विद्वत्परिचयः 4

अखण्डानन्द जी महाराज, आद्या प्रसाद मिश्र,कमला कान्त शुक्ल,करूणापति त्रिपाठी,  कालिकाप्रसाद शुक्ल,कुबेर नाथ शुक्ल, के0 टि0 पाण्डुरड्गि,के0 कृष्णमूर्ति, गजानन सदाशिवशास्त्री मुसलगांवकर, गोविन्द चन्द्र पाण्डेय,चन्द्रशेखर शास्त्री चण्डिका प्रसाद शुक्ल, जगदीश शर्मा, दुर्गादत्त शास्त्री विद्यालड्कार, देवीप्रसाद खंडेराव खरवंडीकर, पटृाभिराम शास्त्री, परमानन्द शास्त्री, पेरी सूर्यनारायण शास्त्री, पुल्लेल श्री रामचन्द्रुडु,ब्रज बल्लभ द्विवेदी, बलदेव उपाध्याय, ब्रजबिहारी चैबे, बलजिन्नाथ पण्डित, भोला शंकर व्यास, मनसाराम शास्त्री, मण्डन मिश्र, मुरलीधर मिश्र, रतिनाथ झा, रामशंकर भट्टाचार्य,रमेशचन्द्र शुक्ल,रमारंजन मुखर्जी, रमारंजन मुखोपाध्याय,रघुनाथ शर्मा, रामचन्द्र कृष्णमूर्ति शास्त्री, रामनारायण त्रिपाठी, रामकरण शर्मा, राजदेव मिश्र,राजेन्द्र मिश्र अभिराज,रामधीन चतुर्वेदी,रामनाथ सुमन,रामेश्वर झा,रेवाप्रसाद द्विवेदी,वाचस्पति उपाध्याय,वायुनन्दन पाण्डेय,विद्यासागर पाण्डेय,विश्वनाथ शास्त्री दातार,विद्यानिवास मिश्र,वीरेन्द्र कुमार वर्मा,वेदानन्द झा,शशि तिवारी,श्रीनाथ मिश्र,श्रीधरभास्करवर्णेकर ‘‘प्रज्ञाभारती‘‘,सरस्वती प्रसाद चतुर्वेदी,सुरेश चन्द्र पाण्डेय,सीताराम शास्त्री,सत्यव्रत शास्त्री,हरिहरानन्द सरस्वती (करपात्री जी),सरस्वती प्रसाद चतुर्वेदी,

अखण्डानन्द जी महाराज

        पूज्यपाद स्वामी अखण्डानन्द जी महाराज भारत की विशिष्ट विभूतियो में से एक है। संस्कृत भाषा तथा साहित्य के महान् मर्मज्ञ प्रसिद्व पौराणिक एवं श्रीमद्भागवत महापुराण के तलस्पर्शी विद्वान् है। विद्यावतां भागवते परीक्षा‘ की सूक्ति को दृष्टि में रखकर स्वामी जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की यदि समीक्षा की जाय तो यह स्पष्ट हो प्रतीत होगा कि भागवती कथा के आप अद्वितीय कथावाचक एवं निष्णात विद्वान् हैं।
        स्वामी अखण्डानन्द जी का व्यक्तित्व इतना विराट् है कि उसे शब्दों की लघुपरिधि में बाँध पाना कठिन है। स्वामी जी बाल्यकाल से ही स्वाध्याय प्रेमी तथा वैराग्यवान् रहे हैं। आपने वाराणसी में अनेक प्रख्यात मनीषियों से व्याकरणवेदान्तधर्मशास्त्रतथा ज्योतिष आदि शास्त्रों का गहन अनुशीलन करते हुए प्रगाढ़ पाण्डित्य अर्जित किया है।
        परिव्राजकत्व अंगीकार करने के बाद स्वामी जी ने सम्पूर्ण भारत में वेदान्त एवं श्रीमदभागवत के व्रचार का व्रत ले रखा है। स्वमी जी के प्रवचन सुनने के लिए श्रोताओं की अपार भीड़ उमर पड़ती है। स्वामी जी के व्यक्तित्व में अभिनव व्यास का प्रतिबिम्ब प्रतिभासित होता है। वस्तुतः स्वा0 अखण्डानन्द जी भक्तों में भक्त और ज्ञानियो में ज्ञानी हैं। मौनेपु मौनी गुणिषु गुणवान् पण्डितेषु पण्डितश्च‘ की उक्ति आप पर पूर्णतया चरितार्थ होती है।
        स्वामी महाराज साहित्य के सुधी आराधक है। उनके द्वारा रचित अनेक विद्वत्तापूर्ण ग्रन्थ इस तथ्य के साक्षी हैं। आपने प्रसिद्व कल्याण पत्रिका के सम्पादन में अपना अमूल्य योगदान दिया है। गीताप्रेसगोरखपुर से प्रकाशित श्रीमदभागवत तथा संक्षिप्त महाभारत एवं साधनांक का सम्पादन आपकी कीर्ति के ज्वलन्त उदाहरण है। सत्साहित्य के प्रकाशन में आपकी गहरी अभिरुचि है। स्वामी जी की लेखनी से अब तक 50 से भी अधिक ग्रन्थों का सृजन हो चुका है। उपनिषद्ब्रहम्सूत्र एवं गीता पर गम्भीर व्याख्याएँ प्रस्तुत कर हैंजिनसे प्रस्थानत्रयी के प्रतिभावान् भाष्यकर आचार्यों की पंक्ति में स्वामी जी का सादर उल्लेख किया जा सकता है।
        स्वामी जी जहाँ एक ओर प्रेरक संत हैंशास्त्रों के गम्भीर अध्येता हैं। भागवतकथा के महान व्याख्याता एवं सिद्वहस्त लेखक हैवहीं वह मानवता के उन्नायकसमाज सुधारक और अनेक धर्मार्थ संगठनो के मनोनीत प्रहरी सदस्य हैं।
         वेद विद्या केन्द्र वृन्दावनगोसेवा केन्द्रअन्न दान केन्द्र ट्रस्टों का संचालन महाराज श्री की देख-रेख में हो रहा है।
        पावन व्यक्तित्वअगाध पाण्डित्य अनुपम वाग्मिता एवं विरल साधुता आदि लोकोत्तर गुणों के धनी पूज्य श्री स्वामी अखण्डानन्द जी को विशेष पुरस्कार से सम्मानित कर स्वयं उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी अपने को धन्य मानती है।
                       अद्वैताम्बुधिमन्थनोद्भवमहापीयूषवाग्वैभव-
                                प्राचुर्योदिततत्वरत्नविकसदरिप्रभेद्भासितः
                ज्योतिष्पीठपरम्परामणिमहामालासुमेरुपमोऽ
                                खण्डानन्दसरस्वतीयकतपतिर्नम्यो बुधेन्द्रैर्न कैः
                श्री राधायदुनन्दनाङिघ्रकमलव्याख्यासुधैकाम्बुधिः
                                किं वा संस्कृतवाङ्मयसोत्रतिलतादिव्यालवालोपमः
                आबाल्यात्तपसासमेघितमहातेजो निदानं पुनः
                                सोऽयं श्रीसतिराट् मुहुर्विजयते

आद्या प्रसाद मिश्र

प्रोफेसर आद्या प्रसाद मिश्र का जन्म 29 मार्च 1921 ई0 जौनपुर जनपद में हुआ था।
          श्री मिश्र जी 1942-43 ई0 में दह गई बी0ए0 परीक्षा को छोड़कर अन्य सभी परीक्षाओं में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर उत्तीर्ण हुए। 1950 ई0 में आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में सोलह वर्ष तक अध्यापन कार्य किया। तदन्नतर 1975 से जुलाई 1978 तक कला संकाय के संकायाध्यक्ष तथा अक्टूबर 1978 से 1979 तक प्रतिकुलपति एवं जुलाई 1979 से 1979 से 1980 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति पद को अंलकृत किये।
          प्रो0 मिश्र के द्वारा लिखित शाड्कर वेदान्त दर्शन पर एक अंग्रेजी में साड्ख्यशास्त्र पर तीन हिन्दी में तथा विष्णुसहस्र नाम स्त्रोत पर विष्णुसहस्र नाम पर्यालोचन नाम से संस्कृत में एक कुल पाँच शोध परक ग्रन्थ प्रकाशित है। इनके अतिरिक्त छात्रों के लिये सर्वथा उपादेय उपनिषद् ‘तर्क‘ व्याकरण विवेचनात्मक छः ग्रन्थ एवं उत्तम काव्याशों की संग्रहात्मक चार पुस्तकें (भूमिका,हिन्दी,अनुवाद एवं व्याकरणात्मक टिप्पणी के साथ) प्रकाशित है। आप का संस्कृत निबन्ध मन्दाकिनी नामक उच्चतम परीक्षाओं के लिये सर्वथा उपादेय साठ संस्कृत निबन्ध ग्रन्थ प्रकाशित है। इनके भी अतिरिक्त उच्चकोटि के शोध जनरलों, अभिनन्दन ग्रन्थों एवं अखिल भारतीय विदद् गोष्ठियों के लेख संग्रहों में पचास से अधिक शोध प्रकाशित है।
          आचार्य श्री मिश्र के शोध निर्देशन में आज तक चालीस अनुसन्धाताओं ने डी.लिट् उपाधि प्राप्त की हैं।
प्रो0 मिश्र ने आल इण्डिया ओरियण्टल कान्फ्रेंस पूना में 1992 में हुए ‘‘प्लैटिनम जुबली’’ अधिवेशन में धर्म एवं दर्शन की अध्यक्षता की। आल इण्डिया ओरियण्ट कान्फ्रेंस के रोहतक में हुए 1994 के अधिवेशन में 1996 के कोलकाता अधिवेशन के लिये आपको उपाध्यक्ष चुना गया।
          यू0जी0सी0 द्वारा विभिन्न वर्षों में तीन समितियों के सम्मानित सदस्य इस प्रकार अनेक संस्थाओं की समितियों के अध्यक्ष तथा सदस्य पद पर रहकर आपने कार्यो का सम्पादन किया।
          प्रो0 मिश्र जी केन्द्रीय शिक्षा मन्त्रालय द्वारा उच्चशोधकार्य के लिये प्रारम्भ अलंकार चूड़ामणि योजना के अन्तर्गत 1982 में वृत्ति प्राप्त की जो 1984 में समाप्त हो गई। आप तदानीन्तन उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी द्वारा 1985 में विशिष्ट पुरस्कार से सम्मानित है। वर्ष 1992 में भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा संस्कृत के लिये सर्टिफिकेट आॅफ आनर से आपको सम्मानित किया गया है।

कमला कान्त शुक्ल

ज्योतिष-शास्त्र विहार परायण महामत्तमगंज कंठीरव आचार्य कमलाकान्त शुक्ल का जन्म   15.11.1911 में ग्राम मठिया शुक्ल जनपद देवरिया उत्तर प्रदेश में हुआ था। ाप श्री चन्द्रशेखर शुक्ल के पुत्र है। 1942 ई. में आपने काशी के राजकीय संस्कृत महाविद्यालय वाराणसी से ज्योतिषाचार्य परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करके धर्मसंघ शिक्षा मण्डल दुर्गाकुण्ड, वाराएासी से ज्योतिष मार्तण्ड उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त किया।
          श्री शुक्ल जी 1944 से 1964 तक श्री राधाकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय देवरिया में ज्योतिष प्राध्यापक पद पर सेवा करने के पश्चात् 1979 वर्ष पर्यन्त चैदह वर्ष तक संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में ज्योतिष प्राध्यापक पद को अलंकृत किया। 44 वर्ष तक अध्यापन सेवा करने के पश्चात् सेवानिवृत्त हुए।
          आचार्य शुक्ल द्वारा लिखित संपूर्णानंद संस्कृत महाविद्यालय की सरस्वती सुषमा पत्रिका में पंचाग विमर्शः, अयनांश-विमर्शः, धूमकेतुचार विमर्शः, प्रजावृद्वि-विमर्शः शीषर्क से पांच महत्वपूर्ण लेख प्रकाशित हो चुके है। उसके अलावा पदम् विभूषण श्री विद्या निवास मिश्र के संपादकत्व में प्रकाशित होने वाले ‘हिन्दू-धर्म-विश्व कोश’ नामक महाग्रंथ में आप द्वारा लिखित (भारतीय वास्तु कला तथा दश दुर्योग) शीषर्क का निबन्ध प्रकाशनार्थ भेजा गया है। इसके अतिरिक्त आप द्वारा लिखित व्याख्यायित एवं संपादित हिन्दी व्याख्या युक्त ‘वास्तु सार संग्रह’ सोदाहरण संस्कृत हिन्दी व्याख्या युक्त ‘जैमिनीय सूत्रं’ ये पांच ग्रंथ संपूर्णानन्द संस्कृत विद्यालय से प्रकाशित हैं।
          आचार्य शुक्ल जी की श्लाघनीय, विशाल शिष्य परम्परा है। आपके शिष्यों में डाॅ0 कृष्ण चन्द्र द्विवेदी जो संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से ज्योतिष विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त है, नागेन्द्र पाण्डेय, जो उक्त विश्वविद्यालय में ज्योतिष विषय के उपाचार्य एवं इस समय उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के सम्मानित अध्यक्ष पद पर विराजमान हैं। इसके अतिरिक्त इक्कीस शिष्य देश एवं प्रदेश के विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में महत्चपूर्ण पदों पर कार्य कर रहे हैं।
          अवकाश प्राप्ति केे अनन्तर श्री शुक्ल जी मानव संसाधन विकास मंत्रालय एवं शिक्षा विभाग की योजनानुसार 1985 से 1987 तक आचार्य शास्त्र चूड़ामणि एवं 1987 से 1991 तक तीन वर्ष आचार्य शास्त्र प्रौढि़ के पद पर विराजित रहे। आप 1992 से संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के आजीवन सम्मानित आचार्य के रूप में नियुक्त है।
          आचार्य श्री शुक्ल जी 1996 में उ0प्र0 संस्कृत संस्थान के विशेष पुरस्कार से, 1996 में स्वतंत्रता सेनानी पुरस्कार से, 2001 में काशी की विद्वत् परिषद् द्वारा म0म0 श्री शिव कुमार शास्त्री पुरस्कार से और संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से, सरस्वती-सुषमा पत्रिका के स्वर्ण जयन्ती पुरस्कार से पुरस्कृत किए गए है। 2002 वर्ष में भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रशस्ति पत्र के साथ राष्ट्रपति पुरस्कार से भी आप सम्मानित किए गए हैं।
          सन्त ह्दय, त्रिस्कन्ध ज्योतिष केक प्रकाण्ड पण्डित, लब्धप्रतिष्ठ लेखक प्रवीण शिक्षक भारतीय संस्कृति तथा संस्कृत के उन्नायक आचार्य कमला कान्त शुक्ल को ‘विशिष्ठ पुरस्कार’ से समादृत करते हुए, इक्यावन सहस्त्र रूपये की धनराशि सादर भेंटकर उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान स्वंय गौरवान्वित है।

करूणापति त्रिपाठी

            आचार्य करूणापति त्रिपाठी जी का जन्म 19130 में हुआ। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर हुई। उपनयन संस्कार के पश्चात् वेदाध्ययन एवं 19260 में रणवीर संस्कृत पाठशाला में प्रवेशिका परीक्षा हुई। आचार्य त्रिपाठी जी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शास्त्राचार्य परीक्षा प्रथम श्रेणी में स्थान प्राप्त कर 19380 में उसी विश्वविद्यालय में हिन्दी में एम00 तथा 19400 शिक्षा शास्त्र की बी0टी0 परीक्षा उत्तीर्ण की।

                   आचार्य करूणापति त्रिपाठी जी गवर्नमेन्ट संस्कृत कालेज में मयूर भजनफेलो रूप  में तीन वर्ष तक तथा दो वर्ष तक आधुनिक सहायकाध्यापक पद पर 1946 सं 19750 तक काशी हिन्दु विश्वविद्यालय तथा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में कुलपति पद पर कार्य किये। नवम्बर 1980 से दश वर्ष तक उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी के अवैतनिक रूप से अध्यक्ष पद पर रह कर कार्य सम्पन्न किये।
                   आचार्य त्रिपाठी जी ने अनेक ग्रन्थों का सम्पादन किया है, उनमें सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से, रसिक जीवनम् विराड्विवरणम्, पंचमुखी टीका सहित शिवमहिम्न काशीखण्ड के दो भागों का सम्पादन चल रहा है। उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी से पंचदशी, संक्षिप्त महाभारत प्रथम खण्ड वृहद जुपाणिनीयम्, यतीन्द्रजीवनचरितम् आदि ग्रन्थों का सम्पादन किये हैं। संस्कृत वाड्मय के वृहद् इतिहास क अष्टम खण्ड का सम्पादन चल रहा है।
              नागरी प्रचारिणी सभा काशी में पचास वर्षों से अनेक ग्रन्थों का हिन्दी में सम्पादन किया, जिनमें हिन्दी शब्दसागर, हिन्दी विश्वकोष हिन्दी साहित्य का बृहद्इतिहास आदि ग्रन्थ प्रमुख हैं।
                  आचार्य त्रिपाठी जी महामहिमा राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत है। आप अनेक विश्वविद्यालयों के विद्या परिषद् के सदस्य हैं। इस समय सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्विद्यालय के सम्मानित प्राध्यापक पद को भी सुशोभित कर रहे हैं।

कालिकाप्रसाद शुक्ल

        पराम्परागत संस्कृत विद्वानो के कुल में आचार्य श्री कालिका प्रसाद शुक्ल का जन्म देवरिया जनपद के मठिया शुक्ल नामक ग्राम में 15-10-1721 ई0 को हुआ था। आप के पिता पण्डित चन्द्रशेखर शुक्ल जी संस्कृत के अच्छे विद्वान थे जिनसे आपने प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहणकर उच्च अध्ययनार्थ काशी आ गये। सर्वतन्त्र स्वतन्त्र श्री पण्डित सभापति शर्मोपाध्याय आदि विशिष्ट विद्वानों से अध्ययन करते हुए 1742 ई0 में सं0 सं0 वि0 से ‘‘नव्य व्याकरणाचार्य‘‘ की उपाधि प्राप्त की और जैन संस्कृत महाविद्यालय लूनाबाड़ा गुजरात में अध्यापक पद पर प्रतिष्ठित हो गए। बाद में राजकीय सज्जन कुँवर संस्कृत महाविद्यालय‘ में प्रधानाध्यापक पद पर चले गए। योग्यता विशेष के कारण आपकी नियुक्ति बड़ोदा विश्वविद्यालय‘, गुजरात के संस्कृत महा विद्यालय में प्रध्यापक पद पर हो गई। जहाँ 10 वर्षों तक अध्यापन करने के बाद सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में व्याकरण विभाग में चले आए जहाँ से आप उपाचार्य एवं आचार्य पदों पर कार्य करते हुए 1781 में सेवानिवृत्त हो गए।
        आप के निर्देशन मे पचास से अधिक छात्रों ने विद्यावारिधि (पी-एच0 डी) और एक छात्र ने विद्यावाचस्पति (डी0 लिट्0) उपाधि प्राप्त की है। श्री शुक्ल जी स्वतन्त्र लेखनसम्पादनअनुवाद एवं काव्य-प्रणयन में व्यस्त रहे है। ‘‘वैयाकरणानामन्येषां च मतेन शब्दस्वरुप तच्छक्तिविमर्शः‘‘ नामक वाचस्पति (डी0 लिट्0) शोधप्रबन्ध में आपकी प्रतिभा सर्वतोभावेन प्रस्फुटित है।
        आपने भगवान् भास्कर की स्तुति में ‘‘भास्करभावभानवः‘‘ (सूर्य-शतकम्) तथा राधा-चरितमहाकाव्यम्‘ का निर्माण किया हैं जिसमंे श्री शुक्ल की काव्य प्रतिभा का चमत्कार दर्शनीय है। श्री शुक्ल जी ने न्यास एवं पदमंज्जरी टीकाओं के साथ सम्पूर्ण काशिकावृत्ति हेमवती टीका सहित परिभाषेन्दुशेखर‘ ‘वैयाकरणसिद्वान्तमंज्जूषा‘ ‘वैयाकरण-सिद्वान्तलघुमंज्जूषा‘ ‘ज्योत्सना‘ व्याख्या के साथ परमलघु मंज्जूषा‘ प्रभृति व्याकरण के आकार ग्रन्थों का, ‘कोविदानन्द‘ एवं त्रिवेणिका‘ सहित चित्रमीमांसा‘ का विशद टिप्पणी एवं भूमिका के साथ संपादन प्रकाशन कर भगवती सरस्वती की प्रशंसनीय सेवा की है। संस्कृत पत्रिकाओं में लिखकर एवं संस्कृत विद्वत्परिषदोंकवि गोष्ठियों में भाग लेकर आपने सर्वतोमुख पाण्डित्य को प्रकट किया है। सं0 सं0 विश्वविद्यालय के आचार्य (प्रोफेसर)विभागाध्यक्षसंकायाध्यक्ष आदि महत्तवपूर्ण पदों से सेवा निवृत्त होने के बाद आज भी आप शास्त्रचूडामणि योजना में सम्मानित आचार्य के पद पर प्रतिष्ठित है।
        श्री शुक्ल जी के गवेषणा गौरव से आकृष्ट होकर द्वारकाशारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु श्री शंकराचार्य ने ‘‘पण्डितावतंस‘‘ पदवी से विभूषित किया।
        ‘‘वैयाकरणानामन्येषां च मतेन शब्दस्वरुपतच्छक्तिविमर्शः‘‘ नामक प्रकाशित शोध प्रबन्ध ग्रन्थ पर उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी ने रु0 3000/ तीन हजार के विशेष पुरस्कार से आपको सम्मानित किया है। 1878 में आगरा विश्वविद्यालय ने आपको अतिथि प्राध्यापक (विजिटिंग प्रोफेसर) बनाकर सभादृत किया था।
        आचार्य शुक्ल के विशिष्ट एवं व्यापक पाण्डित्यशास्त्रनिष्ठा शिष्यसम्पत्ति एवं ग्रन्थ सम्पत्ति तथा दीर्घकालीन संस्कृत सेवा का आकलन कर एवं आपकी अध्ययन अध्यापन और ग्रन्थ निर्माण में प्रवृत्ति को दृष्टि में रखकर उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी आपको पच्चीस हजार रुपयों का विशिष्ट पुरस्कार प्रदान कर अत्यन्त गौरव का अनुभव करती है।

कुबेर नाथ शुक्ल


 आचार्य कुबेरनाथ शुक्ल का जन्म 1911 ई0 में पुरैना शुक्ल नामक ग्राम में हुआ था। आप श्री सालिकराम शुक्ल के द्वितीय पुत्र है। श्री शुक्ल जी बाल्यकाल से ही प्रतिभा सम्पन्न रहे। आपका अध्ययन सरवारि संस्कृत पाठशाला में मध्यमा पर्यन्त हुआ। उसके बाद राजकीय संस्कृत महाविद्यालय काशी में विद्वद्वरेण्य पण्डित हरिनारायण तिवारी जी के सान्निध्य में आपने व्याकरणाचार्य की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया। इसके बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
                   श्री शुक्ल की उत्तर प्रदेश के राजकीय शिक्षा विभाग से सेवा प्रारम्भ करके दो वर्ष तक सहायक निरिक्षक संस्कृत पाठशाला के पद पर रहकर निरिक्षण कार्य किये। काशी राजकीय संस्कृत महाविद्यालय में कुल सचिव पद पर दस वर्ष तक सेवा करके वहीं चार वर्ष तक प्राचार्य रहे। काशी राजकीय संस्कृत महाविद्यालय के रूप में परिवर्तित होने पर श्री आदित्य नाथ झा महोदय के प्रथम कुलपति पद पर आसीन होने पर आप प्रथम कुलसचिव रहें। आचार्य शुक्ल जी संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति पद को भी गौरान्वित किये है।
                   कारयित्री भावयित्री प्रतिभावाले आचार्य शुक्ल सारस्वती सुषमा पत्रिका के सम्पादन का कार्य भी बड़े ही श्रभ से सम्पादित किये है। व्यवस्थापत्र संग्रह नामक ग्रन्थ का प्रकाशन तथा वाल्मीकिरचनामृत नामक ग्रन्थ की दो भागों में रचना किये। योगवाशिष्ट के रामएवं योग वाशिष्ठ के आख्यान ये दोनों ग्रन्थ हिन्दी में शुक्ल द्वारा लिखे गये हैं। इस समय साप्ताहिक गाण्डीवम् पत्र का सम्पादन कर रहे हैं।
                   आचार्य शुक्ल प्रयाग विश्वविद्यालय के पदेन सिनेट सदस्य तथा समय-समय पर सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के शिष्ट परिषद् तथा विद्यापरिषद् के सम्मानित सदस्य रहे। राजस्थान संस्कृत महाविद्यालय तथा मध्यप्रदेश संस्कृत महाविद्यालयों के परीक्षक मण्डल के संयोजक पद को भी सुशोभित किया है। प्रदेश में जिला विद्यालय निरिक्षक भी रहें।

के0 टि0 पाण्डुरड्गि

 प्रो0 कृष्णाचार्य तमणाचार्य पाण्डुरडि का जन्म कर्नाटक प्रदेश के धारवाडमण्डल में तुम्मिनकुटि ग्राम में 1918 में हुआ।
          पिता के सान्निध्य में आप काव्यव्याकरणकोश आदि का अध्ययन करके विद्वान् की उपाधि से युक्त हुये। उनके बाद आपने तमिलनाडू प्रदेश के चिदम्बर क्षेत्र में अन्नमल्लै विश्वविद्यालय के प्राच्य विद्या विभाग में पूर्वमीमांसा का अध्ययन करके शिरोमणि उपाधि प्राप्त किया। तत्पश्चात् काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से बी00 एवं एम00 (संस्कृत) की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया।
          श्री पाण्डुरडि विद्याध्ययन के अनन्तर धारवाड स्थित राजकीय कर्नाटक पाठशाला में पण्डित स्थानउपान्यासक स्थानएवं उपप्राध्यापक पदों पर कार्य करते हुए 1948 से 1960 तक सैकड़ो छात्रों को पढ़ाया। उसके बाद वेंगलूर नगर स्थित राजकीय पाठशाला में प्राध्यापक होकर अध्यापन एवं शोध कार्य में संलग्न रहते हुए 1968 ई0 में वेंगलूर विश्वविद्यालय में संस्कृत विभागाध्यक्ष पद को अलंकृत किया।
          आप 1971 ई0 में सेवा निवृत्त हुए। सेवा निवृत्ति के बाद 1971 से 1914 तक वेंगलूर नगरस्थित प्रसिद्ध प्राचीनेतिहास शोध संस्थान के मिथक् सोसायटी नाम की संस्था के अध्यक्ष रहे।
          पचास वर्ष की दीर्घकालीन सेवा में अध्यापन एवं शोध निर्देशन में संलग्न रहते हुए आपने दो हजार हस्तलिखित ग्रन्थों का संग्रह किया और उनकी सूची को प्रकाशित किया। देश-विदेश में विद्यमान संस्कृत हस्तलिखित ग्रन्थ सम्पत् नामक ग्रन्थ की रचना की। श्री पाण्डुरडिग ने बीस हस्तलिखित ग्रन्थों का सम्पादन करके प्रकाशित किया। आपने बारह वेदान्त के ग्रन्थ अंग्रेजी में अनूदित हैं। साहित्य के ग्रन्थ भी संस्कृतअंगे्रजी कन्नड़ भाषाओं में लिखे गये है। उनमें रवीन्द्र रूपकसंस्कृत कवयित्रयःकाव्यशास्त्र विनोद और विचार ज्योति ग्रन्थ प्रमुख हैं। पचास से अधिक शोध लेख प्रसिद्ध शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं।
          श्री पाण्डुरडिंग ने केन्द्रीय संस्कृत पनिषद् एवं सत्य साई विश्वविद्यालय के संस्कृत मण्डल के तथा अन्य विश्वविद्यालयों के सम्मानित सदस्य रहे। आपके पास जर्मनीआस्ट्रेलिया अमेरिका आदि देशों के अनेक छात्र और अध्यापक पूर्व मीमांसा एवं द्वैत वेदान्त का अध्ययन करने के लिये आते है।
          श्री पाण्डुरिंग की संस्कृत सेवा को देखकर 1981 ई0 में भारत सरकार ने राष्ट्रपति पुरस्कार प्रदान किया। उडुपीमठाधीश्वर श्री राघवेनद्र स्वामी ने ‘‘े शास्त्रनिधि’’ मीमांसाभुषण’’ दर्शनरत्न‘‘ की उपाधि की उपाधि प्रदान किया। 

के0 कृष्णमूर्ति


          डा0 के0 कृष्णमूर्ति का जन्म कर्नाटक प्रान्त में कावेरी तट पर केवलपुर ग्राम में सन् 1923 वर्ष में हुआ था। आप मैसूर से संस्कृत में एम0 ए0 की परीक्षा स्वर्ण पदक करके प्रथम श्रेणी मंे सन् 1943 ई0 में उत्तीर्ण किये। आप संस्कृतकन्नड़एवं अंग्रेजी भाषा में अपने कौशल से अनेक स्वर्ण पदकों से विभूषित किये गये हैं। बम्बई विश्वविद्यालय से आपने ध्वन्यालोकः तत्खण्डनकाराश्च इस विषय में पी-एच0 डी की उपाधि प्राप्त की।

          1949 ई0 में आपने कर्नाटक विश्वविद्यलय में संस्कृत विभागाध्यक्ष पद पर नियुक्त होकर उच्च कक्षाओं में अध्यापन कार्य किया और कालेज के सभी पाठ्यग्रंथो का अच्छा संस्करण प्रकाशित किया। उसके बाद आकरलक्षण ग्रन्थों पर विशेष अध्ययन किया जिसके फलस्वरुप ध्वन्यालोकवकोवितजीवितअभिनवगुप्त की लोचन टीका अभिनवभारती नाट्यशास्त्र आदि ग्रंथो की संस्कृत के साथ-साथ अंग्रेजी में भी व्याख्या की जो दिल्ली एवं बड़ौदा आदि स्थानों से प्रकाशित है। इसी प्रकार अनेक ग्रन्थों का प्रकाशन एवं संपादन आपने वैदुश्यपूर्ण ढ़ग से किया है।

          श्री मूर्ति जी के द्वारा रचित अनेक ग्रन्थ बहुचर्चित हैं। आपने भारतीय ज्ञानपीठ एवं साहित्य अकादियों में तथा अन्याय विद्वत संस्थाओं में प्रचुर सेवा की है।

          1984 ई0 में आप कर्नाटक विश्वविद्यालय से सेवा निवृत्त होने के बाद तीन वर्ष तक श्री सत्यसाई इन्स्टीट्यूट आफ हायर लरनिंग विश्वविद्यालय में भारतीय संस्कृत विभागाध्यक्ष पद पर कार्य किया।

गजानन सदाशिवशास्त्री मुसलगांवकर


महामहोपाघ्याय की उपाधि से अलंकृत आचार्य गजानन शास्त्री मुसलगाँवकर महोदय का जन्म 15-0-1917 ईस्वी को हुआ था। परमपूज्य महामहोपाध्याय धर्मरत्न धर्ममार्तण्ड श्री सदाशिव शास्त्री मुसलगाँवकर महोदय आपके पिता थे।

                   श्री मुसलगाँवकर महोदय की शिक्षा आनुवंशिक पद्वति से हुई। आपने शुक्लयजुर्वेद माध्यन्दिनीय शाखा काकर्मकाण्डतन्त्रशास्त्रन्यायशास्त्रधर्मशास्त्र भारतीय राजनीति शास्त्रन्याय-वैशेषिक मीमांसाशास्त्र वेदान्तसांख्ययोग और वेदान्त भाष्य का अध्ययन किया है। आपने विद्यालय शिक्षा पद्वति से मीमांसाशास्त्र वेदान्तसांख्ययोग और वेदान्त भाष्य का अध्ययन किया है। आपने विद्यालय शिक्षा पद्वति से मीमांसाचार्य वेदान्तचार्य साहित्यचार्यसाहित्याचार्यसाहित्यरत्नम्एम00 इत्यादि परीक्षा उत्तीर्ण की और पी0एच0डी0 की उपाधि प्राप्त की।

                   आचार्य मुसलगाँवकर महोदय ने 63 वर्षों तक अनेक शिक्षण संस्थाओं में अध्यापन का कार्य किया हैजिनमें प्रमुख हैं-1962 ई0 तक वाराणसी स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में क्रमशः प्रवक्ताउपाचार्यविभागाध्यक्ष के पद पर रहते हुए अध्यापन कार्य किया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आपको गुजरात प्रान्त स्थित बड़ौता के एम0एस0 विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में नियुक्त किया गया। इसके पश्चात्! इलाहाबाद स्थित ‘‘गंगाधर झा शोध संस्थान‘‘ में ‘‘ शास्त्र-चूड़ामणि’’ पद अलंकृत किया। आपके शिष्य देश-विदेशां में और अनेक संस्थाओं से संबद्ध होकर संस्कृत भाषा के प्रचार एवं प्रसार में संलग्न है।

                   श्री मुसलगाँवकर महोदय ने अपने ग्रन्थों का लेखन एवं सम्पादन किया है। मीमांसा दर्शन का विवेचानात्मक इतिहास वैदिक साहित्य का इतिहासमीमांसापदार्थ संग्रह आदि आपके मौलिक एवं संस्कृत में प्रस्तावित ग्रन्थ हैं। वेदान्तसांख्यन्यायसाहित्यवेदपुराणधर्मशास्त्रनीतिशास्त्र और शैवागम आदि विषय के नव ग्रन्थों की व्याख्या की है। इनका वेद का वेदार्थ पारिजातशुक्ल यजुर्वेद भाष्य की हिन्दी व्याख्याशैवागम का अनुभव सूत्र ये तीन ग्रन्थ महत्वपूर्ण है। उत्तर संस्कृत संस्थान से प्रकाशित संस्कृत वाड्मय का वृहद् इतिहास के अन्तर्गत न्यायखण्ड का सम्पादन श्री मुसलगाँवकर महोदय ने किया है। इसके अतिरिक्त आपने 19 ग्रन्थों की व्याख्या की है।
                   श्री मुसलागाँवकर महोदय का संस्कृत सेवा का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। इन्हे वाराणसी स्थित सांगवेद विद्यालय से 1989 ई0 में मीमांसा-भूषण’’ कीग्वालियर संस्कृत मण्डल से ’’वैदिक‘‘ तिलक’’ की, 1990 ई0 में भारत के राष्ट्रपति आर. वेकटरमण द्वारा ‘‘सर्टिफिकेट आफ आनर’’ की तथा श्री जगद्गुरूशंकराचार्य करवीर पीठ द्वारा ‘‘महामहोपाध्याय’’ की उपाधि द्वारा अलकंृत किया गया है।
                   आचार्य मुसलगाँवकर सांस्कृतिक परम्परा के अन्तर्गत ‘‘महर्षि वेद व्यास’’ पुरस्कार से पुरस्कृत है। श्रद्धेय डाॅ. गजानन शास्त्री मुसलगाॅवकर महोदय की आजीवन संस्कृत सेवा उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को लक्ष्य में रखते हुए उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान आपको एक लाख इक्यावन हजार रूपये के ‘‘विश्व-भारती’’ नामक पुरस्कार एवं सम्मान प्रदान करते हुए गौरव का अनुभव कर रहा है।

गड्गाधर पण्डा

     प्रो. गड्गाधर पण्डा का जन्म 8.8.1957 ई. में हुआ था। बावन वर्षीय श्री पण्डा की जन्मभूमि ग्राम सलाराजनपद कटक उड़ीसा प्रान्त हैं।
          प्रो. पण्डा संस्कृत में एम.ए. परीक्षा विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से उत्तीर्ण करके श्रीजगन्नाथ विश्वविद्यालय पुरी से पुराणसाहित्यधर्मशास्त्रऔर सांख्ययोग विषय में आचार्य परीक्षायें प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हैं। आप राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान मानित विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. (विद्यावारिधि)कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय दरभंगा से विद्यावाचस्पति डी.लिट्. उपाधि प्राप्त किये है।
          प्रो. पण्डा सिन्धिया ओरियण्टल संस्थान उज्जैन से अनुसन्धान सहायक के रूप में सेवा प्रारम्भ करके क्रमशः राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में प्राध्यापकपद पर साढ़े आठ वर्षों तक सेवा के अनन्तर सी.एस.एन.एस. संस्कृत महाविद्यालयकाच्चीपुर तमिलनाडु में प्रधानाचार्य पद पर साढ़े तीन वर्ष तक वर्ष तक सेवा करने के पश्चात् मानव संसाधन विकास मन्त्रालय के शिक्षा विभाग में संस्कृत भाषा के उच्च शिक्षा सलाहकार पद पर साढ़े तीन वर्ष तक कार्य सम्पादित करके लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ में दो वर्ष तक कुलसचिव पद पर कार्य किया। आप 1998 ई. से में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में पुराणेतिहास विभाग के आचार्य एवं विभागाध्यक्ष पद पर नियुक्त होकर अध्यापन में रत हैं। आप 16.6.2000 ई. से 15.6.2003 ई. तक सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्विद्यालय के साहित्य संस्कृत संकाय के संकायाध्यक्ष पद पर भी सेवा किये है। आपके शोध निर्देशन में दश छात्र शोधकार्य में संलग्न हैं।
          प्रो. पण्डा द्वारा दश ग्रन्थ लिखे और सम्पादित किये गये हैं। आपने साठ शोधपत्र लिखे हैं और चालीस संस्कृतवार्तायें एवं भाषण भी प्रकाशित हैं। आष्ट्रेलिया में मेलवर्न में पंचम विश्व संस्कृत सम्मेलन में आप सहभागी रहे। आप ने उडिया भाषा में चार शोधपत्र एवं हिन्दी में अट्ठारह शोधपत्र लिखा हैं और वे प्रकाशित हैंै। प्रो. पण्डा देश के अलावा आष्ट्रेलियाथाईलैण्डसिंगापुरनेपाल आदि देशों में संस्कृत के प्रचार हेतु भ्रमण किया है।
          प्रो. पण्डा अध्यापन के साथ-साथ देश की विभिन्न संस्थाओं में कहीअध्यक्ष सदस्यएवं राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ के अध्ययन मण्डल के सम्मानित सदस्य के रूप में संस्कृत के उन्नयन में संलग्न हैं। आपकी प्रशासनिक पदों पर भी महत्वपूर्ण उपलब्धि है। पुरश्चर्या पाठ्यक्रमों में भी पण्डा जी की सहभागिता स्तुत्य है।
          प्रो. पण्डा संस्कृत साहित्य परिषदतमिलनाडु द्वारागीर्वाणविद्यारत्न सम्मान सेसम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के संस्कृत वर्य सम्मान सेअमृतवाणी सेवा प्रतिष्ठानउड़ीसा द्वारा अमृत भाषा सम्मान से और इण्डियन इन्स्टिट्यूट आफ ओरियण्टल हेरिटेजकलकत्ता द्वारा ‘‘ज्ञानभारती’’ पुरस्कार से सम्मानित किये गये है।

          ऐसे प्रज्ञावान प्रो. गड्गाधर पण्डा को उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान इक्यावन हजार रूपये के विशिष्ट पुरस्कार से सम्मानित करते हुए गौरवान्वित हो रहा है।

गोविन्द चन्द्र पाण्डेय

      आचार्य गोविन्द चन्द्र पाण्डेय का जन्म 30 जुलाई 1923 को इलाहाबाद में हुआ। काशीपुर में आकर बसे कुमायूँ के सुप्रतिष्ठित परिवार में जन्में श्री पीताम्बर दत्त उनके पिता एवं श्रीमती भगवती देवी उनकी माता थी। माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक शिक्षा प्रथम श्रेणी एवं उच्च स्थान के साथ उत्तीर्ण किया और वहीं से डी.लिट् की उपाधि प्राप्त की।
          प्रो0 पाण्डेय जी उसी समय पण्डित प्रवर श्री रघुवीर दत्त शास्त्री और पण्डित रामशंकर द्विवेदी के सानिध्य में व्याकरण, एवं साहित्य शास्त्रों का पारम्परिक रीति से अध्ययन किया। विश्वविख्यात विद्वान् प्रो0 क्षेत्रेश चन्द्र चटोपाध्याय के सानिध्य में भाषा शास्त्र, धर्म, दर्शन, और इतिहास की नवीन पद्धति से शिक्षा प्राप्त की और उन्ही के निर्देशन में 1947 ई0 में डी0फिल0 की उपाधि प्राप्त की। शोधकाल में ही पालि, प्राकृत फ्रेंच, जर्मन, और बौद्ध चीनी भाषा का भी कार्योपयोगी अध्ययन किया।
          श्री पाण्डेय जी ने 1947 ईस्वी से 1957 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में लेक्चरर और रीडर के भी पद पर कार्य किया। 1957 ई. में प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति और पुरातत्व विषय के प्रथम आचार्य होकर आप गोरखपुर विश्व विद्यालय चले गये। 1962 में राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर रहे। 1978 में पाण्डेय जी पुनः इलाहाबाद आये और 1985 से 1988 तक तीन वर्ष तक आई0 सी0 एच0 आर0 के प्रथम राष्ट्रीय फेलो नियुक्त हुए। भारतीय दर्शन अनुसंधान परिषद् की परिषद की विज्ञान दर्शन, संस्कृति, इतिहास के सम्पादकत्व योजना में सम्पादक के रूप में कार्यरत हैं। इस समय भी श्री पाण्डेय जी भारतीय उच्च अध्ययन तिब्बती अध्ययन संस्थान, सारनााि एवं इलाहाबाद संग्रहालय के अध्यक्ष हैं।
          पाण्डेय महोदय द्वारा लिखे गये संस्कृति, दर्शन साहित्य, इतिहा विषयक अनेक आलोचनात्मक शोध ग्रन्थ, काव्य ग्रंथ और विविध लेख प्रकाशित हैं। आप द्वारा संस्कृत भाषा में रचित मौलिक एवं अनूदित तथा प्रकाशित प्रमुख ग्रन्थ ‘दर्शन विमर्श’ 1996 वाराणसी, ‘सौन्दर्य दर्शन विमर्श’ 1996 वाराणसी, ‘एकं सद्विप्राः बहुधा वदन्ति’ 1997 वाराणसी ‘न्यायबिन्दु’ 1975 सारनाथ जयपुर, इसके अतिरिक्त संस्कृति एवं इतिहास विषयक पाँच ग्रन्थ और दर्शन विषय के आठ ग्रन्थों में ‘शंकराचार्य विचार और सन्दर्भ‘ ग्रन्थ महनीय हैं। विविध साहित्यिक कृतियों में आप द्वारा विरचित आठ ग्रन्थ संस्कृत वाड्मय को विभूषित कर रहें है।
          प्रो0 पाण्डेय जी भारत सरकार की महत्वपूर्ण समितियों के समय समय पर सदस्य रहें हैं, एवं देश विदेश की अनेक महत्वपूर्ण संगोष्ठियों में भागीदार होते रहे है। जैसे मीमांसा रचना निमित्तक भारत सरकार द्वारा विशिष्ट धनराशि रूप पुरस्कार, मनीषासम्मान, मड्गला प्रसाद पुरस्कार, विज्ञान दर्शन पुरस्कार, नरेश मेहता सम्मान, मूर्तिदेवी पुरस्कार, साहित्य अकादमी का सर्वोच्च सम्मान महत्तर सदस्यता रूप में, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की मानद डी.लिट् उपाधि, व लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय से महामहोपाध्याय की उपाधि प्रमुख है।
          महामहोपाध्याय श्री गोविन्द चन्द्र पाण्डेय की संस्कृत वाड्मय के प्रति उत्कृष्ट सेवा और उसके प्रति समर्पित जीवन, भारतीय संस्कृति की संरक्षण तत्परता, भारतीय दर्शन की पोषण भावना एवं उनके विशिष्ट कृतित्व एवं व्यक्तित्व का आलोडन करके उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान तत्परता, भारतीय ‘‘एक लाख इक्यावन हजार’’ रूपये के ‘‘विश्वभारती’’ नामक सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित कर स्वंय गौरवान्वित हो रहा है।

चन्द्रशेखर शास्त्री

आचार्य श्री चन्द्रशेखर शास्त्री पदवाक्यप्रमाणज्ञ आचार्यो की परम्परा के यशस्वी विद्वान् है। नव्य व्याकरण एवं साहित्य शास्त्र का अगाध पाण्डित्य आचार्यप्रवर में विद्यमान है। आज भी अनेक विद्वान् शास्त्रीय समस्याओं के निराकरण में आपके पाण्डित्य से लाभान्वित होते है। आचार्य जी ने 1922 में गवर्नमेण्ट संस्कृत काॅलेज वाराणसी से नव्य व्याकरणाचार्य तथा 1923 में बिहार एवं उड़ीसा एसोसियेशन से साहित्याचार्य की उपाधि तथा कलकत्ता से काव्यतीर्थ की उपाधि से सम्मानित किया है।
                   आचार्य प्रवर ने श्री बल्देव सहाय संस्कृत महाविद्यालय, कानपुर में 1921 से 1974 तक उच्च कक्षाओं में छात्रों को अपने गम्भीर पाडित्य से कृतार्थ किया है। व्याकरण, दर्शन तथा साहित्य में आपकी सूक्ष्मेक्षिका की भूरि-भूरि प्रशंसा अनेक विद्वानों ने की है।
                   श्री शास्त्री जी संस्कृत शिक्षा से सम्बन्धित अनेक संस्थाओं के सदस्य रह चुके है। उ0प्र0 माध्यमिक शिक्षा परिषद, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय की शिष्ट परिषद्, विद्वत् परिषद्, 0प्र0 नागरी लिपि सुधार समिति तथा उ0प्र0 नागरी लिपि सुधार समिति तथा उ0प्र0 संस्कृत अकादमी आदि संस्थाओं के सदस्य पदों को सुशोभित कर रहे है। श्री शास्त्री जी ने अपने जीवन-काल में ऐसे अनेक शिष्यों को बनाया है जो आज उच्च पदों को सुशोभित रहे है। धाराप्रवाह संस्कृत-भाषण आपके व्यक्तित्व का एक विशिष्ट अंग है।
                   आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री कुशलवक्ता, शास्त्रों के निष्णात पण्डित, संस्कृत भाषा एवं साहित्य के महान् उन्नायन है। ऐसे महान् पण्डित को विशिष्ट पुरस्कार द्वारा सम्मानित करते हुए उ0प्र0 संस्कृत अकादमी अपने को गौरावान्वित समझती है।

चण्डिका प्रसाद शुक्ल

आचार्य डा0 चण्डिका प्रसाद शुक्ल का जन्म सन् 1921 ई0 में प्रयाग जनपद के गंगातट पर स्थित  परवा ग्राम में सरयूपारीण ब्राह्ण कुल में हुआ था। वंश परम्परा से पूर्वज संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान् होते थे। अतः शैशव से ही श्री शुक्ल जी पर संल्कृत विद्या के संस्कार पड़ने लगे थे। उन्होंने गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज वाराणसी से साहित्य में आचार्य एवं इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम00 संस्कृत में उत्तीर्ण किया। पुनः इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही डी0फिट्0 शोध उपाधियां भी प्राप्त की।
          डा0 शुक्ल ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही संस्कृत विभाग में 1953 अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया और विभाग में ही क्रमशः प्रवक्ताप्रवाचक एवं प्राचार्य पदों को अलंकृत किया। अन्त में विभाग से अध्यक्ष पद से 1951 में अवकाश प्राप्त किया। तदनन्तर राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान दिल्ली द्वारा चूड़ामणि प्रोफेसर के रूप में नियुक्त होकर स्थानीय गंगानाथ-झा-संस्कृत-विद्यापीठ में अध्यापन भी किया। उसी समय भारत सरकार द्वारा आकाशवाणी नयी दिल्ली में संस्कृत कार्यक्रम की सलाहकार समिति के सम्मानित सदस्य नियुक्त हुए।
          डा0 शुक्ल की लेखनी से अनेक ग्रन्थ रत्न प्रसूत हुये हैं। सर्वप्रथम उन्होंने 1950 में सम्पूर्ण नैषध-चरित‘ महाकाव्य का हिन्दी अनुवाद किया। पुनः नैषध पर ही उनका विख्यात शोधग्रन्ध नैषध-परिशीलन‘ निकलाजिसका विद्वज्जगत् ने अतिशय हार्दिक अभिनन्दन किया। अपने डी0 लिट्0 शोध प्रबन्ध के रूप में डा0 शुक्ल ने श्रृंगारपरिशीलन लिखा जो श्रृंगाररस पर अद्वितीय शोध-ग्रन्थ है। नैषध की भाँति उन्होंने शिशुपाल-वध‘ महाकाव्य पर माघकवि नामक समीक्षा लिखी। आचार्य शुक्ल की सर्वश्रेष्ठ कृति ध्वन्यालोक‘ पर उनकी प्रसिद्ध दीपशिखा‘ नामक  संस्कृत टीका हैजिसने संस्कृत साहित्य-जगत् को ध्वनि के विषय में एक नूतन एवं यथार्थ दृष्टि दी।
          डा0 शुक्ल में संस्कृत हिन्दी दोनों भाषाओं में काव्य-निर्माण की अद्भूत क्षमता है। उनका संस्कृत के लघुत्रयी एवं बृहत्रयी के कुछ अंशो का हिन्दी पद्यानुवाद मुक्ताफल‘ नाम से प्रकाशित हुआ था। उनकी नवीनतम् कृति संस्कृत की अति सुरम्य प्रायः एक सहस्त्र सूक्तियों का हिन्दी दोहानुवाद हैजो सूक्ति-गंगाधर‘ नाम से प्रकाशित हुआ है।
          प्रोफेसर शुक्ल के निर्देशन में 32 छात्रों ने डी0लिट्0 की उपधि प्राप्त की। डा0 शुक्ल के विचारों की मौलिकताप्रतिपादन की आकर्षकताअध्यापन की प्रवीणता तथा विषयज्ञान के अतल गाम्भीर्य से छात्र सदा मुग्ध रहते थे। विद्या के साथ विनय उनकी सबसे बड़ी शेविध है। उनकी कृतियाँ संस्कृत वाड्मय की अमूल्य निधि हैं।
          उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थानसाहित्य शास्त्र के मर्मज्ञ मनीषी डा0 चण्डिका प्रसाद शुक्ल को इक्यावन हजार रूपये के विशिष्ट पुरस्कार से सम्मानित कर गौरव का अनुभव करता है।

जगदीश शर्मा

पण्डित श्री जगदीश शर्मा का जन्म जयपुर (राजस्थान) के समीपस्थ समेल्या ग्राम में पौष कृष्ण द्वादशी बुधवार वि0 सं0 1967 को हुआ। इनके पिता पं0 श्री बिहारीलाल शर्मा महराज संस्कृत कालेज जयपुर में साहित्य-वेदान्त विभागाध्यक्ष थे।
          पण्डित शर्मा जी की प्रारम्भिक तथा उच्च शिक्षा जयपुर में हुई। अपने 1931 ई0 में साहित्याचार्य परीक्षा सर्वाधिक अंक प्राप्त कर उत्तीर्ण कीफलतः आपको स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ। आपके विद्यागुरूओं में पं0 बिहारीलाल शर्मापं0 वीरेश्वर शास्त्री द्रविड़ तथा म00पं0 शिवदत्त दाधिमथ प्रमुख है।
          पं0 जगदीश शर्मा ने चमडिया संस्कृत महाविद्यालयशेखावाटी तथा संस्कृत महाविद्यालयखेतड़ी में प्राचार्य के रूप में अध्यापन किया। इसके बाद श्री शर्मा ने महाराज संस्कृत कालेज जयपुर में साहित्य विभागाध्यक्ष पद को अलंकृत किया। सेवा निवृत्ति के पश्चात् राजस्थान के प्रथम मुख्य मन्त्री श्री हीरालाल द्वारा श्री शर्मा वनस्थली विद्यापीठ के वेद विद्यालय में प्राचार्य पद पर नियुक्त हुए। प्राचार्य पद पर 13 वर्षों तक कार्य करने के पश्चात् आप वहाँ मानद आचार्य भी नियुक्त हुए।
          श्री शर्मा कीछात्रावस्था से ही संस्कृत गद्य-पद्य रचना में अभिरूचि थी। संस्कृत रत्नाकर‘ पत्रिका में आपकी रचनायें समय-समय पर प्रकाशित हुई है। आप भारती’ पत्रिका  के सम्पादन किया है। श्री शर्मा विचरित कृतियाँ निम्नलिखित हैं-बिहारि स्मारिकावीरेश्वर प्रत्यभिज्ञानम्श्री शिव प्रत्यभिज्ञानम् तथा श्री लक्ष्मीनाथ जीवनवृत्तम। पं0 जगदीश शर्मा राजस्थान के सम्मानित विद्वानों में अग्रगण्य हैं।
          श्री शर्मा राजस्थान सरकार द्वारा श्रेष्ठ अध्यापक के रूप मेंशंकर अकादमी ऋषिकेश में जयन्त सरस्वती द्वारा लब्ध प्रतिष्ठा विद्वान् के रूप में तथा 1982 ई0 में राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं। श्री शर्मा व्याकरणन्यायसाहित्य आदि शास्त्रों के प्रौढ़ विद्वान् तथा समर्थ समालोचक हैं। काव्य समालोचना के क्षेत्र में नीर-क्षीर-विवेक दृष्टि आपकी विशेषता है।
          उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान पं0 श्री जगदीश शर्मा की विशिष्ट संस्कृत सेवा को देखते हुए आपको इक्यावन हजार रूपये के विशिष्ट पुरस्कार से सम्मानित कर गौरवान्वित है।

दुर्गादत्त शास्त्री विद्यालड्कार

 आचार्य श्री दुर्गादत्त शास्त्री का जन्म तत्कालीन पंचनद प्रान्त के कांगड़ा मण्डलान्तर्गत ‘‘नलेटी‘‘ ग्राम में निर्धन परिवार में हुआ।
          आप 1936 ई0 में पंजाब विश्वविद्यालय से शास्त्री परीक्षा उत्तीर्ण करके कांगड़ामण्डलान्तर्गत नादौन नगर में संस्कृत पाठशाला में अध्यापक पद पर रहे। 1943 ई0 में वर्तमान पाकिस्तान के स्याल-कोट जनपद में चूहम मुण्डा नगर में आर्यसमाज के उच्च विद्यालय में मुख्य पण्डित पद पर अध्यापन करते हुए 1947 ई0 में देश के विभाजन होने पर वहाँ से निवृत्त हुए। हिमाचल प्रदेश में राजकीय उच्च विद्यालय में अध्यापन कार्य करके 1977 ई0 में सेवा निवृत्त हुए।
          श्री शास्त्री ने अनेक काव्यनाटक एवं उपन्यासादि ग्रन्थों की रचना की हैउनमें राष्ट्रपथ-प्रदर्शनतर्जनीमधुवर्षण तीन काव्य तथा वत्सलातृणजातकम् दो नाटक एवं वियोगवल्लरी सप्तपदी उपन्यास प्रमुख है।
          आप पूर्व में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा बाणभटट् पुरस्कार से तथा अन्य संस्कृत संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत हैं। भारत के महामहिम राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित है। श्री दुर्गादत्त शास्त्री के पाण्डित्यशास्त्रनिष्ठा एवं विशिष्ट वैदुष्य को देखते हुए उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान आपको पच्चीस हजार रूपये के विशिष्ट पुरस्कार से सम्मानित करके गौरवान्वित है।

देवीप्रसाद खंडेराव खरवंडीकर

डा0 देवीप्रसाद खंडेराव खरण्डीकर का जन्म महाराष्ट्र प्रान्त स्थित अहमदनगर में 1.10.1935 ई. में हुआ था। श्री खंडेराव एम.ए. परीक्षा उत्तीर्ण कर पी.एच.डी. उपाधि से विभूषित है। आपकी पूरी शिक्षा विद्यालवीय पद्धति से हुई है। आपने अहमदनगर विद्यालय में सैंतीस वर्ष तक संस्कृत का अध्यापन किया। श्री खण्डेराव संस्कृत नाटक के निपुण लेखक है।
          श्री देवीप्रसाद खंडेराव अहमदनगर स्थित सनातनधर्म सभा के सदस्य एवं गान्धर्व महाविद्यालय के भी सदस्य पद पर कार्य कर रहे है। श्री खंडेराव महाराष्ट्र सरकार द्वारा तथा एन.सी.आर.टी विभाग द्वारा दो बार पुरस्कृत हैं। आप आकाशवाणी द्वारा भी दो बार सम्मानित किये गये हैं।
          श्री खंडेराव इस समय पैंतालिस वर्षों से प्रकाशित होने वाली ‘‘गुच्जारव’’ पत्रिका के प्रधान सम्पादकत्व का निर्वहन कर रहे हैं। डाॅ. राव द्वारा पत्रिका के माध्यम से संस्कृत के लेखांे के माध्यम से संस्कृत की सेवा कर रहे हैं। उसी का पैदा होना सार्थक है, जिससे कुल एवं समाज की उन्नति हो, उसके मूलभूत प्रमाण खंडेराव, इस अवस्था में भी सारस्वत साधना में अहर्निश संलग्न हैं। संस्कृत वाड्मय की पूर्ति में लेखन द्वारा संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार में कटिबद्ध हैं।
          संस्कृत पत्रकारिता के माध्यम से श्री देवीप्रसाद खंडेराव खरवंडीकर की संस्कृत सेवा का विवेचन कर उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान ने आपको इक्यावन हजार रूपये के नारद पुरस्कार से सम्मानित करता हुआ प्रकाम गौरव का अनुभव कर रहा है।                    

पटृाभिराम शास्त्री

          पण्डित प्रवर पदम्भूषण आचार्य पट्टाभिराम शास्त्री जी का जन्म दक्षिण भारत के आत्रोड जनपद के वैदिक स्वाध्याय परम्परागत श्रोत्रीय कुल में 1908 ई0 में हुआ था। आपके पिता श्री पी0 एन0 कृष्णाराव थे जो वैदिक परम्पराओं के परमभक्त थे।
          शासत्री जी ने अपनी शिक्षा का प्रारम्भ सन् 1924 में तिरुपति संस्कृत महाविद्यालय से किया। साहित्य व्याकरणादि विषयों का विधिवत् अध्ययन करके राजकीय परीक्षा से सम्बन्धित एन्टेन्स परीक्षा भी उत्तीर्ण किया।
          सन् 1933 ई0 में आप गौरी शंकर संस्कृत महाविद्यालय में मीमांसा विषय के अध्यापक हुए। एक वर्ष तक आप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन करके 1946 के फरवरी महीने में महाराज संस्कृत कालेज जयपुर में प्राचार्य पद को आलंकृत किया। शास्त्री जी के सदाचार एवं वैदुष्य से प्रभावित होकर महामना मदन मोहन मालवीय ने भी प्राचार्य पद पर नियोजित होने के लिए अपनी सम्मति प्रकट की थी। कलकत्ता विश्वविद्यालय में अध्यापन हेतु आहूत किये जाने पर आपने 1952 से 1967 तक प्राध्यापक एवं रीडर पद पर कार्य किया। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यलय में आप साहित्य विभाग में विभागाध्यक्ष पद पर आहूत होने पर सफलतापूर्वक अध्यापन करते हुए वहीं से सेवानिवृत्त हुए।
          आप द्वारा लिखे गये मौलिकसम्पादित एवं अनूदित ग्रन्थो की सूची विस्तृत है जिनमे मीमांसा कौस्तुभताण्ड्यब्राहमणआपस्तम्ब धर्मसूत्रवेदप्रकाशन्यायमालाध्वन्यालोक आदि प्रमुख हैं।
          आपका सम्मान देश के उच्च शिक्षा संस्थाओ में सर्वदा होता रहा है। आप भारत के राष्ट्रपति द्वारा पदम्भूषण उपाधि से सम्मानित किये गये है। इस समय आप वाराणसी में वेद मीमांसा अनुसंधान केन्द्र स्थापित करके उसका संचालन करते हुए सुरभारती की सेवा में संलग्न हैं।
          आचार्य श्रीपट्टाभिराम शास्त्री को लोकोत्तर संस्कृत सेवा के प्रभावित होकर उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी एक लाख रुपये के 1984 वर्षीय संस्कृत भारती नामक पुरस्कार से सम्मानित करती हुई गौरवान्वित हो रही है।

परमानन्द शास्त्री

        आचार्य परमानन्द शास्त्री का जन्म उत्तर प्रदेश के मेरठ मण्डल के अन्तर्गत ‘‘अनवरपुर’’ ग्राम में 31.1.1926 ईस्वी को वशिष्ठ गोत्रिय गौड़ ब्राह्ण परिवार में हुआ। आपके पिता आयुर्वेदज्ञ श्रीमन्त हरवंश लाल शर्मा त्रिवेदी तथा माता श्रीमती चमेली देवी थी।
                   आचार्य शास्त्री महोदय ने 1932 ईस्वी के जुलाई मास में प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश लेकर अपने अध्ययन का शुभारम्भ किया। आपकी शिक्षा संस्कृतअंग्रेजी एवं उर्दू भाषा में समसामयिक रूप में हुई। आपने सन् 1940 में प्रथमा’’ परीक्षासन् 1946 में ‘‘शास्त्री’’ परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आपने सन् 1949 में बी.ए. की परीक्षा एवं 1954 में एम.एम. संस्कृत‘‘ परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आपने सन् 1959 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से संस्कृत विषय में पी,एच.डी की उपाधि अर्जित की।
                   अध्ययनकाल में मेधावी रहे शास्त्री महोदय ने परिस्थियों के अनुकूल होने पर शिक्षण कार्य प्रारम्भ किया। सर्वप्रथम आपने सन् 1945 के जुलाई मास से लेकर सन् 1946 तक 66 श्री भगीरथी संस्कृत महाविद्यालय’’ गढ़ मुक्तेश्वर में अंग्रेजी शिक्षण का कार्य किया। उसके बाद विभिन्न संस्थाओं में हिन्दी एवं संस्कृत के प्रवक्ता पद पर अध्यापन किया। श्री शास्त्री महोदय ने सन् 1954 से लेकर 1986 तक ‘‘अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय’’ में संस्कृत प्रवाचक पद पर सेवा की। सन् 1983 से सन् 1986 तक आप संस्कृत विभागाध्यक्ष के पद को अलंकृत करते हुए सेवानिवृत हुए। आपकी शिष्य परम्परा अन्यत विशाल है। आपके अनेक शिष्य विभिन्न संस्थाओं में विशिष्ट पद पर विराजमान हैं।
                   प्रतिभावान् श्री शास्त्री की संस्कृत एवं हिन्दी में लेखन कला अत्यन्त विशिष्ट है। आपने राष्ट्रभाषा में आलोचनात्मक मौलिक ग्रन्थों की रचना की है। आपकी रचनाएं गद्यपरक एवं गीतिपरक है। श्री शास्त्री जी की संस्कृत की तेरह (13) रचनाएँ हैं। आपकी ‘‘गन्ध-दूतम्‘‘ नामक ग्रन्थ ‘‘ उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान‘‘ से पुरस्कृत हैं। आपके ‘‘चीरहरण’’ नामक काव्य को सन् 1985 में ‘‘मध्य प्रदेश साहित्य परिषद्‘‘ द्वारा ‘‘कालिदास पुरस्कार’’ से सम्मानित किया जा चुका है। संस्कृत में रचित यह काव्य उर्दू एवं पारसी काव्य के समान ही रस की अनुभूति देगाऐसा कवि का विचार है। इसके अतिरिक्त ‘‘सन्तोषकल्पतरू‘‘ ‘‘स्वरभारती’’ नामक रचनाएँ भी प्रशंसनीय हैं। इसके अतिरिक्त ‘‘दूर्वा’’ ‘‘स्वरमंगला’’ आदि बहुत सी संस्कृत पत्रिकाओं में शास्त्रीजी की विविध कविताएँ प्रायः प्रकाशित होती रहती है।
                   आचार्य परमानन्द शास्त्री का जीवन ‘‘ऋषि-तुल्य’’ है। आपका समग्र जीवन संस्कृत की सेवा में स्वलेखनसंस्कृत वाड्मय के पोषण एवं संवधर्न मेंऔर काव्य ग्रन्थों की रचना करने में संलग्न है। आपकी समग्र सेवा को ध्यान में रखते हुए ‘‘उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान’’ आपको इक्यावन हजार रूपये के ‘‘विशिष्ट पुरस्कार‘‘ से सम्मानित करते हुए हर्ष प्रकट करता है तथा गौरव का अनुभव करता है।

पेरी सूर्यनारायण शास्त्री

          शास्त्री जी का जन्म 1910 ई0 में आन्ध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम् जनपद में स्थित चोदावरम् नामक गांव मे हुआ था। आपके पिता का नाम पी0 सर्वेशम् तथा माता का नाम सोमाम्मा था।
          आपने आन्ध्र प्रदेश विश्वविद्यालय से 1933 ई0 में व्याकरण विद्या प्रवीण तथा 1931 ई0 में साहित्य विद्या प्रवीण की उपाधि उच्च श्रेणी में प्राप्त की। साथ ही साथ आप अभय भाषा प्रवीण नामक उपाधि से भी अलंकृत हुए।
          आपने लगभग 35 वर्षो तक शासकीय महाराजा संस्कृत विद्यालय विजयङगरम् में वरिष्ठ प्रवक्ता के पद पर अध्यापन किया। तिरुपति तिरुमलाई देवस्थान में 4 वर्षो तक अध्येता पद पर कार्य किया और अन्य शिक्षण संस्थाओं में भी सेवा की।
          भण्डारकर प्राच्यशोध संस्थान से शोध बृति प्राप्त करते हुए। (स्फोटबाद) विषय पर शोध कार्य किया। आपके शोध पत्र एवं अनूदित ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं। तेलगू भाषा में तथा संस्कृत भाषा में आपका प्रशंसनीय कार्य रहा है। आजीवन छात्रों एवं शोधार्थियों कों आपने अपना मार्ग दर्शन देते हुए संस्कृत का गौरव बढ़ाया। आप राज्य सरकार भारत सरकार तथा राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत हुए हैं। देश की उच्च शैक्षिक संस्थाओ में सदस्य होकर संस्कृत के गौरव को बढ़ाने में योगदान किया है।
          आपके सार्वभौम व्यक्तिव एवं कृतित्व को देखकर एक लाख रुपये के 1985 वर्षीय विश्व संस्कृत भारती नामक सर्वेच्च पुरस्कार से सम्मानित करते हुए उ0 प्र0 संस्कृत अकादमी अत्यन्त गरिमा का अनुभव कर रही है।

पुल्लेल श्री रामचन्द्रुडु

            प्रो. पुल्लेल श्री रामचन्द्रुडु का जन्म दिनांक 24.10.19270 को आन्ध्र प्रदेश के पूरब गोदावार जिले के अन्तर्गत इन्दुपल्ली गाँव के प्रसिद्ध पण्डित परिवार में हुआ था। उन्होंने बाल्यकाल में अपने पिता श्री सत्यनारायण शास्त्री जी और व्याकरण के पसिद्ध विद्वान् श्री कोम्पेल्ल सुब्बराय शास्त्री जी के पास व्याकरण शास्त्र का अध्ययन किया।
          मद्रास विश्वविद्यालय से सम्बद्ध मद्रास संस्कृत विद्यालय में 1943 से 1947 तक अध्ययन करते हुये आपने ‘‘वेदान्तशिरोमणि‘‘ की परीक्षा प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त करके उत्तीर्ण किया। आपने मद्रास विश्वविद्यालय से ही ‘‘तेलुगु विद्वान्‘‘ परीक्षा भी उत्तीर्ण किये। संस्कृत साहित्य शास्त्र को पण्डितराज जगन्नाथ की देन, इस विषय पर लिखे गये निबन्ध पर उस्मानिया विश्वविद्यालय से पी0एच0डी0 की उपाधि प्राप्त किया।
          श्री रामचन्द्रुडु जी उस्मानिया विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग के आचार्य पद को अलंकृत करके 19770 में सेवानिवृत्त होने के बाद यू0जी0सी0 अतिथि प्रोफेसर पद को सुशोभित किया। आपने उस्मानिया विश्वविद्यालय से सम्बद्ध संस्कृत अकादमी के निदेशक पद पर कार्य किया।
          आपने पचासों ग्रन्थों का लेखन अनुवाद एवं सम्पादन किया है। आपका पाली ग्रन्थ धम्मपद का संस्कृत में श्लोकानुवाद एवं पारसीक लोकोक्ति ग्रन्थ का भी संस्कृत मंे अनुवाद प्रशस्य है। अंग्रेजी भाषा में भी अनेक ग्रन्थों की रचना किये हैं।
          श्री रामचन्द्रुडु महोदय 1985 में आन्ध्र प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा तथा 1991 में तेलुगु विश्वविद्यालय से एवं उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भी दो बार पुरस्कृत हो चुके है। 1987 में आप राष्ट्रपति पुरस्कार द्वारा सम्मानित किये गये हैं।
          आपके सार्वभौम व्यक्तित्व एवं कृतित्व को देखते हुये उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान 1913 वर्ष कके एक लाख रूपये के विश्वविभारती नामक सर्वोच्च पुरस्कार से आपको सम्मानित करता हुआ अत्यन्त गौरव का अनुभव करता है।

ब्रज बल्लभ द्विवेदी

          ब्रजबल्लभ द्विवेदी महोदय  ई0 में दर्शन विषय में आचार्य की परीक्षा पास करके संस्कृत में एम0 ए0 की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। वाराणसेय सरस्वती भवन में    से    तक पाण्डु लिपि संपादन का कार्य योग्यता पूर्वक किये।
          आप से तक राजकीय संस्कृत कालेज तत्पश्चात् परिवर्तित वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय में सरस्वती सुषमा के प्रकाशनाधिकारी रहे। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में   से     तक योगतंत्र विभाग में प्राध्यापक रहते हुए उसी वर्ष में सांख्ययोग तंत्रागम विभाग में आचार्य पद पर नियुक्त हुए और वहीं से आपने अपनी सेवा समाप्त की।
          नित्य र्षोडषिकार्णव ग्रन्थ पर उत्तर प्रदेश शासन द्वारा आप     ई0 में कालिदास पुरस्कार से पुरस्कृत हुए। श्री द्विवेदी जी के द्वारा संपादित अनेक ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें महार्थ मंजरो, शक्तिसंगमतंत्रम, विज्ञान भैरव, तंत्रयात्रा आदि ग्रन्थ मुख्य हैं।    ई0 में हालैण्ड देश में आवोजित विश्व-संस्कृत सम्मेलन में आपने भारतवर्ष का प्रतिनिधित्व किया।

 बलदेव उपाध्याय

          पदम्भूषण से सम्मानित आचार्य बलदेव उपाध्याय जी का जन्म 10 अक्टूबर 1899 ईसवी में बलिया जिले मे स्थित सोनवरसा नामक ग्राम में पवित्र सरयूपारी ब्राहमण परिवार में हुआ था। आपने 1916 ई0 में स्कूल लिविंग परीक्षा प्रथम क्षेणी में उत्तीर्ण करके पूरे प्रदेश में अपना स्थान सुरक्षित रखा। 1922 ई0 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संस्कृत विषय में एम0 ए0 की परीक्षा प्रथम क्षेणी में उत्तीर्ण किया और प्रथम स्थान प्राप्त किया। गर्वनमेेंन्ट संस्कृत कालेज वाराणसी से साहित्याचार्य की उपाधि भी प्राप्त किया। अध्ययनोत्तर आपने काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में 30 वर्ष तक प्रध्यापक रीडरप्रोफेसर पदों पर सेवा प्रदान की। दो वर्ष तक सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में पुराणेतिहास विभागाध्यक्ष पद को आलंकृत करके 5 वर्ष तक यहीं अनुसंधान विभाग में निदेशक पद पर सेवा करते हुए। आपके वेदपुराणदर्शनआलोचना आदि विषयों पर लिये गये चार दर्जन से अधिकग्रन्थ प्रकाश में आ चुके हैं। आप इस समय भी ग्रन्थों के सम्पादन एवं अनुवाद कार्यो में तत्पर हैं।
          आचार्य उपाध्याय 1942 ई0 मंे भारतीय दर्शन ग्रन्थ पर साहित्य सम्मेलन प्रयाग से मंगलाप्रसाद पुरस्कार और बौद्ध दर्शन मीमांसा ग्रन्थ पर 1995 में डालमिया पुरस्कार तथा शंकर दिगविजय ग्रन्थ पर श्रवणनाथ पुरस्कार से साथ ही साथ उत्तर प्रदेश शासन द्वारा अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हुए है। श्री उपाध्याय जी राष्ट्रपति द्वारा पदम्भूषण उपाधि से भी अलंकृत किये गये हैं।

ब्रजबिहारी चौबे

        प्रो. चैबे जी का जन्म 1.1.1940 ई. को जबहीं ग्राम बलिया (उ.प्र.) में हुआ था। आपके पिता स्व. श्री नारायण चैबे और माता अंजोरिया देवी थी। श्री चैबे जी माता पिता के चतुर्थ पुत्र हैं।
          प्रो0 चैबे की प्रारम्भिक शिक्षा गाॅव के विद्यालय में हुई थी। माध्यमिक एवं उत्तरमाध्यमिक की शिक्षा रामसिंहासन उच्चतर माध्यमिक विद्यालय दुबहरबलिया में हुई थी। बी.ए. तथा एम00 तथा एम.ए. (संस्कृत वेद गु्रप से) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी से क्रमशः 1959 तथ्रर 1961 में उत्तीर्ण किये। वहीं से 1964 में ‘‘ट्रीटमेंट आॅव नेचर इन दि ऋग्वेद’’ विषय पर डा0 सिद्धेश्वर भट्टाचार्य के निर्देशन में पी.एच.डी. उपाधि प्राप्त की।
          प्रो. चैबे इन्स्टीट्यूट आॅव ओरियन्टल फिलासोफी वृन्दावन में 11.8.1965 वर्ष से     10.1.1967 तक प्राध्यापक पद पर कार्य करने के पश्चात् 12.1.1967 से विश्वेश्वरानन्द विश्वबन्धु संस्कृत तथा भारत भारती अनुशीलन संस्थानपंजाब विश्वविद्यालय होशियारपुर में व्याख्याता पदप्रवाचक पदआचार्य पद एवं निदेशक पद पर कार्य करते हुए 30.6.2002 में सेवानिवृत्त हुए। सेवाकाल में ही आप स्वामी दयानन्द सरस्वती विश्व विद्यालयअजमेर में दयानन्द वैदिक पीठ विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में कार्य किये। आप के निर्देशन में बहुत से छात्र शोध कार्य किये हैं।
          प्रो. चैबे ने इकतालिस ग्रन्थों का प्रणयन किया है और एक सौ पाँच शोध पत्रों को भी लिखा है। होशियारपुर शोध केन्द्र में आदरी निदेशक के रूप मेंप्राचीन ग्रन्थों के सम्पादनवैदिक ग्रन्थों के अनुवाद तथा जन सामान्य के लिये उपयोगी वेद सम्बन्धी लघु पुस्तिकाओं के लेखन में प्रवृत्त हैं।
          प्रो. चैबे अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन के सत्ताइसवें अधिवेशन कुरूक्षेत्र में 1974 वर्ष में वी. राघवन् पुरस्कार से तथा 1955 वर्ष में हिन्दी  साहित्य अकादमी होशियारपुर द्वारा सम्मानित हुए तथा उसी वर्ष उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा संस्कृत साहित्य पुरस्कार से एवं 2004 ई. में महामहिम रााष्ट्रपति सम्मान से पुरस्कृत हुए। इसके अलावा आप विभिन्न संस्थानों से भी सम्मानित हैं।
          प्रो. चैबे विश्वविद्यालयोंशिक्षा संस्थाओं तथा शोध संस्थानों द्वारा आयोजित संस्कृत एवं वेदविषयक संगोष्ठियों (112) सम्मेलनों (43) तथा पुनश्चर्या पाठ्यक्रमों एवं कार्यशालाओं (42) में अध्यक्षता एवं पत्रवाचक किये है। आप विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा पूना विश्वविद्यालय में उच्च संस्कृत शिक्षा पाठ्य निर्धारण समिति का सदस्यजयनारायण व्यास विश्वविद्यालयजोधपुर की परामर्शदात्री समिति का सदस्यइसके अलावा देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों की शोध संस्थानों की शोध संस्थानों की शोध समिति की सदस्यता विभूषित की।

 बलजिन्नाथ पण्डित

डाॅ0 बलजिन्नाथ पण्डित मूलतः काश्मीरी है। सम्प्रति श्री पण्डित जम्मू में निवास करते है। इनकी अवस्था 81 वर्ष की है। अनुमानतः आपका जन्मकाल 1915 ई0 है।
          डाॅ0 बलजिन्नाथ पण्डित ने शास्त्रीएम00 (संस्कृत) और पी0एच0डी0 (शैवदर्शन) उपाधियाँ प्राप्त की। आपने पंजाब विश्वविद्यालय की प्राज्ञ परीक्षा में और शास्त्री में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया।
          डाॅ0 पण्डित का अध्यापन कार्य संस्कृत पाठशाला के प्रधानाध्यापक के रूप में प्रारम्भ हुआ। आपने 22 वर्षों तक आटर््स कालेजों में संस्कृत का अध्यापन किया। डाॅ0 पण्डित ने हिमाचल विश्वविद्यालय में वर्षों तक सफलतापूर्वक संस्कृत पढ़ाया। आप 10 वर्षों तक श्री रणवीर विद्यापीठ जम्मू की काश्मीर शैव दर्शन योजना के शोधनिदेशक भी रहे।
          डाॅ0 पण्डित कुशल अध्यापक होने के साथ ही एक सफल लेखक भी है। आपने संस्कृतहिन्दी तथा अंग्रेजी तीनों भाषाओं में ग्रन्थ लिखे हैं। आपके द्वारा लिखित प्रमुख ग्रन्थ निम्न हैं-1. स्वातन्त्रयदर्पण 2.विंशतिकाशास्त्रविमर्शिनी, 3. शैवाचार्यों नागार्जुनः, 4. आत्मविलासविमर्शिनी  5.ललितास्तवरत्नटीका,  6. काश्मीरशैवदर्शनस्य बृहत् कोशः, 7. काश्मीर शैवदर्शन, 8. वैष्णवागम रहस्य, 9. अमृतवाग्भवाचार्य चरित, 10. एप्रोच आफ काश्मीर शैविज्म, 11. हिस्ट्री आफ काश्मीर शैविज्म, 12. एन इण्ट्रोडक्सन टु काश्मीर शैविज्म, 13. काश्मीर शैवदर्शन का परिचय आदि।
          डाॅ0 बलजिन्नाथ पण्डित संस्कृत के विशिष्ट विद्वान् हैं। आप दर्शनशास्त्र केविशेषकर काश्मीर शैवदर्शन के मर्मज्ञ मनीषी हैं। आपकी कृतियों में शैवदर्शन का गूढ़ विवेचन आपके गम्भीर वैदुष्य का परिचायक है।

भोला शंकर व्यास

             प्रो0 भोलाशंकर व्यास का जन्म बूंदी (राजस्थान) में बूंदी नरेशों के संस्कृत वैदुष्य के लिये प्रसिद्ध राजगुरू परिवार में फाल्गुन कृष्ण द्वादशी संवत् 1981 को हुआ।
          प्रो0 व्यास जी ने अपने ग्रामस्थ संस्कृत विद्यालय में प्राचीन पद्धति से साहित्य तथा व्याकरण के प्रमुख ग्रन्थों कापितामहपितृव्य तथा पिता के सानिध्य में विधिवत् अध्ययन किया। आपने 1947 ई0 में आगरा विश्वविद्यालय से एम00 ( संस्कृत परीक्षा में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया) प्रो0 व्यास ने 1948 ई0 में काशीस्थ राजकीय संस्कृत कालेज से प्रथम श्रेेणी में साहित्य शास्त्री और आगरा विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में एल0एल0बी0 उपाधि भी प्राप्त की। 1950 ई0 में राजस्थान विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एम00 परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त कर प्रो0 व्यास विश्वविद्यालयीय स्वर्णपदक में विभूषित हुए। आपने राजस्थान विश्वविद्यालय से ही क्रमशः 1952 में पी0एच0डी0 लन्दन विश्वविद्यालय के स्कूल आफ ओरियण्टल स्टडीज से भाषा विज्ञान का आधुनिक पद्धति से अध्ययन तथा शोधकार्य भी किया।
          1953 ई0 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक के रूप में प्रो0 व्यास की नियुक्ति हुई और यहीं क्रमशः पदोन्नत होते हुए आपने हिन्दी विभाग के आचार्य तथा अध्यक्ष के पद को सुशोभित कर अवकाश ग्रहण किया। अवकाश ग्रहण के पश्चात् व्यास जी तीन वर्षों तक लबधावकाण प्रोफेसर के रूप में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग से भी सम्बद्ध रहे हैं। वाराणसी में संस्कृत तथा हिन्दी के वद्वत्समाज में प्रो0 व्यास का वैदुष्य समादृत हैऔर आपकी परिगणना संस्कृत काव्य समीक्षाकाव्यशास्त्रनाट्यशास्त्रभाषाशास्त्र और हिन्दी साहित्य के राष्ट्रीय ख्याति के विद्वानों में की जाती है।
          प्रो0 व्यास हिन्दी-संस्कृत संस्थानोंविश्वविद्यालयीय परीक्षण-समितियों तथा लोकसेवा आयोगों के सम्मानित सदस्य रह चुके हैं। आप राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा विशिष्ट साहित्यिक पुरस्कार से भी पुरस्कृत हो चुके हैं। आप राजस्थान संस्कृत अकादमी द्वारा विशिष्ट संस्कृत पण्डित के रूप में भी समादृत हुए है।
          प्रो0 व्यास ने संस्कृत काव्य समीक्षाकाव्यशास्त्रभाषाशस्त्र तथा छन्दः शास्त्र से सम्बद्ध अनेक ग्रन्थों का लेखनसम्पादन तथा संस्कृतहिन्दी और अंग्रेजी में शताधिक लेखों की रचना की है। आप एक सफल संस्कृत कवि भी है। आप द्वारा विरचित विजयम् महाकाव्य निकट भविष्य में ही प्रकाश्यमान है।ं
          प्रो0 व्यास जी उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा प्रकाश्यमान संस्कृत वाड्मय का वृहद् इतिहास के तृतीय खण्ड आर्ष महाकाव्य‘ के सम्पादक है। सम्प्रति आप अपने बृद्ध प्रपितामह के ऐतिहासिक संस्कृत महाकाव्य रामविलाकाव्यम्‘ के सम्पादन-प्रकाशन में प्रवृत्त हैं।

मनसाराम शास्त्री

पण्डित मनसाराम शास्त्री का जन्म उत्तर प्रदेश के देवल गढ़ के विडोल नामक ग्राम में 15.9.1922 ई0 में हुआ था। आपके पिताश्री गीता राम जी थे।
                   आपकी प्रारम्भिक शिक्षा गांव में हुई थी। राजकीय संस्कृत महाविद्यालयवाराणसी से नव्यव्याकरणाचार्य तथा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से शाड्करवेदान्त एवं साहित्याचार्य तथा आगरा विश्विद्यालय से संस्कृत में एम00 की परीक्षाउत्तीर्ण की। बंगाल संस्कृत एशोसियन कलकत्ता से काव्यतीर्थ परीक्षा उत्तीर्ण की है।
                   श्री निम्बार्क संस्कृत महाविद्यालय वृन्दावन में 1955 ई0 से 1963 तक प्राचार्य पद पर तथा 1963 से 1969 तक ऋषि कुल संस्कृत विद्यापीठ हरिद्वार में विभागाध्यक्ष एवं प्राचार्य पद पर कार्य किये। 1969 से 1983 तक हरिद्वार स्थिति भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय में अध्यक्ष एवं प्राचार्य पद पर सेवा किया।
                   श्री शास्त्री जी के अनेक लेख संस्कृत पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए है। वेदान्त आदि विषयों में प्राचीन परम्परानुसार दिल्ली हैदराबाद आदि स्थानों में आपने सफलतापूर्वक शास्त्रार्थ किया तथा शोधार्थियों का मार्ग निर्देशन भी करते रहे।

मण्डन मिश्र

          संस्कृत सेवा में संलग्न विलक्षण प्रतिभा डा0 मण्डन मिश्र का जन्म राजस्थान प्रान्त के जयपुर जिले में हनूतिया नामक ग्राम में 7 जून 1921 ई0 में हुआ था।
          श्री मिश्र जी ने राजकीय संस्कृत कालेज वाराणसी से मध्यमा एवं शास्त्री परीक्षा पास करके पंजाब विश्वविद्यालय से भी साहित्यशास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण की। आपने राजस्थान विश्वविद्यालय एवं दरभंगा विश्वविद्यालय से मीमांसा एवं साहित्य विषय में उपाधि प्राप्त की और जयपुर विश्वविद्यालय से एम0 ए0 एवं पी-एच0डी0 की उपाधियों से विभूषित हुये।
          आप जगद्गुरुशंकराचार्य द्वारा प्रदत्त विद्याभास्कर उपाधि से एवं राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किये गये हैं तथा अन्य सम्मानित उपाधियों एवं स्वर्णपदको से भी सम्मानित है।
          विश्व संस्कृत शतसब्दी के अन्तर्गत ग्रन्थ प्रकाशन योजना में श्री मिश्र जी ने प्रधान संपादक के रुप में ग्रन्थ का तीन भागों में संवादन किया। सामग्री संकलन हेतु बिहारआसामकेरल आदि प्रदेशों में तथा इंग्लैण्डअमेरिका रुस आदि देशों में जाकर आपने सामग्री संकलित करके 5000 पृष्ठो के संग्रह का संपादन किया। आपकी यह सेवा अतिप्रशंसनीय है।
          आप देश की गणमान्य उच्च शिक्षा संस्थाओं में सदस्य के रुप मे तथा जयपुर अकादमी में अध्यक्ष पद को अलंकृत करते हुए संस्कृत की सेवा कर रहे हैं।
          राजकीय संस्कृत कालेज जयपुर में सन् 1948 से सेवा प्रारम्भ करके 1962 तक आपने क्रमशः प्राध्यापक एवं प्रोफेसर के रुप में पद की गरिमा बढ़ायी। इस समय आप राष्ट्रीय संस्कृत संस्थानदिल्ली में निदेशक के पद पर तथा श्री लाल बहादुर शास्त्री केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ में प्रचार्य पद पर कार्य कर रहे हैं। राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के निदेशक पद पर विराजमान रह कर भारतवर्ष में आठ केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ स्थापित की और अतिरिक्त के लिये आपका प्रयास चल रहा है। आपकी संस्कृति सेवा संस्कृत विद्वानों के लिये अविस्मरणीय रहेगी।
          विद्वदवरेण्य डा0 मिश्र की विशिष्ट संस्कृत सेवा तथा सुर भारती के प्रति जागरुकता को एवं आपके विशिष्ट व्यक्तित्व एवं कृतित्व को देखकर उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी 1986 वर्षीय एक लाख रुपये के विश्व संस्कृत-भारती नामक पुरस्कार से सभाजित करती हुई अपने को कृतकृत्य समझ रही है।

मुरलीधर मिश्र

          आचार्य मुरलीधर मिश्र का जन्म 1905 ई0 में कार्तिक मास की प्रतिप्रदा में हुआ था। आप गोरखनुर जिले के बरबलदीगार नामक गाँव के निवासी हैं और आपके पिता स्व0 श्री शिवपूजन शर्मा थे।
          श्री मिश्र प्रथमा परीक्षा के सभी ग्रन्थों का अध्ययन घर पर ही किया। यदि मूर्ख बनना चाहते हो तो घर पर ही रहो। इस लोकोक्ति से प्रभावित होकर घर में पठन पाठन का व्यवधान देखकर काशी में आकर राजकीय संस्कृत पाठशाला में अध्ययन शुरु किया। वहाँ गणपतिशास्त्री मोकाटेके आन्तेवासित्व में अध्ययन करते हुये आचार्य की परीक्षा प्रथम क्षेणी में उत्तीर्ण किया। सन् 1930 ईसवी में रियन‘ नामक स्वर्ण पदक प्राप्त किया। कलकत्ता एसोसिएशन संस्था से काव्यतीर्थ की उपाधि से विभूषित हुये। अन्य बहुत सी उपाधियों से श्री मिश्र विभूषित हुये हैं।
          17 फरवरी 1938 ई0 में राजकीय संस्कृत महाविद्यालय काशी के व्याकरण सहायकाध्यापक पद पर नियुक्त हुये और वहाँ व्याकरण के विभागाध्यक्ष पद के रिक्त होने पर व्याकरण विभागाध्यक्ष पद पर प्रतिष्ठित हुये। 1971 ईसवी में वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय से अवकाश प्राप्त करके घर पर ही छात्रों को संस्कृत की शिक्षा दे रहे हैं।
          विश्वविद्यालय से सेवामुक्त होने के बाद केन्द्रीय सरकार की योजनानुसार आप पाँच वर्ष तक विशिष्ट अध्यापक के रुप में अनुसंधाता छात्रों को मार्ग दर्शन करते रहे। चूडामणि योजना के अन्तर्गत आपने बहुत से छात्रों का मार्ग निर्देशन किया।
          आपने प्रक्रिया कौमुदी की उत्तम टीका और अष्टादशपुराण व्यसवस्था नामक ग्रन्थ पर भी काम किया जो किसी अन्य विद्वान के द्वारा लिखा गया थाउसका सरस्वती सुषमा पत्रिका में भूमिका सहित प्रकाशन कराया। आपके बहुत से महत्वपूर्ण निबन्ध शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।
          विद्वद्मूर्धन्य आचार्य मिश्र के पौढ़ पाण्डित्यशास्त्र निष्ठालम्बी संस्कृत सेवा को देखकर अकादमी पच्चीस हजार के विशिष्ट पुरस्कार से सम्मानित करती हुई अपने में गौरवान्वित है।

रतिनाथ झा

आचार्य रतिनाथ झा का जन्म जनपद बस्ती के तलपुरवा नामक ग्राम में स्व0 रविनाथ झा महोदय के पुत्र के रूप में 15.7.1922 ई0 में हुआ। शैशवकाल में ही मातृ सुख से वंचित झा का लालन पालन पितृव्य सुश्री जगदम्बा देवी ने किया।
                   प्रारम्भिक शिक्षा के साथ साथ संस्कृत शिक्षा के प्रति पितृव्य गंगाधर झा महोदय द्वारा प्रेरित श्री झा महोदय ने बिहार प्रान्त के वेतियाराज संस्कृत महाविद्यालय में वेदव्याकरणसाहित्य आदि अनेक शास्त्रों में निष्णात आचार्य देवशर्मा के सानिध्य में व्याकरणवेदान्त आदि अनेक विषयों का अध्ययन किया। उसके बाद 1944 ई0 में काशी हिन्दु विश्वविद्यालय से शास्त्राचार्य परीक्षा एवं संस्कृत विषय में एम00 परीक्षा प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त करते हुए उत्तीर्ण किये। गुरूओं को विशेष अनुकम्पा से काव्य निर्माण कला समस्या पूर्ति आदि अनेक प्रतियोगिताओं में श्री झा पुरस्कृत हुए। 1950 ई0 में अखिल भारतीय संस्कृत वाद-विवाद प्रतियोगिता में सर्वप्रथम स्थान पाकर स्वर्ण पदक से पुरस्कृत किये गये।
                   आचार्य झा महोदय काशी हिन्दूविश्वविद्यालय में 1954 ई0 तक शोध सहायक पद पर कार्य करके वहीं साहित्य दर्शन विभाग में व्याख्याता पद पर नियुक्त हुए। 1971 में उपाचार्य पद पर प्रोन्नत होकर 1982 ई0 में सेवा निवृत्त हुए। शास्त्र चूड़ामणि योजना में मार्च 89 तक विरला संस्कृत महाविद्यालय में विशिष्ट ग्रन्थों का अध्ययापन किया। झा महोदय ने संस्कृत में सात ग्रन्थों की रचन की हैउनमें मालवीयशतकम् गान्धीशतकम् एवं अरविन्द शतकम् है। संस्कृत साहित्य अकादमी के प्रयास से प्रकाशित षोडषी में अन्यतम कवि के रूप में झा महोदय की रचनाओं का संकलन है।

रामशंकर भट्टाचार्य

          डा0 रामशंकर भट्टाचार्य जी का जन्म बंगाल प्रदेश के बांकुड़ा मण्डल के अन्तर्गत  भट्टपाडा नामक ग्राम में 18.9.1926 ई0 में हुआ था। आप हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करके लखनऊ से मध्यमा परीक्षा उत्तीर्ण करके लखनऊ से मध्यमा परीक्षा उत्तीर्ण की। राजकीय संस्कृत कालेज से नव्य व्याकरण विषय से शास्त्री परीक्षा और प्राचीन व्याकरण से आचार्य परीक्षा प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान पाकर उत्तीर्ण किया। आगरा विश्वविद्यालय से एम00 और वही से 1962 ई0 में पी0एच0डी0 की उपाधि प्राप्त की।
                   डा0 भट्टाचार्य जी तेरह वर्ष तक सरकारी सेवा करके 1955 ई0 में भारती महाविद्यालय वाराणसी के अनुसन्धान विभाग में छः वर्ष तक कार्य किये।
                   आप अनेक ग्रन्थों का लेखन किये हैजिनमें पातच्जल योगसू़त्रमसभाष्यसांख्यसूत्रम्सांख्य सार आदि ग्रन्थ प्रमुख है। इसके अतिरिक्त छः ग्रन्थो का सम्पादन किये है। और कुछ मुद्रणाधीन हैं। आपके शोध लेख संस्कृत पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुये है। उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी की संस्कृत वाड्मय के वृहद् इतिहास लेखन योजना के अन्तर्गत पुराणखण्ड का सम्पादन कार्य भी कर रहे हैं। राष्ट्रभाषा में भी संस्कृत ग्रंन्थो में गरूणपुराण जैसे ग्रन्थ का हिन्दी भूमिका के साथ सम्पादन किये हैं। भोजवृत्तिःयोगतारवलिः पातञ्जल योग दर्शन आदि ग्रन्थों का सम्पादन किये है। बंगला तथा अंग्रेजी में लिखे ग्रन्थों का हिन्दी में अनुवाद कार्य भी कार्य किये है। 

 रमेशचन्द्र शुक्ल

        विद्वद्वरेण्य आचार्य श्री रामचन्द्र शुक्ल का जन्म जून 1907 ई0 में हुआ था। श्री शुक्ल ने साहित्य और साख्ंय योग विषय में राजकीय संस्कृत कालेजवाराणसी से आचार्य परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आगरा विश्वविद्यालय से एम0 ए0 किया। अलीगढ़ विश्वविद्यालय से आपने पी0एच0डी0 की उपाधि प्राप्त की।
        संस्कृतपाठशालाओं से आपने अध्यापन कार्य आरम्भ किया। बदायूंबरसानांनन्दगांवराजाका सदतपुरदिल्ली स्थित श्री वाषर्णेय कालेज तथा अलीगढ़ कालेज में अटृाईस वर्षांे तक अध्यापन कार्य करते हुए संस्कृत भाषा की महानीय सेवा की। इसके बाद महर्षि महेश योगी के वेदानुसन्धान संस्थान में दो वर्षो तक शोध कार्य भी कराया। आज भी आप दिल्ली स्थित मोतीनाथ संस्कृत महाविद्यालय में शास्त्र-चूड़ामणि प्रोफेसर के रुप में आचार्य परीक्षा के छात्रांे को शास्त्रों के रहस्यों का उद्घाटन कराते हुए तथा विभन्न प्रकार का निर्देश देते हुए अध्यापन कर रहे है। श्री शुक्ल महोदय द्वारा आज तक संस्कृत भाषा में अटृारह मौलिक ग्रन्थ रचे गये जिसमे से सोलह प्रकाशित है। दो ग्रन्थ अप्रकाशित हैं। वर्तमान में श्री शुक्ल महोदय आधुनिक भारत पुराण की रचना में प्रवत्त है। आप के अनेक ग्रन्थ उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी द्वारा पुरस्कृत है।
        श्री शुक्ल महोदय द्वारा विचित मौलिक ग्रन्थों में प्रबन्धरत्नाकरः (विशाल निबन्धग्रन्थ)नाटयसंस्कृति-सुधा-(पी0एच0डी0 उपाधि हेतु प्रस्तुत प्रकाशित शोध प्रबन्ध)गान्धिगौरवम्, (पुरस्कृत)भरतचरितामृतम्गीतमहावीरम्श्रीकृष्णचरितमहाकाव्यम् (पुरस्कृत) भारत-स्वातन्त्रयसंग्रामेंतिहासः (नामित पुरस्कार से पुरस्कृत)संस्कृत-प्रबन्ध-प्रभाइन्दिरायशक्ति- लकम्लालबहादुरशास्त्रि चरितम्रसदर्शनम्बंगलादेश इत्यादि ग्रन्थो के अतिरिक्त संस्कृत पत्र पत्रिकाओं में अनेक शोध पूर्ण लेख प्रकाशित हुए हैं और आज भी हो रहे है।
        अलीगढ़ में बारह वर्षों से संस्कृत परिषद् के मन्त्री पद से संस्कृत की सेवा कर रहे हैं। आज भी दिल्ली स्थित देववाणी परिषद् के अध्यक्ष के पद से संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार में संलग्न हैं।
        इस प्रकार से संस्कृत भाषा के प्रति श्री शुक्ल जी का समर्पित जीवन एक आदर्श है। अकादमी आपको पच्चीस हजार रुपयों के विशिष्ट पुरस्कारो से सम्मानित कर अत्यन्त गौरव का अनुभव कर रही है।
रमारंजन मुखर्जी
      प्रो. रमारंजन मुखर्जी का जन्म 1-1-1929 ई. में हुआ। आप हाईस्कूलइण्टरमीडिएटबी.ए. तथा आनर्स परीक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करके वहीं से संस्कृत विषय में एम. ए. परीक्षा प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान पाकर 1946 ई. में उत्तीर्ण की। आप दर्शन साहित्य विषयों में 1955 एवं 1965 ई. वर्ष में शोध की उपाधि प्राप्त की है।
          आप संस्कृत व्याख्याता पद पर 1947 से 1958 ई. तक विभिन्न विद्यालयो में कार्य किये। यादवपुर विश्वविद्यालय में 1958 से 1961 तक उपाचार्य पद को अलंकृत किये और वहीं विश्वविद्यालय में जुलाई 1961 से 1987 ई. तक समय समय पर आचार्य पद पर रहते हुए संस्कृत विभागाध्यक्ष पद को भी अलंकृत किये। आप वर्दवान विश्वविद्यालय तथा रवीन्द्रभारती विश्व विद्यालय में कुलपति रहे। आप देश विदेश के विभिन्न संस्कृत संस्थानों में विश्वविद्यालयांे तथा अन्यान्य राजकीय विभागों में सम्मानित सदस्य रहे।
          प्रो. मुखर्जी महोदय ने अंगे्रजी एवं बंगभाषा में सात ग्रन्थों का प्रणयन एवं सम्पादन किया है। आपके पच्चीस शोध पत्र विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित है। यादवपुर विश्वविद्यालय की संस्कृत सिरीज के माध्यम से अन्वीक्षा नामक ग्रन्थ का सम्पादन किया है।
          प्रो. मुखर्जी माल्टा देश में 1977 में वहां के विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद् के सदस्य रहे और उसी वर्ष पेरिस देश के संस्कृत सम्मेलन में सम्मानित हुए। कनाडाजर्मनहांगकांगलन्दन आदि देशों के संस्कृत सम्मेलनों में सम्मानित किये गये है। आप राष्ट्रपति द्वारा भी पुरस्कृत है। आप तिरुपति राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ के कुलाधिपति पद पर थे।

रमारंजन मुखोपाध्याय

             रमारज्जन मुखोपाध्याय का जन्म पश्चिम बंगाल के वीर भूमि मण्डल में सिउडी नामक ग्राम में जगज्जननी की कृप से धन्य पवित्र कुल में 1.11928 ई0 में हुआ था। आप के पिता स्वनामधन्य श्री अमितारज्जन थेजिन्होंने अपने मण्डल में बहुत से विद्यालय एवं महाविद्यालयों की स्थापना करके बहुत प्रतिष्ठा प्राप्त किया। आपकी माता पुण्यव्रता शकंरीबाला थी।
          श्री रमारज्जन जी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी00 एवं एम00 की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। तत्पश्चात् उसी विश्वविद्यालय से पी0एच0डी0 की उपाधि प्राप्त करके यादवपुर विश्वविद्यालय से डि0 लिट् की उपाधि प्राप्त किया। श्री रमारज्जन विद्वद्वरेण्य पण्डित सीताराम शास्त्रीसातकडि मुखोपाध्यायएवं गौरीनाथ शास्त्री प्रभूति विद्वानों से विद्या अर्जन करके अलंकार शास्त्रव्याकरण एवं दर्शन में निष्णात हुये।
          यादवपुर विश्वविद्यालय में संस्कृतविभागाध्यक्ष के रूप में चैदह वर्ष तक कार्य करके श्री रमारज्जन ने वर्धमान विश्वविद्यालय के कुलपति पद को बारह वर्ष तक अलंकृत किया। उसके कलकत्ता स्थित रवीन्द्रभारती विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। अध्यापन एवं प्रशासन कार्य में निपुण आप द्वारा लिखित अनेक ग्रंथ प्रकाशित हैं। उनमें रस समीक्षाप्राचीन भारत में साहित्य तत्व मीमांसाकाव्येचित्रकल्पम् भारतीयनन्दनतत्वदृष्ट्या समीक्षणम् बांगखण्डे प्राप्तानां शिलालेखानां विश्लेषणम् प्रमुख हैं। आपने सम्पूर्ण रामकृष्णकथामृत का अनुवाद सरल संस्कृत में किया है। इसका प्रकाशन साहित्य अकादमी नई दिल्ली से होना है। प्रो0 मुखोपाध्याय ने अंग्रेजी एवं बंग आदि भाषाओं में सात ग्रन्थों का प्रणयन एवम् सम्पादन किया है। आपके बहुत से शोध पत्र विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। यादवपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत सिरीज के माध्यम से ‘‘अन्वीक्षा‘‘ नामक ग्रन्थ का आपने सम्पादन किया हैं।
          श्री रमारज्जन मुखोपाध्याय संस्कृत भाषा एवं भारतीय संस्कृति के उद्द्योषक के रूप में देश-विदेश में अन्तर्जातिक गोष्ठियों में भाग लेकर सुर भारती की सेवा में जुड़े रहे। अनेक विश्विद्यालयों द्वारा तथा सरकार द्वारा विदेश में भी भारतीय संस्कृति के प्रचार हेतु आप भेजे गयेऔर वहाँ संस्कृति की प्राचीनता के महत्व का आपने सम्यक् प्रतिपादन किया। भारत सरकार द्वारा प्रतिनिधि के रूप में भेजे गये आप चीन में गोष्ठी का प्रतिनिधित्व करके बहुत बड़ा कार्य किया। आप 1977 ई0 में माल्टा देश में स्थित विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद् के सदस्य रहे और उसी वर्ष पेरिस के संस्कृत सम्मेलन में सम्मानित किये गये। कनाडाजर्मनहांगकांगलन्दन आदि देशों के संस्कृत सम्मेलनों में भी आप सम्मानित हुए हैं। 1921 ई0 में उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी द्वारा आप विशिष्ट पुरस्कार से सम्मानित किये जा चुके हैं। अनेक विश्विद्यालयों एवं प्रतिष्ठानों से डी0लिट्प्रज्ञाभारती आदि उपाधियों से विभूषित पण्डितवर्य श्री रमारज्जन महामहिम श्री राष्ट्रपति द्वारा भी सम्मानित किये गये हैं।
          विद्वद् मूर्धन्य श्री रमाज्जन इस समय तिरूपतिस्थित मानित विश्वविद्यालय राष्ट्रिय संस्कृत विद्यापीठ के कुलाधिपति पद पर प्रतिष्ठित होकर संस्कृत के उत्थान में तत्पर हैं।
          
रघुनाथ शर्मा
        (1) जन्म एवं स्वाध्याय- सकलशास्त्रों के रत्नाकार आचार्य रघुनाथ शर्मा जी का जन्म जुलाई सन् 1900 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के छाता नामक ग्राम में हुआ था। आपके पिता संस्कृत वाङ्मय के प्रख्यात विद्वान षट्शास्त्री पं0 काशीनाथ शास्त्री थे। न्यायवेदान्तमीमांसा आदि शास्त्रों का स्वतन्त्र रुप से अध्ययन करते हुए भी आपने व्याकरण-शास्त्र की आचार्य परीक्षा गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज वाराणसी से सन् 1926 में उत्तीर्ण की तथा न्याय शास्त्र का अध्ययन नैयायिकप्रवर श्री शिवशंकर भटृाचार्य से तथा महामहोपाध्याय श्री शिवकुमार शास्त्री जी के प्रधान शिष्य अपने श्वसुर श्री अच्युत त्रिपाठी जी से किया।
        संस्कृत वाङ्मय के प्रत्येक क्षेत्र में आपकी प्रतिभा लब्धप्रसरा थीअत एव काशीस्थ प्रसिद्व शिक्षा संस्था मारवाड़ी संस्कृत कालेज में साहित्य शास्त्र तथा संन्यासी संस्कृत महाविद्यालयमें वेदान्त आदि शास्त्रों के अध्यापन के लिए आपको नियुक्त किया गया। लगभग 12 वर्षो तक इन दोनों विद्यालयों में अध्यापन के बाद गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज वाराणसी में आपकी नियुक्ति 1938 में व्याकरण प्राध्यापक के रुप में हुई। 1958 ई0 संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ आपको वेदान्त विभाग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया और आप इसी पद से जून 1965 में अवकाश प्राप्त कर सम्प्रति अपने जन्म स्थान छाताबलिया में शास्त्र चिन्तन एवं लेखन कार्य करते हुए देश विदेश के अनुसन्धित्सुओं को मार्ग निर्देशन देते हुए जीवन यापन कर रहे हैं।
        (2) शिष्यसम्पत्ति- दीर्घकाल अध्यापन काल में आपने लिखित सामग्रीएवं शिष्य सम्पत्ति दोनों ही संस्कृत जगत् को विपुल रुप से दी है। आप के छात्रों में प्रमुख हैः-
 {1} आचार्यप्रवर श्री रामप्रसाद त्रिपाठी-पूर्व वेदवेदांग संकायाध्यक्षसं0सं0                        विश्वविद्यालयवाराणसी।
     {2} आचार्य श्री जगन्नाथ उपाध्याय-पूर्व श्रमण विद्या संकायाध्यक्षसं0सं0 विश्वविद्यालय    वाराणसी।
   {3} आचार्यप्रवर श्री देवस्वरुप मिश्र-आचार्य एवं अध्यक्षवेदान्त विभागसं0सं0                         विश्वविद्यालयवाराणसी।
        {4} पं0 प्रवर श्री रामशंकर भटृाचार्य-पुराण सांख्य के लब्धप्रतिष्ठ विद्वान्।
    {5} डा0 श्री भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी-वागीशशास्त्री‘ अनुसंधान संस्थान निदेशकसं0सं0       विश्वविद्यालय वाराणसी।
        इसके अतिरिक्त अन्य भी सैकड़ों छात्र देश के विभिन्न संस्थाओं में कार्यरत हैं। विदेशों में कार्यरत छात्रों में डा0 ठाकुर प्रसाद मिश्र मारिशसतथा जार्ज कार्डोना प्रोफेसर यूनिवर्सिटी आफ पेंसिलवेनिया यू0 एस0 ए0 जो आज भी अपनी जिज्ञासाओं की शान्ति के लिए आपके घर पर आते रहते है।
        (3) सारस्वतसेवा- श्री शास्त्री जी कि कुछ मुख्य रचनायें-
{1} व्याकरणमहाभाष्यम् (प्रदोपोद्द्योतसहित) निर्णय सागरबाम्बे-1937
{2} अनुभूतिप्रकाशः
{3} चित्सुखी
{4} वाक्यपदीयम् सं0 सं0 वि0 वि0 ब्रहमकाण्डम् 1963
{5}    ‘‘       ‘‘   ‘‘  ‘‘   ‘‘  द्वितीयकाण्डम् 1968
{6}    ‘‘       ‘‘   ‘‘  ‘‘   ‘‘  तृतीयकाण्डे प्रथमो भागः
{7}    ‘‘       ‘‘   ‘‘  ‘‘   ‘‘  तृतीयकाण्डे द्वितीयो भागः
{8}    ‘‘       ‘‘   ‘‘  ‘‘   ‘‘  तृतीयकाण्डे तृतीयो भागः
{9} वाक्यपदीयपाठनिर्णयः
{10} चित्रनिबन्धावलिः
{11} अहमर्थविवेकः
{12} व्याकरणदर्शनबिन्दुः
{13} अष्टकविमर्शः । रच्यमानः ।
{14} स्तोत्रसाहित्य-पराम्बास्तुतिकुसुमांजलिः। शतकत्रयात्मा।
        (क) अपराजिताशतकम् (ख) शीतलाशतकम्।
            अप्रकाशित रचनाएँ यथा-
         श्री रामस्तवःवायुस्तवःकूर्मस्तवः वराहस्तवःनृसिंहस्तवःवामनस्तवःसूर्यस्तवः,श्री कृष्णस्तवःमत्स्यस्तवःबुद्धस्तवःपरशुरामस्तवःकल्किस्तवःनासत्यस्तवः।
        इसके अतिरिक्त भागवतसार तथा पार्वतीपरिणय भी प्रकाशनाधीन है। इसके अतिरिक्त सैकड़ो शोध-निबन्ध ‘‘सारस्वती सुषमा‘‘ आदि अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके है।
        (4) सम्मानप्राप्ति-
{1} वाचस्पतिः (सं0 सं0 वि0 वि0 वाराणसी)
{2} विशिष्ट पुरस्कार (उ0 प्र0 संस्कृत अकादमी)
{3} कालिदास पुरस्कार (उ0 प्र0 संस्कृत अकादमी)
{4} राष्ट्रपति सम्मान-1981
{5} सं0 संस्कृत विश्वविद्यालय में सम्मानित प्राध्यापक
{6} डी0 लिट् की मानद उपाधि (काशी हिन्दू विश्वविद्यालयवाराणसी)
{7} महामहिमोपाध्याय (भारती परिषद्प्रयाग)
        श्री शर्मा जी के अध्यापन काल में बीस अनुसन्धाताओं ने विद्यावारिधि की उपाधि प्राप्त की। इस समय सेवा से निवृत्त होने के बाद भी विद्यावारिधि एवं विद्यावाचस्पति उपाधि के लिए छात्रों का मार्ग निर्देशन करते हुए न्यायव्याकरणवेदान्त तथा साहित्य आदि विषयों में प्रख्यात विद्वानों की जिज्ञासाओं को भी शान्त तथा समाहित कर रहे है।
        आपके सम्बन्ध में अन्यतम शिष्य श्री रामशंकर भटृाचार्य ने स्वसम्पादित ‘‘पातज्जल योगदर्शन‘‘ में ठीक ही कहा है-
                        ‘‘पातज्जलमहाभाष्योत्तानता न्यायदृष्टितः
                         मया प्रविदिता सम्यग्यस्याध्यापनगौरवात्।
                         तस्मै श्री रधुनाथाय शास्त्रिणे शब्दचच्वे
                         समर्पितं श्रद्वयेदं श्रीपातज्जलदर्शनम्।।‘‘
पण्डित प्रवर श्री रघुनाथ शर्मा जी को व्याकरण के प्रसिद्व ग्रन्थ वाक्यपदीयम्‘ पर उनके द्वारा विरचित अम्बाकत्र्री टीका एवं उनके द्वारा की गई संस्कृत वाङ्मय की अहनिश सेवाओं को देखते हुए उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी वर्ष 1972 में   विश्व भारती’ नामक पुरस्कार से सम्मानित किया ।

रामचन्द्र कृष्णमूर्ति शास्त्री

                           सामवेद के विशिष्ट विद्वान् श्री शास्त्री जी ने मद्रास विश्वविद्यालय से वेदान्त शिरोमणि तथा वेदान्त विशारद परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया और वहीं से शोध कार्य करके 1936 से 1942 तक व्याख्याता पद का निर्वाह किया। दो वर्षों तक जगद्गुरूविद्यास्थान में प्राचार्य पद को अंलकृत किया। 1946 ई0 से 1973 ई0 तक संस्कृत कालेज मद्रास में अद्वैत वेदान्त के आचार्य पद पर अर्वतनिक रूप से सेवा की।
                   आचार्य कृष्णमूर्ति द्वारा छः ग्रन्थों का प्रकाशन किया गया हैजिसमें योगसूत्र भाष्य प्रमुख है। आपने अनेक शोध पत्र भी लिखे हैं।
                   अद्वैत वेदान्त विषय में आपको स्वर्णपदक भी प्राप्त हुआ है 1958 ई0 में कोचीन महाराज द्वारा शास्त्ररत्नाकर एवं 1989 ई0 महा-महोपाध्याय के सम्मान तथा उपाधि से सम्मानित किया गया है।

रामनारायण त्रिपाठी

          विविध शास्त्रों के मर्मज्ञ आचार्य रामनारायण त्रिपाठी का जन्म गोरखपुर जनपद के जगदीशपुर नामक ग्राम में शनिवार आषाढ़ कृष्णप्रतिप्रदा विक्रम संवत 1989 में हुआ था। इन्होंने काशीस्थ राजकीय संस्कृत महाविद्यालय (गर्वनमेन्ट संस्कृत कालेज) से 1948 ई0 वर्ष में नव्य व्याकरणाचार्य परीक्षा उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् काशी में अध्यापन कार्य करते हुये उन्होनें शंकरवेदान्त तथा धर्मशास्त्र विषयों में भी स्वर्णपदक पूर्वक आचार्य उपाधि प्राप्त की। इन्होने एम0 ए0 की परीक्षा उत्तीर्ण की। अपने अध्यवसाय से पारम्परिक शास्त्रों का गम्भीर ज्ञान प्राप्त करने के अन्तर आचार्य जी ने लखनऊ विश्वविद्यालय के प्राच्य विभाग में अनेक वर्षो तक अध्यापन कार्य किया। इस विभाग में अनेक वर्षो तक अध्यापन कार्य किया। इस विभाग के अध्यक्ष पद से वह सन् 1983 में सेवानिवृत्त हुए।
          कारयित्री तथा भावयित्री प्रतिभा से सम्पन्न तथा लब्ध प्रतिष्ठा आचार्य त्रिपाठी जी ने सरस्वती की सेवा में निरस्त रहते हुये सैकड़ो निबन्ध लिखे जो कि विभिन्न शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित तथा प्रंशसित हुए। ऋतुविलास शशिकला नामक दो कृतियां संस्कृत काव्य रचना में इनकी दक्षता को अभिव्यक्त करती हैं। इनके शास्त्रविश्लेषणपरक संस्कृत ग्रन्थांे के नाम इस प्रकार है--स्वप्नविमर्शः पाणिनीयसंज्ञविमर्शः सर्वज्ञात्ममुनिनिर्विशेषद्वैतवादउणादिशब्दकोषः शैवसिद्धान्तपरिचयः। हिन्दी भाषा में भी इन्होने कई शोध निबन्ध तथा पुस्तकें लिखी है।

रामकरण शर्मा

प्रो0 रामकरणशर्मा का जन्म 20 मार्च 1927 में बिहार प्रान्त के सारण जिले के शिवपुर ग्राम में हुआ था।
          श्री शर्मा ने ब्रह्चर्याश्रम गनीपुर मुजफ्फर से वेद वेदागों का प्रशिक्षण प्राप्त करके संस्कृत संस्थान बिहार से 1944 से  1947 तक साहित्याचार्य, व्याकरणशास्त्री-अद्वैतवेदान्तशास्त्री की उपाधि प्राप्त किया। पटना विश्वविद्यालय से बी00 की उपाधि संस्कृत एवं हिन्दी विषय में प्राप्त किया। 1953 में आप कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से पी.एच0.डी. की उपाधि से समलंकृत हुये।
          श्री शर्मा जी 1949 से 1952 तक नालन्दा विश्वविद्यालय में संस्कृत एवं हिन्दी विषय के प्राध्यापक रहे। चार वर्ष बिहार लोक सेवा आयोग के सम्मानित सदस्य रहे। इस प्रकार से श्री शर्मा जी विविध शिक्षण संस्थानों में अध्यापक कार्य किये। आपने 1947 से 1980 तक दरभंगा विश्विद्यालय के कुलपति पद को सुशोभित किया। 1984-85 मंे आप सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के उपकुलपति पद पर आसीन रहे। भारत सरकार के संयुक्त शैक्षिक सलाहकार पद पर सेवा करके, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान के संस्थापक निदेशक पद को भी अलंकृत किया।
          श्री शर्मा जी अनेक लघु रचनाएँ प्रकाशित हैं। आपने महाभारत में काव्य-तत्व का अनुवाद एवं चरक संहिता का अंग्रेजी अनुवाद किया। संस्कृत के अनेक ग्रन्थों का लेखन आपने किया है। उनमें काव्य एवं उपन्यास प्रमुख हैं। मदालसा, शिवस्वकीयम् सीमा आदि ग्रन्थ विशेष चर्चित है।
          श्री शर्मा भारतीय भाषा परिषद्, साहित्य अकादमी, एवं राष्ट्रिय पुरस्कारों से सम्मानित किये जा चुके हैं। आप 1987 में राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित हुये। आप 1984 में अखिल भारतीय संस्कृत परिषद् द्वारा महामहोपाध्याय की उपाधि से एवं 1993 में दिल्ली संस्कृत अकादमी द्वारा संस्कृत सेवा सम्मान से सम्मानित किये गये।

 राजदेव मिश्र

          डाॅ0 राजदेव मिश्र का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में 1-3-1928 ई. मेें हुआ था। आप की प्रारम्भिक शिक्षा आनुवंशिक पद्धति द्वारा पितृव्य एवं पितामह के सानिध्य में हुई। श्री मिश्र जी विद्यालयीय प्राच्य पद्धति से पूर्व राजकीय संस्कृत महाविद्यालय वर्तमान सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्विद्यालय वाराणसी से नव्य व्याकरण विषय में शास्त्री एवं आचार्य परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किये। पाश्चात्य पद्धति से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी से संस्कृत विषय में एम.ए. परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करकेकाशी विद्यापीठ वाराणसी से पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त किये।
          श्री मिश्र जी साकेत महाविद्यालय फैजाबाद में स्नातक एवं स्नाकोत्तर कक्षाओं का इकतीस वर्ष तक अध्याध्पन करते हुए वहीं विभागाध्यक्ष पद को विभूषित करते हुएउसी विद्यालय के प्रधानाचार्य पद को गरिमा मण्डित करते हुएवही से सेवानिवृत्त हुए। आपके अध्यापनकाल में आपही के निर्देशन में अनेक शोध छात्र पी.एच.डी.की उपाधि प्राप्त किये। वर्तमान में भी आपके सानिध्य में अनेक छात्र शोध कर रहे हैं। श्री मिश्र जी सम्पूर्णानन्द संस्कृत पत्रिकाओं के प्रधाध्न सम्पादक के रूप में सेवा करते हुए संस्कृत का गौरव बढ़ाते रहे है।
          श्री मिश्र जी द्वारा लिखित एवं सम्पादित कुल इक्यावन ग्रन्थ हैं। इसी प्रकार संस्कृत में अठ्ठावन निबन्ध भी प्रकाशित हैं और अनेकशः प्रकाशित होने वाले हैं। श्री मिश्र जी द्वारा लिखित एक सौ से अधिक संस्कृत गोष्ठियों एवं सम्मेलनों में सम्मिलित होते रहे हैं। श्री मिश्र देश के सर्वोच्च संस्कृत के संस्धानो मेकहीं अध्यक्षउपाध्यक्षसदस्य विशेषज्ञ एवं संरक्षक पत्रिकाओं के प्रधान सम्पादक के रूप में सेवा करते हुए संस्कृत का गौरव बढ़ाते रहे हैं।
          शास्त्र चूड़ामणि सम्मान से सम्मानित श्री मिश्र जी पैंतीस विभिन्न सम्मानों से एवं पुरस्कारों से सम्मानित किये गये हैं। उन सम्मानों में संस्कृत का सर्वोच्च सम्मान राष्ट्रपति सम्मानउत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा प्रदत्त विशिष्ट पुरस्कार इसके अलावा कानपुर से संस्कृत वाचस्पतिभारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के संस्कृत विभाग द्वारा शास्त्र चूड़ामणिविद्वद् रूप में नियुक्तइस प्रकार से श्री मिश्र जी बहुत पदकों और सम्मानों से समर्चित एवं अभिनन्दित हैं।

राजेन्द्र मिश्र अभिराज 

         नवनवोन्मेष प्रतिभा सम्पन्न महामहोपाध्याय प्रो. अभिराज राजेन्द्रमिश्र प्रो0 अभिराज का जन्म उत्तर प्रदेश जौनपुर जनपद के स्यन्दनिका नदी के तट पर स्थित द्रोणीपुर ग्राम में 2-1-1943 में हुआ। पिता पं. दुर्गाप्रसाद मिश्र एवं यशस्विनी माता अभिराज देवी के आप मध्यम पुत्र हैं। अभिराज राजेन्द्र मिश्र जी प्रारम्भिक शिक्षा गांव के समीप जयहिन्द इण्टर कालेज में प्राप्त करके इसके बाद उच्चशिक्षा हेतु इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। वहां आपने 1962 ई. में स्नातक परीक्षा करके 1964 ई. में संस्कृत विषय में सम्पूर्ण कला संकाय में सर्वोच्च अंक के साथ स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त है।
          1966 ई. में श्री मिश्र जी डी.फिल. उपाधि प्राप्त कर उसी वर्ष इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में व्याख्याता पद पर नियुक्त हुए। वहीं पर आपने 1984 ई. में प्रवाचक (रीडर) पद प्राप्त किया। श्री मिश्र जी अप्रैल 1987 से मार्च 1989 पर्यन्त इण्डोनेशिया के बाली द्वीप स्थित उदयन विश्विद्यालय में भारत सरकार द्वारा विजिंटिग प्रोफेसर नियुक्त होकर सुरभारती की महती सेवा की। 1991 में शिमला विश्वविद्यालय में संस्कृतविभागाध्यक्ष एवं आचार्य पद को स्वीकार कियावहीं आप भाषा संकाय के अधिष्ठाता (डीन) तथा विद्वत्परिषद् के सदस्य भी हुए।
          वर्ष 2002 के अप्रैल मास में प्रो. मिश्र सम्पूर्णानन्द संस्कृतविश्विद्यालय के कुलपति पद को विभूषित किया।
          प्रयाग विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. आद्याप्रसाद मिश्र के  भ्रातृत्व अभिराज राजेन्द्र मिश्र में शैशव काल से ही कवित्व का स्फुरण क्रमशः अभिनवविपुल रचनाधर्मिता को प्राप्त कर गया। प्रो. मिश्र की कृतियों में दो महाकाव्य चैदह खण्डकाव्यपांच नवगीतसंग्रहपैंसठ एकांकी रूपकदो नाटिकाचार कथासंग्रहअनेक समीक्षाग्रन्थ प्रकाशित हुए है। अब तक संस्कृत-हिन्दी-भोजपुरी-अंग्रेजीइण्डोनेशियाई भाषाओं में पचासी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। यवद्विपीय रामायण का हिन्दी रूपान्तरण विश्वस्तरीय रचनाओं में विशेष महत्वाधायक है।
          इस सारस्वत सेवा के फलस्वरूप प्रो. मिश्र शासकीय एवं अशासकीय विविध पुरस्कार एवं सम्मान से सभाजित हुए है। इनके प्राप्त पुरस्कारों में प्रमुख हैं-उत्तर प्रदेश साहित्यिक सम्मान एकादशवारदिल्ली संस्कृत अकादमी पुरस्कार तीन बारमध्यप्रदेश संस्कृत अकादमी से कालिदास सम्मान दो बारकलकत्ता के भारतीय भाषा परिषद का कल्पल्ली पुरस्कारमहामहिम राष्ट्रपति सम्मानकानपुर से राष्ट्रिय आत्मा पुरस्कारचित्रकूट से वाल्मीकि पुरस्कारप्रयाग से डाॅ. राजकुमार वर्मा एकांकी पुरस्कारहरिद्वारस्थ परमार्थाश्रम से स्वामी धर्मानन्दसरस्वती साहित्य सम्मान सोनभद्र से डाॅ0 विद्यानिवास मिश्र सम्मानपनीपत जैमिनी अकादमी द्वारा सहस्त्राब्दि रत्नसम्मानउत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान से विशिष्ट पुरस्कारहैदराबाद के वेदभारती से डाॅ0 ओंगेटि अच्युतरामशर्मा संस्कृत पुरस्कारकानपुर से मानस संगम साहित्यसम्मानज्योतिर्मठ बद्रिकाश्रम से महामहोपाध्याय की उपाधि और देवरिया मण्डलस्थ देवरहवा बाबा आश्रम से ब्रह्र्षि की उपाधि उल्लेखनीय है।
          इस प्रकार संस्कृत जगत् के प्राणभूत प्राचीन-अर्वाचीन उभयविद्या प्रवीण सह्दय कविश्रेष्ठ आचार्य अभिराज राजेन्द्र मिश्र महोदय की देश विदेश में महती प्रतिष्ठा है।

रामधीन चतुर्वेदी

        श्री रामाधीन चतुर्वेदी का जन्म बिहार प्रान्त अन्तर्गत भमुआ रोहतास जनपद के हनुमानगढ़ ग्राम में 1 जनवरी 1928 को हुआ। आपके पिता का नाम पं0 बलदेव चतुर्वेदी था।
          श्री चतुर्वेदी जी की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के समीप संस्कृत पाठशाला में हुई। उसके बाद आपने काशी हिन्दूविश्वविद्यालय से मध्यमाशास्त्रीव्याकरणचार्य एवं चक्रवर्ती एवं पी0एच0डी0 को दो उपाधियाँ प्राप्त की। महामहोपाध्याय दरभंगा विश्वविद्यालय से तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से साहित्यरत्नम की उपाधि प्राप्त की। महामहोपाध्याय श्री गिरिधर शर्मा चतुरर्वेदी के निर्देशन में ‘‘संस्कृतभाषाविज्ञान’’ विषय पर शोध कार्य किया। यह शोध प्रबन्ध 1963 में प्रकाशित हुआ जो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में व्याकरणाचार्य की परीक्षा पाठ्य ग्रन्थ में स्वीकृत है।
          श्री चतुर्वेंदी जी ने 1963 ई0 में श्री लालबहादुर शास्त्री केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ दिल्ली में अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया। उसके बाद काशी बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राच्य विद्याधर्म विज्ञान संकाय में 1965 से 1978 तक व्याकरण प्रवक्ता तथा 1987 ई0 तक आप व्याकरण रीडर पद पर आसीन रहे। इसी बीच दो वर्ष तक वहीं विभागाध्यक्ष पद को भी अलंकृत किया।
          चक्रवर्ती चतुर्वेदी जी ने पारम्परिक विधि से व्याकरणशास्त्र के अध्ययन अध्यापन के साथ ही अपने शोध निर्देशन में अनेक शोधार्थियों को पी0-एच0-डी0 उपाधि से विभूषित किया। आपके शोधपूर्ण अनेक लेख हिन्दी एवं संस्कृत की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। आप द्वारा लिखित पन्द्रह पुस्तकें प्रकाशित हैं। आप वृद्धावस्था में भी अपने निवास स्थान पर निष्ठापूर्वक अध्यापन कर रहे हैं।

रामनाथ सुमन


        मन-वाणी-कर्म तीनों की ऐक्य साधना से भारतीय भावना और उदान्त हिन्दुत्व के अहर्निश प्रचारपरायण आचार्य रामनाथ सुमन का जन्म उत्तर प्रदेश स्थित गाजियाबाद जनपद के धौलाना नामक स्थान (कस्बे) में आषाढ़ शुक्ल दशमी संवत् 1983 तदनुसार 20.7.1926 ई0 को सामान्य ब्राहम्ण कुल में हुआ। आपकी माता पूज्या श्रीमती ब्रहदेवी और पिता पूज्य पण्डित श्री शिवचरण दत्त शर्मा थे।
                   आचार्य सुमन जी की शिक्षा हापुड़ नगर के तपस्वी चण्डी संस्कृत पाठशाला में पण्डित बालकरामशास्त्री के सानिध्य में हुई। वहीं से आपने अपनी अद्वितीय बुद्वि बल से प्रथमा-मध्यमा परीक्षाओं में प्रथम श्रेणी प्राप्त कर संस्कृत सम्भाषण एवं श्लोकारचना में निपुणता प्राप्त की। पाणिनीय व्याकरण शास्त्र में अत्यन्त रूचि के कारण आपको गढ़मुक्तेश्वर के श्री भागीरथी संस्कृत महाविद्यालय के पदवाक्यप्रमाणपारावारीण प्राचार्य पं0 श्री सत्यव्रत शर्मा जी के पास भेजा गया। वहां से आपने शास्त्री एवं नव्यव्याकरणाचार्य परीक्षायें 1951 ई0 में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। 1957 ई0 में आगरा विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में एम00 परीक्षा उत्तीर्ण कर पुनः 1960 ई0 में क्रमशः साहित्याचार्य एवं सांख्ययोगाचार्य की परीक्षायें प्रथम श्रेणी में आचार्य सुमन जी ने उत्तीर्ण की है।
                   आचार्य सुमन जी ने 1951 ईमें धौलाना माध्यमिक विद्यालय में संस्कृत प्रवक्ता पद पर नियुक्त होकर शिक्षण कार्य प्रारम्भ किये। आचार्य जी अपनी अप्रतिम प्रतिभा के बल पर 1960 ई. से 1986 तक राणाकालिज पिलखुआ में संस्कृत विभागाध्यक्ष पद को अलंकृत करते हुएप्राचार्य पद को सुशोभित करते हुए वहीं से सेवानिवृत्त हुए। आपके सहरत्राधिक शिष्य देश के प्रत्येक कोने में आपकी कृपा से एवं आप द्वारा प्रदत्त संस्कारों से संस्कारित होकर देश और प्रदेश में योगदान कर रहे है।
                   आचार्य सुमन जी द्वारा लिखित ‘‘संस्कृत सुबोध‘‘ नामक ग्रन्थ उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् से प्रकाशित है। सुमन द्वारा लिखित ‘‘संस्कृति सुधा‘‘ तथ ‘‘संस्कार दीपिका’’ का प्रणयन किया है और ‘‘कादम्बरी कथामुख‘‘ का अनुवाद किया है। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान से प्रकाशित होने वाली परिशीलनम् पत्रिका के संस्थान के अध्यक्ष होने के कारण प्रधान सम्पादक के रूप में कार्य किया। राष्ट्रीय स्तर की विविध पत्र पत्रिकाओं में आपके शोधपरक ललित संस्कृत के लेख प्रकाशित है।
                   आचार्य सुमन महोइदय ने देश और प्रदेश की विभिन्न उच्च संस्थाओं में अध्यक्ष एवं संयोजक रहेजैसे भारत संस्कृत परिषद् के अध्यक्ष एव मार्गदर्शकमण्डल के राष्ट्रीय संयोजकउत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के अध्यक्षएवं दिल्ली संस्कृत अकादमी के सम्मानित सदस्य के रूप में कार्य किया।
                   आचार्य जी 1998 ई0 में स्व0 चन्द्रवती जोशी संस्कृत भाषा पुरस्कार से तथा 1999 ई0 में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी द्वारा संस्कृत वर्ष के अन्तर्गत विशिष्ट विद्वान् के रूप में सम्मानित किये गये और इसी वर्ष भारत के महामहिम राष्ट्रपति डा0 के0 आर0 नारायण द्वारा राष्ट्रपति सम्मान से भी सम्मानित हुए है।

रामेश्वर झा

आचार्य रामेश्वर झा का जन्म मिथिलांचल के समस्तीपुर जिले के ‘‘पटसा‘‘ ग्राम में वैशाखशुक्ल प्रतिपदा वि0 सं0 1963 (1905 ई0) में हुआ। उनके पिता का नाम श्री अयोध्यानाथ झा और माता का नाम रमा देवी था। आचार्य रामेश्वर झा ने पं0 रामदत्त मिश्र, श्री राधाकान्त झा, श्री सदानन्द झा, पं0 उग्रानन्द झा और पं0 बालकृष्ण मिश्र के सान्निध्य में व्याकरण एवं न्यायशास्त्र का विधिवत् अध्ययन कर उभय शास्त्र में प्रगाढ़ पाण्डित्य अर्जित किया। इन्होंने खुर्जा स्थित श्रीराधाकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय में न्याय विभागाध्यक्ष के रूप में तथा काशी के नित्यानन्द संस्कृत वेद महाविद्यालय में प्राचार्य के रूप में सफल अध्यापन कार्य किया। पं0 रामेश्वर झा के अप्रतिम वैदुष्य के फलस्वरूप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1980 ई0 में उन्हें महामहोपाध्याय की मानद उपाधि प्राप्त हुई और 1981 ई0 में भारत सरकार की ओर से राष्ट्रपति सम्मान भी मिला। महान् दार्शनिक एवं तन्त्रशास्त्र के मर्मज्ञ मनीषी महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज जी की प्रेरणा से पं0 रामेश्वर झा ने शैवदर्शन विषयक ‘‘पूर्णताप्रत्यभिज्ञा‘‘ नामक मौलिक ग्रन्थ की रचना की। दो भागों में विभक्त पूर्णताप्रत्यभिज्ञा के प्रथम भाग में पूर्णता का तथा द्वितीय भाग में शैवदर्शन के 36 तत्त्वों का वर्णन है। आर्ष शैली में लिखित यह ग्रन्थ शैवागमदर्शन के अध्ययन का मार्ग प्रशस्त करता है। ‘पूर्णताप्रत्यभिज्ञा‘ हिन्दी टीका के साथ तारा प्रिंटिग वक्र्स वाराणसी से 1984 में प्रकाशित हुई। ‘‘शिवतत्त्वविमर्शः‘‘ पं0 रामेश्वर झा की दूसरी रचना है। इसके अतिरिक्त आचार्य रामेश्वर झा की दैनन्दिनियों में सहस्राधिक हस्तलिखित श्लोक सुरक्षित हैं। पं0 रामेश्वर झा 12 दिसम्बर 1981 को इहलीला समाप्त कर शिवसायुज्य को प्राप्त हुए।

   रेवाप्रसाद द्विवेदी

         आचार्य रेवा प्रसाद द्विवेदी जी का जन्म पुण्यसलिला भगवती नर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित प्रसिद्व ग्राम नादनेर में बसे कश्यप गोत्रीय ब्राह्म्ण पं. नर्मदा प्रसाद द्विवेदी के यहां सन् 1935 ई. में हुआ। उन्ही ने आपको विष्णुसहस्त्रनाम पढ़ाकर संस्कृत की शिक्षा दी।
          आपने 1950 में वाराणसी राजकीय संस्कृत महाविद्यालय की संपूर्ण मध्यमा परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और इसी वर्ष काशी आकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से साहित्य शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण हुए और वहीं से 1953 में आचार्य परीक्षा भी उत्तीर्ण की। इन दोनो परीक्षाओं में आपने प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त किया। सन् 1965 में रवि शंकर विश्वविद्यालय रायपुर से पी.एच.डी. उपाधि तथा 1974 ई. में जबलपुर विश्वविद्यालय से डी.लिट् की उपाधि प्राप्त किया। आपके दोनों शोध प्रबन्ध प्रकाशित हो चुके हैं। 1999 ई. में तिरूपति संस्कृत विद्यापीठ द्वारा आपको महामहोपाध्याय इस सम्मानित उपाधि से अलंकृत किया गया।
          महामहोपाध्याय आचार्य द्विवेदी जी सर्वप्रथम 1959 ई. में शासकीय महाविद्यालय मध्यप्रदेश में लेक्चरर पद पर नियुक्त होकर 1970 तक कार्यरत रहे। जनवरी 1970 में ही काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के साहित्य विभाग के उपाचार्य एवं अध्यक्ष रूप में कार्यरत रहकर 1977 ई. में आचार्य नियुक्त कर दिए गए जहां आप 1990 तक कार्यरत रहे।
          आपने संस्कृत के तीन महाकाव्यों की रचना की-
1.उत्तरसीताचरितम् 2. स्वातत्रयसंभवम् 3. कुमारविजयम् एवं 20 खण्डकाव्य, 2 नाटक, 7 शास्त्रीय ग्रंथों का संपादन तथा 19 कठिन संस्कृत ग्रंथों का हिन्दी अनुवाद किया और महाकवि कालिदास के समग्र साहित्य को तीन सौ से अधिक हस्तलिखित विविध ग्रंथो तथा साहित्य शास्त्र के आधार पर अपने मूल रूप पहुंचाया। आपके संपादन का प्रतिमान कालिदास ग्रंथावली है। इतना ही नहीं अपितु आपने कालिदास के संपूर्ण साहित्य का सुसमीक्षित रूप को नवीनतम पाण्डु ग्रंथों में, नागरी लिपि में अपने हाथ से लिखा और मेघदूत को कालिदासकालीन ब्राह्लिपि में भी।
          श्रद्धेय द्विवेदी जी की साहित्य सेवा से प्रसन्न होकर भारत के राष्ट्रपति डाॅ0 नीलम संजीव रेड्डी ने इन्हें सन् 1978 में सर्टिफिकेट आफ् आनर ( राष्ट्रपति सम्मान) से सम्मानित किया। मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् तथा उ0प्र0 संस्कृत संस्थान के अनेक पुरस्कारों से आप पुरस्कृत हैं। 1984 में आपको काव्यशास्त्र पर उल्लेखनीय कार्य के लिए बम्बई की एशियाटिक सोसायटी ने म.म.पी.वी. काणे स्वर्णपदक से सम्मानित किया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने आपको 1985 में मालवीय पुरस्कार प्रदान कियौ 1993 से आप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्कृत के सम्मानित प्राध्यापक थे।

 वाचस्पति उपाध्याय

        प्रो. उपाध्याय का जन्म 1.7.1943 ई. ग्राम औझाराजिला सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश में हुआ है।
पण्डित कुल में उत्पन्न प्रो. उपाध्याय जी की शिक्षा दीक्षा विशिष्ट विद्वान् पिता एवं पितामह के सानिध्य में आनुवंशिक पद्धति से हुईजो प्रसिद्ध मीमांसक पद्मभिराम शास्त्रीएवं अनेक शास्त्र मर्मज्ञ पं. गौरीनाथ शास्त्री के आचार्यत्व में पल्लवित पुष्पित हुई। आप कलकत्ता विश्वविद्यालय से 1962 में संस्कृत में एम.ए. और उसी विश्विद्यालय से 1967 ई. मंे.पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त किये। संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी से 1970 ई. में डी.लिट् (वाचस्पति) उपाधि प्राप्त कर अपने नाम को सार्थक किया।
          प्रो. उपाध्याय 1970 ई. से 1980 तक दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में व्याख्याता पद को और 1980 ई. से 1984 तक प्रवाचक पद को और पुनः 1984 ई. से 1994 ई. तक आचार्य एवं विभागाध्यक्ष पद को अलंकृत किये। आप चैबीस वर्ष तक अध्यापन कार्य किये। आपके निर्देशन में सत्तर छात्र एम.फिल् एवं ऊनसठ छात्र पी.एच.डी किये।
          प्रो. उपाध्याय अध्यापन में निष्णात होते हुएप्रशासकीय कार्यो में भी परम कुशल रहे है। प्रमाण स्वरूप 1968 से 1970 ई. तक सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय का कुलसचिव पदराष्ट्रीय संस्कृत संस्थान दिल्ली का निदेशक पदऔर देश के विभिन्न संस्थाओं की सदस्यतासचिव पद तथा वर्तमान में लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ का 1994 ई. से अब तक श्री उपाध्याय जी का कुलपति पद प्रशासकीय पदके इतिवृत्त का बयान करता है। आप विश्व संस्कृत सम्मेलनों में महासविच पद पर कार्य करते हुए 2001 ई. के विश्व संस्कृत सम्मेलन के पांच खण्डों में प्रकाशित शोधपत्रों के संग्रह का प्रकाशन किये है।
          प्रो. उपाध्याय द्वारा लिखित चार ग्रन्थ प्रकाशित हैंजिनमें ‘‘मीमांसा दर्शन विमर्श‘‘ एवं सेश्वरमीमांसाये दोनों ग्रन्थ है। राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय स्तरीय गोष्ठियों एवं समारोहांे में आप द्वारा सत्ताइस लेख पढ़े जा चुके हैं।
          प्रो. उपाध्याय 2001 ई. में संस्कृत के प्रचार-प्रसार में की गई उत्कृष्ट सेवा के लिये महामहिम राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित किये गये। 1978-97 ई. में आप उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी द्वारा संस्कृत साहित्य पुरस्कार से एवं विभिन्न संस्थाआंे द्वारामहामहोपाध्यायशास्त्र विद्वन्मणि आदिक चैदह पुरस्कारों से पुरस्कृत किये गये है।
          प्रो. उपाध्याय ने देश के अलावाजर्मनीस्विटिजरलैण्डनेपाल आदि नव देशों में संस्कृत के उन्नयन हेतु प्रतिभागिता की है।

वायुनन्दन पाण्डेय

          आचार्य वायुनन्दन पाण्डेय महोदय का जन्म उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के मलाँव नामक गांव में 15.10.1927 ईस्वी को हुआ था।
          आचार्य पाण्डेय महोदय ने सन् 1936 तक गोरखपुर स्थित संस्कृत पाठशाला तिलसर गगहाँ नामक स्थान में आचार्य श्री रामप्रताप द्विवेदी जी के सानिध्य में संस्कृत अध्ययन आरम्भ किया। आपने वाराणसी स्थित संस्कृत विश्वविद्यालय से ‘‘विद्या वारिधि’’    (पी.एच.डी.) की उपाधि प्राप्त की।
          आचार्य वायुनन्द पाण्डेय महोदय ने सन् 1953 से सन् 1958 तक वाराणसी स्थित ‘‘श्री दयालु संस्कृत महाविद्यालय में व्याकरणाध्यापक के पद पर सेवा की। आपने दिनांक 23.9.1958 ईस्वी से 20.11.1964 तक उक्त महाविद्यालय में प्रधानाचार्य पद को अलंकृत किया। आपने दिनांक 21.11.1964 ईस्वी से 7.11.1975 से 30.6.1988 तक क्रमशः साहित्य विभाग के प्राध्यापक पद एवं उपाचार्य पद पर सेवा सम्पादित करते हुए सेवानिवृत्त हुए। आचार्य पाण्डेय महोदय ने सेवाहनवृत्ति के बाद ‘‘सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय’’ में ‘‘शास्त्रचूड़ामणि’’ पद पर तथा ‘‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय’’ में ‘‘ आमंत्रित आचार्य’’ कि रूप में सेवा सम्पादित की।
          आचार्य पाण्डेय द्वारा शिक्षित छात्रों की विशाल श्रंृखला है। जो शास्त्रों में विशिष्टता एवं उच्च शिक्षा प्राप्त कर देश के विभिन्न शिक्षा संस्थाओं में उच्च पदों पर शिक्षण कार्य का सम्पादन कर रहे हैं। आपके मार्ग निर्देशन में 37 छात्र शोध कार्य पूर्ण कर चुके है।
                   आचार्य पाण्डेय द्वारा शिक्षित छात्रों की विशाल श्रंृखला है। जो शास्त्रों में विशिष्टता एवं उच्च शिक्षा प्राप्त कर देश के विभिन्न शिक्षा संस्थाओं में उच्च पदों पर शिक्षण कार्य का सम्पादन कर रहे है। आपके निर्देशन में 37 छात्र शोध कार्य पूर्ण कर चुके है।
                   आचार्य पाण्डेय महोदय द्वारा सम्पादित ग्रन्थ ‘‘री अप्पय दीक्षित’’ द्वारा लिखित ‘‘वृतिवार्तिकम् का प्रकाशन सम्पूर्णानन्द संस्कृत महाविद्यालय द्वारा किया गया। आपके द्वारा लिखित ‘‘कालियविजयं’’ काव्य ’सूर्योदय’ पत्रिका में तथा ‘इन्दिरा-समृति‘‘ नामक रचना ‘‘गाण्डीवम्‘‘ पत्रिका में प्रकाशित हुआ। आपके द्वारा अनूदित ‘‘नैषधीय-चरितम्’’ चैखम्भा प्रकाशन द्वारा सन् 1976 में प्रकाशित किया गया। इसके अतिरिक्त आपके द्वारा लिखित अनेक शोध लेख संस्कृत की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं।
                   आचार्य पाण्डेय ‘‘अखिल भारतीय पण्डित महापरिषद्’’ द्वारा ‘‘साहित्य चकोर‘‘ साहित्य-भूषणम्‘‘ उपाधि से सम्मानित है। आचार्य पाण्डेय प्रदेश की विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित हैं। इसके अतिरिक्त आचार्य पाण्डेय महोदय ने संस्कृत भाषा के विभिन्न सम्मेलनों में भाग लेकर व्याख्यान दिये तथा विभिन्न कवि-सम्मेलनों में काव्य पाठ करके सह्दयों के ह्दय को आलहादित किया है। सम्प्रति श्री पाण्डेय महोदय अपने घर पर छात्रों को विद्यादान कर रहे है।

विद्यासागर पाण्डेय

               आचार्य विद्या सागर पाण्डेय का जन्म विक्रमी संवत् 1994 पौष शुक्ल प्रतिप्रदा दिनांक 2.1.1938 ई. को मिर्जापुर जनपद में मां विन्ध्यवासिनी की गोद में मां गंगा के पावन तट पर विराजमान बबुरा ग्राम में हुआ था। आपके पिता आजीवन समाजसेवी एवं कुशल किसान श्रीराजनारायण पाण्डेय थे। आपकी परम वात्सल्यमयी मां सरस्वती देवी थी।
          श्री पाण्डेय जी ग्राम बबुरा के ही लघु माध्यमिक विद्यालय में आठवीं कक्षा तक पढ़कर बाद में पिता की दृढ़ इच्छा के अनुसार मिर्जापुर स्थित श्री भैरव संस्कृत पाठशाला में व्याकरण शास्त्र के पांरगत स्वर्गीय श्री भगवती प्रसाद द्विवेदी के एवं स्वर्गीय श्री कमलाकान्त पाण्डेय के सानिध्य में प्रथमा, पूर्व मध्यमा एवं उत्तर मध्यमा की परीक्षा उत्तीर्ण की। उत्तर मध्यमा के अध्ययन काल में ही संस्कृत एवं हिन्दी में पद्य रचना का स्त्रोत मां सरस्वती की अनुकम्पा से प्रस्फुटित हुआ।
          आपने 1961 ई. तके श्रीसनातनभैरवशंकरब्रह्संयुक्तसंस्कृत स्नातकोत्तर महाविद्यालय मीरजापुर से शास्त्री प्रथम वर्ष की परीक्षा उत्तीर्ण किया। परिस्थितिवश 1961-66 तक जनपद के लघु माध्यमिक विद्यालय लाल जी पड़रिया में संस्कृत अध्यापक के रूप में अध्यापन करते हुए स्वतंत्र रूप से आचार्य परीक्षा उत्तीर्ण की। 1968 में आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, विसुन्दरपुर, मीरजापुर में संस्कृत प्रवक्ता पद पर नियुक्त होकर अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया। वहां से 2000 में सेवानिवृत्त होकर इस समय जिज्ञासु छात्रों को संस्कृत कर्मकाण्ड कह शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। श्री पाण्डेय ने आभिज्ञान शाकुन्तलम् के श्लोकों का उन्ही छन्दों में हिन्दी भाषा में पद्यानुवाद किया है। आप द्वारा रचित एवं अनुदित शिवताण्डव स्तोत्र है। उसका उन्हीं छन्दों में हिन्दी भाषानुवाद मुद्रित है। पंचमहायज्ञ ग्रंथ मुद्राधीन है। ‘अभिनव भारत राष्ट्रम्, इसका अनुवाद सहित द्वितीय संस्करण प्रकाशित है। चतुर्थ रचना ‘मैं कौन हूं‘ संस्कृतिपरक सर्वोपयोगी प्रश्नोत्तरावली लिखी जा रही है।
          श्री पाण्डेय जी की प्रवृत्ति बाल्यकाल से ही संस्कार एवं संस्कृतिमय थी, जिससे प्रेरित होकर आपने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा माध्यमिक कक्षा से संस्कृत भाषा को निकाले जाने के कारण मीरजापुर की संस्कृत बचावो संघर्ष समिति के मंत्री पद का दक्षतापूर्वक निर्वहन करते हुए प्रदेश व्यापी आंदोलन में भाग लिया। श्री पाण्डेय जी सांस्कृतिक कार्यक्रमों, संस्कृत नाट्य अभिनव और संस्कृत कवि सम्मेलनों में सदा अपना योगदान देते रहते है। आप संस्कृत विद्वानों के अभिनन्दन तथा उनके सम्मान एवं संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार में सदैव तत्पर रहते है।

विश्वनाथ शास्त्री दातार

शैक्षणिक अनुभव
मीमांसान्याय और प्राचीन राजशास्त्र-अर्थशास्त्र के प्रकांड विद्वान
कुंवर अनन्त नारायण सिंह को पुराण प्रवचन के माध्यम से दीक्षा दी
प्राचीन राजशास्त्र के शिक्षक संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय,वर्ष 1981 में सेवानिवृत्त ।
सम्मान-
संस्कृत में उच्चकोटि के कार्यो के लिए उन्हें वर्ष 1990 में राष्ट्रपति पुरस्कार
लाल बहादुर राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ [नई दिल्ली] द्वारा 15 फरवरी 1994 में महामहोपाध्याय की उपाधि
विद्याभूषणउडुपी मदुराचार्य तंजावर पुरस्कार
वेद पंडित पुरस्कार 1984  में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान,लखनऊ 
विशिष्ट पुरस्कार 2002 में  उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान,लखनऊ 
पुनः महर्षि बाल्मीकि पुरस्कार
पौरोहित्य कर्मकांड पुरस्कार 2001 में वीर हनुमान मंदिर,राजस्थान
 म.म.पं सदाशिव मुसलगांव स्मृति पुरस्कार, 2004
अन्य
अनेक ग्रंथ प्रकाशित

 88 वर्ष में निधन

विद्यानिवास मिश्र

          विश्व प्रसिद्ध विद्वान् पद्मश्री श्री विद्यानिवास मिश्र का जन्म मकर संक्रान्ति 1982 वि0      (14 जनवरी 1926 ई0) ग्राम पकड़डीहा जिला गोरखपुर में हुआ था। आपकी माता श्रीमती गौरी देवी और पिता स्व0 पं0 प्रसिद्वनारायण मिश्र थे। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव मेंमाध्यमिक शिक्षा गोरखपुर मेंसंस्कृत में एम00 परीक्षा उत्तीर्ण किया। कार्य क्षेत्र निरन्तर बदलता रहा।
          आपने हिन्दी साहित्य सम्मेलन में स्व0 राहुल जी की छाया में कोश कार्य पुनः पं0 श्रीनारायण चतुर्वेदी की प्रेरणा से अकाशवाणी में कोशकार्यविन्ध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के सूचना  विभागों में कोशकार्य किया। आपने गोरखपुर विश्वविद्यालयसंस्कृत विश्वविद्यालय और आगरा विश्वविद्यालय में क्रमशः संस्कृत और भाषा विज्ञान का अध्यापन किया। श्री मिश्र जी कैलीफोर्निया और वांिशंगटन विश्वविद्यालयों में अतिथि अध्यापक 1960-61 और 1967-68 में रहे। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी संस्थान आगरा के 1977 से 81 तक आपने निदेशक पद को सुशोभित किया। 1985-86 में आप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विजिटिंग प्रोफेसर रहे।
          श्री मिश्र जी 1986-89 तक काशी विद्यापीठ के कुलपति पद को विभूषित किया। आप सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के भी कुलपति रहे।
          श्री मिश्र जी साहित्य अकादमी की कार्यपरिषद् के सदस्य रहे। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्षहैंऔर कालिदास अकादमी की कार्यसमिति के सदस्य रहे हैं। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्षसेण्टर फार डेवलमेण्ट एडवास्ड कम्प्यूकटंग के अवैतनिक परामर्शदाता तथा अनेक साहित्यिक शैक्षिक संस्थाओं से जुड़े हुए है।
          श्री मिश्र जी संस्कृत अंग्रेजी एवं हिन्दी भाषा में अनेक ग्रन्थों का प्रणयन एवं सम्पादन किया है। आप के अठ्ठारह निबन्ध संग्रहसोलह आलोचनात्मकविवेचनात्मक ग्रन्थव्यंगहास्य ग्रन्थकविता संग्रहतीन अनूदित ग्रन्थ इसके अतिरिक्त अनेक पत्रिकाओं के सम्पादन के साथ-साथ बत्तीस ग्रन्थों का सम्पादन और विभिन्न भाषाओं में नव शोध ग्रन्थ भी प्रकाशित हैं।
          आप विभिन्न उच्चस्तरीय पुरस्कारों से भी पुरस्कृत किये जा चुके है। 1988 में पद्मश्री पुरस्कार से पुरस्कृत, 1990 में मूर्तिदेवी सम्मानकेशव पुरस्कारविड़ला संस्थान के शंकर सम्मान से भी पुरस्कत हैं। अमेरिका तथा यूरोप में आयोजित अन्ताराष्ट्रीय सम्मेलनों में अनेक बार सम्मानित हुए। आप नवभारत टाइम्स के प्रधान सम्पादक रहेऔर इस समय हिन्दू धर्म विश्वकोष के सम्पादक हैं।

वीरेन्द्र कुमार वर्मा

            डा0 वीरेन्द्रकुमार वर्मा का जन्म 1931 ई0 में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर नगर में हुआ। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा सहारनपुर में ही हुई। आगरा विश्वविद्यालय में स्नातक उपाधि प्राप्त करने के अनन्तर डाॅ0 वर्मा ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम00 तथा पी0एच0डी0 उपाधियाँ प्राप्त की। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत महाविद्यालय से इन्होंने वेदाचार्य की उपाधि भी प्राप्त की। उपर्युक्त परीक्षाओं में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त करने के कारण इनको स्वर्णपदक भी मिलेे। डाॅ0 वर्मा ने डाॅ0 सूर्यकान्त तथा डाॅ0 गोपालचन्द्र मिश्र से वेदों का गहन अध्ययन किया।
          1960 ई0 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में डाॅ0 वर्मा प्रवक्ता नियुक्त हुए। उसके बाद 1971 से क्रमशः रीडरप्रोफेसर तथा अध्यक्ष पद पर कार्य करते हुए अवकाश ग्रहण किया। डाॅ0 वर्मा कला संकाय के प्रमुख के रूप में अपने प्रशासन कौशल से प्रशंसित रहे हैं।
          डाॅ0 वर्मा ने वेद के प्रातिशाख्य-ग्रन्थों पर विशेष शोधकार्य किया है। आपके 20 अधिक प्रकाशित ग्रन्थ हैंजिनमें ऋग्वेद प्रातिशाख्य-एक परिशीलनवाजसनेयि प्रातिशाख्यम् तैतिरीय प्रातिशाख्यम् आदि प्रमुख हैं। आपके अनेक शोधलेख भी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। डाॅ0 वर्मा को वाजसनेयि प्रातिशाख्य‘ तथा तैतिरीय प्रातिशाख्यम् पर उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान और राजस्थान संस्कृत अकादमी से पुरस्कार भी प्राप्त हो चुका है।
          वैदिक वाड्मय के संरक्षणसंस्कृत साहित्य के सम्वर्धन एवं श्लाघनीय सेवा के लिए राजस्थान संस्कृत अकादमी एवं श्रीनाथ दारस्थ मन्दिर-मण्डल ने संयुक्त रूप से डाॅ0 वर्मा को सम्मानपत्र प्रदान किया है। आपके निर्देशन में शतधिक छात्र-छात्राओं ने शोधोपाधि (पी0एच0डी0) प्राप्त की। आप विद्या परिषद् शोध समिति आदि के सदस्य के रूप में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालयवाराणसी से निरन्तर सम्बद्व रहे है। प्रो0 वर्मा इस समय भी सेवानिवृत्त आचार्य के रूप में वहां छात्रों को विद्यादान कर रहे हैं।
          उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान वेद के विशिष्ट विद्वान् प्रो0 वीरेन्द्रकुमार वर्मा को इक्यावन हजार रूपये के विशिष्ट पुरस्कार से सम्मानित कर गौरव का अनुभव कर रहा है।

वेदानन्द झा

           आचार्य वेदानन्द झ महोदय का जन्म 15.8.1926 ई0 में बिहार प्रान्त के सीतामढ़ी जनपद के वसन्तपुर ग्राम में हुआ था। आप के पिता महामहोपाध्याय द्रव्येशझा संस्कृत के प्रख्यात विद्वान् थे।
              आचार्य झा महोदयव्याकरणवेदान्तन्यायसांख्य योग एवं साहित्य विषयों के आचार्य हैं। आप संस्कृत विषय में एम00 साहित्य रत्न एवं पोष्टाचार्य की उपाधि श्रमपूर्वक प्राप्त की है।
                   आचार्य झा महोदय ने 1947 ई0 से अध्यापन कार्य प्रारम्भ करके 1990 ई0 तक अध्यापन किया है। सर्वप्रथम बिहार प्रान्त में जानकी संस्कृतमहाविद्यालय सीतामढ़ी में सहायकाध्यापक पद पर कार्य करके अड़तीस वर्ष तक उत्तर प्रदेश के विभिन्न संस्कृत विद्यालयों में प्रधानाचार्य पद पर प्रतिष्ठित रहे। नेपाल देश में भी 1960 ई0 से 1964 तक सिद्वेश्वर संस्कृत विद्यालय में नियुक्त थे। नई दिल्ली में शास्त्र चूड़ामणि पद को शोभित किया है।
                   आचार्य झा द्वारा लिखित शोध निबन्ध सारस्वती सुषमा जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। आपके अनेक ग्रन्थ भी आपकी विशिष्ट योग्यता है।
                   शारदा पीठाधीश्वर श्री शंकराचार्य महोदय के तत्वाधान में 1980 में हुई विद्वद्गोष्ठी में शास्त्रार्थ चर्चा में देश की प्रधानमन्त्री स्वर्गीय श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा आप सम्मानित हुए।

शशि तिवारी

          यशस्विनी श्रीमती डा0 शशि तिवारी का जन्म 16.10.1945 ई. में हुआ था। आपकी जन्म से लेकर पी.एच.डी. पर्यन्त सभी शिक्षा लखनऊ उत्तर प्रदेश में हुई। आप 1965 ई. में लखनऊ विश्वविद्यालय से संस्कृत विषय में एम.ए. परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और तीन स्वर्णपदक प्राप्त किया। लखनऊ विश्वविद्यालय से ही आपने पी.एच.डी. एवं जर्मन प्रोफिसियंशी की उपाधि प्राप्त किया।
          डा. शशि तिवारी इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के अन्तर्गत मैत्रेयी कालेज में संस्कृत विषय में प्रवाचक पद पर कार्य कर रही हैं। आपके वेदउपनिषद्संस्कृत साहित्य भारतीय संस्कृति और धर्म और दर्शन अध्ययन के विषय रहे हैं। आपके शोध निर्देशन में दो छात्र शोध करके पी.एच.डी. उपाधि प्राप्त कर चुके हैं। नव छात्र एम.फिल. की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं। इस समय चार छात्र आपके निर्देशन में शोध कर रहे है।
          डा. शशि तिवारी द्वारा उन्नीस ग्रन्थ लिखे गये हैं और वे प्रकाशित ग्रन्थों में कुछ सूक्तपरककुछ उपनिषद्विषयककुछ संस्कृत लोकोक्तिपरक और संस्कृतसाहित्येतिहास विषयक हैं। अन्य प्रकाशनों में छः ग्रन्थ प्रकाशनाधीन हैं।
          डा. शशि तिवारी संस्कृत एवं वेदविद्या के प्रचार प्रसार और विकास के लिये राष्ट्रीय एव अन्ताराष्ट्रीयों में भाग ग्रहण करके अनेक शोध पत्रों को पढ़ी हैं। 1985 ई. में आप इटली में उपनिषद में तीन शोध पत्र और 2000 ई. में दबोकन अमेरिका में वेदसम्मेलन में शोध पत्र प्रस्तुत की तथा सत्र की अध्यक्षता भी की। आपने राष्ट्रीय एवं अन्ताराष्ट्रीय शोध सम्मेलनों की आयोजिका का कार्य किया।
          डा. शशि तिवारी देश की बहुत सी संस्कृत संस्थाओं में सदस्यसहसचिवकोषाध्यक्षशिक्षकपरिषद् की सचिव के रूप में संस्कृत के कार्य में तत्पर होकर संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार में संलग्न है।
          डा. शशि तिवारी अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त कर चुकी हैं। दिल्ली संस्कृत अकादमी द्वारा ‘‘ संस्कृतसमाराधक सम्मान’’ तथा संस्कृत साहित्य सेवा सम्मानउत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान से दो बार संस्कृत साहित्य पुरस्कारहोस्टन यूनिवर्सिटी होस्टन अमेरिका से विश्ववेद सम्मान’’ इस प्रकार से आप अनेक सम्मानों से सम्मानित की गई हैं।

 श्रीनाथ मिश्र

        पं. श्री श्रीनाथ मिश्र का आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी विक्रमी संवत 1984 को हुआ था। पं0 श्रीराम नाथ मिश्र आपके पिता एवं विद्यागुरू भी थे।
श्री मिश्र जी 1974 ई0 में संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से वेदाचार्य (घनपाठी) परीक्षा उत्तीर्ण किए। धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज आपके मार्गदर्शक रहे।
          श्री मिश्र जी का जीवन कर्मकाण्ड एवं यज्ञापि संपादन में व्यतीत हो रहा है। आप अपने वैदिक ज्ञान के प्रभाव से विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित है। उदाहरणस्वरूप-जगद्गुरू कांची शंकराचार्य चन्द्रशेखर सरस्वती द्वारा सिंह ललाट पुरस्कार, संादीपनी वेद विद्या प्रतिष्ठान उज्जैन द्वारा ‘वेदपण्डित’ सम्मान, इन्दौर विद्वद् परिषद् द्वारा ‘कर्मकाण्ड-रत्नं ‘सम्मान’ ए0डी0 फ्लोर मिल मैनपुरी द्वारा ’वेदाचार्य’ सम्मान श्री काशी गणेशोत्सव द्वारा ‘वेदमूर्ति’ पुरस्कार, जय हिन्द पच्चाड्ग द्वारा ‘वैदिक भास्कर’ पुरस्कार इन छः पुरस्कारो से आप सम्मानित किए गए है।
          श्री मिश्र जी भारत के विभिन्न प्रदेशों में विविध यज्ञों का संपादन कराए है। 1945 में अतिरूद्रयज्ञ 1965 में राजस्थान के सालासर स्थान में ‘शतकुण्डी रामयज्ञ’ 1963 में हरिद्वार में ‘लक्षचण्डी महायज्ञ’ इन्दौर मध्यप्रदेश में 1976 एवं 1986 में ‘लक्षचण्डी महायज्ञ’ एवं उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर में 1987 में अतिरूद्र यज्ञ’ 1982 में दिल्ली में -लक्ष्मीनारायण यज्ञ’ पश्चिम बंगाल में सहस्त्रचण्डी यज्ञ एवं ऋषिकेश में चतुर्वेदपारायण का कार्य भी आप द्वारा किया गया है। इसके अतिरिक्त आप अन्यान्य यज्ञादि कार्य संपन्न कराए है।

 श्रीधरभास्करवर्णेकर ‘‘प्रज्ञाभारती‘‘

           सुरभारती के उपासक श्री वर्णेकर महोदय का जन्म 31.7.1918 ई0 में महाराष्ट्र प्रान्त के अन्तर्गत नागपुर जनपद के अभ्यंकर नगर में हुआ था। संस्कृत विषय में एम00 की परीक्षा 1941 ई0 में पास करके नागपुर विश्वविद्यालय से डी0 लिट् की उपाधि प्राप्त की आपका ज्ञान एवं अध्ययन संस्कृत के अतिरिक्त मराठीहिन्दीअंग्रेजीपाली एवं फें्रच भाषाओं में भी है।
                    आप 1965 ई0 से 1969 तक नागपुर विश्वविद्यालय में संस्कृत विभागाध्यक्ष पद को सुशोभित किये। आपने संस्कृत के अनेक ग्रन्थों का लेखन एवं सम्पादन भी किया हैजिनमें मन्दोमिमाला प्रमुख है। इसके अतिरिक्त बीस ग्रन्थ संस्कृत के हैं। संस्कृत वाड्मय के कोष का दो खण्डों में तथा तृतीय परिभाषा खण्ड का भी आपने सम्पादन किया है। आपने हिन्दी में भी भारतीय विद्या ग्रन्थ संस्कृत वाड्मय कोष का सम्पादन तथाा कविताकहानीउपन्यासनिबन्ध आदि के रूप में दश ग्रन्थ लिखा है। मराठी भाषा में भी चार ग्रन्थों की रचना की है।
                   श्री वर्णेकर महोदय भारत की विभिन्न संस्कृत संस्थाओं में अध्यक्ष पद पर रहे। न्यूयार्क देश की संस्कृत परिषद् में भारत का प्रतिनिधित्व भी आपने किया। आप प्रज्ञाभारतीसुर-भारतीकण्ठाभरण एवं भारत पुत्र की उपाधि से अलंक1त किये गये हैं।
                   श्री वर्णेकर जी कुवलयानन्द योग पुरस्कार राष्ट्रपति पुरस्कारक्षमा देवी राव पुरस्कार एवं महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार से पुरस्कृत किये गये है।

सरस्वती प्रसाद चतुर्वेदी

             प्राचीन और नव्य संस्कृत ज्ञान-धारा के समन्वित व्यक्तित्व के घनी आचार्य सरस्वती प्रसाद चतुर्वेदी ने 1925 में गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेजवाराणसी से व्याकरणार्थ, 1926 में कलकत्ता से काव्यतीर्थ तथा 1929 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम00 परीक्षा उत्तीर्ण की है। आचार्य चतुर्वेदी ने अपने अध्यवसाय से शास्त्रीय परम्परा का गम्भीर ज्ञान प्राप्त किया तथा यावज्जीवमधीते विप्रः‘ के आदर्श को चरित्रार्थ किया है।
                   आचार्य चतुर्वेदी अपने प्रारम्भिक काल में मध्य प्रदेश के शिक्षा विभाग में रहकर कार्य किया। 1959-61 तक केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय के अन्तर्गत केन्द्रीय संस्कृत मण्डल के सचिव पद पर कार्य किया है। 1961 से 1966 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में संस्कृत-विभागाध्यक्ष पद पर रहकर आपने-अपने गम्भीर ज्ञान से छात्रों को आलोकित किया है। 1966 से 1971 तक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से पुरस्कृत सम्मान्य प्राघ्यापक पद पर आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही कार्य किया है।
                   शैक्षिक कार्य के अतिरिक्त आचार्य चतुर्वेदी अनेक विद्या संस्थाओं से सम्बद्व है। अखिल-भारतीय-प्राच्यविद्या सम्मेलन (1953) केन्द्रीय संस्कृत मण्डल (1955-61) केन्द्रीय एवं राज्य सरकार संस्कृत कार्यक्रम परामर्श समितिकेन्द्रीय संस्कृत अकादमी तथा मध्य प्रदेशीय साहित्य अकादमी आदि विभिन्न संस्कृत संस्थाओं से आपका निरन्तर सहयोग रहा है।
                   आचार्य चतुर्वेदी जी के वैदुष्यसाहित्य निष्ठा एवं दीर्घकालीन संस्कृत सेवाओं के उपलक्ष्य में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालयवाराणसी ने आपको वाचस्पति (डि0लिट्0) की उपाधि से इसी वर्ष 78 में सम्मानित किया है। 

सुरेश चन्द्र पाण्डेय

            प्रो0 सुरेश चन्द्र पाण्डेय जी का जन्म 7 अगस्त 1934 ई0 को उत्तर प्रदेश (सम्प्रति उत्तराचंल) के अल्मोड़ा जनपद में हुआ था।
          प्रो0 पाण्डेय जी नैनीताल नगर के राजकीय इण्टर कालेज से 1950 ई0 में हाईस्कूल परीक्षा तथा 1952 में इण्टरमीडिएट की परीक्षा श्रेणी में उत्तीर्ण कर प्रयाग विश्वविद्यालय में  बी.ए. कक्षा में प्रवेश लेकर संस्कृत, दर्शन और अंग्रेजी विषय लेकर बी.ए. परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर संस्कृत विषय से एम.ए. परीक्षा 1953 में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की, तथा प्रथम स्थान भी प्राप्त किया। उसी वर्ष में, विश्विद्यालय के संस्कृत विभाग में आपकी लेक्चरर पद पर नियुथ्ति हुई। तब से सेवा मुक्त हुए। 1965 में आपने ‘ध्वनि सम्प्रदाय और उसकी आलोचनाएं विषय पर डी.फिल उपाधि प्राप्त की।
          प्रो0 पाण्डेय जी ने प्रयाग विश्विद्यालय में संस्कृत विभाग में 39 वर्षों के अध्यापन काल में साहित्य शास्त्र, वेद व्याकरण, काव्य नाटक तथा पालि-प्राकृत भाषाओं का अध्यापन तथा डी.फिल.डी.लिट् उपाधि हेतु शोध छात्रों का शोध निर्देशन किया। जिनमें से अभी तक 34 छात्रों को डी.फिल उपाधि मिल चुकी है।
          प्रो0 पाण्डेय जी द्वारा लिखित पांच ग्रन्थ है:-
          1.ध्वनिसिद्धान्त विरोधी सम्प्रदाय-सन् 1972 में प्रकाशित तथा उ.प्र. शासन द्वारा पुरस्कृत। 2. कवि और काव्यशास्त्र-सन् 1981 में प्रकाशित। 3. अलंकारदप्पण-सम्पादन एवं व्याख्या सन् 2001। 4. नलविलास नाटकम्-सम्पादन सन् 1996 ई.। 5. कादम्बरीसौरभम्-सन् 1953 में प्रकाशित।
          इसी प्रकार से आप द्वारा लिखित एवं संपादित पांच ग्रंथ संस्कृत वाड्मय की श्रीवृद्वि कर रहे हैं। आपके अनेक शोधपत्र विविध संस्कृत पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। 2001 ई. में बैंकाक में सम्पन्न संस्कृत सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमण्डल के सदस्य के रूप में आपने भाग लिया।
          1995 में इलाहाबाद विश्विद्याल से सेवानिवृत्ति के अनन्तर वाराणसी में स्थित ‘पाश्र्वनाथ विद्यापीठ’ में प्राकृत भाषा एवं साहित्य विभाग के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया। 1999 में इलाहाबाद संग्रहालय में फेलो तथा उसी वर्ष ‘भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान’ शिमला में विजिटिंग प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुए। 1999 में भारत सरकार द्वारा केन्द्रीय संस्कृत परिषद् तथा सहायता अपुदान समिति के सदस्य के रूप में आपकी नियुक्ति हुई।

 सीताराम शास्त्री

          संस्कृत के क्षेत्र में लब्ध प्रतिष्ठ आचार्य सीताराम शास्त्री का जन्म 15 अक्टूबर     ई0 में हुआ था। आपके परिवार में संस्कृत गृह भाषा के रुप में बोली जाती थी जिससे बाल्यकाल में ही आपने संस्कृत भाषण की पटुता को प्राप्त किया। आपके पूर्वज भी संस्कृत के विशिष्ट विद्वान् थे जिनका नाम आज भी श्रद्वा से संस्कृत समाज मे लिया जाता है।
          आप बाल्यकाल से ही मेधा सम्पन्न रहे जिससे संस्कृत की सभी परीक्षायेें प्रथम क्षेणी में उत्तीर्ण किये।    ई0 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के व्याकरण विषय में शोध कार्य कारके पी-एच0 डी0 की पदवी से विभूषित हुये। श्री शास्त्री जी में शास्त्रार्थ की अप्रतिम प्रतिभा थी जिससे बड़े-बड़े शास्त्रार्थों में आप पुरस्कृत हुए। आपकी शास्त्रप्रवीणता को देखकर वाराणसी की अखिलभारतीयपण्डितपरिषद् ने आपको पंडितराज की उपाधि से अंलकृत किया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राच्य विभाग में व्याकरण विभागाध्यक्ष पद पर कार्य करके वहां से सेवामुक्त हुये।
          शास्त्री जी के दो दर्जन से अधिक संस्कृत ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके है। जिसमें नागेश भट्ट कृत ‘वृहच्छब्देन्दुशेखर‘ और श्री हरिदीक्षित कृत ‘वृहच्छब्दरत्नम्‘ यह दोनो ग्रन्थ प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त आपके और भी ग्रन्थ प्रकाशित हैं और कुछ प्रकाशनाधीन हैं।

 सत्यव्रत शास्त्री

          श्री शास्त्री जी का जन्म प्रसिद्व संस्कृतवेत्ता के रुप में देश के कोने कोने में प्रसिद्व है। संस्कृत के क्षेत्र में शास्त्री जी ने अपना एक कीर्तिमान स्थापित किया है। संस्कृत की प्राचीन परम्परा के चिन्तक बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न शास्त्री जी का जन्म 20-     ईसवी में हुआ था।
          श्री शास्त्री जी प्रारम्भ के धनी थे जिससे अध्ययन क्षेत्र में सर्वथा सभी परीक्षायें प्रथम क्षेणी में उत्तीर्ण की। हिन्दी और संस्कृत के अतिरिक्त पंजाबी एवं अंग्रेजी भाषा में भी आपका सामानाधिकार हैं।         ई0 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से तथा       ई0 में आप राष्ट्रपति पुरस्कार से पुरस्कृत हुये। बहुविध पुरस्कारों से पुरस्कृत होते हुये संस्कृत सेवा में सत्त संलग्न हैं।
          वर्तमान समय में आप दिल्ली विश्वविद्यालय में संस्कृत विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं। इससे पहले आपने जगन्नाथ संस्कृत महाविद्यालय, पुरी में कुलपति पद को भी अलंकृत किया था। संस्कृत की बड़ी बड़ी परिचर्चा गोष्ठियों में भाग लेने के लिए आप देश विदेश में ससम्मान बुलाये जाते हैं। ‘ऐसे आन इन्डोलोजी‘ तथा रामायण का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन यह दो ग्रन्थ आपकी कृतियों में उत्कृष्ट हैं। इस समय आप थाईलैण्ड के हिन्दू मन्दिर के तथा प्राच्यसंस्कृतअभिलेखों के संरक्षण कर योजना में लगे हैं।
          विद्वद्वरिष्ठ शास्त्री जी के विशिष्ट व्यापक पाण्डित्य एवं संस्कृत में किये गये लेखन एवं संपादनादि कार्यों को देखते हुये उ0 प्र0 संस्कृत अकादमी पच्चीस हजार रुपये के विशिष्ट पुरस्कार से आपको सम्मानित करती हुई प्रकाम संतोष का अनुभव कर रही है। 

सरस्वती प्रसाद चतुर्वेदी

प्राचीन और नव्य संस्कृत ज्ञान-धारा के समन्वित व्यक्तित्व के धनी आचार्य सरस्वती प्रसाद चतुर्वेदी ने 1925 में गवर्नमेण्ट संस्कृत काॅलेजवाराणसी से व्याकरणाचार्य, 1926 में कलकत्ता से काव्यतीर्थ तथा 1929 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम00 परीक्षा उत्तीर्ण की है। आचार्य चतुर्वेदी ने अपने अध्यवसाय से शास्त्रीय परम्परा का गम्भीर ज्ञान प्राप्त किया तथा यावज्जीवघीते विप्रः के आदर्श को चरितार्थ किया है।
            आचार्य चतुर्वेंदी ने अपने प्रारम्भिक काल में मध्य प्रदेश के शिक्षा विभाग में रहकर कार्य किया। 1959-61 तक केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय के अन्तर्गत केन्द्रीय संस्कृत मण्डल के सचिव पद पर कार्य किया है। 1961 से 1966 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में संस्कृत मण्डल के सचिव पद पर रहकर आपने-अपने गम्भीर ज्ञान से छात्रों को आलोकित किया हैै। 1966 से 1971 तक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से पुरस्कृत सम्मान्य प्राध्यापक पद पर आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही कार्य किया।

            आचार्य चतुर्वेदी जी के वैदुष्यसाहित्य निष्ठा एवं दीर्घकालीन संस्कृत सेवाओं के उपलक्ष्य में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालयवाराणसी ने आपको वाचस्पति (डि0लिट्) की उपाधि से इसी वर्ष 78 में सम्मानित प्रसाद चतुर्वेंदी को विशिष्ट पुरस्कार से सम्मानित कर संस्कृत अकादमी अपने को धन्य मानती है।

हरिहरानन्द सरस्वती   (करपात्री जी)

        ‘विश्व-संस्कृत-भारती‘ पुरस्कार पदवाक्य प्रमाण पारावारपारीण-सकलशास्त्रवेत्ताअदि जगद्गुरु श्री शंकराचार्य के अभिनव अवतार स्वरुप अनन्त श्रीविभूषित स्वामी करपात्री जी द्वारा विरचित वेदार्थ-पारिजात‘ नामक ग्रन्थ पर देना निश्चित हुआ है। यह ग्रन्थ इतना विशाल है कि इसका भूमिका भाग ही 2274 पृष्ठों का है। ग्रन्थ का मुख्य भाग है-‘‘वेदों का प्राचीन परम्परा पर आश्रित भाष्य जिसका प्रकाशन प्रतीक्षित है। इस महाग्रन्थ के भूमिका भाग में स्वामी जी ने भारतीय दर्शन के सभी पक्ष प्रस्तुत किए हैं तथा आर्य-समाजभारतीय एवं विदेशी गवेषकों के वेद-सम्बन्धी दृष्टिकोणों को समीक्षा की है। मूल ग्रन्थ संस्कृत भाषा में निबन्ध ग्रन्थ के रुप में लिखा गया है।
        (1) जन्म और स्वाध्याय-इस महान संस्कृत ग्रन्थ का निर्माण अनन्त श्री विभूषित स्वामी हरिहरानन्द सरस्वती जी महाराज ने किया है जिन्हे सम्पूर्ण राष्ट्र एवं विश्व स्वामी करपात्री जी के नाम से जानता है। यद्यपि इस समय वे ब्रहम्लीन हो चुके हैं और उनकी अब कीर्तिकाया ही शेष है। स्वामी करपात्री जी के पांच भौतिक शरीर का प्रादुर्भाव विक्रम सं0 1964 की श्रावण शुक्ल द्वितीयारविवार के दिन प्रतापगढ़ के निकट भटनी नामक ग्राम में पं0 श्रीरामनिधि ओझा नामक शिव भक्त की तृतीय सन्तान के रुप में हुआ था। नवें वर्ष में आपका भटनी के निकट खण्डवा नामक ग्राम में विवाह हुआ। सत्रहवें वर्ष में आपने संन्यास ग्रहण कर लिया। गंगा के तट पर स्थित नरवर के सांगवेद विद्यालय में षड्दर्शनाचार्य स्वामी श्री विश्वेश्वराश्रम जी से योगाभ्यास के साथ संस्कृत शास्त्रांे का गम्भीर अध्ययन किया। 24 वर्ष की अवस्था में स्वामी करपात्री जी ने ज्योतिष पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य ब्रहम्लीन स्वामी श्री ब्रहमानन्द सरस्वती जी से दण्ड संन्यास ग्रहण किया और सम्पूर्ण भारत की अनेक पदयात्राएँ कीं।
        (2) धर्म-ब्रहम-मीमांसाप्रचार- स्वामी करपात्री जी ने भारतीय जीवन एवं व्यक्ति के जिस स्वरुप का अपने शास्त्र चिन्तन द्वारा निर्धारण किया उसकी दृढ़ता एवं विकास के लिए आपने जीवन भर प्रयत्न किया। एक ओर जहाँ वे अपने आप में निर्लिप्त एवं वीतराग थे वहीं दूसरी ओर सनातन वैदिक धर्म की मर्यादा के महान् प्रहरी उसके अनुयायी तथा समाज के महान् आचार्य थे। सम्पूर्ण भारत राष्ट्र के पुनर्गठन का आप का अपना दर्शन था। तदर्थ आपने अनेक ग्रन्थ लिखेयोजनाएँ बनाई और उनका क्रियान्वयन भी किया। सन् 1940 ई0 में भारत की अन्तरात्मा धर्म की रक्षा के लिए धर्मसंघ एवं धर्मसंघ शिक्षा मण्डल नामक संस्थाएँ स्थापित कीं। इनका मार्ग निर्देशन स्वामी जी जीवन भर करते रहे। शास्त्रार्थसर्ववेद शाखा सम्मेलनविराट् यज्ञों के आयोजन तथा धर्म ब्रहम प्रवचन के लिए स्वामी करपात्री‘ जी का नाम पर्याय बन गया था।
         (3) सारस्वतसेवा-साहित्यकार और प्रसिद्व व्याख्यता के रुप में स्वामी के रुप में स्वामी करपात्री जी ने भारतीय वाङ्मय को संस्कृत तथा हिन्दी भाषा में विशाल ग्रन्थ राशि प्रदान की। उनके राजनयिक विचारांे के लिए माक्र्सवाद और रामराज्य‘ नामक ग्रन्थ उतना ही प्रसिद्व है जितना आध्यात्मिक विचारों के लिए अहमर्थ और परमार्थसार। तान्त्रिक अनुष्ठानों से सम्बन्धित उनका श्रीविद्यारत्नाकर‘ तंत्रशास्त्र के लिये पूरे देश का वैसा ही मानक ग्रन्थ है जैसा साहित्य शास्त्र के लिए भक्तिरसार्णव‘ नामक ग्रन्थ। भक्ति-सुधारामायण-मीमांसाभागवत-सुधाविचारपीयूषवेदस्वरुपविमर्शवेदों का अपौरुषेयत्व आदि सर्वोत्कृष्ट ग्रन्र्थों की सुदीर्घं परम्परा में प्रकाशित है वेदार्थ पारिजात‘ नामक विशाल वेद भाष्य ग्रन्थ।
        स्वामी करपात्री जी का व्यक्तित्व बहु आयामीलोकसंग्रहीसमाजसेवीमहान् विद्वान् तथा आध्यात्म योगी का अखिल भारतीय व्यक्तित्व था। उनका साहित्य भी अपनी गरिमा और विपुलता में मूर्धन्य रहा है। निश्चित ही अनन्त श्री विभूषित ब्रहम्लीन स्वामी करपात्री जी महाराज भारत रत्न‘ के प्रथम श्रेणी के लाडले और उसके लिए सर्वात्मना समर्पित सपूत थे।
        पूज्य महाराज श्री जी की धर्म-दर्शन-संस्कृत-संस्कृति के प्रति की गयी सेवा अमूल्य और अवर्णनीय है। धर्म-ब्रहममीमांसा के पर्याय श्री हरिहरानन्द सरस्वती (श्री करपात्री जी) को उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी ने वर्ष 1981 में  एक लाख रुपये के विश्व-संस्कृत-भारती नामक सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित किया। 

गोपालदत्त पाण्डेय

संस्कृत साहित्य के उत्कृष्ट विद्वान् प्रो0 गोपालदत्त पाण्डेय का जन्म 2 अप्रैल, 1915 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद नगर में हुआ था। इनके पिता श्री कुंजबिहारी पाण्डेय था। पिता के निधन के बाद 1926 में अपने मातामह पं0 नित्यानन्दन के पास आप वाराणसी में आकर उन्ही के सानिध्य में पारम्परिक रूप से संस्कृत शिक्षा प्राप्त की। श्री पाण्डेय जी ने राजकीय संस्कृत कालेज वाराणसी से सम्पूर्ण मध्यमा, शास्त्री, व्याकरणाचार्य की उपाधियाँ प्राप्त किया। आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से वी00 आनर्स परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आगरा विश्वविद्यालय से संस्कृत एवं हिन्दी में प्रथम श्रेणी में एम00 की परीक्षा उत्तीर्ण किया।
            श्री पाण्डेय जी एक सुयोग्य शिक्षक एवं प्रशासन रहे। आप उत्तर प्रदेश में अनेक राजकीय महाविद्यालयों में आचार्य एवं विभागाध्यक्ष रहे। सेवा के अवशिष्ट दो वर्षों में उपशिक्षा निदेशक पद पर रह कर कार्य किया। अवकाश प्राप्ति के बाद 1940 से 1973 तक आप कुमायूँ के स्थापनार्थ विशेष कार्याधिकारी पद पर नियुक्त रहे। सुयोग्य अध्यापक एवं प्रशासन के साथ ही श्री पाण्डेय जी एक उत्कृष्ट साहित्यकार भी हैं। आपने अनेक ग्रन्थों की व्याख्या एवं अनुवाद भी किया है। जिनमें व्याकरण महाभाष्य के दो आहिक, हिन्दी व्याख्या संवलित व्याकरण सिद्धान्त कौमुदी, मन्दार मज्जरी, योजनागन्ध नाम का एकांकी नाटक प्रमुख है। आप द्वारा लिखित संस्कृत के बीस शोध-परक लेख पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। श्री पाण्डेयजी इस समय उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान की संस्कृत वाड्मय के वृहद् इतिहास लेखन योजना के अन्तर्गत व्याकरण खण्ड के सम्पादक हैं।
            प्रो0 गोपालदत्त पाण्डेय के विशिष्ट वैदुष्य एवं उत्कृष्ट संस्कृत सेवा को देखते हुए, उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान आपको 1912 वर्ष के पच्चीस हजार रूपये के विशिष्ट पुरस्कार से सम्मानित अत्यन्त गौरव का अनुभव कर रहा है।

कपिलदेव द्विवेदी

संस्कृत साहित्य के मूर्धन्य विद्वान् पदमश्री डा0 कपिलदेव द्विवेदी ने संस्कृत साहित्य एवं संस्कृत भाषा के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान किया है। आपका जन्म उत्तर प्रदेश में ग्राम गहमर, जिला गाजीपुर में 16 दिसम्बर, 1919 में हुआ था।
            प्रो0 द्विवेदी ने सभी परीक्षायें प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की हैं। आपने 1946 में पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर से एम00, 1943 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से डी0फिल0 (संस्कृत) विश्वविद्यालय वाराणसी से व्याकरणाचार्य, गुरूकुल महाविद्यालय से एम00 हिन्दी की उपधि प्राप्त की। संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी से व्याकरणाचार्य, गुरूकुल महाविद्यालय हरिद्वार से विद्याभास्कर की परीक्षा उत्तीर्ण किया। आपने बाल्यकाल में ही यजुर्वेद तथा सामवेद कण्ठस्थ किया था।
            श्री द्विवेदी दश से अधिक विदेशी भाषायें जानते हैं। प्राचीन लिपि शास्त्र में विशेषज्ञता प्राप्त की है। आपको सत्तर पुस्तकें लिखने का श्रेय प्राप्त है। आप संस्कृत भाषा की सरलीकरण पद्धति के प्रवर्तकों में से है। आप द्वारा लिखित कुछ ग्रन्थ उत्तर प्रदेश शासन द्वारा पुरस्कृत है। डा0 द्विवेदी उत्तर प्रदेश की विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं में संस्कृत विषय में प्रोफेसर, एवं प्राचार्य पद के साथ-साथ गुरूकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर, हरिद्वार में दश वर्ष तक कुलपति पद पर रहे। आप आगरा विश्वविद्यालय, वाराणसी तथा अन्य संस्थाओं की कार्यपरिषद् के सदस्य के रूप में संस्कृत का गौरव बढ़ाया है।
            वेदों के विद्वान् के रूप में आपको लन्दन विश्वविद्यालय, फैंकफर्ट विश्वविद्यालय एवं अन्य विदेशी विश्वविद्यालयों से तथा  अन्यान्य संस्थाओं से सम्मानित किया गया है। संस्कृत साहित्य की उत्कृष्ट सेवा के लिये भारत सरकार ने ‘‘पद्मश्री‘‘ से सम्मानित किया है। आपको आचार्य गोवर्धन शास्त्री पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है। इस समय डा0 द्विवेदी ज्ञानपुर भदोही स्थित विश्वभारती अनुसंधान परिषद् के निदेशक पद पर कार्य कर रहे है।
            

पद्मा मिश्रा

सुश्री पद्मा मिश्रा का जन्म 19170 में मुरादाबाद में हुआ था। आप 19330 में पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर से शास्त्री परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संस्कृत विषय में एम00 की परीक्षा तथा 19550 में वहीं से आचार्य की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। आपने डाॅ0 डी0 आर0 भण्डारकर के साथ कलकत्ते में 19410 तक इतिहास में अन्वेषण कार्य किया। इसी समय उनकी सहायता से प्रकाशित ‘‘प्राचीन भारत‘‘ मुख पत्र का सम्पादन भी किया। आप अक्टूबर, 19440 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के वीमेन्स कालेज में कार्यरत हुई।
            डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने के लिये लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल आफ ओरियण्टल कालेज में जुलाई 1965 में कार्यरत होकर डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। लंदन से लौटने के अनन्तर अवकाश प्राप्ति तक संस्कृत विभाग में भी कार्यरत रहीं। वहीं से 19670 में अवकाश प्राप्ति तक नव क्षात्राओं को अपने निर्देशन में पी.एच0डी0 उपाधि प्रदान कराई।
              

प्रभाकरनारायण कवठेकर

प्रो0 प्रभाकर नारायण कवठेकर का जन्म राजगुरू परिवार में जनपद इन्दौर में 19 सितम्बर, 19230 में हुआ। आपने परम्परानुसार संस्कृत का अध्ययन 1934 से इन्दौर के शासकीय संस्कृत महाविद्यालय प्रारम्भ किया। गुरूजनों के पास उन्होंने प्राचीन परिपाटी से व्याकरण, साहित्य, स्मृति, पुराण, वेद, काव्यतीर्थ परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। आपने वाराणसी से मध्यमा, शास्त्री, और आचार्य की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया। 1944 में साहित्याचार्य की उपाधि प्राप्त की। आगराविश्वविद्यालय से पी0 एच0 डी0 की डिग्री प्राप्त की। प्रयाग से साहित्यरत्न भी किया।
            श्री कवठेकर महोदय 19530 से अध्यापन कार्य प्रारम्भ किये। तीन वर्ष तक स्नातकोत्तर कक्षाओं को पढ़ाया। इक्कीस शोधार्थी छात्रों को मार्ग निर्देश किया। इस समय भी शोध निर्देशन कर रहे हैं। 19530 में संस्कृत स्नातकोत्तर विभाग के अध्यक्ष एवं 19700 में शासकीय स्नातकोत्तर कालेज इन्दौर में प्राचार्य तथा 19780 में विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति रहे।
            भारत सरकार के केन्द्रीय संस्कृत मण्डलाध्यक्ष के पद का निर्वाह करते हुए श्री कवठेकर महोदय तिरूपति संस्कृत विश्वविद्यालय तथा दिल्ली संस्कृत विश्वविद्यालयों को सम्मानित स्थान प्राप्त कराने में श्रेय प्राप्त किया। इस समय देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के अतिथि प्रोफेसर पद को सुशोभित कर रहे है।
            श्री कवठेकर जी मराठी एवं हिन्दी काव्य-रचना में प्रख्यात होते हुए संस्कृत काव्य रचना में अग्रणी हैं। आपका नया विदेश यात्रा वर्णन काव्य प्रशंशित है। विदेशों में भी आपके संस्कृत काव्यों का प्रसारण दूरदर्शन के माध्यम से किया जाता है। श्री गालिब के दीवान ग्रन्थ का पद्यानुवाद आपने  किया है। भारत सरकार के प्रतिनिधि मण्डल के सदस्य होने के कारण देश-विदेश में नेतृत्व किया है। जिससे आप बहुत आदरणीय हुए।
            

प्रभात शास्त्री

डा0 प्रभात शास्त्री का जन्म जेष्ठ कृष्ण द्वितीया 1975 विक्रमी संवत् में हुआ था। स्व0 श्री गंगाप्रसाद मिश्रजी आपके पूज्य पिता है।
श्री शास्त्री जी सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी से साहित्याचार्य एवं विद्यावाचरूपति उपाधि प्राप्त कर चुके है। आपने श्री हर्ष सावित्री संस्कृत पाठशाला दारागज प्रयाग में अवैतनिक रूप से अध्यापन कार्य किया।
            संस्कृत साहित्य के संवर्धन में तत्पर श्री शास्त्री जी ने संस्कृत ग्रन्थों के लिखने और उनके सम्पादन में अब भी योगदान कर रहे है। प्रमाण स्वरूप उनके द्वारा सम्पादित ग्यारह ग्रन्थों में गीतगिरीशम्, रामगीतागोविन्दम्, गीताशंकर आदि ग्रन्थ प्रमुख है। इनके अतिरिक्त पच्चीस ग्रन्थ आपके द्वारा सम्पादित किये जा चुके हैं। उनमें अध्यात्मरामायण, चन्द्रकलानटिका, भगवदज्जुकम्, समुद्रमंथन द्वारा सम्पादित किये जा चुके हैं। अकबर कालिदास की कविता संस्कृत की स्त्री कवयित्रिया और उनके काव्य ये दो ग्रन्थ अप्रकाशित हैं। आपने संस्कृत साहित्य के अतिरिक्त हिन्दी साहित्य के अनेक ग्रन्थों का सम्पादन एवं प्रकाशन किया है। श्री शास्त्री जी की कविताएँ संस्कृत की पत्र-पत्रिकाओं मंे प्रकाशित हैं। संगमनी नामक संस्कृत पत्रिका का तेइस वर्षों से प्रकाशन एवं सम्पादन चल रहा है। अक्टूबर 1941 के ‘‘विशाल भारत‘‘ संस्कृत के प्रगतिशील कवि प्रभात शीषर्क से संस्कृत कविताओं पर समीक्षा लेख प्रकाशित है।
            श्री शास्त्री जी को मानव संसाधन विकास मन्त्रालय द्वारा ‘‘शास्त्र चूड़ामणि‘‘ अध्येतावृत्ति प्राप्त है, और अन्य विश्वविद्यालयों से पी0एच0डी0 एवं फिल0 की उपाधियाँ भी प्राप्त किये है। श्री शास्त्री जी ने विभिन्न विशिष्ट संस्थाओं में सम्मानित सदस्य के रूप में संस्कृत की सेवा किये। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के शिष्ट परिषद् एवं कार्यपरिषद् के सम्मानित सदस्य रह चुके है। श्री शास्त्री जी उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी द्वारा अपनी सम्पादित पुस्तकों के लिये तीन बार पुरस्कृत हुए। भारत के महामहित राष्ट्रपति द्वारा संस्कृत पाण्डित्य एवं शास्त्र में विशारदता के लिये 1993 में सम्मानित किये गये। आप अनेक पुरस्कारों से पुरस्कृत हैं।