखाने का भी कार्यक्रम चलाया जाता है। अनेक सोशल मीडिया तथा वेबसाइट के माध्यम से भी संस्कृत शिक्षण  कार्य चल रहा है। देश में अनेक दैनिक समाचार पत्र तथा 3000 से अधिक पत्रिकाओं का नियमित प्रकाशन हो रहे हैं, जिसके माध्यम से संस्कृत भाषा तथा उसमें निहित ज्ञान को सीखा जा सकता है।
स्वयंसेवी संगठनोंभाषा शिक्षण हेतु केन्द्र सरकार द्वारा संचालित अौपचारिक शिक्षण केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा संचालित संस्कृत सम्भाषणपौरोहित्य आदि के प्रशिक्षण कार्यक्रम।
       संस्कृतभारती, लोकभाषा प्रचार समिति जैसे कुछ स्वयंसेवी संगठन भाषा शिक्षण हेतु नियमित शिविरों का संचालन करता है। संस्कृतभारती ग्रीष्म काल में सम्पूर्ण देश में आवासीय संस्कृत सम्भाषण प्रशिक्षण शिविर का आयोदन करती है, जिसमें सम्भाषण शिविर में पढ़ाने हेतु प्रशिक्षण भी देती है।  राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान द्वारा देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा अन्य स्थानों पर अनौपचारिक संस्कृत शिक्षण केंद्र का संचालन किया जाता है। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ प्रतिवर्ष सरल संस्कृत सम्भाषण प्रशिक्षण शिविर, ज्योतिष एवं कर्मकाण्ड प्रशिक्षण शिविर का आयोजन करता है।
        यदि देखा जाए तो कोई भी भाषा स्वयं में जीविकोपार्जन का साधन नहीं होती, अपितु भाषा द्वारा उपार्जित ज्ञान से रोजगार पाया जाता है। भाषा से रोजगार खोजने वाले को चाहिए की संस्कृत में निहित ज्ञान का उपयोग करते हुए विभिन्न रोजगार को खोजें।संस्कृत भाषा के विस्तार में अनेक सहायक उपकरण है। कभी-कभी कुछ उपकरण भाषा के विकास में रुकावट भी पैदा करता है उसी में से एक है लिपि।  संस्कृत भाषा अनेक लिपि में लिखी जाती है परंतु समस्या तब आती है जब अनेक लिपि में इसकी पुस्तकें मुद्रित नहीं हो पाती। भारत जैसे देश में अनेक लिपियां प्रचलित हैं। वहां के छात्रों को संस्कृत अध्ययन के समय पहले देवनागरी लिपि का ज्ञान करना होता है, उसके बाद वह संस्कृत भाषा का ज्ञान प्राप्त कर पाता हैं। भाषा शिक्षण के लिए वर्तमान के डिजिटल युग में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रगत अध्ययन केंद्र द्वारा अनेक टूल्स विकसित किए। इसी प्रकार उस्मानिया विश्वविद्यालय तथा विभिन्न IIT के द्वारा भी टूल्स विकसित किए गए हैं ।
 संस्कृत की विशाल ज्ञान संपदा अभी भी पांडुलिपियों में सुरक्षित हैं। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के द्वारा कुछ वर्षों पूर्व उन पांडुलिपियों का डिजिटलाइजेशन किया गया था। अभी भी वह पांडुलिपि सुगमता से प्राप्त नहीं हो रहे हैं। यदि इसके लिए कोई समुचित तंत्र विकसित हो जाए तब संस्कृत अध्ययन का विस्तार सुनिश्चित है।
राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान मुंबई परिसर के  शिक्षाशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर मदन मोहन झा तथा मैंने भी कई Android ऐप विकसित किये। पुस्तक संदर्शिका मोबाइल ऐप में संस्कृत पुस्तकों की सूची तथा विद्यालय अन्वेषिका में उत्तर प्रदेश में स्थित संस्कृत शिक्षण केंद्रों की सूची दी गयी है। अभी तक हमारे पास एक साथ एक ही स्थान पर संस्कृत शिक्षा केन्द्रों के वारे में जानकारी पाने का आसान स्रोत उपलब्ध नहीं था।  हमारे आसपास संस्कृत की कौन - कौन संस्थाएं कार्यरत है तथा उनसे हमें किस प्रकार की सहायता मिल सकती है। योग्य छात्रों को आसान सूचना उपलब्ध नहीं मिलने के कारण उन्हें उचित विद्यालय में नामांकन लेने में कठिनाई आ रही थी। अच्छे शिक्षण संस्थाओं को योग्य छात्र नहीं मिल पाते थे। अब आप घर बैठे इस ऐप की सहायता से अपने जनपद अथवा प्रदेश में स्थित माध्यमिक विद्यालयों, वेद विद्यालयों, महाविद्यालयों आदि का नाम, पता, सम्पर्क सूत्र तथा वहां पर उपलब्ध शैक्षिक सुविधाओं के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। आप अपने परिचितों को उचित सुझाव दे सकते हैं। यह ऐप संस्कृत पुस्तक प्रेमियों तथा पुस्तकालयों को पुस्तक खरीद, अभिभावकों को श्रेष्ठ शिक्षण संस्थान के चयन, छात्रों को परीक्षा केंद्र तक पहुंचने, योजनाकार को संस्कृत संबंधी योजना के निर्माण, पत्रवाहक को संस्कृत विद्यालयों तक पत्र पहुंचाने आदि जैसे विविध कार्य में सहायक सिद्ध होगा। इससे उन संस्थाओं को भी पहचान मिल सकेगा, जो अब तक पहचान की संकट के कारण उपेक्षित थे। इसी प्रकार अबतक अनेक प्रकार के शब्दकोश, व्याकरण आदि के लिए Android ऐप आ चुका है। इस प्रकार संस्कृत के डिजिटल युग के एक नया दौर का आरंभ हो चुका है।  इसी संस्कृत सप्ताह के अवसर पर दिनांक 4 अगस्त से 10 अगस्त 2017 तक मैंने संस्कृत पद्य रचनम् ।। कवयो वयममी।। इस Facebook ग्रुप पर 25 से अधिक संस्कृत कवियों  के कविता पाठ का लाइव प्रसारण करवा चुका हूँ। डिजिटल संस्कृत कवि सम्मेलन का यह पहला और अनूठा प्रयोग था, जिसे सफलतापूर्वक संचालित किया जा चुका है। इस प्रकार संस्कृत डिजिटल युग की भाषा भी  बनती जा रही है।
इस वर्ष के संस्कृत सप्ताह में लखनऊ का हिंदी प्रिंट मीडिया संस्कृत भाषा की खबर को प्रमुखता से प्रकाशित की। संस्कृत सप्ताह का समाचार छापने को लेकर उनमें प्रतिस्पर्धा का भाव देखा गया। यहां का समाज भी इस प्रकार के समाचार की प्रतीक्षा करता है, क्योंकि इस वर्ष हमने लखनऊ के निशातगंज पांचवी गली में स्थित सब्जी मंडी की दुकानों पर सब्जियों के संस्कृत में लिखे हुए नाम की पट्टिका लगाया। अनेक दुकानों पर सचित्र सब्जियों के नाम लिखे वैनर लगाये गये। लखनऊ निवासी इस अनूठे प्रयास को देखने तथा सब्जियां खरीदने  बड़ी मात्रा में आये । यहां संस्कृत को लेकर कुछ अधिक ही उत्सुकता रहती हैं। नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, अमर उजाला ने संस्कृत सप्ताह से जुड़े समाचार को सचित्र प्रकाशित किया।