शनिवार, 17 जून 2017

योग की महायात्रा

       योग की यात्रा उपनिषदों से शुरु होकर बौद्ध, जैन, तन्त्रागम, संहिता होते हुए गीता में पूर्ण होती है। इससे सिद्ध है कि योग के अनेक पथ परन्तु एक लक्ष्य है। उसे ही आत्मा और परमात्मा का मिलन अथवा समाधि कहा गया है। पातञ्जलयोग दर्शन में पतंजलि ने अपने से पूर्ववर्ती औपनिषदिक तथा सांख्य के आचार्यों के सिद्धान्तों को लेकर योग विद्या को सुव्यवस्थित रूप दिया। इसे अष्टांगयोग अथवा राजयोग कहते हैं। प्रस्तुत आलेख में पूर्वोक्त विषयों के साथ योग की परिभाषा, चित्त का स्वरुप, चित्त की अवस्था तथा अष्टांग साधन की चर्चा की गयी है।
       मैं अपने इस ब्लाग पर प्रतिवर्ष विश्व योग दिवस के अवसर पर भारतीय योग विद्या पर लेख लिखता आया हूँ।गत वर्ष 21 जून 2016 को योग दिवस के अवसर पर योगः एक प्रायोगिक विज्ञान नामक लेख लिखा था।
योग की समस्त पुस्तकें संस्कृत भाषा में लिखी है। यहाँ अनेक पारिभाषिक शब्द होते हैं,जिसका सही अर्थ जानने के लिए हमें अन्य सन्दर्भ ग्रन्थों की सहायता लेनी पड़ती है। विना संस्कृत पढ़े गूढ़ विषय की सही जानकारी नहीं हो पाती। मेरा बचपन और अब युवावस्था इन्हीं संस्कृत ग्रन्थों के अध्ययन करते बीता। अपनी जिम्मेदारी समझते हुए मुझसे जितना सम्भव हो रहा है इस वर्ष भी इस विषय पर प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध करा रहा हूँ।
भारतीय दर्शन परम्परा में योग परम्परा को तीन खण्डों में विभाजित किया जाता है। 
1. वैदिक काल (वेद तथा उपनिषद् साहित्य )
2. उत्तर वैदिक काल ( जैन, बौद्ध साहित्य, योग वाशिष्ठ, संहिता, तन्त्र, आगम ग्रन्थ आदि )
3. दर्शन काल ( पातंजल योग, गीता तथा विभिन्न शास्त्रों के दर्शन ग्रन्थ )
 उपर्युक्त योग की अविच्छिन्न परम्परा में लक्ष्य/साध्य एक ही है,परन्तु साधन भिन्न- भिन्न है। संस्कृत के ग्रन्थों में योग शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया गया है। इसका मूल कारण यह है कि इस योग शब्द की उत्पत्ति तीन अलग-अलग धातुओं से हुई है। ये मूल धातुएँ हैं-
1. युज् समाधौ- दिवादि गण   समाधि अर्थ में पतंजलि तथा सांख्य में प्रोक्त
2. युजिर् योगे-रुधादि गण      योग अर्थ में न्याय, वैशेषिक तथा वेदान्त दर्शन में प्रयुक्त
3. युज् संयमने- चुरादि गण    संयमन अर्थ में  
युजिर् में भी युज् शेष बचता है। युज् धातु से घञ् प्रत्यय करने पर योग शब्द बनता है।  भारत के प्राचीन शास्त्र ग्रन्थों में योग की परिभाषा अलग-अलग की गयी है।
 उपनिषदों में युजिर् योगे धातु से सम्पन्न योग है। संयोगो योग इत्युक्तो जीवात्मपरमात्मनोः। यह जीवात्मा और परमात्मा के संयोग को लक्षित करता है,जबकि पतंजलि तथा सांख्य प्रोक्त योग युज् समाधौ धातु से सम्पन्न होने के कारण समाधि को लक्षित करता है। योग साध्य है,जिसका साधन अष्टाङ्ग है।  प्रस्तुत आलेख में गीता में कहे समत्वं योग उच्यते को आधार माना हूँ। छान्दोग्य, बृहदारण्यक,श्वेताश्वतर उपनिषद् में योग के बारे में सूत्रात्मक जानकारी मिलती है। योग दर्शन पर कुछ स्वतंत्र उपनिषदें भी प्राप्त होती है। महर्षि पतंजलि (ई. पूर्व द्वितीय शताब्दी) योग के प्रथम प्रतिष्ठित आचार्य माने जाते हैं। इन्होंने ही सर्वप्रथम योग विद्या को सुव्यवस्थित रूप दिया। व्याकरण (अष्टाध्यायी पर महाभाष्य) तथा आयुर्वेद के अतिरिक्त इन्होंने योग दर्शन नामक पुस्तक की रचना की। श्रावण कृष्ण पंचमी(नागपंचमी) को वारणसी में स्थित नागकूँआ मुहल्ले में आज भी संस्कृत विद्वानों का शास्त्रार्थ होता है। माना जाता है कि इसी स्थान पर इसी तिथि को महर्षि पतंजलि का अवतार हुआ था। पतञ्जलि को शेषनाग का अवतार माना जाता है।
              योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।
              योsपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोsस्मि।

       इस पुस्तक को पातंजलयोगदर्शनम् कहा जाता है। भारतीय दर्शन में योग एक दर्शन है। तन्त्र के ग्रन्थों, उमास्वाती के तत्वार्थसूत्र में योग का वर्णन प्राप्त होते हैं। इसका चरम लक्ष्य समाधि है। पतंजलि कृत योग दर्शन पर सांख्य दर्शन का गहरा प्रभाव है। योग दर्शन के टीकाकार नारायणतीर्थ ने योगसिद्धान्त चन्द्रिका में षट्कर्म, षट्चक्र, कुण्डलिनी, शक्ति आदि नवीन विषयों की उद्भावना की। इन्होंने साधनभूत योग के क्रियायोग, चर्यायोग, कर्मयोग, हठयोग, मन्त्रयोग, ज्ञानयोग,अद्वैतयोग,लक्ष्ययोग, ब्रह्मयोग, शिवयोग, सिद्धियोग, वासनायोग, लययोग,ध्यानयोग, तथा प्रेमभक्तियोग के नाम से सूत्रों की चर्चा करते हुए राजयोग के असम्प्रज्ञात समाधि का पर्याय बताया। समाधि के दो भेदों असम्प्रज्ञात तथा सम्प्रज्ञात में अन्तर यह है कि सम्प्रज्ञात साधि चित्त की एकाग्र अवस्था में होती है,जिसमें राजसिक और तामसिक वृत्तियों का निरोध होता है। चित्त में सत्वज्ञान प्रधान वृत्तियाँ रहती है।  पतंजलि कृत राजयोग को अष्टांग योग कहा जाता है। योग की परिभाषा करते हुए पतंजलि ने कहा कि योगः चित्तवृत्तिनिरोधः। चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है। अतः योग को समझने के पहले चित्त और उसकी वृत्ति को समझना आवश्यक है।
योग दर्शन में चित्त से मन, बुद्धि और अहंकार को लिया गया है। मन ही कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय को कार्यों में लगाये रखता है। ब्रह्मबिन्दु उपनिषद् में मन पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। एक मंत्र में कहा गया है कि-
                मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
                बन्धाय विषयासंगो मुक्त्यै निर्विषयं मनः ॥
अर्थात् : मन ही मानव के बंधन और मोक्ष का कारण है। इन्द्रियविषयासक्त मन बंधन का कारण है और विषयोँ से विरक्त मन मुक्ति का कारण है ।" गीता में भी अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं-
               योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
               एतस्याहं न पश्यामि चंचलत्वात्स्थितिं स्थिराम्।।6- 33
               चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
               तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् || 34
अतः मन को सामान्यावस्था पर लाये विना किसी कार्य में सफलता नहीं मिल सकती। सुखदुःखे समे कृत्वा--। समत्वं योग उच्यते। अस्तु। 
चित्त की शुद्धि के लिए आहार और विहार (रहन सहन) का सही होना आवश्यक है, अन्यथा योग नहीं होकर केवल शारीरिक व्यायाम मात्र होकर रह जाएगा। योग के आठ अंगों को अपनाकर ही योग के चरम लक्ष्य को पाया जा सकता है। गीता में नियमित या सही-सही, नपा-तुला भोजन का निर्देश प्राप्त होता है-
              युक्ताहारविहारस्य युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
              युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा ।।6-17।।
  सत्व रज और तम इन तीनों गुणों की उद्रेक के अनुसार चित्त की निम्नलिखित तीन अवस्थाएं होती है।
1. प्रख्याशील 2. प्रकृतिशील 3. स्थितिशील। 
प्रथम अवस्था का चित्त सत्व प्रधान होता हुआ रज और तम से संयुक्त होकर अणिमा,महिमा आदि ऐश्वर्य का प्रेमी होता है। प्रकृतिशील अवस्था में तमोगुण से युक्त चित्र अधर्म, अज्ञान,अवैराग्य तथा अनैश्वर्य से संयुक्त होता है। स्थितिशील अवस्था में तम के क्षीण होने पर रजस् के अंश से युक्त होने पर चित्त सर्वत्र प्रकाशमान होता है तथा धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य से व्याप्त होता है।
         योग दर्शन में चित्त की पांच भूमियां अथवा अवस्थाएं स्वीकार की गई है। ये भूमियां है- क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र, निरुद्ध। इन 5 अवस्थाओं का स्वरूप निर्धारण निम्नवत् है-
1. क्षिप्त-  चंचल स्वभाव को ही यहाँ क्षिप्त कहा गया है। क्षिप्त अवस्था में चित्र चंचल होकर संसार के सुख दुख आदि के लिए परेशान रहता है। इस अवस्था में रजोगुण की प्रधानता रहती है।
2. मूढ-  चित्त की मुढ अवस्था में तमोगुण बढ़ जाता है। तमोगुण के बढ़ जाने से चित्त विवेक शून्य हो जाता है, अतः मूढ़ अवस्था में विवेक न होने के कारण पुरुष क्रोध इत्यादि के द्वारा गलत कार्यों में प्रवृत्त होता है।
3. विक्षिप्त- विक्षिप्त अवस्था में रजोगुण की अपेक्षा सतोगुण का उद्रेक रहता है। सतोगुण की अधिकता के कारण विक्षिप्त अवस्था का चित्त कभी-कभी स्थिर हो जाता है। इस अवस्था में दुख साधनों की ओर प्रवृत्ति न होकर सुख के साधनों की और प्रवृति रहती है। ये तीनों अवस्थाएं समाधि के लिए अनुपयोगी है।
स्तोत्र साहित्य भी योग दर्शन के प्रभाव से अछुता नहीं रह सका। शिवमानस पूजा में योग के तत्वों का उपयोग भक्ति की पराकाष्ठा दिखाने के लिए की गयी है। भक्त अपनी निद्रा को समाधि की स्थिति कहता है।
           आत्मा त्वं गिरिजा मतिः परिजनाः प्राणाः शरीरं गृहं
           पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रासमाधिस्थितिः ।
           संचारस्तु पदोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो
           यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शंभो तवाराधनम् ॥ 
4. एकाग्र- एकाग्र अवस्था वह अवस्था है, जिसमें चित्त की बाह्य वृत्तियों का निरोध हो जाता है।
5. निरुद्ध-  अनिरुद्ध अवस्था में चित्त के समस्त संस्कारों तथा समस्त वृत्तियों का विलय हो जाता है। इन 5 भूमियों में से अंतिम दो भूमियां समाधि के लिए अपेक्षित है।
          पातंजल योगसूत्र के साधनपाद में योग के आठ साधनों की चर्चा की गई है। इससे अविद्या रूपी अशुद्धि का क्षय होता है। भोजवृत्तिकार ने इन आठों अंगों को समाधि के लिए प्रत्यक्ष रुप से सहायक होने से अंतरंग साधन कहा है। इनमें से कुछ  बाधक रूप से विद्यमान हिंसा आदि वितर्कों को निर्मूल करने के द्वारा समाधि को सिद्ध करते हैं। आसन प्रत्याहार आदि के लिए भी यम नियम का पालन करना उपकारक है। यह साधन है- 
        यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोष्टाङ्गानि। 29।
1. यम 2.नियम 3. आसन 4. प्राणायाम 5. प्रत्याहार 6. धारणा 7. ध्यान तथा 8. समाधि। यह आठ साधन योग के अंग भी कहलाते हैं। संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-
1. यम- यम का अर्थ संयम है। सत्य, अहिंसा, अस्तेय (चोरी नहीं करना)ब्रह्मचर्य, एवं अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक संग्रह नहीं करना) यम कहे जाते हैं। गीता में इसे दैवी सम्पत् कहा गया है।
     अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम्। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।
    तेज: क्षमा धाति: शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत॥
2. नियम- नियम के भी पांच भेद होते हैं। शौच,(पवित्र), संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान(ईश्वर के लिए स्वयं का समर्पण)।
3. आसन-  योग दर्शन में स्थिर और सुख प्रदान करने वाले बैठने के प्रकार को आसन करते हैं। उपासना में आसन सिद्धि की अत्यंत उपादेयता है। आसन सिद्धि चित्त की एकाग्रता में अत्यंत सहायक होती है। मैंने 9 जून 2015 के योग से मेरा परिचय लेख में हठयोग प्रदीपिका आदि ग्रन्थों में वर्णित आसनों के विस्तृत विवरण दे चुका हूँ।
4. प्राणायाम- श्वास को अन्दर खींचने और बाहर छोड़ने का नाम प्राणायाम है। इसमें श्वास- प्रश्वास की गति को विच्छेदित भी किया जाता है। पतंजलि ने योग सूत्र के अंतर्गत वाह्य, आभ्यंतर, स्तंभवृत्ति तथा प्राणायाम या केवल कुंभक प्राणायाम यह चार भेद बताए गए हैं।
5. प्रत्याहार- जब वाह्य विषयों से इंद्रियों का निरोध (रुकावट) हो जाता है तो उसे प्रत्याहार कहते हैं। मन को वश में कर इन्द्रयों को बाह्यविषयों से रोकने का अभ्यास। इस स्थिति में इंद्रियों की वृत्ति अंतर्मुखी हो जाती है।
6. धारणा-  किसी स्थान विशेष में चित्त को लगा देना धारणा कहलाता है। स्थान विशेष से तात्पर्य नाभिचक्र, हृदयकमल, मूर्धा स्थित ज्योति, नाक के आगे का भाग तथा जिहवा के आगे भाग आदि से है।
7. ध्यान- नाभि आदि उपर्युक्त स्थान विशेष में ध्यान करने योग्य वस्तु का ज्ञान जब एकाकार होकर प्रवाहित होता है तो उसे ध्यान करते हैं। ध्यान में ध्यान ध्याता और ध्येय का भेद बना रहता है।
8. समाधि- जब ध्यान वस्तु का आकार ग्रहण कर लेता है और अपने स्वरूप से शून्यता को प्राप्त हो जाता है तो उसे समाधि कहते हैं। समाधि में ध्यान और ध्याता का भेद मिट जाता है।
विभिन्न ग्रन्थों में प्रतिपाादित योग का स्वरूप
1. योगः कर्मसु कौशलम्- कर्म में कुशलता ही योग है। (गीता)
2. तं विद्यादुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्। दुःख के संयोग से रहित को योग समझो।  (गीता)
3. संयोगो योग इत्युक्तो जीवात्मपरमात्मनोः। जीवात्मा और परमात्मा का संयोग योग कहा गया है।(अहिर्बुध्न्य संहिता)
3. समत्वं योग उच्यते। (गीता)
4. तत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया। (गीता)
5. पश्य मे योगमैश्वरम्। (गीता)
                                                                                 लेखक- जगदानन्द झा
                                                                                 ब्लागर- संस्कृतभाषी

शुक्रवार, 16 जून 2017

उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ वर्ष 2017 का पुरस्कार विज्ञापन


    उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ द्वारा  वर्ष 2017 के पुरस्कारों का विज्ञापन जारी कर दिया गया है। पुरस्कार का आवेदन पत्र स्वीकार करने की अंतिम तिथि  31 जुलाई 2017 है। इनमें से कुछ पुरस्कार उत्तर प्रदेश के निवासियों अथवा उत्तर प्रदेश में 10 वर्षों से रह रहे लोगों के लिए है। विज्ञापन को ध्यान से पढें। अंत में पुरस्कार नियमावली का लिंक भी उपलब्ध करा दिया गया है। आवेदन करने से पहले एक बार पुरस्कार नियमावली का अध्ययन करना उचित होगा। विश्वभारती, वाल्मीकि,व्यास,नारद तथा विशिष्ट पुरस्कार व्यक्तित्व आधारित है। विद्वानों द्वारा संस्कृत के विविध क्षेत्रों में अबतक की गयी सेवा के लिए ये पुरस्कार दिये जाते हैं, जबकि नामित, विशेष और विविध पुरस्कार निर्धारित समयावधि (इस वर्ष के विशेष और विविध पुरस्कार के लिए वर्ष 2016 में तथा नामित पुरस्कार के लिए वर्ष 2015 एवं 2016) में प्रकाशित पुस्तकों के लिए दिये जाते हैं। वेद कण्ठस्थ परम्परा के लिए वेद पंडित पुरस्कार प्रदान किये जाते हैं। विज्ञापन का पूरा प्रारूप नीचे उपलब्ध है। आपकी सुविधा को ध्यान में रखते हुए इस विज्ञापन के नीचे प्रत्येक फार्म का सरल लिंक उपलब्ध कराया गया है। यह लिंक आपको इच्छित पुरस्कार के आवेदन पत्र को डाउनलोड करने का सीधा लिंक उपलब्ध कराता है। इच्छित फार्म डाउनलोड करने के लिए पुरस्कार के नाम पर क्लिक करें सभी फार्मों की एकत्र सूची देखने तथा डाउनलोड करने के लिए डाउनलोड पर चटका लगायें। यहाँ पुरस्कार के नाम के आगे सम्बन्धित फार्म को डाउनलोड  करने के लिए Click here for download Application लिखा हुआ है। 





    
       पुरस्कारों के नाम                                          अर्हता
       विश्व भारती पुरस्कार         संस्कृत के क्षेत्र में राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति।
         
       वाल्मीकि पुरस्कार           संस्कृत साहित्य में रचनाधर्मिता,विशिष्ट कृतित्व के लिए राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति

     व्यास पुरस्कार             वेद वेदांग तथा पौराणिक वाङ्मय में रचनाधर्मिता तथा अपने विशिष्ट कृतित्व-व्यक्तित्व से राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त।आवेदक की न्यूनतम आयु 60 वर्ष

    नारद  पुरस्कार           संस्कृत पत्रकारिता में कम से कम 25 वर्षों से अपने लेखन/सम्पादन तथा प्रकाशन से संस्कृत पत्र/पत्रिकाओं का राष्ट्रीय स्तर का गौरव प्रदान कराया हो। आवेदक की न्यूनतम आयु 60 वर्ष

    विशिष्ट पुरस्कार          संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार, विकास कार्य, संस्कृत सम्मेलन/संस्कृत सम्भाषण आदि द्वारा संस्कृत के सामाजिक प्रयोग में उल्लेखनीय योगदान की न्यूनतम अवधि 20 वर्ष

     वेद पंडित पुरस्कार        वेद की किसी भी शाखा का ज्ञान तथा पूरी संहिता कंठस्थ होनी चाहिए।

               ग्रन्थ लेखन क्षेत्र के पुरस्कार

    नामित पुरस्कार        कुल पांचों पुरस्कार ,मौलिक प्रकाशित संस्कृत पुस्तकें । प्रथम संस्करण ही विचारणीय।  पुस्तक की 5 प्रतियाँ अपेक्षित होंगी। 

   विशेष पुरस्कार       संस्कृत भाषा में विरचित रचनात्मक/ समीक्षात्मक कृतियाँ, एक पुरस्कार पालि तथा प्राकृत में रचित ग्रन्थों के लिए आरक्षित।  पुस्तक की प्रतियाँ अपेक्षित होंगी। 

   विविध पुरस्कार       संस्कृत में रचनात्मक कृतियों तथा संस्कृत के विषयों पर हिन्दी में रचित समीक्षात्मक कृतियों के लिए।  पुस्तक की प्रतियाँ अपेक्षित होंगी। 
नोट- विशेष पुरस्कार से अधिक धनराशि के पुरस्कारों हेतु किसी भी विद्वान को एक बार से अधिक उसी पुरस्कार के लिये विचार नहीं किया जायेगा। विशेष/विविध पुरस्कारों हेतु उसी विधा में उसी पुरस्कारों के लिये उसी विद्वान की कृति दो वर्ष से पहले विचारणीय नहीं होगी।
                                         
         


गुरुवार, 15 जून 2017

संस्कृत काव्यशास्त्रकारों की सूची एवं परिचय

    काव्यशास्त्र एक प्राचीन शास्त्र है।, जिसे काव्यालंकार, अलंकारशास्त्र, साहित्यशास्त्र और क्रियाकल्प के नाम से अभिहित किया जाता है। वैदिक ऋचाओं में काव्यशास्त्र के उत्स दिखाई पड़ते हैं। काव्यशास्त्र का क्रमबद्ध सुसंगठित और सर्वांगपूर्ण समारंभ भरत मुनि के नाट्यशास्त्र से होता है। भरतमुनि ने समस्त काव्य घटकों को अपने शास्त्र में स्थान दिया और उसकी विवेचना में नाट्य दृष्टि प्रधान हो गई। यही कारण था कि नाट्यशास्त्रीय परंपरा से अलग काव्यशास्त्रीय चिंतन का सूत्रपात हुआ।। उसके अनंतर भामह, दंडी, वामन, आनंदवर्धन, कुंतक जैसे मनीषी आचार्यों की श्रृंखला अपने विचारों से क्रमशः काव्यशास्त्रीय सिद्धांतों को परिपुष्ट करते रहे। व्यक्तिगत काव्य चिंतन और मौलिक काव्यदृष्टियों के कारण परवर्ती काल में अनेक काव्यशास्त्रीय संप्रदायों का उद्भव हुआ।। भरत से भामह तक जो काव्यशास्त्र अपनी शैशवावस्था में था, भामह से आनंदवर्धन तक आते-आते तरुणाई को प्राप्त हुआ।। 600 विक्रम संवत् (भामह) से 800 विक्रम संवत् आनंदवर्धन का काल साहित्यशास्त्रीय संपन्नता का काल माना जाता है। इन 200 वर्षों में ही विभिन्न संप्रदायों के मौलिक ग्रंथों का निर्माण हुआ। अलंकार, रीति, रस, ध्वनि इन चार संप्रदायों का उद्भव इन्हीं 200 वर्षों में हुआ। विवेचन की सुविधा को दृष्टि में रखते हुए तथा ध्वनि सिद्धांत को केंद्र में रखकर काव्यशास्त्रीय परंपरा को तीन भागों में बांटा जा सकता है।
1. पूर्व ध्वनि काल अज्ञात से आनंदवर्धन तक 800 विक्रम संवत् ध्वनि काल  2. आनंदवर्धन से मम्मट तक 800 से 1050 विक्रम संवत् तक उत्तर ध्वनि काल 3. मम्मट से जगन्नाथ तक 1050 से 1750 विक्रम तक पूर्व ध्वनि काल।
अग्नि पुराण को सम्मिलित करते हुए यह काल भरत मुनि के नाट्यशास्त्र से आरंभ होता है और इस काल के अंतिम आचार्य रुद्रट थे तथापि पूर्व ध्वनि काल के साहित्यकार में अलंकार संप्रदाय का प्रभुत्व था इस काल के गणमान्य आचार्यों में भामह, दंडी, उद्भट, वामन, रुद्रट की दृष्टि काव्य के बहिरंग विवेचन में लगी रही। इसीलिए रस अथवा ध्वनि को यह आचार्य विवेचित नहीं कर सके। भामह, दंडी उद्भट, रुद्रट ने काव्य में अलंकार की प्रधानता को स्वीकार किया तथा रस को भी अगर सवादलंकार के रूप में समाहित किया। दंडी ने तो काव्य की शोभाधायक समस्त धर्म अलंकार शब्द से वाच्य है कहकर अपना अंतिम निष्कर्ष दे दिया। आचार्य वामन ने सीमित क्षेत्रों में रहते हुए भी अपनी मौलिकता का परिचय दिया और अलंकार को स्वीकार किया। उन्होंने काव्य में अलंकार को ग्रहण किया लेकिन स्पष्टतः सौन्दर्य काव्य का अलंकार सौन्दर्य को माना। सौन्दर्य का सृजन गुण करते हैं। उपमादि अलंकार उसकी शोभा में वृद्धि करते हैं। काव्यात्मा की चर्चा के प्रसंग में उन्होंने इसी सत्य का उद्घाटन किया। वामन के अनुसार काव्य की आत्मा रीति है। रीति विशिष्ट पद संघटना है। अतः वामन ने भामह, दंडी, रुद्रट की अपेक्षा अलंकार को एक व्यापक भूमि प्रदान की। भामह और वामन के ने दो संप्रदायों के प्रवर्तक दृष्टि को जन्म दिया। भामह की प्रतिष्ठा अलंकार संप्रदाय के प्रवर्तक के रूप में हुई और वामन रीति संप्रदाय के जन्मदाता माने जाते हैं। अलंकार संप्रदाय की अपेक्षा रीति संप्रदाय को अधिक अंतर्मुखी माना जाता है। वामन उस अंतरतम को नहीं प्राप्त कर सके, जिसे आनंदवर्धन ने प्राप्त किया, क्योंकि वामन ने गुण को ही प्रधानता देकर विराम ले लिया। वस्तुतः वामन ने गुणों को आश्रय की दृष्टि से विचार नहीं किया, इसीलिए वह अपनी ध्वन्यात्मक अनुभूति को अभिव्यक्ति नहीं दे सके। रस को साहित्य की आत्मा घोषित करने वाले आनंदवर्धन के लिए वामन ने ही इस प्रकार की पृष्ठभूमि का निर्माण किया।

    इस लेख में यहाँ कुछ ही काव्यशास्त्रकारों की जीवनी एवं उनकी रचनायें उपलब्ध करायी गयी है। शेष काव्यशास्त्रकारों के नाम पर क्लिक करने पर एक नयी कड़ी खुलेगी। आप वहाँ जाकर उनके बारे में विस्तृत जानकारी पा सकेंगें।
1. आचार्य भरत  2. मेधाविन्  3. धर्मकीर्ति  4. भट्टि  5. भामह  6. दण्डि 7. वामन  8. रुद्रट   9. रुद्रभट्ट  10. आनन्दवर्धन 11. उद्भट 12.महिमभट्ट 13. मुकुलभट्ट  14. भट्टतौत 15. क्षेमेन्द्र  16. कुन्तक  17. भट्ट नायक 18. शारदातनय 19. शिंगभूपाल 20. विद्याधर  21. विद्यानाथ  22.राजशेखर 23. राजानक रुय्यक  24. ममम्ट  25. अप्पय दीक्षित 26. कर्णपूर   27. धनञ्जय    28. जयदेव  29. देवेश्वर  30. हेमचन्द्र   31. अमरचन्द्र  32. केशव मिश्र  33. सागर नन्दी  34. वाग्भट्ट प्रथम  35. वाग्भट्ट द्वितीय   36. भानुदत्त मिश्र   37. रूपगोस्वामी  38.रामचन्द्र गुणचन्द्र  39. विश्वना 40. अभिनवगुप्त  41. भोजराज   42. आशाधर भट्ट  43. नागेश भट्ट   44. जगन्नाथ  45. विश्वेश्वर पाण्डेय
आचार्य भरत
संस्कृत काव्यशास्त्र के प्राचीन आचार्य में आचार्य भरत का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। इनके द्वारा लिखित एक मात्र काव्यशास्त्रीय ग्रंथ नाट्यशास्त्र प्राचीनतम उपलब्ध कृतियों में से एक है। यह कृति नाट्यशास्त्र विषय के साथ ही समस्त ललित कलाओं का विश्वकोश है। यह ग्रन्थ 36 अध्यायों में विभक्त है। इसमें कुल 5000 श्लोक है। काव्य के लक्षण ग्रंथों में पहला स्थान नाट्यशास्त्र को प्राप्त होता है। काव्यमीमांसा में राजशेखर ने भरत मुनि के साथ-साथ सहस्राक्ष सुवर्णनाभ, प्रचेतायन, पुलस्त्य, पराशर इत्यादि अनेक साहित्य के आचार्यों का नामोल्लेख किया है। भरत ने भी नाट्यशास्त्र में नंदीकेश्वर का उल्लेख किया है। किंतु इनमें से किसी भी आचार्य की कृति आज उपलब्ध नहीं है। अतः भरत विरचित नाट्यशास्त्र ही काव्यशास्त्र का सर्व प्राचीन तथा प्रमुख ग्रंथ है। आचार्य भरत को भारतीय आलोचकों के साथ-साथ पाश्चात्य आलोचकों ने भी मुक्त कंठ से प्रशंसा की। नाट्यशास्त्र का लक्ष्य नाटक की रचना तथा अभिनय है, फिर भी इसमें काव्यशास्त्र के समस्त अंगों का सर्वांगीण एवं सूक्ष्म विवेचन किया गया है। आचार्य भरत ने सर्वप्रथम यह प्रतिपादित किया कि काव्य का प्रमुख तत्व रस है और यह विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी (संचारी) भावों से निष्पन्न होता है। बाद के आचार्यों ने नाट्यशास्त्र को आधार बनाकर काव्यशास्त्रीय ग्रंथों की रचना की।
 आचार्य भरत और उनका काल
नाट्यशास्त्र पर अब तक हुए पर्याप्त अनुसंधान के बाद भी इस ग्रंथ के रचना का समय ज्ञात नहीं हो सकता है, परंतु इतना ज्ञात है कि इसकी रचना भास और कालिदास के पहले हो चुकी थी, क्योंकि इन काव्यकारों की रचना में इस ग्रंथ की जानकारी उपलब्ध होती है। युधिष्ठिर मीमांसक ने भरत मुनि का समय 500 ईसवी पूर्व से 1000 ईसवी तक के बीच में माना है। हर प्रसाद शास्त्री ने भी भरतमुनि को 2000 ईसवी पूर्व स्वीकार किया है। डॉ. कीथ का मानना है कि वह 300 ईसवी के लगभग रहे होंगे। मैकडोनल 600 ईसवी मानते हैं। भारतीय परंपरा के अनुसार आचार्य भरत का समय वैदिक काल के बाद तथा पुराण काल के पहले माना जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि नाट्यशास्त्र की रचना कालिदास से पहले हो चुकी थी कालिदास का समय ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी है। इसलिए भरत को ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी या इसके पूर्व का माना जाना चाहिएय़
नाट्यशास्त्र में कुल 36 अध्याय हैं। दृश्यकाव्य इसका प्रधान विषय है फिर भी इसमें दृश्य तथा श्रव्य दोनों भेदों का वर्णन किया गया है।

नाट्यशास्त्र का विषयवस्तु
इसमें नाट्य की उत्पत्ति, नाटक के लक्षण, स्वरूप, नाट्य मंडप, उनके भेद, प्रेक्षागृहों की रचना, प्रेक्षा भवन, यवनिका, रंग देवता की पूजा, तांडव नृत्य की उत्पत्ति तथा इसके उपकरण, आठों रसों का विवेचन, पूर्वरंग, नांदी, प्रस्तावना, रस का स्थायी भाव, अनुभाव, विभाव तथा व्यभिचारी भाव, आंगिक, वाचिक, सात्विक तथा आहार्य, हस्त अभिनय, शरीराभिनय, अभिनय की गति, धनुर्विज्ञान का प्रदर्शन, व्यायाम, स्त्रियों द्वारा पुरुष तथा पुरुष द्वारा स्त्रियों का अभिनय, पांचाली, आवंती, दाक्षिणात्या और मागधी इन चार प्रवृतियों का विवेचन, छंदों के भेद, अलंकारों के स्वरूप तथा इसके भेद, भाषा का विधान, किस पात्र को संस्कृत में बोलना है और किस पात्र को प्राकृत में, सात स्वर, रूपक तथा उसके  10 भेद, नाटक की कथा वस्तु की रचना, प्रेमियों के प्रकार, स्त्रियों के वश में करने के पांच उपायों, चित्राभिनय, आरोही, अवरोही, स्थायी एवं संचारी भाव का वर्णन, वीणा की विधि, बांसुरी के स्वरों का विवरण, ताल और लय का भेद, गायक तथा वादक की योग्यता, संगीत के आचार्य तथा शिष्य की योग्यता, वाद्यों का विवेचन, मृदंग, प्रणव, दर्दुर तथा अवनद्ध वाद्य, (चमड़ा मढ़े हुए वाद्य) का वर्णन, अंतःपुर की सेविकाओं और राज सेविकाओं के गुण, सूत्रधार, पारिपार्श्विक, नट, पिट, चेट, नायिका आदि के गुण, विधि पात्रों की भूमिका,ऋषियों के नाम, उनके द्वारा किए गए प्रश्न, नट बंशों की उत्पत्ति का इतिहास और नाट्यशास्त्र का माहात्म्य का वर्णन किया गया है।
नाट्यशास्त्र की टीका

काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों में नाट्यशास्त्र लोकप्रिय रचनाओं में से एक है। अतः इस पर अनेक टीकाएं लिखी गई, परंतु अभी केवल अभिनवगुप्त कृत अभिनव भारती एक टीका उपलब्ध होती है। इसका दूसरा नाम नाट्यवेदविवृत्ति भी है। अभिनवगुप्त की टीका में अनेक प्राचीन टीकाकारों के नाम और उनके मतों का उल्लेख प्राप्त होता है, परंतु वर्तमान में इनमें से कोई भी टीका उपलब्ध नहीं है। यहां पर उद्भट, भट्ट लोल्लट, शंकुक, भट्ट नायक, राहुल, भट्टमंत्र, कीर्तिधर, हर्षवार्तिक और मातृगुप्त के टीकाओं का वर्णन मिलता है। इनमें से कुछ वास्तविक नाम है तो कुछ काल्पनिक।


भामह
       आचार्य भरतमुनि के बाद भामह को काव्यशास्त्र के क्षेत्र में द्वितीय स्थान प्राप्त है। इन्होंने काव्यालंकार नामक अलंकारशास्त्रीय ग्रन्थ की रचना की। भरत यदि नाट्यशास्त्र के प्रथम आचार्य माने जाते हैं तो भामह भारतीय अलङ्कारशास्त्र के प्रथम आचार्य माने जाते हैं। काव्यशास्त्र की उन्नत परम्परा का आरम्भ भामह से हुआ। परवर्ती काव्यशास्त्र के सभी आचार्यों ने काव्यालंकार को प्रमाण के रूप में उपस्थापित किया। इनके पूर्ववर्ती आचार्यों में मेधाविन् के नाम का निर्देश प्राप्त होता है, परन्तु अभी तक इनकी कोई भी कृति सम्मुख नहीं आ सकी है। भामह, नेमिसाधु तथा राजशेखर ने मेधाविष्ट का उल्लेख किया है। नवम शताब्दी ई. में कश्मीर के राजा जयादित्य की राजसभा के सभापति आचार्य उद्भट ने भामह के ग्रन्थ पर भामह विवरण नामक से टीका लिखी थी, जो अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ है। यह इन्हें काश्मीर का निवासी सिद्ध करता है। उद्भट ने अलंकार पर काव्यालंकार सारसंग्रह  नामक एक स्वतंत्र ग्रन्थ की रचना की थी, जो अभी प्रकाशित है। प्रतिहारेन्दुराज ने इस ग्रन्थ पर लघुविवृत्ति नामक टीका लिखी थी इसमें भामहविवरण का उल्लेख प्राप्त होता है।  विशेषोक्तिलक्षणे च भामहविवरणे भट्टोद्भटेन --- निरूपितः। अभिनवगुप्त ने अनेक स्थलों पर भामह विवरण का उल्लेख किया है। काव्यालंकार के अंतिम श्लोक से ज्ञात होता है कि इनके पिता का नाम रक्रिल गोमिन् था।
            अवलोक्य मतानि सत्कवीनामवगम्य स्वधिया च काव्यलक्ष्म:।। 
            सुजनावगमाय भामहेन ग्रथितं रक्रिलगोमिसुनुनेदम्।।
भामह का काल दण्डी से पूर्व माना जाता है। इन्होंने अपने ग्रन्थ का आरम्भ सार्वसार्वज्ञ की स्तुति से करते हैं,जिससे  इन्हें बौद्ध मतावलम्बी माना जा सकता है ।

         संस्कृत के अन्य विद्वानों के काल की अनिश्चितता की तरह भामह का काल पर भी विद्वान् एक मत नहीं हैं। आचार्य भामह का समय छठी शताब्दी का पूर्वार्द्ध माना जाता है, जिसके साक्ष्य में यह तर्क दिया जाता है कि उन्होंने अपने काव्यालंकार के पंचम परिच्छेद में न्याय निर्णय का वर्णन करते हुए दिङ्नाग के प्रत्यक्षं कल्पनापोढम् इस प्रत्यक्ष लक्षण को उद्धृत किया है। दिङ्नाग का समय 500 ईसवी के आसपास माना जाता है। दिङ्नाग के बाद उनके व्याख्याकार धर्मकीर्ति का समय 620 ईसवी के लगभग माना जाता है। धर्मकीर्ति ने दिङ्नाग के प्रत्यक्षं कल्पनापोढम् लक्षण में अभ्रान्तम् पद जोड़ दिया गया है। किंतु भामह के ग्रंथ में दिए गए प्रत्यक्ष लक्षण में और अभ्रान्तम् पद नहीं है। इससे यह सिद्ध होता है कि भामह दिङ्नाग परवर्ती और धर्मकीर्ति के पूर्ववर्ती रहे होंगे। आनंदवर्धन ने भी भामह का समय बाणभट्ट के पूर्ववर्ती बताया है। बाणभट्ट का समय सातवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध है, इस दिशा में भामह का समय पांचवी छठी शताब्दी के मध्य में निर्धारित किया जा सकता है।
भामह कृत काव्यालंकार का विषय विवेचन
काव्यालंकार की प्रथम हस्तलिखित ग्रन्थ को प्रो. रंगाचार्य ने ढूढा। श्री के. पी. त्रिवेदी ने प्रतापरुद्रयशोभूषण के परिशिष्ट में इसे प्रकाशित किया। पुस्तक कुल छः परिच्छेद में विभाजित है। काव्य प्रयोजन, काव्यदोष, गुणत्रय ( माधुर्य, ओज और प्रसाद) का विवेचन, द्वितीय तथा तृतीय परिच्छेदों में अलंकार निरूपण, काव्यगत दोष निरूपण,  काव्य में ग्राह्य एवं त्याज्य शब्दों का निर्देश इसके वर्ण्य विषय हैं।
  नोट- आपके लिए यह लेख कितना उपयोगी लगा, टिप्पणी करना नहीं भूलें। 
                                                        जगदानन्द झा

अभिनवगुप्त और उनकी कृतियाँ

       भारत में जब-जब कश्मीर की चर्चा होगी, परममाहेश्वर शैवाचार्य अभिनवगुप्त याद आते रहेंगे। इनके पिता का नाम नरसिंहगुप्त तथा माता का नाम विमलकला था। उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध नगर कन्नौज के राजा यशोवर्मन् (730-740 ई.) के राज्य में इस कश्मीरी ब्राह्मण के जन्म से 200 वर्ष पूर्व इनके पूर्वज अत्रिगुप्त का जन्म गंगा और यमुना की मध्यभूमि अन्तर्वेदी नाम से विख्यात क्षेत्र में हुआ था।  वहीं से इनके पूर्वज को विद्या प्रेमी तत्कालीन कश्मीर नरेश ललितादित्य ने ससम्मान कश्मीर लाया था।
तमथ ललितादित्यो राजा निजं पुरमानयत्।
प्रणयरभसात् कश्मीराख्यो हिमालयमूर्धगम्।। तन्त्रालोकआह्निक 37 श्लोक 39
इसके बाद का वंश वर्णन करते हुए अभिनवगुप्त कहते हैं कि इनके वंश में वराहगुप्त पैदा हुए । वराहगुप्त अभिनवगुप्त के पितामह तथा नरसिंहगुप्त पिता थे।
       तस्यान्वये महति कोऽपि वराहगुप्तनामा बभूव भगवान् स्वयमन्तकाले ।
       गीर्वाणसिन्धुलहरीकलिताग्रमूर्धा यस्याकरोत् परमनुग्रहमाग्रहेण।। तन्त्रालोकआह्निक 37 श्लोक 53
       
      तस्यात्मजश्चुखलकेति जने प्रसिद्धश्चन्द्रावदातधिषणो नरसिंहगुप्तः ।
      यं सर्वशास्त्ररसमज्जनशुभ्रचित्तं माहेश्वरी परमलंकुरुते स्म भक्तिः।। तन्त्र.,आ.37, श्लोक53।।
तन्त्रालोक के अध्ययन से इनकी जीवनी तथा सगे सम्बन्धियों का पूर्ण ज्ञान हो जाता है। इनका घर श्रीनगर में वितास्ता के तट पर था। उन्होंने अपने तंत्र ग्रंथ तन्त्रालोक में इसका सविस्तार वर्णन किया है।
            काव्यप्रकाश के टीकाकार वामचार्य ने अपनी बालबोधिनी में अध्यापकों द्वारा अभिनवगुप्त नाम रखे जाने का निर्देश दिया है। इदमत्र रहस्यं पुरा किल क्वचिद्वलभो पठतां बहूनां ब्राह्मणबालकानां----- तन्नाम अभिनवगोपानसीगुप्तपाद इति वेदग्ध्यमुखेनाभिव्यनक्ति।
अभिनवगुप्त तथा इनकी रचनाओं का समय
अभिनवगुप्त ने अपने तीन पुस्तक क्रम स्तोत्र, भैरव स्तोत्र तथा ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृत्ति विमर्शिनी में इन ग्रन्थों के रचनाकाल का उल्लेख किया है। तदनुसार इनका समय 950 ई. से लेकर 1025 तक माना जा सकता है।
षट्षष्टिनामके वर्षे नवभयामसितेऽहनि।
मयाभिनवगुप्तेन मार्गशीर्षे स्तुतः शिवः।। क्रम स्तोत्र
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृत्ति विमर्शिनी के अनुसार इस पुस्तक का रचनाकाल 4115 सम्वत्सर बीत जाने पर मार्गशीष के अंत में 90 सम्वत्सर में हुआ।
इति नवतितमेऽस्मिन् वत्सरान्ये युगांशे,
तिथिशशिजलधिस्थे मार्गशीर्षावसाने।
जगति विहितबोधां ईश्वरप्रत्यभिज्ञां
व्यवृणुत परिपूर्णा प्रेरितः शम्भुपादैः।।
अभिनवगुप्त ने राजा यशस्कर के मंत्री पुत्र कर्ण को तंत्र सिद्धांतों को समझने के लिए मालिनी विजयवार्तिक की रचना किया था। इसमें उन्होंने  कर्ण और भद्र को सत्शिष्य के रूप में सम्बोधित किया है। तन्त्र सिद्धान्त को समझने के लिए कर्ण और भद्र को युवा होना चाहिए। यशस्कर की मृत्यु 948 ई. में हुई थी। क्षेमेन्द्र ने बृहत्कथा मंजरी और भारत मंजरी में लिखा है कि साहित्य का अध्ययन उन्होंने अभिनवगुप्त से किया था। क्षेमेन्द्र ने समयमातृका की रचना 1050 ईस्वी में तथा दशावतारचरित की रचना 1066 ई. में की थी, अतः इनकी साहित्य रचना का समय 1030 से 1060 समझा जाना चाहिए। अभिनवगुप्त इनसे निकट पूर्व में हुए थे। इस दशा में उनकी साहित्य रचना का समय 900 ईस्वी से 1010 ईस्वी माना जाना चाहिए। इस कालखण्ड में इनका जीवन शैव भक्ति तथा साहित्य साधना में व्यतीत हुआ। लोकश्रुति के अनुसार मगन नामक स्थान की विश्रुत भैरव गुफा में इन्होंने समाधि ली । 
विद्यार्जन
अभिनवगुप्त ने उस विषय के आधिकारिक विद्वानों से विद्या अर्जित किया था। इनके अलग-अलग शास्त्रों के अलग-अलग गुरु थे। कश्मीर से निकलकर वे जालन्धर भी गये तथा शम्भुनाथ से कौल शास्त्र की शिक्षा प्राप्त की।  इन्होंने अपनी कृतियों में बडे ही सम्मान के साथ अपने गुरुओं का उल्लेख किया है, जिनके विवरण निम्नानुसार हैं-
1.    व्याकरण शास्त्र के गुरु - नरसिंह गुप्त
नरसिंह गुप्त अभिनवगुप्त के पिता थे। इनका दूसरा नाम चुलुखक था।
2.    ध्वनि सिद्धांत के गुरु - भट्ट इंदुराज
ध्वन्यालोक की लोचन टीका के आरम्भ में अभिनवगुप्त ने अपना नाम लेकर स्मरण किया।
भट्टेन्दुराजचरणाब्जकृताधिवासहृद्यश्रुतोभिनवगुप्तपादाभिधोहम्।  
3.    द्वैतवादी शैव सम्प्रदाय के गुरु- भूतिराज तनय
वाक्यपदीय के टीकाकार हेलाराज ने अपना नाम भूतिराज तनय हेलाराज का उल्लेख अनेकवार किया है। सम्भव है कि ये वही भूतिराज तनय हों।
नाट्यशास्त्र के गुरु- भट्टतौत
इस प्रकार अभिनवगुप्त अनेक शास्त्रों के निष्णात विद्वान थे। अलंकार, न्याय, वैशेषिक, वेदांत, शैव, तंत्र, आदि शास्त्रों के सिद्धांतों का इन्होंने अपने अनेक गुरुओं से अध्ययन किया था। अपने ईश्वर प्रत्यभिज्ञा विवृत्ति विमर्शनी में लिखा है कि उन्होंने  नानागुरुप्रवरपादनिपात-जात संवत्सरीरुहविकासनिवेशित- श्रीः। अनेक गुरुओं के चरणों में बैठकर विद्या प्राप्त की।
अभिनवगुप्त की कृतियां
आचार्य अभिनवगुप्त ने अपने गुरुओं का अनुसरण करते हुए अनेक साहित्यों का प्रणयन किया। इन्होंने प्रत्यभिज्ञा दर्शन और त्रिक संप्रदाय की स्थापना की थी। मूल रूप से अभिनवगुप्त दार्शनिक थे परंतु साहित्य शास्त्र पर भी इनका असाधारण अधिकार था।
अभिनव गुप्त की साहित्यिक एवं दार्शनिक विचारों से संबंधित ग्रंथ बहुतायत में प्राप्त होते हैं।  इन्होंने कुल 44 ग्रंथों की रचना की थी, जिसमें से बहुत सारी रचनाएं अब नष्ट हो गई है। तंत्रालोक से लेकर भैरव स्थल जैसे छोटे ग्रंथ को को चार भागों में बांटा जा सकता है।
1.    काव्यशास्त्रीय कृतियां
2.    स्तोत्र
3.    तंत्र
4.    प्रत्यभिज्ञा दर्शन
अभिनवगुप्त के गुरु आचार्य मम्मट थे, जिसे सरस्वती का अवतार कहा जाता है। इनकी लोचन टीका संस्कृत क्षेत्र में अत्यंत ही महत्वपूर्ण स्थान रखती है इन्हें दुनिया लोग के एक-एक आकार के रूप में ही नहीं अपितु ध्वनि संप्रदाय के संस्थापक एवं प्रवर्तक के रुप में देखा जाता है यह आनंदवर्धन के समकालीन थे आचार्य अभिनवगुप्त आलोचना शास्त्र के इतिहास में गौरव में स्थान रखते हैं इनके द्वारा प्रदर्शित मार्ग पर चलते हुए भारत में आलोचना विषयक चिंतन प्रादुर्भूत हुआ यह अभिनव गुप्त कश्मीर के सेव आचार्य में अनन्यतम थे तथा प्रत्यभिज्ञा दर्शन के मौलिक आचार्य होने के कारण परम महेश्वर आचार्य पदवी से विभूषित किए जाते हैं। यद्यपि अभिनवगुप्त ने स्वतंत्र रुप से किसी काव्यशास्त्र ग्रंथ की रचना नहीं की फिर भी इन्होंने काव्यशास्त्र पर महत्वपूर्ण ग्रंथों टीकाएं लिखी है जिनके विवरण निम्नवत् हैं-
ध्वन्यालोक लोचन
आनंदवर्धन कृत ध्वन्यालोक पर अभिनवगुप्त की लोचन टीका प्राप्त होती है। इसे सहृदय लोक लोचन, काव्यालोक लोचन और ध्वन्यालोक लोचन नाम दिया जाता है। इसी टीका के कारण साहित्यकार इन्हें लोचनकार नाम से भी पुकारते हैं। काव्यशास्त्र के क्षेत्र में इस टीका का अतिशय महत्व है। इसमें ध्वनि और रस निष्पत्ति के तथ्यों की विशेष विवेचना की गई है तथा ध्वनिविरोधी मतों का दृढ़तापूर्वक खंडन किया गया है। अभिनव गुप्त ने अपने इस टीका में अपने से पूर्ववर्ती टीकाकारों के मतों को भी उद्धृत किया है।
          किं लोचनं विना लोके भाति चंद्रिकया  हि।
         तेनाभिनवगुप्तोयं लोचननोन्मीलनं व्यधात्।।
ध्वन्यालोक लोचन पर भी एक टीका कोल के विद्वान् उदयोतुग ने लिखी थी, जिसे कौमुदी नाम से जाना जाता है।
अभिनवभारती
भरत के नाट्यशास्त्र पर अभिनव भारती नामक टीका प्राप्त होती है। इसका दूसरा नाम नाट्यवेद विवृत्ति भी है। नाट्यशास्त्र पर प्राचीन काल में अनेक टीकाएं लिखी गई, परंतु आज केवल यही टीका उपलब्ध है। नाट्यशास्त्र के विषयों की जानकारी के लिए यह टीका अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। इसमें प्राचीन भारत की नाट्यकला (अभिनय,नृत्य संगीत) आदि विषयों की जानकारी बहुत ही गहराई से दी हुई है। देखा जाए तो अभिनव गुप्त द्वारा नाट्यशास्त्र पर लिखा गया यह एक स्वतंत्र और मौलिक रचना की भांति है, परंतु दुर्भाग्य है कि यह टीका पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं है।
काव्यकौतुक विवरण
इस ग्रंथ के रचनाकार अभिनवगुप्त के गुरु भट्टतोत हैं। अभिनवगुप्त ने इस पर विवरण नामक टीका लिखी है। आज यह ग्रंथ और टीका दोनों उपलब्ध नहीं होते हैं। अभिनव भारती तथा ध्वन्यालोक लोचन में कहीं-कहीं उसके उद्धरण प्राप्त होते हैं।
2. स्तोत्र
आचार्य अभिनवगुप्त ने अनेक स्तोत्र ग्रंथों की रचना की। इनमें कुछ स्तोत्र बड़े हैं तथा कुछ छोटे हैं। भैरवस्तवकर्म स्तोत्र आदि वृहदाकार में है और बोधपंचाशिका आदि छोटे आकार के हैं। उनके द्वारा रचित स्तोत्रों के विवरण निम्नानुसार हैं-
देवी स्तोत्र विवरण शिव शक्ति बिना भाव स्तोत्र प्रकरण स्तोत्र इत्यादि
क्रमस्तोत्र
त्रिक विद्या की प्रशंसा में लिखा गया यह ग्रंथ है।
भैरवस्तोत्र
शिव की दार्शनिक स्तुति की गई है, जो कि कश्मीर में बहुत ही प्रसिद्ध है।
देहस्थदेवताचक्र स्तोत्र
अनुभवनिवेदन स्तोत्र
क्रमकेलि
यह ग्रंथ  अनुपलब्ध है।
मालिनी तंत्र पर पूर्वपंञ्चिका अनुपलब्ध है।
अनुत्तराष्टिका स्तोत्र
3 तंत्र
आचार्य अभिनव गुप्त की कृतियों में एक भाग तंत्रों से संबंधित है इनका तंत्रालोक अत्यंत ही प्रसिद्ध ग्रंथ है। मालनी विजय भारती परात ऋषि का विवरण तथा तंत्रालोक सार भी तंत्र ग्रंथ हैं।
तंत्रालोक
अभिनव गुप्त की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृति तंत्रालोक है। यह अनेक प्रकाशकों के द्वारा अनेक खंडों में प्रकाशित किया जा चुका है। इसमें कुल, तंत्र, क्रम तथा प्रत्यभिज्ञा आदि सभी विचारधारा के समस्त पक्षों का विस्तारपूर्वक व्याख्या प्रस्तुत है। इसमें कर्मकांड और दर्शन दोनों का व्यवस्थित विवेचन किया गया है। शैव दर्शन का यह सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। चंद्रलोक पर जयरथ ने विवेक नामक टीका लिखी है। आज इस पुस्तक पर अनेकों टीकाएं प्राप्त होती है। इसमें कुल चौदह आह्निक और 30059 श्लोक हैं।
तंत्रसार
यह तंत्रालोक की शिक्षाओं का गद्यात्मक सारांश ग्रंथ है।
मालिनीविजयवार्तिक
यह ग्रन्थ परमार्थ विद्या और दर्शन के बहुत सारे रहस्यपूर्ण विषयों पर प्रकाश डालता है। त्रिक संप्रदाय का गहन ग्रंथ है। इस पर अभी तक कोई भी टीका उपलब्ध नहीं हो सकी है।
परात्रिंशिकाविवरण
यह एक आगम का ग्रंथ है, जिस पर मातृका मालिनी और कश्मीर शैवदर्शन के दूसरे रहस्यपूर्ण और गुढ व्यावहारिक सिद्धांतों पर प्रकाश डाला गया है।
5.प्रत्यभिज्ञा दर्शन
शिवदृष्ट्यालोचन
यह शिव दृष्टि पुस्तक पर लिखी गई टीका है, परंतु यह अभी उपलब्ध नहीं होती।
आचार्य अभिनवगुप्त ने प्रत्यभिज्ञा दर्शन विवाद वित्त से संबंधित की भी रचना की इस दर्शन पर मूल रूप से कार्यक्रम और व्यक्ति की रचना उत्पल गुप्त ने किया था जोकि अभिनवगुप्त के दादागुरु थे अर्थात अभिनवगुप्त के गुरु लक्ष्मण गुप्त तथा उनके गुरु उत्पल गुप्त थे कार्य का ग्रंथ का नाम ईश्वर प्रत्यभिज्ञा और व्यक्ति का नाम ईश्वर प्रत्यभिज्ञा निवृत्ति है इस पर अभिनवगुप्त में विस्तृत टीका लिखी है जो कि ईश्वर प्रत्यभिज्ञा विवर्त यूनिवर्सिटी के नाम से प्राप्त होती है अभिनवगुप्त ने प्रतिज्ञा दर्शन पर दो विमर्श में लिखी है इनमें से एक प्रत्यभिज्ञा विमर्श नी है जिसे लघु वृत्ति भी कहा जाता है तथा दूसरी गाड़ी का वृद्धि पर विमर्श नी प्राप्त होती है जो कि ईश्वर प्रत्यभिज्ञा व्यक्ति विमर्श नी है है इस ग्रंथ के अंत में अभिनव गुप्ता ने लिखा है कि भगवान शिव के उस मार्ग को सरल और सार्वजनिक सुलभ बनाया है जिसे गुरुओं ने निरूपित किया जो इस मार्ग का अनुसरण करता है वह पूर्ण हो कर शिव रूप हो जाता है।
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी
परमार्थसार
 इस पर छह में राज केसीसी योग राजनीति का लिखी है।
परमार्थचर्चा
इसमें शैवाद्वैत को दर्शाया गया है।
बोधपञ्चदशिका
इसमें वह कश्मीरी शैव दर्शन पर संक्षिप्त में चर्चा की गई है।
गीतार्थसंग्रह

अभिनवगुप्त में भगवत् गीता पर गीतार्थ संग्रह नामक गीता भाष्य भी लिखा था, जिसकी शिक्षा उन्होंने भट्टेन्दु राज से प्राप्त की थी।  
 इस लेख से यदि आपको थोडी भी सहायता मिलती है तो मैं अपना लेखन सार्थक समझूँगा।यथासमय इस लेख को और विस्तृत करने का प्रयास करुँगा। अभी बस इतना हीं।
आपका स्नेही ब्लागर
जगदानन्द झा, लखनऊ