Facebook पर व्यक्त मेरे विचारों का संकलन

23-05-2014     
     संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए जन जागरुकता अभियान चलाने की आवश्यकता है। यह इसलिए के कक्षा 6 से 8 तक पढ़ने के बाद छात्र/छात्राओं को अगली कक्षाओं में संस्कृत पढ़ने की प्रेरणा देने वाला कोई नहीं होता। समाज में संस्कृत के प्रति अच्छी धारणा पैदा किये जाने पर ही इसके विकास की कल्पना की जा सकती है। अभी संस्कृत शिक्षा की पैरवी करने वाले सामाजिकों का अभाव है। जब तक जनमानस में संस्कृत की स्वीकार्यता पर्याप्त मात्रा में नही बढ़ायी जाती सांस्थानिक स्तर पर सभा, संगोष्ठी करने का कोई खास लाभ नहीं मिलने वाला। पुनि-पुनि चन्दन की कहावत वाले कार्यक्रमों में वही गिने-चुने वक्ता और श्रोता होते है, जो इस क्षेत्र से जुड़े है।
            इस ग्रीष्मावकाश में हर मुहल्ले-गाँव के सामाजिक स्थलों पर स्थानीय अभिभावकों एवं छात्रों की सभा कर संस्कृत शिक्षा के लाभ, उद्येश्य व प्रेरक कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए। समाज के अनेक तबकांे को इस शिक्षा के बारे में जानकारी मुहैया कराने एवं उसके लिए माहौल निर्मित करने के लिए कक्ष और फाइल से बाहर निकलकर धरातल पर कार्य करना होगा।
जन जागरुकता के लिए SMS, ई-मेल, सोशल मीडिया, पत्र लेखन द्वारा अपने परिचितों को संदेश भेजना, ग्राम मोहल्ले की गलियों में सभायें आयोजित करना व्यक्तिगत और सामूहिक रुप से जन सम्पर्क अभियान चलाना, समाचार, दीवार पर संस्कृत को अपनाने हेतु प्रेरक वाक्यों को लिखा जाना आदि कार्य किये जा सकते है।
            किसी एक क्षेत्र का चुनाव कर संस्कृत शिक्षा के लिए जन जागरुकता अभियान चलाने इसके लिए उचित माहौल तैयार करने का सकारात्मक असर आएगा। कुछ वर्षो बाद संस्कृत शिक्षार्थियों एवं संस्कृत के पैरोकारों की संख्या में वृद्धि होगी।
            अभी-अभी सम्पन्न हुए लोक सभा चुनाव में चयनित सांसदो को संस्कृत में शपथ लेने के लिए एक प्रेरक अभियान चलाने की आवश्यकता है। प्रत्येक सांसदीय क्षेत्र के संस्कृतज्ञ अपने संसदीय क्षेत्र से चयनित सांसदों से संस्कृत में शपथ लेने का आग्रह करें तो निश्चय ही संस्कृत की उच्च स्तर पर स्वीकार्यता का सन्देश जन-जन तक जाएगा। यह एक मौका है। SMS, मेल, फोन, पत्र, व्यक्तिगत एवं सामुहिक आग्रह द्वारा इसे सम्भव किया जा सकता 

22 May 2014
     मैं शिक्षा आध्यात्म एवं चिकित्सा को त्रिकोण के रुप में देखता हूँ। सर्वप्रथम महाभारत में डिप्रेशन का जिक्र (अवसाद) प्राप्त होता है। अर्जुन के अवसाद ग्रस्त होने पर उनकी साइकोथैरेपी, काउंसलिंग श्री कृष्ण द्वारा किया गया।तनाव एक मनोरोग है। यह बीमारी आमतौर पर व्यक्ति को जीवन के पूर्वार्ध के वर्षों में खासकर किशोरावस्था व युवावस्था में अपना शिकार बनाती है, यदि मनोरोग खासकर तनाव का समय से उपचार न कराया जाये तो विकलांगता, बेरोजगारी, दुर्व्यवहार, जेल की यातना सहने, आत्महत्या करने या एकाकी जीवन व्यतीत करने जैसी घटनाएँ सामने आती है।
योगवासिष्ठ में मनोदशा का वर्णन निम्न प्रकार से आया है-
क्षणमानन्दितामेति क्षणमेति विषादिताम्।
क्षणं सौम्यत्वमायाति सर्वस्मिन्नटन्मनः।
17 May 2014
स्वातंत्रयोत्तर काल में सृजनात्मक विधाओं में गीतियाँ, गजल, कव्वाली, उपन्यास, लघुकथा, जीवनी, आत्मकथा, यात्रावृत्त, हास्यविनोद, पुस्तक-समीक्षायें तथा अन्य देशी-विदेशी विधाओं को लेखको ने संस्कृत भाषा में पिरोकर उसकी ग्राह्य क्षमता और समद्धि में वृद्धि की है। छन्दों में वार्णिक से मात्रिक तक तथा दोहा, चौपाई, सवैया, कवित्त से लेकर दंडक, अश्वघाटी तक की रचना हो रही है। गजलें और गीतियाँ भी इसी क्रम में है। छन्दोमुक्त नव्यकाव्य की रचना के प्रति संस्कृत-लेखकों का झुकाव और हाइकू जैसी जापानी व प्रयोगात्मक कवितायें भी संस्कृत साहित्य की समृद्ध परम्परा में जुड़ रही है। व्यंग्य-लेख ललित-निबन्ध आदि नवीन विधाओं में लेखन पत्र-पत्रिकाओं के आवश्यक अंग है। मीडिया की विधाओं से प्रेरित संस्कृत-साहित्य में नाटकों के संकलन संस्कृत-नाट्यमंजरी, पूर्व-शाकुन्तलम् आदि का प्रकाशन भी हुआ है। संस्कृत-धारावाहिकों के प्रसारण भी दूरदर्शन पर हुये। चीन देश की गायिका संस्कृत की प्रथम पाॅप गायिका है।
जगद्यात्रा
संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए जन जागरुकता अभियान चलाने की आवश्यकता है। यह इसलिए के कक्षा 6 से 8 तक पढ़ने के बाद छात्र/छात्राओं को अगली कक्षाओं में संस्कृत पढ़ने की प्रेरणा देने वाला कोई नहीं होता। समाज में संस्कृत के प्रति अच्छी धारणा पैदा किये जाने पर ही इसके विकास की कल्पना की जा सकती है। अभी संस्कृत शिक्षा की पैरवी करने वाले सामाजिकों का अभाव है। जब तक जनमानस में संस्कृत की स्वीकार्यता पर्याप्त मात्रा में नही बढ़ायी जाती सांस्थानिक स्तर पर सभा, संगोष्ठी करने का कोई खास लाभ नहीं मिलने वाला। पुनि-पुनि चन्दन की कहावत वाले कार्यक्रमों में वही गिने-चुने वक्ता और श्रोता होते है, जो इस क्षेत्र से जुड़े है।
7 April 2014
चुनाव शुरु संस्कृत गायब। फिर मत कहना संस्कृत जरुरी है। इसे बचाओ।
Shastri Kosalendradas उर्दू 'अंदर' संस्कृत 'पार' अबकी बार मोदी सरकार
योगेन्द्रकुमार गौतमः ये हो नही सकता
आचार्य वाचस्पति संस्कृत-भाषा रही पुकार,
घोषणा-पत्र में मिली न धार,
गौरव- थाती की बातें बेकार,
संस्कृत बिना न होगा उद्धार,
आन्दोलन करने को हो जाओ तैय्यार,
अबकी बारी मोदी सरकार !!!
डॉ. अरविन्द कुमार तिवारी किमिदं यथार्थं? बहुभि: यदुक्तं कृतं तत्? राजनीतौ सर्वं मतावाप्तये घोष्यते। अत: मा चिन्तयन्तु। संस्कृतज्ञा: करिष्यन्ति रक्षां संस्कृतस्य न नेतार:।
Pramodavardhana Kaundinnyayana सँस्कृतं विना का शिक्षा?
अवशिष्टा भवति दासतैव।
दासत्वमुक्तये आवश्यिका राजसत्तैव॥
7 April 2014
स्थान परिचयः-
चित्रकूट के महत्व का गुणगान आदि-कवि वाल्मीकि, पुराणों के रचयिता महर्षि व्यास, महाकवि कालिदास, संस्कृत नाटककार भवभूति, संतकवि तुलसी, मुसलमान कवि रहीम ने मुक्त कण्ठ से किया है। मानवीय सृष्टि-सरणि में अवतारी पुरुष भगवान राम ने जिस स्थान को अपना निवास स्थान चुना हो और जिसकी प्रशंसा के भाव भरे गीत गायें हों उसके प्रभाव तथा माहात्म्य के बारे में कुछ कहना अशेष रह जाता है।
3 April 2014
विगत दिनों जम्मू एवं हिमाचल के अनेक शक्तिपीठ गया था। उनके बारे में कोई भी पौराणिक श्लोक कहीं लिखा नहीं मिला,जिससे ज्ञात हो सके कि यह कोई तीर्थ स्थल है।
28 March 2014
स्मृति ग्रन्थों में कुछ विषयों के प्रतिपादन में भिन्नतायें प्रतीत होती हैं। मनुस्मृति तथा याज्ञवलक्य स्मृति में आचार, व्यवहार, प्रायश्चित्त तीनों ही विषयों का समावेश किया गया है जबकि नारद स्मृति मूलतः व्यवहार प्रधान है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मनुष्य के नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है ऐसे समय में स्मृतियां अत्यधिक सहायक सिद्ध होती है जहां गुरु-शिष्य, पिता-पुत्र, भाई-बहन आदि सम्बन्धों में पूजनत्व की भावना छिपी हुई है।
वर्तमान समय में गुरु-शिष्य के सम्बन्धों में नैकट्य तथा समर्पण की भावना समाप्त हो गई है। गुरु केवल अर्थोपार्जन के लिए पढ़ाता है तथा शिष्य केवल अर्थोपार्जन के लिए शिक्षा ग्रहण करता है अर्थात् अर्थोपार्जन जीवन का उद्देश्य बन गया है। ऐसा नहीं है कि प्राचीन समय में अर्थोपार्जन नहीं किया जाता था। वह जीवन का एक अभिन्न अंग था, किन्तु धर्म को नहीं छोड़ा जा सकता था। स्मृतियों में इन सम्बन्धों में भी ‘‘गुरु देवो महेश्वराय’’ की भावना प्रबल थी जो आज क्षीण हो गई है।
20 March 2014
आचार्य वंशी दास जी.मानवता के प्रतिमान।इनके लिए सारे विशेषण कम हैं। मैं इनसे मिलकर धन्य हो गया। यहाँ वाचाल जीव सहज शान्त हो जाता है। जालन्धर के दाना मंडी,हनुमान मंदिर में इस परम सिद्ध संत की कुटी है। जीवन में एक बार इनका दर्शन अवश्य करें।
7 March 2014
मैंने संस्कृत रचनाओं का दो विभाग किया है। 1. आम जन के लिए की गयी रचनाएं श्लोकबद्ध 2. बुद्विजीवियों के लिए उपयोगी रचनाएं गद्य युक्त। ये परवर्ती काल में भी शास्त्रीय ग्रन्थ और उस पर भाष्य, टीका परम्परा गद्य रुप में ही पातें है यथा ब्रहम्सूत्र, उपनिषद् के भाष्य।
इसके पीछे श्रुति परम्परा महत्वपूर्ण कारक रहा है। लयात्मक (छन्दोबद्ध) रचना को याद रखना सहज होता है। स्मृति संरक्षण हेतु आम जन के योग्य ग्रन्थ के श्लोकबद्ध करने की परम्परा चल पड़ी। जबकि गद्य युक्त ग्रन्थ सन्दर्भ प्रधान होते थे उच्च श्रेणी के श्रेष्ठ विद्वानों के बीच चर्चा किये जाने वाले इन शास्त्रों को कण्ठस्थ करना उतना आवश्यक नहीं था।
7 March 2014
पुस्तकों का संसार मुझे अत्यन्त रोमांचित करते रहा है। बचपन से ही पुस्तकों को पढ़ना और उसे संग्रह करना मेरी दिनचर्या थी। कोई भी पुस्तक मिल जाये उसे जल्द से जल्द पढ़ने को मैं उतावला हो उठता हूँ।
अपने अतीत के अनुभव से मैं यह कह सकता हँू कि उच्च शिक्षा में प्रवेशार्थी छात्रों को पुस्तकालय के उपयोग की शिक्षा दी जानी चाहिए।
26 February 2014
विद्वान् और पुस्तक में श्रेष्ठ कौन?
लगभग 12 वर्ष बीत गये। अब मै सोचता हूँ। पुस्तक बड़ा या विद्वान्। निश्चय हीं पुस्तक की अपेक्षा ज्ञान की जीवित प्रतिमूर्ति बड़ा है। पुस्तकीय ज्ञान को आत्मसात किया विद्वान् उसमें व्यक्त विचारों की व्याख्या कर सकता है। भाष्य कर विस्तृत फलक उपलब्ध कराता है। उससे तर्क पूर्ण ढ़ग से सहमत या असहमत हो सकता है। तद्रुप अनेक ग्रंथो का सार संकलन कर समयानुकूल प्रस्तुत का सकता है।
अब तो मैं यह भी मानने लगा हूँ कि वह विद्वान् उस विद्वान से कहीं ज्यादा श्रेष्ठ है जोे अपने ज्ञान को केवल पुस्तकाकार कर ही नहीं छोड़ा अपितु उसके संवाहकों की एक जीवित वंश परम्परा स्थागित किया हो।
12 February 2014
सामाजिक एवं राष्ट्रीय उत्थान में संस्कृत की भूमिका-
एक बच्चा रोजगार को दृष्टि में रखते हुए रोजगार परक भाषा एवं विद्या पढ़ता है। अभिभावक उसे समाज से दूर किसी ऐसे विद्यालय में उसे पढ़ने भेजते हैं जहाँ वह रोजगार परक भाषा एवं शिक्षा प्राप्त करने में सफल होता है।
बच्चा संस्कृत नहीं पढ़ता। संस्कृत न पढ़ने से उसमें सामाजिक सदाचार, नैतिकता, अपने देश के सांस्कृतिक विरासत से अछूता रह जाता है। माँ-पिता सिर्फ धन देकर पढ़ने में सुविधा प्रदान करने वाले तक रह जाते हैं। बच्चा विदेश जाता है वहीं का निवासी हो जाता है। माँ-पिता द्वारा किया गया खर्च वह लौटाता है। ऐसा बच्चा न तो अपने देश न ही अपने समाज के लिए कुछ कर पाता है। अतः यह आवश्यक है कि मानव के संतुलित विकास के लिए संस्कृत की शिक्षा जरुर दी जाए।
5 February 2014
एक यक्ष प्रश्न संस्कृत का उद्धारक सरकार या प्रेरक समूह
यह तय है कि संस्कृत मूल धारा में न होकर भी समाज का उपकारक शास्त्र बना रहेगा। जिस गति से इस भाषा को चाहने वालें की संख्या घटती जा रही है सम्भव है कुछ दिनों बाद इसके उद्वारक तो दूर प्रशंसको को ढूढ़ना भी मुश्किल होगा।
31 January 2014
हम इस पचड़े में नही पड़ते कि गुप्त प्रेम के इस रोचक ग्रन्थ का कश्मीर या दक्षिण भारत पाठ के अतिरिक्त और कितने पाठ हैं। कितनी टीका है। कवि को मृत्युदण्ड दिया गया या राजकुमार सुन्दर के मृत्युक्षण का उल्लेख इसमें किया गया। वह प्रक्षिप्त है या नहीं। इसके बारे में विशद वर्णन अनेक ग्रन्थों में प्रकाशित है। मुझे तो बस इसमें अधिक रुचि और आनन्द है कि एक राजकुमारी के साथ गुप्त प्रेम कितना सरस होता है। जब कवि अपने गुप्त मिलन के आनन्द को अंतिम बार स्मरण किया तो कैसे? कितना वह मार्मिक स्मरण था कि राजा भी प्रभावित हुए विना नहीं रहा।
30 January 2014
प्रेमाकुल, विरही युवक युवतियों को तो इसे पढ़कर ऐसा लगता है, जैसे उसके ही भिन्न-भिन्न मनोदशाओं का वर्णन यहाँ किया गया है। पुस्तक की विधा, रचनाकर के बारे में तो छपी पुस्तकें उपलब्ध है ही अतः मैं भाव, रस, सौन्दर्यबोध, नायिका भेद आदि का वर्णन यहां नहीं करना चाहता। बस इतना ही कहना चाहूँगा। आप यदि कामशास्त्रीय यथा किसी रूपसी (नव यौवना) का वर्णन, प्रेम सम्बन्ध के प्रायोगिक स्वरूप (सुरत व्यापार) आलिंगन (बांहो में भरने) कामभाव के मुक्त मनोहारी आनन्द का ज्ञान चाहते है तो जरूर पढ़े चौरपंचाशिका ।
6 January 2014
मेरा यह मानना है कि केवल लेखन कर्म से ही संस्कृत की सेवा नहीं होती वरन् संस्कृत शिक्षा अध्ययन को प्रेरित करने वाले, संस्कृत छात्रों व विद्वानों को संरक्षरण देने वाले, संस्कृत के विकास हेतु जनान्दोलन चलाने वाले, संस्कृत के लिए संघटनात्मक ढ़ांचा निर्मित करने वाले, मुद्रक, डिजाइनर, संस्कृत गीत को ध्वनि देने वाले, डाक्युमेंन्ट्री फिल्म निर्मित करने वाले, इलेक्ट्रानिक संसाधनों द्वारा संस्कृत प्रचार करने सहित तमाम वे लोग भी संस्कृत सेवी है, जो निस्वार्थ भाव से संस्कृत को व्रत समझकर इसे पल्लवित एवं पुष्पित कर रहे है।
दसेक बुद्धिजीवी संस्कृतज्ञ काव्य रचना, टीका परम्परा, निरर्थक बौद्धिक व्याख्यान देकर इस भ्रम में रह रहे हैं कि इससे संस्कृत पल्लवित एवं पुष्पित हो रहा है। मैं इससे असहमत हूँ। आखिर ये सब किसके लिए? आपको कौन सुनेगा? कौन पढ़ेगा?
किसके लिए संस्कृत शिक्षा एवं पुरस्कार
शिक्षा व्यक्ति के सर्वांगीन विकास हेतु प्रदान किया जाता है। संस्कृत शिक्षा द्वारा आज के परिवेश के अनुरुप व्यक्ति का सर्वांगीन विकास नहीं करता। पुनश्च आज की शिक्षा उत्पादक शिक्षा हो गयी है। प्राचीन अवधाराणाओं के विपरीत यह रोजगार उपलब्ध कराने का एक जरिया है।
काम करना और उसमे डूब जाना मेरी आदत में शुमार है। महोत्सव का नाम सुनते ही मेरे रगों मे उत्तेजना फेल जाती है। पूरी योजना मेरे सामने तैरने लगती है और मैं जुट पड़ता हूँ उसे पूरे करने में।
अखिल भारतीय व्यास महोत्सव संस्कृत जगत् के लिए एक महत्वपूर्ण पर्व के रुप में प्रतिष्ठित हो इस अभिलाषा के साथ मैं गत वर्ष कार्य में जुटा। लक्ष्य था महोत्सव में सभी संस्कृत सेवियों एवं संस्कृत प्रेमियों को इस अवसर पर आमंत्रण भेजना।
भारतीय साहित्य; खासकर संस्कृत साहित्य का स्वर्णयुग एक हजार वर्षों के बाद अकबर के राजत्व में ही परिलक्षित होता है। मध्यकालीन अखण्ड भारत की महान् विभूति रहीमसंयोग से इसी काल में हो आए हैं।

मेरा नाम जगदानन्द झा है। सम्प्रति में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ में पुस्तकालयाध्यक्ष पद पर कार्यरत हूँ। सौभाग्य से मेरा कार्यक्षेत्र, रूचि का क्षेत्र, मेरी निष्ठा और क्रियाशील अन्तःकरण संस्कृत के लिए ही है। मुझे इस क्षेत्र में कार्य करने एवं संस्कृत विद्याध्ययन को उत्सुक समुदाय को नेतृत्व प्रदान करने में आनन्द का अनुभव होता है। मैं संस्कृत के क्षेत्र में रोजगार के नूतन क्षेत्र को यदि विकसित कर सकॅू तो अपने को धन्य समझूँगा।
समस्त भारतीय धर्म शाखाओं का उद्भव व्यास रचित ब्रहम सूत्र से हुआ है।