जयेश-जितेशयोः संस्कृतशिक्षण- पाठशाला

आत्म निवेदन/ कथ्य/ भूमिका
     किसी भी भाषा के दो स्वरूप होते हैं। 1. लिखित 2. बोलचाल/भाषिक या सम्पर्क भाषा। चुंकि मैं यहाँ आपसे लिखित रूप में सम्पर्क कर रहा हूँ, अतः इस पाठ के माध्यम से आप लिखित संस्कृत सीख सकेंगें। इस पाठ्यक्रम को सीखने के बाद आप संस्कृत भाषा एवं देवनागरी लिपि में लिखी संस्कृत की पुस्तकें पढकर आसानी से समझ सकेंगें। आप संस्कृत में अपना भाव या विचार लिख सकगें। मेरे इस पाठशाला के साथ अभ्यास हेतु आप किसी अन्य पुस्तक की भी सहायता लेते हैं। यहाँ पर अभी सतत पाठ का विस्तार हो रहा है। अतः निरंतर क्रम में परिवर्तन दिखेगा। 

पाठ- 1


लिपि शिक्षण

संस्कृत भाषा को लिखने के लिए देवनागरी लिपि का प्रयोग किया जाता है। अतः संस्कृत सीखने से पहले हमें देवनागरी लिपि के वर्णमाला का ज्ञान होना आवश्यक हो जाता है यहाँ मैं आपको सबसे पहले वर्णमाला से परिचय करा रहा हूँ।
 देवनागरी में दो प्रकार के वर्ण होते हैं
1. स्वर वर्ण
2. व्यंजन वर्ण
स्वर वर्ण
अ इ उ ऋ लृ ए ऐ ओ औ
ध्यातव्यए ऐ ओ औ को संयुक्त स्वर भी कहा जाता है,क्योंकि ये वर्ण दो स्वर के मेल से बनते हैं।
व्यंजन वर्ण
क ख ग घ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह ये व्यंजन वर्ण  हैं
व्यंजन में स्वर वर्ण को जब मिलाया जाता है तब वह उच्चारण करने योग्य होता है अनुस्वार तथा विसर्ग को अयोगवाह कहा जाता है इसका प्रयोग ( लिखने तथा बोलने में ) केवल स्वर वर्णों के साथ ही होता है दो व्यंजन वर्णों को आपस में मिलने पर एक संयुक्त व्यंजन का निर्माण होता है। कहीं-कहीं दो व्यंजनों के मेल को पहचानना आसान होता है। जैसे स् + व् + अ = स्व । कभी- कभी व्यंजनों के मेल से बने अक्षर में इतना परिवर्तन हो जाता कि पहचानना कठिन हो जाता है। जैसे- क् + ष् + अ = क्ष, त् + र् + अ = त्र, ज् + ञ् + अ =  ज्ञ  इत्यादि

अभ्यास

1. द्व, द्ध, भ्र, पर्ण,दुग्ध शब्द में व्यंजन तथा स्वर को अलग- अलग कर लिखें।
2. 10 ऐसे संयुक्त व्यंजन को लिखें,जो दो व्यंजन को मिलने पर भी आसानी से पहचाना जा सकता है। 
3. 10 ऐसे संयुक्त व्यंजन को लिखें,जो दो व्यंजन को मिलने पर स्वरूप में परिवर्तन हो जाता है। 

 वर्ण संयोग
 स्वर तथा व्यंजन के मेल से शब्द बनते हैं जैसेज्+ अ+ य्+ ए+ श्+ अ  इन वर्णों के आपस में जुड़ने पर जयेश शब्द बनता है। 
जब कोई स्वर व्यंजन में जोड़ा जाता है तो उसे मात्रा के रूप में दिखाया जाता है क में आ की मात्रा जुड़ने पर का क् में इ जुड़ने पर कि आदि शब्द बनते हैं। अ अक्षर की कोई भी मात्रा नहीं होती है बल्कि यह हलन्त  चिह्न के हटने से पता चलता है

 अकारान्त शब्द

जिस शब्द के अंत में अ अक्षर होता है, उसे अकारान्त कहते हैं इसी प्रकार जिस शब्द के अंत में इ अक्षर होता है उसे कारान्त कहते हैं जैसे रात्रि।

संस्कृत में तीन प्रकार के शब्द होते है।
1.         पुल्लिंग
2.         स्त्रीलिंग
3.         नपुंसक लिंग
पुल्लिंग
            जिसे पुरूष जाति का बोध होता है। उसे पुलिंग कहते है।

विशेषः- संस्कृत में शब्द लिंग होता है। एक ही वस्तु के लिए पुल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसक लिंग के शब्द का प्रयोग किया जाता है। अधिक जानकारी के लिए लिंगानुशासन पर चटका लगायें।
अकारान्त पुल्लिंग शब्द


जैसे बालक, अश्व
पुल्लिंग शब्द
बक                   छात्र                  हस्त                  ओष्ठ
हंस                   चन्द्र                  सेवक
अध्यापक           पिक                 श्रमिक
अभ्यास-
पुल्लिंगवाची किन्हीं पाँच शरीर के अंग के नाम लिखिए
पुल्लिंगवाची किन्हीं पाँच पक्षियों के अंग के नाम लिखिए
वचन
संस्कृत में तीन वचन होते है।
1.         एकवचन
2.         द्विवचन
3.         बहुवचन
वचन
            जिस शब्द से एक व्यक्ति या वस्तु का ज्ञान होता है। उसे एकवचन, जिससे दो व्यक्ति या वस्तु का ज्ञान होता है। उसे द्विवचन तथा जिससे दो से बधिक व्यक्ति या वस्तु का ज्ञान होता है। उसे बहुवचन कहते है।
बालकः      
बालकौ      
बालकाः 
 बानरः    मयूरः   सिंहः          
क्रिया
 संस्कृत में क्रिया को धातु कहा जाता है। जो कर्ता
उदाहरण-
पठ                    खद
चल                   लिख
वद                   पिव

हस

पाठ-2


















           





यण् सन्धि

इको यणचि 
इक् (इ उ ऋ लृ) के बाद यदि अच् (अ इ उ ऋ लृ ए ओ ए औ) का कोई असवर्ण स्वर हो तो इक् की जगह क्रम से य् व् र् तथा ल् हो जाते है। यहाँ हस्व स्वर से दीर्घ स्वर भी समझना चाहिए।
(क)         यदि हस्व इ या दीर्घ ई के बाद इ, ई को छोड़कर अन्य कोई स्वर वर्ण हो तो इ या ई की जगह य् होता है और वह य्आगे के स्वर से मिल जाता है।



उदाहरण-
                इति + अत्र = इत्यत्र                           इ का य्
                   अति + आचारः = अत्याचारः
                   नदी + अत्र = नद्यत्र                        ई का य्
नदी + आवेगः = नद्यावेगः
 नदी + उद्धारः= नद्युद्धारः

(ख)        उ तथा ऊ के बाद उ, ऊ को छोड़कर यदि कोई स्वर आगे रहे तो उ, ऊ की
जगह व् हो जाता है।
अनु़ + अयः = अन्वयः                    उ का व्
सु़ + आगतम् = स्वागतम्
मधु़ +इदम् = मध्विदम्
मधु़ + ईशः= मध्वीशः
सरयू़+ अम्ब= सरय्वम्बु                 ऊ का व्
वधू़ + आसनम=वध्वासनम्
वधू़ + इच्छा= वध्विच्छा
   (ग) ऋ तथा   के बाद ऋ, और लृ को छोड़कर किसी स्वर में रहने पर ऋके स्थान   
     में र्हो जाता है।
पितृ़ + अनुमतिः= पित्रनुमतिः       ऋ का र्
मातृ़ + आदेशः= मात्रादेशः
  (घ) लृ के बाद ऋ, ऋ और लृ को छोड़कर कोई स्वर हो तो लृ का ल्हो जाता है।
लृ़ + आकृतिः= लाकृतिः              लृ का ल्

पाठ -3  

क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग

जब दो धातुओं (कार्यों) का कर्ता की एक हो तो पूर्वकालिक क्रिया से क्त्वा प्रत्यय होता है।
समानकर्तृकयोः पूर्वकाले 3/4/21
समानकर्तृकयोः धात्वर्थयोः पूर्वकाले विद्यमानाद्धातोः क्त्वा स्यात्।
क्त्वा प्रत्यय के क्त्वा में "त्वा" शेष रहता है, क् हट जाता है।
क्त्वा प्रत्यय का उदाहरणः-    दा+क्त्वा = दत्वा
                        पठ्+क्त्वा = पठित्वा
                        तृ+क्त्वा = तीर्त्वा
द्वितीय नियम
अलं कृत्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा 3/4/18  
निषेधवाची अलं तथा खलु शब्द यदि रिसी क्रिया के पूर्व में हो तो उस क्रिया में भी क्त्वा प्रत्यय होता है।
 ध्यान देने योग्य प्रयोग अथवा वैकल्पिक प्रयोग
कुछ छात्र भ्रमित हो जाते हैं कि लिखित्वा प्रयोग सही है या लेखित्वा। अधोलिखित नियम के अनुसार दोनों प्रयोग सही हैं।
रलो व्युपधाद्धलादेः संश्च 1/2/26
इवर्ण तथा उवर्ण हो उपधा में जिसके ऐसे रलन्त धातुओं से परे इट् सहित क्त्वा एवं सन् विकल्प से कित् होते है।
इट् सहित क्त्वा प्रत्यय का उदाहरणः- लिख्+क्त्वा = लिखित्वा, लेखित्वा
                              गुप्+क्त्वा = गोपित्वा, गुप्त्वा,गुप्त्वा
                              क्षुध्+क्त्वा = क्षुधित्वा, क्षोधित्वा

आगे और पढ़ें  ----    वच्+क्त्वा = उक्त्वा का प्रयोग कैसे होता है?

क्त, क्तवतु प्रत्यय

क्तक्तवतु निष्ठा
क्त, क्तवतु प्रत्यय में त, तवत् शेष रहता है। यह प्रत्यय भूतकालिक क्रिया के अर्थ में वर्तमान धातु से क्त और क्तवतु प्रत्यय होता है।
 क्त‘ प्रत्यय  भाव और कर्म में तथा क्तवतु प्रत्यय कर्ता में होता हैं।
उदाहरण - मया हसितम्, भक्तेन कृष्णः स्तुतः, विष्णुः विश्वं कृतवान्।

 गत्यर्थक, अकर्मक एवं  श्लिष्, शीड्, स्था, आस्, वस्, जन्, रूह, जृ- इतने (उपसर्ग पूर्वक सकर्मक) धातुओं से भाव और कर्म के साथ कर्ता में भी क्तहोता है।
उदाहरण - गृहं गतः। बालः भीतः। प्रियामाश्लिष्टः। हरिः शेषमधिशयितः। वैकुण्ठमधिष्ठितः। कृष्णमुपासितः। हरिदिनमुपोषितः। लक्ष्मणो भरतम् अनुजातः। यानमारूढ़ः। विश्वमनुजीर्णः।


इच्छार्थक, ज्ञानार्थक तथा पूजार्थक धातुओं से वर्तमानकाल में क्तप्रत्यय होता है। उदाहरण - मम मतः, इष्टः। मम बुद्धं, विदितमस्ति। पूजितः, अर्चितः आदि।


संस्कृत के तुलनार्थक प्रत्यय

1. दो की तुलना में तर और दो से अधिक के बीच की तुलना में तमप् प्रत्यय का प्रयोग होता है । जैसेः-
अयम् एतयोरतिशयेन लघुः-- लघुतरः,
अयम् एषामतिशयेन लघुः--लघुतमः।
इसी प्रकार युवन्-       युवतर,        युवतमः
विद्वस-        विद्वत्तर,       विद्वत्तमः
प्रच्-           प्राक्तर,        प्राक्तमः
धनिन्-        धनितरः
गुरू-          गुरूतर, गुरूतमः आदि।
2. क्रिया और क्रियाविशेषण के रूप में प्रयुक्त होने वाले अव्ययों से तर और तम प्रत्यय होने पर उनका रूप तराम् और तमाम् हो जाता है। जैसे- 
पचतितराम्, पचतितमाम्ः उच्चैस्तराम्, उच्चैस्तमाम्ः नितराम्, नितमाम्ः सुतराम्, आदि। किन्तु विशेषण शब्द उच्चैस्तरः (अधिक ऊँचा) ही होगा।
3. दो की तुलना में इयस् और बहुतों की तुलना में इष्ठन् प्रत्यय होते हैं। यह दोनों प्रत्येक गुणवाचक शब्द से होते हैं। इयस् और इष्ठन् प्रत्यय होने पर टि का लोप हो जाता है। जैसे-
लघु शब्द से लघीयस् लघिष्ठः  
पटु शब्द से पटीयस्, पटिष्ठः
महत्- महीयस्, महिष्ठ, आदि।
यहाँ पर क्रमशः उ तथा अत् (टि) का लोप (अदृश्य) हो गया है।
अपवाद- पाचक से पाचकतर, पाचकतम ही रूप बनेगें।
4. मत्वर्थक प्रत्यय विन् और मत् का तथा तृ प्रत्यय का लोप हो जाता है, बाद में यदि ईयस् तथा इष्ठ प्रत्यय हो तो। यहाँ भी टि लोप का नियम लगेगा। जैसे—
मतिमत् (बुद्धिमान)--मतीयस्, मतिष्ठः
मेधाविन्--मेधीयस्, मेधिष्ठः
धनिन्--धनीयस्, धनिष्ठः
कर्तृ--करीयस्, करिष्ठ (अतिशयेन कर्ता), स्तोतृ--स्तवीयस्, स्वविष्ठ। इसी प्रकार स्त्रग्विन् (मालाधारी) से स्रजीयस् और स्रजिष्ठ रूप होगें।
5. साधारणतः तर और तम प्रत्यय से पहले शब्द के अंतिम ई और ऊ का विकल्प से ह्रस्व हो जाता है। जैसे—  
श्री + तरा = श्रीतरा-श्रितरा, श्रीतमा-श्रितमा,
घेमूतरा-घेमतरा (अधिक लँगड़ा), घेमूतमा-घेमुतमा, इत्यादि।
ईयस् इष्ठ और ईमन् प्रत्यय बाद में होने पर ह्रस्व ऋ के स्थान पर र हो जाता है। शब्द के प्रारंभ में कोई व्यंजन अक्षर होना चाहिए। जैसे-
शब्द                 ईयस्          इष्ठ
 कृश (दुर्बल)           कृशीयस्        कृशिष्ठ
दृढ (बलवान्)          द्रढीयस्        द्रढिष्ठ
परिवृढ (मुख्य)         परिव्रढीयस्      परिव्रढिष्ठ
पृथु (विशाल, चैड़ा)              प्रथीयस्        प्रथिष्ठ
भृश (अधिक)           भ्रशीयस्        भ्रशिष्ठ

मृदु (कोमल)           भ्रदीयस्        भ्रदिष्ठ