विद्वत्परिचयः 3

जगन्नाथ पाठकः

02 फरवरी 1934 को सासाराम, जिला रोहतास, बिहार में डॉ. जगन्नाथ पाठक का जन्म हुआ। इनके पिता विश्वनाथ पाठक और माता का नाम सुरता देवी थी। लेखन-पठन के प्रति वृद्ध अवस्था तक आप बेहद सक्रिय रहे। अब तक अपने जीवन में जितना लिखा-पढ़ा है, वह आज के लोगों के लिए प्रेरणादायी है। विरले लोग ही ऐसा कर पाते हैं। इनके उत्कृष्ट कार्यों को देखते हुए सन् 2005 में तत्कालीन राष्टपति एपीजे अब्दुल कलाम ने दिल्ली में इन्हें सम्मानित किया था। इसके बावजूद इतनी सहजता कि जिसका उदाहरण मिलना बेहद कठिन है।
स्नातक के बाद वाराणसी चले आए, बी.एच.यू. से 1957 में प्रथम श्रेणी में साहित्य शास्त्राचार्य, 1964 में हिन्दी से एम.ए, 1965 में संस्कृत से एम.ए किया। बी.एच.यू.से ही 1968 में संस्कृत विषय में ‘धनपालकृत तिलककमंजरी का आलोचनात्मक अध्ययन’ पर पीएच.डी किया।
हिन्दी, संस्कृत के अलावा आपको प्राकृत, अपभ्रंश, उर्दू, अंग्रेजी, बांग्ला, मैथिली और आरम्भिक पर्सियन भाषाओं का ज्ञान था। आपके विशेष अध्ययन का क्षेत्र अलंकारशास्त्र, संस्कृत साहित्य, हिन्दी साहित्य, उर्दू तथा फारसी साहित्य रहा। स्वामी महेश्वरानंदजी सरस्वती (महादेव शास्त्री), आचार्य, बलदेव उपाध्याय, प्रो. वासुदेवशरण अग्रवाल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और प्रो. सिद्धेश्वर भट्टाचार्य के सानिध्य में अध्ययन करने का अवसर आपको मिला। संस्कृत के आर्या छंद पर विशेष रूप से काम किया है, जिसके चार चरणों में से प्रथम और तीसरे चरण में 12-12 मात्राएं, दूसरे में 18 और चौथे में 15 मात्राएं होती हैं। आपका कार्यक्षेत्र अध्यापन रहा है ।श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रिय संस्कृत विद्यापीठ में 10 वर्षों तक व्याख्याता साहित्य के पद पर, गंगानाथ झा केन्द्रिय संस्कृत विद्यापीठ में 5 वर्षों तक प्रवाचक के पद पर, श्री रणवीर केन्द्रिय संस्कृत विद्यापीठ, जम्मू में लगभग 6 वर्षों तक प्राचार्य के पद पर एवं 2 वर्ष 6 माह तक गंगानाथ झा केन्द्रिय संस्कृत विद्यापीठ में अध्यापन करते हुए गंगानाथ झा केंद्रीय संस्कृत विद्यापीठ से बतौर प्राचार्य सेवानिवृत्त हुए।

संस्कृत भाषा में प्रकाशित आपकी पुस्तकों में ‘कापिशायनी ( आधुनिक भावधारा से प्रभावित मुक्तक संस्कृत पद्यों का संग्रह, 1980 में), मृद्विका (मधुशाला वाद से प्रभावित मुक्तक काव्य, 1983 में), पिपासा (संस्कृत ग़ज़ल गीतियों का संग्रह, 1987 में), विच्छित्तिवातायनी (दो हजार मुक्तक आर्याओं का संग्रह, 1992 में), आर्यासहस्रारामम् (हजार संस्कृत आर्याओं का मुक्तक काव्य, 1995 में) और विकीर्णपत्रलेखम् (लधुनाटिका) हैं। जगन्नाथसुभाषितम् भाग 1 एवं भाग 2 ( आर्या छन्द में लिखित मुक्तक काव्य) हैं।
हिन्दी में प्रकाशित कृतियों में थेरी गीत गाथा (बौद्ध भिक्षुणियाओं के जीवन पर आधारित लधु कथाओं का संग्रह, 1978 में), बाणभट्ट का रचना संसार और पत्रलेखा के पत्र (बाणभट्ट द्वारा कादम्बरी में उपेक्षित एक नारी का पात्र, पत्रलेखा की व्यथा कथा पर आधारित एक पत्रात्मक उपन्यास, 1981 में) हैं।
कुछ संस्कृत ग्रंथों का हिन्दी में अनुवाद तथा व्याख्यान आपने किया है, जिनमें हर्षरचित (बाणभट्ट द्वार लिखी ), ऋग्वेदभाष्यभूमिका (सायण) और कुट्टनीमतम् (दामोदर गुप्त) रसमंजरी (भानुदत्त), और ध्वन्यालोक-लोचन हैं।
प्राकृत ग्रंथों का हिन्दी में अनुवाद में गाथासप्तशती (हाल सातवाहन) है। मिलिन्द प्रश्न का पालि से संस्कृत में रूपान्तरण किया है।
जयशंकर की कृतियों कामायनी और आंसू का संस्कृत पद्य में, मिलिन्दप्रश्न का पाली भाषा से संस्कृत में और उर्दू शायर ग़ालिब के दीवान ‘ग़ालिबकाव्यम्’ का संस्कृत पद्य में आपने अनुवाद किया है। दाराशिकोह की ‘मज्म उलबहरैन’ (समुंद्रसंगमः) का संपादन और हिन्दी अनुवाद, ग़ालिब द्वारा फारसी में रचित बनारस वर्णन चिराग़े दैर (देवालयदीपम्) का संस्कृत पद्यानुवाद भी किया है।
आचार्य गोविन्दचंद्र पाण्डे कृत तीन ग्रंथों का अनुवाद हिन्दी में किया है, उनके नाम हैं- सौंदर्य दर्शन विमर्शः, एक सद् विप्रा बहुधा वदन्ति और भक्ति दर्शन विमर्शभक्ति दर्शन विमर्श अद्यवधि अप्रकाशित है।
संपादित एवं प्रकाशित संस्कृत ग्रंथों में जानराजचम्पू (कृष्णदत्त विरचित, 1979 में), काव्यप्रकाश (तीन टीकाओं सहित, 1976 में), जातकमाला (आर्यशूर, 1977 में), जहांगीरविरुदावली (हरिदेव, 1979 में), शाहजहांविरुदावली (रधुदेव मिश्र, 1979 में), वाणीविलासितम् (कुछ आधुनिक संस्कृत कवियों की रचनाओं का संग्रह 1978 में), पद्यरचना (सुभाषित संग्रह, 1979 में), दुर्मिलाशतकम् (त्रिलोकीनाथ मिश्र, 1980 से), सुभाषितहारावली सुभाषित संग्रह 1984 में और रतिममन्मथ नाटक 1983 में (जगन्नाथ विरचित, 1983 में) श्री गोवर्धनकाव्यम् एवं श्रृंगारसरसी शामिल हैं। आपने उत्तर हिन्दी संस्थान लखनऊ द्वारा प्रकाशित भोजपुरी-कोष और उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान का प्रकाशन आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास के आधुनिक काव्य खंड का संपादन कार्य किया है। गंगानाथ झा केन्द्रिय संस्कृत विद्यापीठ,इलाहाबाद से प्रकाशित शोध पत्रिका का प्रधान सम्पादक तथा इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली दृग्भारती पत्रिका का अध्यक्ष रह चुके हैं।
आपको अब तक राष्ट्रपति सम्मान के साथ कई पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। इनमें कापिशायनी के लिए साहित्य अकादमी, नई दिल्ली से वर्ष 1981 में और उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी का संस्कृत साहित्य पुरस्कार (वर्ष 1980) , इसी संस्था से रू 5 लाख का विश्वभारती पुरस्कार (वर्ष 2016) , मृद्विका पर के.के. बिड़ला फाउंडेशन का वाचस्पति पुरस्कार (वर्ष 1992) और उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान का संस्कृत साहित्य पुरस्कार (वर्ष 1983) पिपासा पर उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान का विशेष पुरस्कार (वर्ष 1987), विच्छिात्तिवातायनी पर राजस्थान संस्कृत अकादमी का अखिल भारतीय काव्य पुरस्कार एवं उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान का संस्कृत साहित्य पुरस्कार (वर्ष 1991) ,आर्यसहस्रारामम् पर उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान का संस्कृत साहित्य पुरस्कार (वर्ष 1995), उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान का विशिष्ट पुरस्कार (वर्ष 1998) , ‘ग़ालिबकाव्यम्’ पर उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान का विशेष पुरस्कार (वर्ष 2001) और ‘ग़ालिबकाव्यम्’ पर साहित्य अकादमी, नई दिल्ली से अनुवाद पुरस्कार (वर्ष 2004) , रांची संस्कृत सम्मेलन द्वारा ‘संस्कृतरत्नम्’ की उपाधि (वर्ष 1995), हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा ‘संस्कृत महामहोपाध्याय’ की उपाधि (वर्ष 2001), पं. हेरम्ब मिश्र स्मृति द्वारा ‘शब्द शिखर’ सम्मान और आशादीप परिवार की तरफ से ‘साहित्य शिखर’सम्मान शामिल है। इनके अलावा देशभर की विभिन्न संस्थानों की पुरस्कार चयन समिति, शोध प्रबंध चयन समिति आदि से समय-समय पर जुड़े रहे हैं। आपकी कृतियों पर अबतक 4 छात्रों ने एम. फिल और पीएच. डी का कार्य किया है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में आपके लगभग 25 शोधलेख प्रकाशित हो चुके हैं। आप आकाशवाणी इलाहाबाद और जम्मू के केन्द्र से भी जुडे रहे,जहाँ से आपका कविता पाठ तथा वार्तायें प्रसारित हुई।


रामयत्न शुक्ल

      तपःस्वाध्यायपूतान्तः करणानाम् आचार्य रामयत्न शुक्लमहोदयानां जन्म उत्तरप्रदेशस्य वाराणसी जनपदे त्रिषुकोणेषु गङगा- परिवेष्टितेषु पावने तटे कलातुलसीनामके ग्रामे परमास्तिक कुलोत्पन-ब्राह्मण स्वर्गीय रामनिरंजनशुक्लस्य धर्मभार्यायां धर्मपरायणायां मातुः मैनादेब्याः कुक्षितः तृतीयपुत्ररुपेण 15.01.1932 दिनांङके अभूत्।
भवतः प्रारम्भिकम् शिक्षणम् ग्रामीणे प्राथमिक विद्यालये सम्पन्नम् अभूत्। वाल्यकालादेव संस्कृत भाषां प्रति अनुरागाधिक्येन अध्ययने कुशाग्रबुद्धित्वेऽपि पितुः संस्कृतध्ययनानुरागवशात् संस्कृताध्यायनाय संस्कृतविद्यालय, बभनीमाण्डा इलाहाबादस्य विद्यालये प्रवेशो अभूत्। तत्र मध्यमा परीक्षाम् यावत् शिक्षाम् गृहीत्वा अग्रिम शिक्षा पूर्णतायै श्री शुक्लः काशीम् प्रत्याजगाम्। काश्यां विविधविद्यिापारंगतेभ्यः विद्वद्भ्यः शिक्षाम् गृहितवान्। काशीस्थ गुरुजनेषु प्रशस्ततमाभ्याम् रामयशशत्रिपाठि रामप्रसादत्रिपाठिभ्याम् व्याकरणशास्त्रम् अधीतवान्। अनन्तश्रीविभूषितस्वामिकरपात्रिमहाभागेभ्यः एवं स्वामि श्री शिवचैतन्यभारतीमहात्मभ्यः वेदान्तशास्त्रम् एवं पण्डित प्रवरेभ्यः हरिरामशुक्लेभ्यः मीमांसाशास्त्रम् पं0 प्रवर रामचन्द्र शास्त्रीभ्यः न्यायः, मीमंासा, सांख्ययोगादि दर्शनशास्त्राणां अध्ययनम् कृतवान्।
      आचार्य शुक्लमहोदयाः अध्ययनान्तरम् संन्यासी संस्कृतमहाविद्यालयवाराणस्यां व्याकरणविभागाध्यक्षरुपेण अध्यापनकार्यम् प्रारभ्य नैक वर्षेसु अध्यापनकार्यम् सम्पाद्य तदनन्तरम् गोयनका संस्कृतमहाविद्यालये वाराणस्यां प्राचार्यपदमलंकृतवन्तः। तदनन्तरं काशीहिन्दूविश्वविद्यालये वाराणस्यां संस्कृतविद्याधर्मविज्ञानसंकाये वेदान्तप्राध्यापकपदे नियुक्तिं प्राप्य अध्यापनम् कृतवान्। 1978 ईसवीतः सम्पूर्णानन्दसंस्कृतविश्वविद्यालये वाराणस्याम् उपाचार्य व्याकरणपदे स्थित्वा पुनः तत्रैव विभागाध्यक्षपदं लब्धवा दशवर्षाणि यावत् कार्यं सम्पाद्य तत् एव कार्यनिवृत्तः जातः। सेवानिवृत्यनन्तरम् लालबहादुरशास्त्रिसंस्कृतविद्यापीठे नवदिल्याम् (विजिटिंग प्रोफेसर) सम्मान्याचार्यपदे कार्यम् कृतवान्। इदानिमपि श्री शुक्लवर्याः स्वावासस्थाने अनेकान् छात्रान् पाठयन्ति निःशुल्कम् शोधनिर्देशनादिकम् च कुर्वन्ति।
श्री शुक्लद्वारा लिखिताः अनेके अनुसंधात्मकलेखाः प्रकाशिताः सन्ति। भवताम् शोधप्रबन्धः ‘‘व्याकरणदर्शने सृष्टिप्रक्रिया विमर्शः’’ ग्रन्थरुपेण प्रकाशितः वर्तते।
           आचार्य शुक्ल महोदयाः राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृताः सन्ति। श्रीमन्तः केशवपुरस्कारेण, वाचस्पति, भावभावेश्वर, अभिनवपाणिनि, महामहोपाध्याय पुरस्कारेण उत्तरप्रदेशसंस्कृतसंस्थानतः विशिष्टपुरस्कारेण, करपात्ररत्नपुरस्कारेण, सरस्वतीपुत्रपुरस्कारेण पुरस्कृताः विद्यन्ते। सम्प्रति आचार्यवर्याः वाराणसीस्थस्य काशी विद्वत्परिषदः अध्यक्षः एवं नागकूपशास्त्रार्थसमितेः वाराणस्याः संस्थापकत्वेन संस्कृतभाषायाः संरक्षणम् संबर्द्धनम् च कुर्वन्ति।

                                                    हिन्दी
तपस्या और अध्ययन से पवित्र अंतः करण वाले आचार्य रामयत्न शुक्ल का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में तीनों तरफ से गंगा से परिवेष्टित पवित्र तट पर स्थित कला तुलसीनामक ग्राम में परम आस्तिक ब्राह्मण कुल में उत्पन्न स्व0 रामनिरंजन शुक्ल की धर्मपरायण धर्मपत्नी माता मैना देवी से 15.01.19320 में तृतीय पुत्र के रुप में हुआ। पिता जी का संस्कृत के प्रति अनुराग के कारण श्री शुक्ल जी की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम के प्राथमिक विद्यालय में हुई थी।  बाल्यकाल से ही संस्कृत भाषा के प्रति अधिक अनुराग होने के कारण, पढ़ने में तीव्र बुद्धि होने के कारण, संस्कृत पढ़ने के लिये संस्कृत विद्यालय बभनी, माण्डा, इलाहाबाद में प्रवेश लिया। वहाँ मध्यमा परीक्षा तक शिक्षा ग्रहण कर अग्रिम शिक्षा के लिये काशी आ गये। काशी में विविध विद्या में पारंगत विद्वानों से शिक्षा ग्रहण की। काशी के गुरुजनों में प्रशस्त रामयश त्रिपाठी एवं रामप्रसाद त्रिपाठी के सानिध्य में व्याकरण शास्त्र का अध्ययन किया। अनन्त श्री विभूषित स्वामी करपात्री जी से एवं स्वामी श्री चैतन्य भारती से वेदान्त शास्त्र एवं पण्डित प्रवर हरिराम शुक्ल से मीमांसा शास्त्र तथा पण्डित प्रवर रामचन्द्र शास्त्री से न्याय, मीमांसा, सांख्य, योग आदि दर्शन शास्त्रों की शिक्षा प्राप्त की।
आचार्य शुक्ल अध्ययन के बाद संन्यासी संस्कृत महाविद्यालय वाराणसी में व्याकरण विभागाध्यक्ष के पद पर कार्य प्रारम्भ करके अनेक वर्षों तक अध्यापन करने के बाद गोयनका संस्कृत महाविद्यालय वाराणसी में प्राचार्य पद पर नियुक्त हुए, तत्पश्चात् काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में वेदान्त प्राध्यापक पद पर नियुक्त होकर अध्यापन कार्य किया। 19780 से सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में उपाचार्य व्याकरण पद पर नियुक्त होकर वहीं पर विभागाध्यक्ष पद को प्राप्त कर दश वर्षों तक सेवा करके वहीं से सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद लालबहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली में विजिंटिंग प्रोफेसर पद पर कार्य किया। श्री शुक्ल इस समय भी अपने निवास स्थान पर अनेक छात्रों को निःशुल्क अध्यापन एवं शोध मे निर्देशन का कार्य कर रहें हैं।
श्री शुक्ल द्वारा लिखित अनेक अनुसंधानपरक लेख प्रकाशित हैं। आपका ‘‘व्याकरण दर्शने सृष्टि प्रक्रिया विमर्शः‘‘ नामक शोध प्रबन्ध प्रकाशित है।

प्रभुनाथ  द्विवेदी

     उत्तरप्रदेशस्य मीरजापुरमण्डलस्यैकस्मिन् ग्रामे कृषिकर्मपरायणे सदाचारनिष्ठविप्रवंशे 1947 तमस्य ख्रिष्टाब्दस्यागस्तमासस्य प॰चविंशतितमे दिनांके लब्धजन्मनो आचार्य प्रभुनाथद्विवेदिनोमातुर्नाम स्व. श्रीमती रामकुमारीद्विवेदी पितुश्चाभिख्या
स्व. पण्डितनन्दकिशोरद्विवेदी अस्ति।
      एते प्राथमिकशिक्षां ग्रामविद्यालये, माध्यमिशिक्षां मीरजापुरनगरे उच्चशिक्षा॰च वाराणसीनगरे लब्धवन्तः। आशैशवात्साहित्यिकरुचिसम्पन्नोऽयं प्रतिभाशाली छात्रः परीक्षासु लब्धोच्चश्रेणीकः छात्रवृत्तिमर्जितवान्। वाराणसीस्थकाशीविद्यापीठमिति विश्वविद्यालयतः संस्कृतविषयमधिकृत्य सर्वोच्चैरङ्कैः प्रथमश्रेण्यां एम.ए., इति परीक्षामुत्तीर्य विश्वविद्यालय-अनुदान-आयोगतः कनिष्ठ शोधवृत्तिं समवाप्य संस्कृतकविभागाध्यक्षस्य विद्वद्वरेण्यस्य प्रो. अमरनाथपाण्डेयमहानुभावस्य सन्निर्देशने शोधकार्यं विधाय पी-एच.डी.इत्युपाधिमधिगत्वान्।
ततो बलरामपुरस्थ म.ला. कुँ स्नातकोत्तरमहाविद्यालये प्राध्यापकपदे नियुक्तोऽध्यापनं समारभत। अथ च, वाराणस्यां काशीविद्यापीठस्य संस्कृतविभागे प्राध्यापकरूपेणाध्यापनमारभ्य क्रमशस्तत्रैवोपाचार्यपदे च प्रोन्नतिसमुपलभ्यान्ततः 2010 तमस्य ख्रिष्टाब्दस्य जूनमासस्य 30 तमे दिनाङ्के त्रयस्त्रिंशद्वर्षीयाऽध्यापनसेवातो निवृत्तः। सेवानिवृत्तेरनन्तरमपि आचार्य द्विवेदी देशस्य नैकेषु विश्वविद्यालयेषु विजटिंग फेलोअपि च विजिटिंग प्रोफेसरइति पदमलङ्कृतवान्।
आचार्य प्रभुनाथद्विवेदिप्रणीतानां समीक्षात्मकानां स्वोपज्ञाना॰च ग्रन्थानां संख्या चत्वारिंशामिता (40) वर्तते। सम्प्रति आचार्यः आम्रचार्य जयरथकृतस्य-अलङ्कारोदारहरणम्इति ग्रन्थस्य द्वे पाण्डुलिपी अन्विष्य तयोर्विमर्शपूर्वकं संस्कृतटीकानां सम्पादने निरतोऽस्ति।
        तत्र लक्षरुप्यकालकौ श्रीरामानन्दाचार्यपुरस्कार-साहित्य-अकादमीपुरस्कारौ, बाणभट्टपुरस्कारादयो नैके पुरस्काराः ससम्मानं विभिन्नसंस्थाभिरस्मै प्रदत्तः। 2010 इसवीये वर्षे आचार्य द्विवेदी महोदयः उत्तरप्रदेश संस्कृत संस्थानतः विशिष्टपुरस्कारेण सम्मानितः वर्तते।
                                                              हिन्दी                                                    
       आचार्य प्रभुनाथ द्विवेदी का उत्तर प्रदेश के मीरजापुर जनपदान्तर्गत एक गाँव में कृषक और सदाचारनिष्ठ ब्राह्मण परिवार में 25 अगस्त, 1947 ई. जन्म हुआ। डॉ. प्रभुनाथ द्विवेदी की माता जी का नाम स्व. रामकुमारी द्विवेदी और पिताजी का नाम पण्डित नन्दकिशोर द्विवेदी है। इन्होंने प्राथमिक शिक्षा गाँव के विद्यालय में, माध्यमिक शिक्षा मीरजापुर नगर में तथा उच्चशिक्षा वाराणसी नगर में प्राप्त की। बाल्यकाल से ही साहित्यिक अभिरुचिसम्पन्न प्रतिभाशाली श्री द्विवेदी ने विद्यापीठ (विश्वविद्यालय) से संस्कृत विषय में सर्वोच्च अंकांे के साथ प्रथमश्रेणी में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से जूनियर रिसर्च फेलोशिप प्राप्त करके विभागाध्यक्ष विद्वदुवरेण्य प्रो. अमरनाथ पाण्डेय जी के सुचारु निर्देशन में शोधकार्य सम्पन्न करके पी-एच.डी. उपाधि प्राप्त की। तत्पश्चात् बलरामपुर स्थित म.ला. कुं. स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्राध्यापक नियुक्त होकर अध्यापन आरम्भ किया। तदन्तर काशी विद्यापीठ, वाराणसी के संस्कृत विभाग में प्राध्यापक के रुप में अध्यापन आरम्भ करके क्रमशः उपाचार्य और आचार्य पद पर प्रोन्नत होते हुए 30 जून, 2010 ई. को 33 वर्ष की अध्यापन से सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के पश्चात् भी प्रो. द्विवेदी ने देश के कई विश्वविद्यालयों में बिजिटिंग फेलोऔर विजिटिंग प्रोफेसरके पदों को सुशोभित किया।
प्रो. प्रभुनाथ द्विवेदी द्वारा लिखित समीक्षात्मक और मौलिक ग्रन्थों की संख्या चालीस है। आपने आचार्य जयरथ कृत अलंकारोदाहरणम्की दो पाण्डुलिपियाँ की खोज करके उन दोनों का तुलनात्मक पाठ विमर्श करके सम्पादन किया है तथा मेघदूतनामक गीतिकाव्य की छब्बीस (26) टीकाओं का सम्पादन करने में लगे हैं।
आपको श्रीरामानन्दचार्य पुरस्कार और साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा बाणभट्ट पुरस्कारादि अनेक पुरस्कार विभिन्न संस्थाओं द्वारा प्रदान किये गये हैं। वर्ष 2010 में इन्हें इक्यावन हजार रुपये का विशिष्ट पुरस्कार उ.प्र. संस्कृत संस्थान द्वारा प्रदान किया गया है।

शशि तिवारी

       वैदिकवाड्ंमयस्य संस्कृतसाहित्यस्य च सुप्रष्ठितायाः चत्वारिशदधिकवर्षेभ्यः संस्कृतस्य वेदस्य च अध्यापनेऽनुसन्धाने च निष्ठापूर्वकं समर्पितायाः परमविदुष्याः, डाॅ0 (श्रीमती) शशितिवारी महोदयायाः जन्म 19.10.1945 तमे इसवीये वर्षेऽभवत्।
      श्रीमत्याः शशितिवारी महोदयायाः उच्चशिक्षाया अध्ययनं लखनऊविश्वविद्यालये जातम्। तत्र इयं महानुभावा 1963 तमेवर्षे, बी.ए. एवं 1965 तमे वर्षे संस्कृतविषये एम.ए. परीक्षां सर्वोच्चाडं्कान् प्राप्य उत्तीर्णीकृता। तत्र सप्तस्वर्णपदकैः समलंकृता चाऽभवत्। 1968 इसवीये वर्षे वेदविषये, पी.एच.डी. इति शोधोपाधिं लब्धवती।
डॉ.  तिवारी महोदया 1968 तमे वर्षे आगराविश्वविद्यालयस्य वैकुण्ठीदेवी महाविद्यालये अध्यापनकार्यं प्रारब्धवती। एतदनन्तरं 1972 तः 2010 यावत् दिल्लीविश्वविद्यालस्य मैत्रेयीमहाविद्यालये प्राध्यापिकोपाचार्यपदेषु कार्यं कुर्वन्ती दिल्लीविश्वविद्यालयस्य संस्कृतविभागे आचार्यरूपेण स्नानकोत्तरकक्षासु वैदिकसाहित्यं पाठितवती। 2002 तमे वर्षे अमेरिकादेशस्य औरलैण्डनगरेविजिटिंगप्रोफेसरपदे-अध्यापनं कृतवती। श्रीमत्याः शशितिवारी महोदयायाः निर्देशने प॰चदश संस्कृतशोधछात्राः एम.फिल., पी.एच.डी.  इत्युपाधयः अधिगताः।
एतस्या महानुभावायाः भारतदेशादतिरिक्तं, अमेरिका, इटली, नैपाल, कनाडादादिदेशेषु विभिन्नसंस्कृतसम्मेलनेषु सहभागिता अस्ति।
       श्रीमती तिवारी महोदया विभिन्नवर्षेसु विभिन्नपुरस्कारै सम्मानिता वर्तते। यथा राजस्थान अकादमीतः भारतीयमिश्रापुरस्कारः, एवं संस्कृतशिक्षकपुरस्कारः, दिल्लीसंस्कृतसाहित्यपुरस्कारः, उत्तरप्रदेशसंस्कृतसंस्थानेन अखिलभारतीयसंस्कृतसाहित्यमौलिकरचना पुरस्कारः दिल्लीसंस्कृताकदमीतः संस्कृतसाहित्यसेवासम्मानः ततएव तथा विश्ववेदसंघसेवासम्मानः अमेरिकातः पुनश्च विशिष्टपुरस्कारः उत्तरप्रदेशसंस्कृत संस्थानतः सम्प्राप्य संस्कृतस्य गौरवं वर्धितवत्यः।
                                                    हिन्दी
       वैदिक वाङ्मय और संस्कृत साहित्य की सुप्रतिष्ठित, 40वर्षों से अधिक संस्कृत और वेद के अध्यापन और अनुसंधान में निष्ठा पूर्वक समर्पित परम विदुषी डाॅ0 शशि तिवारी का जन्म 19.10.19450 में हुआ।
श्रीमती शशि तिवारी ने लखनऊ विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की है। वहीं से इन्होनें 19630 में बी00 एवं 19650 में संस्कृत विषय में एम00 परीक्षा सर्वोच्च अंक के साथ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और सात स्वर्ण पदकों से अलंकृत की गई। 1968 वर्ष में वेद विषय में आपने पी0 एच0 डी0 उपाधि प्राप्त की।
डा0 तिवारी ने 19680 में आगरा विश्वविद्यालय के वैकुण्ठी देवी महाविद्यालय से अध्यापन कार्य आरम्भ किया। इसके बाद 19720 से0 20100 तक दिल्ली विश्वविद्यालय के मैत्रेयी महाविद्यालय में प्राध्यापिका एवं उपाचार्य पदों पर अध्यापन कार्य करती हुई दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में अतिथि अध्यापक के रुप में स्नातकोत्तर कक्षाओं में वैदिक साहित्य का अध्यापन किया। 20020 में अमेरिका देश के औरलैण्ड नगर में विजिंटिंग प्रोफेसर के पद पर अध्यापन कार्य किया। श्रीमती तिवारी के निर्देशन में 15 संस्कृत के शोध छात्र एम0 फिल0 एवं पी0 एच0 डी0 की उपाधि प्राप्त किये हैं।
       डा0 शशि तिवारी की भारत के अतिरिक्त अमेरिका इटली, नैपाल, कनाडा आदि देशों में होने वाले संस्कृत सम्मेलनों में सहभागिता रही है।
        श्रीमती तिवारी विभिन्न वर्षों में विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित हुई हैं जैसै- राजस्थान संस्कृत अकादमी द्वारा भारतीयमिश्र पुरस्कार, दिल्ली संस्कृत अकादमी से संस्कृत शिक्षक पुरस्कार और अखिल भारतीय संस्कृत साहित्य मौलिक रचना पुरस्कार तथा संस्कृत साहित्य सेवा सम्मान और अमेरिका से विश्व वेद संघ सेवा सम्मान तथा उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान से संस्कृत साहित्य पुरस्कार, विशिष्ट पुरस्कार से सम्मानित होकर संस्कृत के गौरव को बढ़ाया है।

जयशंकरलाल त्रिपाठी

        आचार्य जयशंकरलालत्रिपाठिमहोदयस्य जन्म उत्तरप्रदेशस्य कान्यकुब्ज’ (कन्नौज) नगरे 1941 तमे वर्षे अभवत्। त्रिपाठिवर्यस्य मातुः नाम सियादुलारीदेवी पितुर्नाम बनारसीलालत्रिपाठी च। सदैव प्रथमश्रेणीं प्राप्य माध्यमिकशिक्षां सम्पूर्योच्चाध्ययनार्थं 1959 तमे वर्षे काश्यामागमनम संजातम्। तत्र वाराणसेय-संस्कृत-विश्वविद्यालयतः 1961 तमे वर्षे नव्यव्याकरणे शास्त्रीप्रथम-श्रेण्यामुत्तीर्णा। 1964 तमे वर्षे आचार्यपरीक्षायां विश्वविद्यालये प्रथमश्रेण्यां प्रथमस्थान॰च तेन प्राप्तवन्तः। तेनैकं रजतपदकं त्रीणि च स्वर्णपदकानि प्राप्तानि। 1966 तमे वर्षे आगराविश्वविद्यालयात् प्रथमश्रेण्याम् एम.ए. कक्षामुतीर्य। 1969 तमेवर्षे काशीहिन्दूविश्वविद्यालयात् संस्कृत-विषये पी-एच.डी. एव॰च। राँची-विश्वविद्यालयात् 1979 तमे वर्षे डी.लिट् उपाधिं प्राप्तयन्तः श्रीमन्तः ते विभिन्नाः छात्रवृत्तयश्च प्राप्ताः।
     अगस्तमासे 1970 तमे वर्षे संस्कृतविभागे, कलासंकाये, काशीहिन्दूविश्वविद्यालये शिक्षणं प्रारब्धम्। 1974 तमे, वर्षे शिक्षकपदे 1973 तमे वर्षे प्रवक्तृ-पदे चयनम 1985 तमे वर्षे उपाचार्यपदे प्रोन्नतिः 1992 तमे वर्षे आचार्य (प्रोफेसर) पदेचयनम् 2003 तमे वर्षे सेवातो निवृत्तोऽभूत। तत्रैव संस्कृतविद्या-धर्मविज्ञान-संकाये व्याकरणविभागे’ 2005 वर्षे अगस्तमासादारम्य अधुना 2015 वर्षपर्यन्तम् अतिथि-प्र्राध्यापकरूपेण आचार्यकक्षायामध्यापयन्ति आचार्यप्रवराः।
48 छात्रैं एतेषां निर्देशने पी-एच.डी. उपाधिर्लब्धः। परमलघुमंजूषा-प्रौढमनोरमा-काशिका-कादम्बरी-प्रभृतयः 24 ग्रन्थाः सव्वाख्याः प्रकाशिताः। श्रमतां अन्येऽपि ग्रन्थाः प्रकाशनं प्रतीक्षमाणाः सन्ति।
समये-समये विभिन्नाभ्यः शिक्षणसंस्थाभ्यः, साहित्यिक-सामाजिक-संस्थाभ्यश्च सम्मानिताः त्रिपाठिवर्यैः। उत्तरप्रदेश-संस्कृत-संस्थानात्’ ‘पाणिनि-पुरस्कारसहिताः सप्त पुरस्काराः प्राप्ताः। त्रिपाठिनः संस्कृतसाहित्यसेवां समवलोक्य महामहिम-राष्ट्रपति-श्रीप्रणवमुखर्जीमहोदयः राष्ट्रपति-सम्मानेन’ 2013 तमे वर्षे त्रिपाठिवर्याः सम्मानिताः।
                                                          हिन्दी
            उत्तर प्रदेश के प्राचीन नगर कन्नौजमें 19410 में आपका जन्म हुआ। माता का नाम स्व0 सियादुलारी देवी तथा पिता का नाम स्व0 पं0 बनारसी लाल त्रिपाठी था। सभी कक्षाओं में प्रथम श्रेणी प्राप्त करते हुये माध्यमिक शिक्षा गृह नगर में सम्पन्न हुई। उच्च शिक्षाहेतु 1959 में काशी आगमन हुआ और तत्कालीन वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय से 1961 में नव्यव्याकरण में शास्त्रीपरीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। 1964 में आचार्यपरीक्षा में विश्वविद्यालय में प्रथम स्थानप्राप्त प्राप्त हुआ जिससे एक रजतपदक और तीन स्वर्णपदक प्राप्त हुये। आगरा विश्वविद्यालय से 1966 में प्रथम श्रेणी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। काशी-हिन्दूविश्वविद्यालय से 1969 में संस्कृत में पी0एच0डी0 प्राप्त की। राँची विश्वविद्यालय से 1979 में संस्कृत में डी0लिट्0 किया।
     अगस्त 1970 से संस्कृत-विभाग कला-संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में शिक्षण प्रारम्भ किया। 2001 से 2003 तक संस्कृत-विभागाध्यक्ष पद का कार्य सम्पादन किया। 2003 में सेवानिवृत्त होकर वहीं पर संस्कृतविद्या-धर्मविज्ञान संकाय के व्याकरण-विभाग में 2005 अगस्त से अभी तक अतिथि प्राध्यापक के रूप में आचार्य कक्षा में अध्यापन कर रहे हैं।
आपके निर्देशन में 48 छात्रों ने पी0एच0डी0 उपाधि प्राप्त की। आपके द्वारा लिखित तथा सम्पादित 24 ग्रन्थ प्रकाशित है। विभिन्न शिक्षण-संस्थानों, साहित्यिक, सामाजिक संस्थानों द्वारा विविध सम्मान प्राप्त है आपको पूर्व में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थानद्वारा-पाणिनी-पुरस्कारसहित सात सम्मान प्राप्त हुए हैं।
संस्कृत भाषा तथा साहित्य में आपके योगदान को देखकर महामहिम राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जीमहोदय द्वारा राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

आनन्द कुमार श्रीवास्तव

   आधुनिकसंस्कृतकाव्यशास्त्रे अप्रतिहतगतयः आनन्दकुमारश्रीवास्तवमहोदयाः प्रयागमहानगरे 09.11.1952 तमे ख्रीष्टाब्दे जन्मालभन्त। एतेषां पितृचरणाः आचार्य उमाशंकर जानकार महाभागाः विद्वत्परम्परायां यशस्विनः आसन्।
इमे महोदया प्रारम्भिकशिक्षाम् अथ च उच्चशिक्षां सर्वां प्रयाग एव प्राप्तवन्तः-1973 तमे वर्षे इलाहाबादविश्वविद्यालयतः परास्नातकपरीक्षां प्रथमश्रेण्यामुत्तीर्णवन्तः अनन्तरं त्रिवेणीकवीनाम् अभिराजराजेन्द्रमिश्रवर्याणां निर्देशने पण्डितराजोत्तर ‘‘आचार्यों का संस्कृतकाव्यशास्त्र को मौलिकयोगदान’’ विषयमधिकृत्य डी.फिल् उपाधिं अर्जितवन्तः। एतैः महोदयैः सम्पूर्णानन्दसंस्कृतविश्वविद्यालयवाराणसीतः प्राच्याध्ययनमपि कृतम्। अस्यामेव परम्परायां महोदयैः प्राच्यसंकृतव्याकरणमपि अधीतम्।
    एते महाभागाः 1974 तमे वर्षे प्रयागे इलाहाबादविश्वविद्यालयस्य संघटकमहाविद्यालये चैधरी महादेवप्रसादमहाविद्यालये प्रवक्तृपदे नियोजिताः। अनन्तरं उपाचार्य विभागाध्यक्षपदम् च अलंकृतवन्तः। सम्प्रति तत्रैव प्राचार्यपदं भजन्ते।
एभिर्महाभागैः चतुर्दश ग्रन्थाः लिखिताः सम्पादिताश्च येषु आधुनिकसंस्कृत काव्यशास्त्र 'Later' Sanskrit Rhetoricians'‘अधोरपंचांगम्, ‘कालिदास साहित्य एवं कामकला’ (खण्डद्वयम्), ’त्रिगुणश्रीः, ‘कविर्जयति वाल्मीकिः, ‘संस्कृत साहित्य में विज्ञानं व्याकरणकुसुमांजलिप्रभृतयः प्रसिद्धाः एव। महोदयानां त्रिंशत् शोधपत्राणिप्रकाशितानि प्रकाश्यमानानि वा सन्ति। सम्प्रति श्रीभट्सत्ताइत्याख्यस्य साप्ताहिकसंस्कृतसमाचारपत्रस्य, वाड्ंमयम्इत्याख्यायाः प्रतिष्ठितायाः षाण्मासिक्याः शोध-पत्रिकायाः च सम्पादने संलग्ना पत्रकारिता़़क्षेत्रे कार्य कुर्वाणाः संस्कृतसेवारताः सन्तीमे महोदयाः। एते प्रयाग-वाराणसी-लखनऊ-दिल्ली जयपुरप्रभृतिषु नगरेषु संस्कृतसम्भाषणकक्षां प्राच्यसंस्कृतव्याकरणकक्षां च संचालितवन्तः।
     एते महोदयाः प्राच्यविद्यासम्मेलनेषु अनुभागाध्यक्षस्य, विविधाराष्ट्रियसंगोष्ठीषु सत्राध्यक्षस्य दायित्वं निव्र्यूढवन्तः। प्रायशः सप्ततिसंस्कृतसम्मेलननेषु संगोष्ठीषु कार्यशालासु च भागं गृहीतवन्तः। महोदयाः विश्वविद्यालय-अनुदान-आयोगेन स्वीकृतायां लघुशोधपरियोजनायां बृहच्छोधपरियोजनायां चापि कार्यं कृतवन्तः। एवमेव महोदयाः विदेशेषु आयोजितेषु संस्कृतसम्मेलनेषु यथा आस्ट्रेलिया-कम्बोडिया-नैपालदेशेषु अपि शोधपत्रं प्रस्तुतवन्तः। केन्यादेशे महोदयाः नैरोबी-आर्यसमाजे वर्षद्वयं यावत् एकां शोधयोजनाम् अभिलक्ष्य निदेशकपदमलंकृतवन्तः। एतदतिरिक्तं महोदयाः सिंगापुर- हांगकांग-थाईलैण्ड-दुबई-अमेरिका-कनाडा- पाकिस्तान-मारीशसप्रभृतीनां देशानामपि यात्रां कृतवन्तः।
महोदयाः अनेकैः सामाजिक-सांस्कृतिक-शैक्षाधिकसंस्थाभिः अध्यक्ष-महामन्त्रिरूपेण सम्बद्धाः सन्ति तथा च हिन्दीसाहित्यसम्मेलनेन संस्कृतमहामहोपाध्याय इत्युपाधिना सभाजिताः वर्तन्ते। महोदयाः उत्तप्रदेशसंस्कृतसंस्थानेनापि अघोरपंचांगं ग्रन्थम् अभिलक्ष्य सम्मानिताः।
                                                             हिन्दी
   अर्वाचीन संस्कृत काव्यशास्त्र के विशेषज्ञ, डाॅ0 आनन्द कुमार श्रीवास्तव का जन्म 9 नवम्बर, 1952 को प्रयाग नगर के संस्कृतविद्वत्कुल में हुआ था। आपके पिता स्व0 आचार्य उमाशंकर जानकार शास्त्री संस्कृत के परम विद्वान् थे।
डॉ.  श्रीवास्तव की प्रारम्भिक एवं उच्च शिक्षा प्रयाग में ही सम्पन्न हुई। आपने सन् 1973 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम00 की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और तदनन्तर त्रिवेणी कवि अभिराज राजेन्द्र मिश्र के निर्देशन में पण्डित राजोत्तर आचार्यों का संस्कृत काव्यशास्त्र को मौलिक योगदानविषय पर डी0फिल्0 उपाधि अर्जित की। इसी बीच डाॅ0 श्रीवास्तव ने सम्मपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी से कतिपय परीक्षायें उत्तीर्ण की साथ ही आपने प्राच्य संस्कृत व्याकरण का भी यत्किंचित् अध्ययन किया।
डॉ.  श्रीवास्तव सन् 1974 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सम्बद्ध सी0एम0पी0 डिग्री कालेज में प्रवक्ता नियुक्त हुए। कालान्तर में एसोशिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष पद को अलंकृत करते हुए आप सम्प्रति उसी महाविद्यालय में प्राचार्य के दायित्व का सफलतापूर्वक निर्वाह कर रहे हैं।
आपने चैदह ग्रन्थों का प्रणयन एवं सम्पादन किया है, जिनमें आधुनिकसंस्कृत काव्यशास्त्र’, ‘अघोरपंचांगम्, कालिदास साहित्य एवं कामकला (दो खण्ड), ‘त्रिगुणश्रीः, ‘कविर्जयति वाल्मीकिः’, संस्कृत साहित्य में विज्ञानव्याकरणकुसुमांजलिआदि प्रमुख हैं। आजकल आप श्रीभट्टसत्तानामक साप्तहिक संस्कृत समाचार पत्र एवं अर्धवार्षिक संस्कृत शोधपत्रिका वाङ्मयम्के सम्पादन में संलग्न होकर संस्कृतपत्रकारिता क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं। आपने प्रयाग, वाराणसी, लखनऊ, दिल्ली, जयपुर प्रभृति नगरों में प्रवास कर संस्कृतसम्भाषण एवं प्राच्यसंस्कृतव्याकरण की कक्षायें संचालित करते हुए देववाणी का प्रचार-प्रसार किया है। इसके अतिरिक्त आपने आस्ट्रेलिया, कम्बोडिया, नेपाल प्रभृति देशों में आयोजित विश्वसंस्कृत सम्मेलन एवं अन्य संगोष्ठियों में शोध पत्र प्रस्तुत किया है।
डाॅ0 श्रीवास्तव अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं से सम्बद्ध हैं। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान ने आपके ग्रन्थ अघोरपंचांगम्को पुरस्कृत किया है। इसके अतिरिक्त हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग ने आपको संस्कृत महामहोपाध्याय उपाधि से सम्मानित किया है।         

धर्मेन्द्र कुमार

डॉ. धर्मेन्दकुमारमहोदयस्य जन्म महाराष्ट्र जन्म महाराष्ट्रप्रान्ते स्थितस्य अमरावतीनगरे अभवत्। एतेषां पितुर्नाम श्रीरामभाऊवोचरे मातुर्नाम च अन्नपूर्णा बोचरे।
प्राचीनपरम्परया शास्त्री आचार्य परीक्षाः उत्तीर्य दिल्ली विश्वविद्यालयतः संस्कृतविषयमधिकृत्य एम.ए., एम फिल्, पी-एच.डी. उपाधिं प्राप्तवान्। ऐसे दिल्लीस्थितकिरोडीमलमहाविद्यालये, खालसा महाविद्यालये च विंशतिवर्षं यावत् अध्यापनं कृतवन्तः। पंचाशत् अन्ताराष्ट्रिय-राष्ट्रिय संस्कृत-सम्मेलनेषु भागं गृहीत्वा विभिन्नान् विषयान् अधिकृत्य स्वशोधपत्रवाचनमपि प्रस्तुतवन्तः।
     इमे महाभागाः संस्कृतसाहित्यविषयमाश्रित्य 10 संख्यकानि पुस्तकानि रचितानि। प॰चाशत् संख्याकानाम् पुस्तकानाम् सम्पादनमपि विहितवन्तः तेषां चत्वारिंशत् शोधपत्राणि अन्ताराष्ट्रिय पत्रिकासु प्रकाशितानि। प॰चाशत् संख्याकानि विभिन्नानि- अन्ताराष्ट्रिय-सम्मेलनानि साफल्येन आयोजितुम् यशः लब्ध्वा संस्कृतस्य प्रचासय अद्भुतं कार्यं कृतवन्तः श्रीमन्तः। यत्र अनेके विद्वान्सः विदुष्यश्च भागं गृहीतवन्तः गृहीतवत्यश्च। सम्प्रति दिल्ली सर्वकारस्य दिल्ली संस्कृत अकादमी पक्षतः संस्कृतस्य प्रचाराय-प्रसाराय वद्धपरिकराः अहिर्निशं  प्रयतमानो सन्ति श्रीमन्तः ।
दिल्ली झण्डेवालानम् इति क्षेत्रे नूतन संस्कृत पुस्तकालस्य सद्य एव उद्घाटनं संजातम्। एतेषां साचिव्यकार्यकाले संस्कृतक्षेत्रे क्रियमाणकार्यं महोदयानां संस्कृतसमाजे महतीं भूमिकां द्योतयति।
राजधानी दिल्याम् विद्यालयेषु महाविद्यालयेषु-विश्वविद्यालयेषु च अनेकेषाम्-संस्कृतसम्बन्धितविषयाणाम्- संस्कृत-एकल- श्लोक-संगीतभाषणवाद-विवादश्लोक-संगीतश्लोकोच्चारणकाव्यालिदिनां बह्वीनां प्रतियोगितानाम् आयोजनम् एभिः क्रियते। यत्र च परस्सहस्र संख्याकाः छात्रा लाभान्विता जायन्ते। एवम्प्रकारेण न केवलं संस्कृतक्षेत्रे अपितु-योग-दर्शन-आयुर्वेद ज्यौतिष-इति प्राचीननाम् विषयाणाम् संरक्षणम्-संवर्धनं च श्रीमन्तः कुर्वन्ति। येन च प्राचीन-अर्वाचीन संस्कृतक्षेत्रे कार्यम् अक्षुण्णम् भवेत्।  एवं-शैक्षणिक-सांस्कृतिक-सामाजिक क्षेत्रे महत् योगदानम् अस्ति धमेन्द्रकुमारमहोदयानाम्।
                                                       हिन्दी
डा0 धमेन्द्र कुमार का जन्म 1964 में हुआ था। आपके माता का नाम श्रीमती अन्नपूर्णा देवी तथा पिता का नाम श्री रामभाऊ बोचरे है। प्राचीन परम्परा से शास्त्री आचार्य उपाधि ग्रहण कर एम00, एमफिल, पी0 एच0 डी0 की उपाधियां प्राप्त की। 50 से अधिक अन्ताराष्ट्रिय एवं राष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलनों में प्रतिभाग कर विभिन्न शोध पत्रों का वाचन किया।
       आपके द्वारा दस संस्कृत की मौलिक पुस्तकों की रचना, प्राचीनतम वेद, उपनिषद, दर्शन, साहित्य, व्याकरण, ज्योतिष, नाटक, कथा आदि विषयो पर आधारित संस्कृत भाषा के प्राचीनतम दुर्लभ पचास ग्रन्थों का प्रकाशन एवं संस्कृत भाषा से सम्बन्धित अनेक ग्रन्थों का निर्माण हुआ है। लाखों की संख्या में संस्कृत साहित्य का देश विदेश में वितरण, दिल्ली विश्वविद्यालय से सम्बद्ध किरोड़ीमल महाविद्यालय एवं खालसा  महाविद्यालय में 20 वर्षों से अध्यापन कार्य करने वाले आप 28 मई 2012 से सचिव, दिल्ली संस्कृत अकादमी, दिल्ली सरकार का पद का दायित्व वहन करते हुए संस्कृत भाषा और साहित्य के प्रचार प्रसार की दृष्टि से अखिल भारतीय स्वर के अनेक कार्यक्रमों/आयोजनों का संचालन किया है। राजधानी दिल्ली तथा दिल्ली से बाहर भी प्रतिवर्ष लगभग 200 कार्यक्रमों का आयोजन जिसमें कक्षा पंचम से लेकर उच्च कक्षा पर्यन्त तथा शोध छात्र-छात्राएं हजारों की संख्या में प्रतिभाग करते हैं जिसके कारण असंख्य छात्र-छात्राएं लाभान्वित हो रहे हंै। आप संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार हेतु दिल्ली संस्कृत अकादमी को एक राष्ट्रिय स्तर पर पहचान दिलानें में अहर्निश प्रयासरत है। इस प्रकार अनेक शैक्षणिक-सांस्कृतिक-सामाजिक कार्यों को ध्यान में रखते हुए संस्कृत-संस्कृति के प्रचार-प्रसार में प्रयासशील एवं सतत् साधना में निरन्तर क्रियाशीलता आपकी सतत् संस्कृत सेवा को प्रमाणित करती है।

 रवीन्द्र नागर

           आचार्यरवीन्द्रनागरमहोदयस्य जन्म 5-11-1941 इसवीयेवर्षेऽभवत्। श्री नागरमहोदयाः शुक्लयजुर्वेदविषयं तथा साहित्य विषयमधिकृत्य आचार्योपाधिं लब्धवन्तः। संस्कृतविषये हिन्दीविषये च एम.ए. परीक्षाऽपि उत्तीर्णिकृता एभिः। ते साहित्यरत्नं हिन्दी एवं गुर्जरीयविषयेषु उपाधिभिः समलंकृताः वर्तन्ते। संस्कृतविषये, पी.एच.डी. इत्युपाधिरपि गम्भीरशोधद्वाराधिगता श्रीमद्भिः।
       आचार्य नागरमहोदयाः लालबहादुरशास्त्रीराष्ट्रीयसंस्कृतविद्यापीठे मानित-विश्वविद्यालये नवदेहल्यां विभागाध्यक्षपदे चत्वारिंशत वर्षाणियावत् सेवां विधाय शास्ञ्याचार्यकक्षाणामध्यापनं कृतवन्तः। आचार्य नागरमहोदयानां निर्देशने विंशतिसंख्यापरिमिता छात्राः शोधकार्यं कृतवन्तः। पौरोहित्य प्राशिक्षणकार्यक्रमाणां सम्यक् संचालनम् विहितवन्तः।
आचार्य नागरमहोदयैः लिखिताः भारतीयसंस्कृतौ एवं संस्कारेषु चतुर्दश संख्यापरिमिताः ग्रन्थाः प्रकाशिताः वर्तन्ते। तेषु विवेकानन्दचरितम् अतीवप्रेरणादायक् उत्कृष्टतम॰च विद्यते। श्री नागरमहोदयाः भारतदेशादतिरिक्तेषु वैदेशिकदेशेषु संस्कृत भाषायाः प्रचारोप्रचारश्च कृतवन्तः। येषु मारिशस देशः, अमेरिका देशश्च प्राथम्यं भजते।
आचार्य नागरमहोदयाः 2012 तमे ईसवीये वर्षे राष्ट्रपति सम्मानेन सम्मानिताः जाताः। एतदतिरिक्तं दिल्लीसंस्कृतअकादमी, गुजराती समाज दिल्ली, हिन्दूसोसायटी आफ अमेरिका द्वारा अपि सम्मानिताः वर्तन्ते श्रीमन्तः।
                                                     हिन्दी
प्रो0 रवीन्द्र नागर का जन्म 5.11.19410 में हुआ श्री नागर शुक्ल यजुर्वेद एवं साहित्य विषय में आचार्य उपाधि प्राप्त कर आप संस्कृत एवं हिन्दी विषय से एम00, साहित्य रत्न, हिन्दी एवं गुजराती विषय में उपाधि प्राप्त आचार्य नागर संस्कृत विषय में पी0एच0डी0 उपाधि से भी विभूषित है ।
प्रो0 नागर ने लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ (मानित) विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष के पद पर 40 वर्षों तक शास्त्री एवं आचार्य कक्षाओं का अध्यापन कार्य किया है।  प्रो0 नागर के निर्देशन में 20 छात्र शोध करते हुए पी0एच0डी0 उपाधि को प्राप्त कर चुके हैं। आपने पौरोहित्य प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों का भी संचालन किया हैं।
आपने भारतीय संस्कृत एवं संस्कारों पर 14 ग्रन्थों का प्रणयन किया हैं। आप द्वारा लिखित ग्रन्थों में ‘‘विवेकानन्द चरितम्’’ ग्रन्थ अत्यन्त प्रेरणादायक और उत्कृष्ट हैं।
श्री नागर जी ने भारत के अतिरिक्त विदेशों में भी संस्कृत भाषा का प्रचार-प्रसार किया हैं, जिनमें मारिशस् एवं अमेरिका प्रमुख हैं। आपने संस्कृत पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
श्री नागर 20120 में राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित हैं। इसके अलावा दिल्ली संस्कृत आकदमी, गुजराती समाज दिल्ली, हिन्दू सोसाइटी आफ अमेरिका द्वारा भी सम्मानित किये गये हैं।

रामकिशोर त्रिपाठी

        आचार्य रामकिशोरत्रिपाठिनः जन्म 1963 तमे वर्षे उत्तरप्रदेशस्य बाँदा जनपदस्य कोलौंहा ग्रामे अभवत्। भवतः पिता स्व0 रामरूचित्रिपाठि एवं माता स्व0 रामावतारीदेवी आसीत्।
        आचार्य त्रिपाठिनः प्रारम्भिकशिक्षा ग्रामस्य प्राथमिकपाठशालायां सम्पन्नाभवत्। मध्यमापरीक्षा श्रीभगवतीआश्रमसंस्कृतविद्यालये पठित्वा उत्तीर्णीकृता। शास्त्रिपरीक्षा महानिर्वाणवेदविद्यालये दारागंजे प्रयागे उत्तीर्णवान्। आचार्य त्रिपाठिः 1986 वर्षें नव्यव्याकरणविषयम् अधिकृत्य आचार्यपरीक्षाम् उत्तीर्णवान्। 1994 वर्षें शंकरवेदान्तविषये आचार्य परीक्षाम्उत्तीर्य 2001 तमे वर्षें (अद्वैतविशिष्टाद्वैतमतयोः समीक्षाः) इति शीर्षकमधिकृत्य वाचस्पति (डि0लिट्0) उपाधिम् प्राप्तवान्।
         श्री त्रिपाठिः 1987 तमे वर्षें ऋषिसंस्कृतमहाविद्यालयखड़खड़ी हरिद्वारे व्याकरणाध्यापक रूपे अध्यापनं प्रारब्धवान्। 1992 तमे वर्षें तत्रैव व्याकरणविभागाध्यक्षपदे नियुक्तिं प्राप्य जुलाईमासास्य 20000 वर्षपर्यन्तम् व्याकरणादि शास्त्राणि पाठितवान्। भवन्तः सम्पूर्णानन्दसंस्कृतविश्वविद्यालये वेदान्तविषये आचार्यपदेनियुक्तिं प्राप्य इदानीमपि अध्यापनकार्यम् कुर्वन्ति। भवताम् शोधनिर्देशने विंशति सख्यापरिमिताः छात्राः शोधोपाधिम् प्राप्तवन्तः।
श्री त्रिपाठिद्वाराव्याकरणे तथा वेदान्तविषये दस ग्रन्थाः लिखिताः सन्ति। येषु केचन् मौलिक ग्रन्थाः केचन् च टीकाग्रन्थाः सन्ति। प॰चचत्वारिंशत् शोधप्रबन्धाः विविध पत्रपत्रिकाषु प्रकाशिताः सन्ति।
आचार्य त्रिपाठिनः 2011 तमे वर्षे उत्तरप्रदेशसंस्कृतसंस्थान द्वारा शंकरपुरस्कारेण एवम् 2012 तमे वर्षें  अखिलभारतीविद्वद्परिषदकाशिद्वारा विद्वद्भूषणेन तथा 2013 तमे वर्षें श्रीविद्यामठकेदारघाटवाराणसी द्वारा विद्याश्रीः सम्मानेन पुनश्च 2014 ईश्वीवर्षें अखिलभारतीविद्वत्परिषद्काशिद्वारा महाशक्तिपुरस्कारेण सम्मानिताः वर्तन्ते।
                                                                हिन्दी
आचार्य रामकिशोर त्रिपाठी का जन्म 19630 में ग्राम कोलौंहा, जनपद बाॅदा उत्तर प्रदेश में हुआ था। आपके पिता स्व0 रामरुचि त्रिपाठी एवं माता स्व0 रामावतारी देवी थी।
            आचार्य त्रिपाठी की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम के प्राथमिक पाठशाला में सम्पन्न हुई। मध्यमा परीक्षा श्री भागवती आश्रम सं0 वि0 नरैनी में पढ़कर उत्तीर्ण की। शास्त्री की परीक्षा महानिवार्ण वेद विद्यालय दारागंज प्रयाग से उत्तीर्ण की। आपने 1986 में आचार्य की परीक्षा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी से नव्यकाकरण विषय में उत्तीर्ण की। 19890 में आपने पी0 एच0 डी0 विद्या वारिधि की उपाधि प्राप्त करने केे पश्चात् 19940 में शांकर वेदान्त विषय में आचार्य परीक्षा उत्तीर्ण करके 20010 में ‘‘अद्वैत विशिष्टाद्वैतमतयोः समीक्षा‘‘ शीर्षक पर वाचस्पति डी0 लिट् की उपाधि प्राप्त की।
            श्री त्रिपाठी 19870 से ऋषि स00 वि0 खड़रवड़ी हरिद्वार में व्याकरण-अध्यापक रुप में अध्यापन का कार्य किया। 19920 में वहीं व्याकरण विभागाध्यक्ष पद पर नियुक्त होकर जुलाई 20000 तक व्याकरणादि शास्त्रों को पढ़ाया। आप  सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में आचार्य वेदान्त पर नियुक्त होकर अध्यापन कार्य कर रहें है। आपके शोध निर्देशन में बीस छात्र शोधोपाधि प्राप्त कर चुके हैं।
            आपने व्याकरण तथा वेदान्त विषय में दस ग्रन्थों की रचना की है, जिनमें कुछ मौलिक और कुछ टीका ग्रन्थ हैं। पैतालीस शोध प्रबन्ध विविध पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं।
            आचार्य त्रिपाठी जी 20110 में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा शंकर पुरस्कार एवं 20120 में अखिल भारतीय विद्वत्परिषद् काशी द्वारा विद्वद्भूषण तथा 20130 में श्री विद्या मठ केदार घाट वाराणसी द्वारा विद्या श्री सम्मान और पुनः 20140 में अखिल भारतीय विद्वत्परिषद् काशी द्वारा महाशक्ति पुरस्कार से सम्मानित किये गये है।

अभिराज राजेन्द्र मिश्र

   ब्रह्मर्षि-महामहोपाध्याय-विद्यासागर पण्डितरत्नादिभिः श्रद्धेयविशदैर्विभूषितः, अर्वाचीनसंस्कृतरचनाया नवयुगप्रवर्तकः, आचार्यः कविश्च, कलातरुः, प्रो. अभिराजराजेन्द्रमिश्रः अद्यतनो मूर्द्धन्यस्संस्कृतरचनाकारः। तत्राभवता विशालपरिमाणं महाकाव्यद्वयं, विंशतिमितं खण्डकाव्यं, पञ्च नवगीतसङ्कलनम्, सप्त गलज्जलिकासøलनम्, एकादशमितमेकाङ्किसङ्कलनम्, नाटकनाटिकाचतुष्टयम्, नवमितं कथानिकासङ्कलनम्, उपन्यासश्चैकः, अष्टादशमिताः काव्यशास्त्रीयाः समीक्षाग्रन्थाः, अष्टमिताः पाठ्यग्रन्थाः द्वादशमिताश्चाऽनूदिताः सम्पादिता वा ग्रन्थाः प्रकाशिताः, मातुर्वीणावादिन्याश्च विलक्षणैव वरिवस्या निव्र्यूढा।
     प्रोफेसरमिश्रस्याऽनेकेषां संस्कृतग्रन्थानां स्फुटरचनानाञ्च रूपान्तरं हिन्दी-अंग्रेजी-उर्दू मलयालम-बंगला-तेलुगु-मराठी-डोगरी- गुजराती-मैथिलीप्रभृतिप्रान्तीयभाषास्वपि जातमथ च तदुपेता आदित्यमिता ग्रन्था अनेकविश्वविद्यालयानां बी.ए., एम.ए., शास्त्राी, आचार्यकक्षा-पाठ्यक्रमेषु निर्धारितास्तिष्ठन्ति।
जौनपुरजनपदस्य (उ.प्र.) स्यन्दिका (सइ) तटवर्तिनि द्रोणीपुराभिधेऽग्रहारे, महीयस्या अभिराजीदेव्याः पण्डितदुर्गाप्रसादमिश्रस्य च मध्यमपुत्रारूपेण 2.1.43 तिथौ लब्धजनिर्मिश्रवर्यः 1964 मितवत्सरस्य इलाहाबादविश्वविद्यालयीयां एम.ए. (संस्कृत) परीक्षां प्रथमश्रेण्यां प्रथमस्थानेन च सार्धं समुत्तीर्णवान्। आसीत् स खलु 1964-1965 समवेतपरीक्षयोरपि सøायोत्तमश्छात्राः (फैकल्टी टापरः) एतदर्थमसौ समलङ्कृतोऽपि जातः क्वीनविक्टोरियारजतपदकेन, पण्डितगंगाप्रसादोपाध्यायस्वर्णपदकेन च। स खलु अन्योक्तेरुद्भवो विकासश्चेति विषयमवलम्ब्योत्कृष्टं शोधकार्यं डी.फिल् कृतवान्। शिमलाविश्वविद्यालयीयः प्रथमो विद्यावाचस्पतिः (डी.लिट्) संस्कृतविषये।
     आचार्यमिश्रेण इलाहाबादविश्वविद्यालये (1966 तः 21 यावत् प्रवक्तृ-प्रवाचकरूपेण) शिमलाविश्वविद्यालये च (19912003 यावत् आचार्यः, विभागाध्यक्षः, भाषासंकायाध्यक्षः, कार्य सदस्यः) अध्यापनं कृतम्। अस्मिनन्नेवान्तरालेऽसौ वर्षद्वयं इण्डोनेशियाराष्ट्रस्य बालीद्वीपस्थे उदयनविश्वविद्यालये, भारतसर्वकारपक्षतः विजटिंगप्रोफेसर-पदं समलङ्कृतवान्। प्रो. मिश्रोऽसौ विश्वविख्याते वाराणसेये सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालये कुलपतिर्नियोजितो (22 जनवरी 2002 ई.) ततश्च 2005 मितवर्षे सेवानिवृत्तिमुपगतः।
साहित्यअकादमी (1988) मध्यप्रदेशशासनस्य कालिदाससम्मानः (द्विवारम् 1988, 1998) के.के. बिरला फाउण्डेशन वाचस्पातिसम्मानः (1993) भारतीयभाषापरिषद् कोलकातायाः कल्पवल्लीसम्मानः (1998) महामहिमराष्ट्रपति सम्मानः (1999) उत्तरप्रदेशशासनस्य वाल्मीकि पुरस्कारः (2009) साहित्य अकादमी बालसाहित्य सम्मानः (2011) साहित्य अकादमी अनुवाद सम्मानः (2013) यथावसरं मिश्रवर्षेभ्यः समुपायनीकृताः।
एतदतिरिक्तं दिल्लीप्रदेशस्य (आदित्यनाथझा सम्मानः) महाराष्ट्रस्य कविकुलगुरुकालिदाससम्मानः) केरलस्य (राजप्रभासम्मानः) राजस्थानस्य (माघपुरस्कारः) आन्ध्रप्रदेशस्य (वेदभारतीपुरस्कारः) पश्चिम बंगालस्य च (विद्यालंकार सम्मानः) एते सम्मानाः तस्मै गुणपक्षधरैस्तत्रात्यैः प्रदत्ता एव। किञ्च दिल्लीस्थदेववाणी परिषदः पण्डितराज सम्मानः उज्जयिनीस्थस्य श्रीरामसेवान्यासस्य विद्योत्तमा सम्मानोऽपि मिश्रवर्यस्य गौरववर्धकावेव।
निसर्गत एव विश्वस्तो निश्छलश्च, मधुरो मित्रावत्सलश्च, सर्वानुग्रही सर्वोदयाभिलाषी च, बहिरन्तश्च निरभिमानः
प्रो. अभिराजराजेन्द्रः स्वकीयं निखिलमपि लोकवैभवं वागधिष्ठात्रयाः कृपाप्रसादमात्रामेव मन्यते-
                     नाऽहं करोमि कवितामिह शारदैव, साऽऽत्मानमञ्जयति मत्कवनच्छलेन।
                      गन्धं तनोति जलजं न निजप्रभावै-र्विस्फूर्जितं सकलमेव तदर्कलक्ष्म्याः।।
                                                            हिन्दी
ब्रह्मर्षि, महामहोपाध्याय, विद्यासागर तथा पण्डितरत्नादि श्रद्धेय विशदों से विभूषित तथा अर्वाचीन संस्कृत रचनाधर्मिता के नवयुगप्रवर्तक, आचार्य एवं कवि, समीक्षक एवं चिन्तक तथा काव्य-नाट्य-कथा-समीक्षाशास्त्राी कवि साहित्य कलातरु प्रो. अभिराज राजेन्द्रमिश्र आज के मूर्धन्य संस्कृत रचनाकार हैं। आप ने दो विशाल महाकाव्य, तीन खण्डकाव्य, पाँच नवगीत संग्रह, सात गज़ल संग्रह, ग्यारह एकांकी संग्रह, चार नाटक नाटिका, नौ कथा संग्रह, एक उपन्यास, अट्ठारह काव्यशास्त्राीय एवं समीक्षाग्रंथ, आठ पद्यग्रंथ, बारह अनूदित एवं सम्पादित ग्रंथों का प्रकाशन कर, माँ वीणापाणि की विलक्षण सेवा की है। प्रो. मिश्र के अनेक संस्कृत ग्रंथों एवं स्फुट रचनाओं का अनुवाद हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, मलयालम बंगला, तेलगु, मराठी, डोमरी, गुजराती तथा मैथिली आदि प्रान्तीय भाषाओं में भी हो चुका है तथा उनके दर्जनों ग्रंथ अनेक विश्वविद्यालयों के बी.ए., एम.ए., शास्त्राी तथा आचार्य कक्षाओं के पाठ्यक्रम में निर्धारित हैं।
जौनपुर जनपद (उ.प्र.) के स्यन्दिका (सई) तटवर्ती द्रोणीपुर नामक ग्राम में महीयसी अभिराजी देवी एवं पं. दुर्गाप्रसाद मिश्र के मध्यम पुत्रा के रूप में 2 जनवरी 1943 को जन्मे मिश्र जी ने 1964 ई. में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की एम.ए. (संस्कृत) परीक्षा प्रथम श्रेणी तथा प्रथम स्थान में उत्तीर्ण की। वह 1964 तथा 1965 की समवेत परीक्षाओं में भी फैकल्टी-टाॅपर रहे तथा एतदर्थ क्वीन विक्टोरिया रजतपदक तथा पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय स्वर्णपदक से विभूषित हुए। उन्होंने अन्योक्ति के उद्भव एवं विकास पर उत्कृष्ट शोधकार्य (डी.फिल्) तथा शिमला यूनिवर्सिटी से प्रथम संस्कृत डी.लिट्. किया है।
प्रो. मिश्र ने इलाहाबाद (1960 से 90 तक लेक्चरर एवं रीडर) तथा शिमला विश्वविद्यालय (1991-2003 ई. प्रोफेसर विभागाध्यक्ष भाषासंकायाध्यक्ष, कार्यकारिणी सदस्य) में अध्यापन किया। इसी अन्तराल में वह दो वर्ष (1987-89) इण्डोनेशिया के बालीद्वीपीय उदयन यूनिवर्सिटी में भारत सरकार की ओर से विजिटिंग प्रोफसर भी रहे। सेवानिवृत्ति से एक वर्ष पूर्व ही, वह विश्वविख्यात सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी (22 जनवरी 2002 ई.) में कुलपति नियुक्त हुए।
प्रो. मिश्र को साहित्य अकादमी (1988) म.प्र. शासन का कालिदास-सम्मान (दो बार 1988, 1998) के.के. बिरला फाउण्डेशन का वाचस्पति-सम्मान (1993) भारतीय भाषापरिषद् कलकत्ता का कल्पवल्ली पुरस्कार (1998) म.प्र. राष्ट्रपति सम्मान (1999) उ.प्र. शासन का वाल्मीकि सम्मान (2009) सा.अका. बालसाहित्य सम्मान (2011) सा अका. अनुवाद सम्मान (2013) के अतिरिक्त उ.प्र. (11 बार) दिल्ली प्रदेश, महाराष्ट्र (कविकुलगुरु) केरल (राजप्रभा) राजस्थान (माघ) आन्ध्रप्रदेश (वेदभारती) पश्चिम बंगाल (विद्यालंकार) का राज्य भी यथावसर प्राप्त हो चुका है। देववाणीपरिषद् का पण्डितराज सम्मान तथा श्रीराम सेवान्यास उज्जैन का विद्योत्तमा सम्मान भी मिश्र जी का गौरवर्धक है। स्वभावतः विश्वस्त एवं निश्छल, मधुर एवं मित्रावत्सल सर्वानुग्रही एवं निरभिमान प्रो. अभिराजराजेन्द्र अपना सारा लोक वैभव मां वाणी का प्रसाद मात्रा मानते हैं-

रहसबिहारी द्विवेदी

आचार्यो रहसबिहारी द्विवेदः पण्डित श्रीरामभिलाष द्विवेदी सिद्धान्त ज्योतिषाचार्यस्य गेहे 02 जनवरी 1947 तमे वर्षे ग्रामः समहनम् पत्रा. मेजारोड जि. इलाहाबादे जनिं लेभे।
एम.ए. (संस्कृते) लब्धस्वर्णपरकः साहित्याचार्यः विद्यावाचस्पतिःमानदोपाधिः महामहोपाध्यायःअसौ 1971 ई. वर्षे मध्य प्रदेश लोक सेवायोगतः-उच्चशिक्षासेवाकृते चयनितः संस्कृत प्रवक्ता मन्दसौर-शाजापुर-छतरपुरमण्डलानां स्नात्तकोत्तर महाविद्यालयेषु मार्च 1978 ई. यावत् तदनन्तरं मार्च 1978 तः रानी दुर्गावती विश्वविद्यालये व्याख्याता तत्रा उपाचार्य-आचार्य-कलासøाध्यक्षादिपदानि निर्वहन् 30 जनवरी 2009 ई. वर्षे सेवानिवृत्तः। मध्ये च सितम्बर 2098 तः 28 दिसम्बर 2098 यावत् सम्पूर्णानन्दसंस्कृत विश्वविद्यालये वाराणस्यां शोधसंस्थान निदेशकः। सेवानिवृत्यनन्तरं शास्त्राचूडामणिरूपेण प्रयागस्थ रा.सं. संस्थान परिसरे वर्ष द्वयम्।
यू.क्रि. महावि. प्रयागे सत्राद्वयमतिथ्याचार्यः। सत्राद्वयेन सम्प्रति म.म. वैदिक विश्वविद्यालये जाबालिपुरे-आचार्यः सøायाध्यक्षश्च वेदविज्ञान संकाये। प्रकाशितशोधपत्राणि-200 विविध शोध पत्रिकाभिनन्दनग्रन्थेषु।
प्रकाशिताः ग्रन्थाः-संस्कृतमहाकाव्यानुशीलनम्, श्रीकृष्णस्य स्वस्तिसन्देशः, संस्कृत महाकाव्यों का आलोचनात्मक अध्ययन साहित्यविमर्शः, तीर्थभारतम् (काव्य ग्रन्थः), साहित्यानुसन्धान व बोधप्रविधिः। सम्पादिताः ग्रन्थाः-संस्कृतवाङ्मये विज्ञानम्, मध्यप्रदेशस्य स्नातक प्रथम द्वितीय तृतीय वर्षाणामनिवार्य संस्कृतपाठ्यग्रन्थाः। सम्प्रति प्रवर्तमानाः क्रमशः त्रायी’, ‘चतुष्टयी’, ‘अर्थगौरवम्। हिन्दकाव्यम्-भारत बनाम इण्डियात्राीणि खण्डकाव्यानि स्फुटकविताश्च पत्रिकासु प्रकाशिताः।
पुरस्कारसम्मानादयः-आचार्यश्रीः, जबलपुरम्। सास्वतससम्मान’ 2000 वाराणसी। भारत-भारती’ 2002 महाकौशल साहित्य संस्कृतिपरिषद्। भाषारत्नम्’ 2006 जैमिनी अकादमी पानीपतम्। भामहपुरस्कारः’ 2006 म.प्र. शासनम् राजशेखरपुरस्कार’ 2007 म.प्र. शासनम्। कालिदासपुरस्कारः 2008 उ.प्र. सं.संस्थानम् विशेष पुरस्कारः। उ.प्र. शास्त्रार्थ समिति नगइया-2011 वाराणसी-अन्नपूर्णा सम्मानः 2011, राष्ट्रपतिसम्मान पुरस्कारः 2011.
                                                                   हिन्दी
प्रो. द्विवेदी का जन्म 02 जनवरी 1947 को ग्राम-समहन (मेजारोड) इलाहाबाद में हुआ। इनके पिता स्व. पं. राममिलाप द्विवेदी ज्योतिषशास्त्रा और संस्कृत साहित्य के विद्वान थे। अतः संस्कृत की प्रारम्भिक शिक्षा उनसे ही प्राप्त की। नियमित छात्रा के रूप में अध्ययनकर आपने एम.ए. संस्कृत (संकाय में प्रथम श्रेणी में प्रथम) साहित्याचार्य, विद्यावाचस्पति की उपाधियाँ प्राप्त कीं। 1971 में म.प्र. लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित होकर मन्दसौर, शाजापुर और छतरपुर के स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में प्राध्यापक कार्य करते रहे। 2 मार्च 1978 से रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर में कार्यभार ग्रहण कर आपने संस्कृत के व्याख्याता उपाचार्य और आचार्य तथा अध्यक्ष तथा संकायाध्यक्ष का कार्य किया। यहाँ से अवकाश पर रहकर सितम्बर 1998 से 28 दिसम्बर 98 तक आप सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी में शोध संस्थान के निदेशक भी रहें। पुनः जबलपुर आकर आपने आचार्य एवं अध्यक्ष के रूप कार्यभर ग्रहण किया और यहीं से 30 जनवरी 2009 को सेवानिवृत्त हुए। आपने सेवानिवृत्ति के बाद संस्कृत संस्थान परिसर इलाहाबाद में शास्त्रा चूड़ामणि एवं म्ण्ब्ब् कालेज इलाहाबाद में अतिथिप्राध्यापक का कार्य दो सत्रों में किया। सम्प्रति आप महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय जबलपुर में वेदवेदांग संकाय के आचार्य तथा संकायाध्यक्ष हैं। आपको अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से संभावित किया जा चुकी है। यथा-संस्कृत महामहोपाध्याय (डी.लिट्. की मानद उपाधि, राष्ट्रपति द्वारा 2011 में सम्मान प्रमाण पत्रा, म.प्र. शासन के भामह एवं राजशेखर पुरस्कार उ.प्र. संस्कृत संस्थान के विशेष पुरस्कार नामित पुरस्कार आदि। आपको जैमिनी अकादमी पानीपत द्वारा भाषारत्न सम्मान, महाकौशल संस्कृति परिषद द्वारा ‘‘भारतभारती सम्मान आदि अनेक पुरस्कार मिले हैं। आपके निर्देशन में तीस शोधछात्रों को पी.एच.डी. तथा डी.लिट् की उपाधि प्रदान की गई है। आप समीक्षक के रूप में सर्वविदित हैं। संस्कृत और हिन्दी में प्रणीत कुछ ग्रन्थों के नाम इस प्रकार हैं-
1. संस्कृत महाकाव्यानुशीलनम् 2. श्रीकृष्णस्य स्वति सन्देशः 3. संस्कृत महाकाव्यों का समालोचनात्मक अध्ययन 1961 से 1971 तक 4. साहित्यविमर्शः 5. तीर्थभारतम् (काव्यग्रन्थः) 6. साहित्यानुसंधानावबोधप्रविधिः 7. संस्कृतवाङ्मये विज्ञानम् (सम्पा.) सम्पूर्ण म.प्र. के संस्कृत साहित्य पाठ्य ग्रन्थ 8. त्रायी 9. चतुष्टयी 10. अर्थगौरवम् (सम्पादित) 11. रामकाव्यविमर्श । उ.प्र. सं. संस्थान के काव्य खण्ड में प्रकाशित, 12. भारत बनाम इण्डिया हिन्दी काव्य, 13. काव्याधिकरणानुभूति विमर्शः शोध पत्रा लगभग 200 प्रायः संस्कृत में विविध शोध पत्रिकाओं एवं अभिनन्दन ग्रन्थों में प्रकाशित। अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में अध्यक्षता एवं मुख्यातिथ्य। प्रो. द्विवेदी आधुनिक संस्कृतसाहित्य एवं काव्यशास्त्रा के मौलिक चिन्तक हैं। नव्य काव्यतत्त्व मीमांसाइनकी मौलिक काव्यशास्त्राीय कृति है जो डॉ. रमाकान्त पाण्डेय द्वारा सम्पादित-आधुनिक संस्कृत काव्यशास्त्रा समीक्षणम् ग्रन्थ में प्रकाशित है।

राधेश्याम चतुर्वेदी

आचार्यराधेश्यामचतुर्वेदिमहाभागा आजमगढ़मण्डलान्तर्गतगोबरहानाम्नि ग्रामे 1940 ईस्वीये वर्षे जन्म लेभिरे। एतेषां पितुर्नाम पं. मुरलीधर चतुर्वेदी मातुý नाम श्रीमती सकला देवी आसीत्। बाल्यादेव कुशाग्रबुद्धय इमे स्वीयां प्रारम्भिकीं शिक्षां स्वीय एव जनपदे प्राप्तवन्तः। सन् 1960 तमे वर्षे उच्चशिक्षां प्राप्तुमिमे वाराणसीं प्रतस्थुः। तत्रा सम्पूर्णानन्दसंस्कृतविþ- विद्यालयात् शास्त्राी-व्याकरणाचार्यपरीक्षामुत्तीर्य काशीहिन्दूविþविद्यालयतः संसकृतविषये स्नातक-स्नातकोत्तरपरीक्षे प्रथमश्रेण्यामुत्तीर्य कलासøायीयच्छात्राणां प्रथमं स्थानं प्राप्नुयुः। परिणामतः श्रीमधुसूदनानन्द- सरस्वतीकाशीहिन्दूविþविद्यालयेति स्वर्णपदकद्वयेन सम्मानिता एते तस्मादेव विþविद्यायात् 1971 वर्षे डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी उपाधिं प्राप्तवन्तः।
तस्मिन्नेव वर्षे काशीहिन्दूविश्वविद्यालये अध्यापकत्वेन नियुक्ता एते सन् 2002 ईस्वीये ततः सेवानिवृत्ताः स}ाताः। तदनन्तरं 2005 वर्षतः 2007 पर्यन्तं महात्मागान्धीकाशीविद्यापीठस्थसंस्कृतविभागे शास्त्राचूड़ामणिविद्वान् इति पदे ससम्मानं नियुक्ता एते आध्यापनादिकार्यं कृतवन्तः। 2008 ईस्वीये वर्षे देवसंस्कृतिविþविद्यालयस्य कुलाधिपति डाॅ0 प्रणवपण्ड्यामहाभागैः सबहुमानं संस्कृतवेदविभागाध्यक्षपदे (इदानीं भाषाविभागाध्यक्षपदे) इमेरिट्स प्रोफेसररूपेण प्रतिष्ठापिताः सन्तः विश्वविद्यालयस्य सेवाकार्यमहर्निशं कुर्वन्त आसते।
    स्वकीयाध्यापकजीवने विभिन्नान् विषयानाधृत्य शोधकार्यं कारयद्भिरेभिः त्रायोविंशतिश्छात्राः पी-एच.डी. उपाधियोग्या निर्मिताः। सम्प्रति पझ्छात्राः एतेषां निर्देशकत्वे विभिन्नविषयानादाय शोधकार्यं कुर्वन्त आसते।
आयुर्वेद-वेदान्त-मीमांसा-तन्त्रादिविषयानाधृत्य षोडशग्रन्थाः प्रकाशिता एभिः। प्रकाशितेष्वेतेषु ग्रन्थेषु शिवदृष्टिः, गायत्राीमहातन्त्राम्, तन्त्रालोकः, महाकालसंहिताग्रन्थाः उत्तरप्रदेशसंस्कृतसंस्थानेन पुरस्कृताः। पझ्षो ग्रन्था मुद्रणालये प्रकाशनार्थं प्रेषिताः प्रकाशनप्रक्रियां निर्वहन्तः सन्ति। भारतवर्षस्य विभिन्नासु संस्कृतपत्रिकासु एतेषां विभिन्नविषयकाः शोधलेखाः प्रकाशिताः। सुदूरोत्तरस्थकश्मीरादारभ्य दक्षिणस्यां पाण्डिचेरीप्रभृतिषु नानास्थानेषु काले-काले समायोजितासु सगोष्ठीषु भागं गृहीतवन्त इमे स्वकीयप्रतिभापाटवं विदुषां समक्षे प्रास्तुवन्। अनेकेषु विþविद्यालयेषु अध्ययनसमितेः, विद्यापरिषदः, परीक्षासमितेः सदस्यरूपेण स्वकीयमुत्तरदायित्वं निर्वहन्त एते महानुभावाः सप्तसप्ततिवर्षीयेऽपि वयसि संस्कृतवाङ्मयस्य सेवामहर्निशं कुर्वन्तो विराजन्ते।
                                                                                हिन्दी
आजमगढ़ जनपद के ओबरहा नामक गांव में आचार्य राधेश्याम चतुर्वेदी का जन्म सन् 1940 में हुआ। इनके पिता का नाम पं0 मुरली धर चतुर्वेदी एवं माता का नाम सकला देवी है। बाल्यावस्था से ही कुशाग्र बुद्धि आचार्य चतुर्वेदी की आरम्भिक शिक्षा अपने जनपद में हुई। सन् 1960 में संस्कृत अध्ययन के लिए ये वाराणसी आये और वहां सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्राी आचार्य तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक एवं स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर 1971 में डी.फिल शोध उपाधि भी प्राप्त की है।
          आचार्य चतुर्वेदी 1971 ई. से ही काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापक के रूप में नियुक्त हुए और वहाँ निरन्तर अध्यापन कार्य करते हुए सन् 2002 में सेवानिवृत्त हुए। तदनन्तर आचार्य चतुर्वेदी ने महात्मागान्धी काशी विद्यापीठ से संस्कृत विभाग में दो वर्षों तक शास्त्रा विद्वान् के रूप में अध्यापन कार्य किया तथा वर्तमान में इमेएमिरेट्स प्रोफेसर के रूप में देव संस्कृति विश्वविद्यालय में भाषा विभागाध्यक्ष का कार्य करते हुए संस्कृत अध्यापन कर रहे हैं।
        आचार्य चतुर्वेदी द्वारा प्रणीत और सम्पादित सोलह ग्रन्थ आयुर्वेद, वेदान्त, मीमांसा तथा इत्यादि विषयों में प्रकाशित हैं। इनके मार्ग निर्देशन में 23 शोध छात्रों ने पी.एच.डी. उपाधि प्राप्त की है और वर्तमान में पाँच छात्रा शोध कार्य कर रहे हैं।
आचार्य चतुर्वेदी के प्रकाशित ग्रन्थों में प्रमुख शिव दृष्टि, गायत्राीमहातन्त्राम्, तन्त्रालोक, महाकाल संहिता उ.प्र. संस्कृत संस्थान द्वारा पुरस्कृत हुए हैं। देश के विभिन्न भागांे में आयोजित राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलनों में प्रतिभागिता तथा अनेक संस्थाओं में सहयोग प्रदान करते हुए आचार्य चतुर्वेदी अहर्निश संस्कृत वाङ्मय की सारस्वत साधना में संलग्न हैं। 

मीरा द्विवेदी

   डॉ. श्रीमती मीरा द्विवेदी उत्तरप्रदेशस्य जालौनजनपदे हुसेपुरासमीपस्थिते टीहर नामके ग्रामे चतुःषष्ट्यधिकै- कोनविंशतिशततमे वर्षे अक्टूबर मासस्य पञ्चदशदिनाøे (15.10.1964 ई.) अजायत। अस्याः पिता वैद्य श्री प्रयाग नारायणदीक्षितः माता च श्रीमती चन्द्रप्रभा। वृन्दावने मानवसेवासंघ-बालमन्दिरे अस्याः प्रारम्भिकी शिक्षा, ततः तत्रौव बालिका माध्यमिकविद्यालये अधीत्य इयं माध्यमिक शिक्षापरिषदः हाईस्कूल परीक्षां प्रथमश्रेण्यां समुदतरत्। तदनन्तरं राजस्थानस्य वनस्थलीविद्यापीठे अन्तेवासिनी भूत्वा श्रीमती द्विवेदी संस्कृते स्नातकोत्तरोपाधिं पीएच.डी. इति शोधोपाधिं च लब्धवती। अथच इयं तत्रौव प्राचीनपद्धत्या अधीत्य शास्त्रिा-आचार्योपाधिमपि अलभत।
अध्ययनं परिसमाप्य डॉ. मीरा द्विवेदी तत्रौव वनस्थली विद्यापीठे द्वाविंशतिवर्षाणि अध्यापितवती। तस्मिन्नवधौ च तत्रा व्याख्याता-प्रवाचक-विभागाध्यक्षपदानि अलंकृतवती। सम्प्रति दशाधिकद्विसहस्रतमाब्दात् दिल्ली विश्वविद्यालयस्य संस्कृत विभागे सहाचार्यपदे नियुक्ता सती संस्कृतमध्यापयति।
डॉ. श्रीमती द्विवेदी समये-समये विविधपुरस्कारैः सम्मानैश्च सभाजिता। यथा-उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थानस्य संस्कृत साहित्य विशेष पुरस्कारम्, दिल्ली संस्कृत अकादमी प्रदत्तं नाट्यलेखन पुरस्कारम्, विक्रम कालिदास पुरस्कारं चेयं प्राप्तवती।
     डा. श्रीमती मीरा द्विवेदी द्वारा प्रणीतानि, सम्पादितानि नैकानि पुस्तकानि सन्ति प्रकाशितानि यथा-आधुनिक संस्कृत महिला नाटककार, शब्द संवाद, चिन्तनालोक, चन्द्रापीड कथासंस्कृतनाट्यनिर्झरम्, अभिनवचिन्तनम्, काश्मीरक्रन्दनम्। अस्याः बहूनि शोधपत्राणि प्रकाशितानि। एवञ्चेयं द्विवेदी विभिन्नसंस्थासु संस्कृत साहित्यविषये व्याख्यान द्वारा आकाशवाणीदूरदर्शनमाध्यमेन च सततं संस्कृतसाहित्यस्य संवर्धने तस्य प्रचारे प्रसारे निरता सती सारस्वत साधनां करोति।
                                                  हिन्दी
डॉ. (श्रीमती) मीरा द्विवेदी का जन्म उत्तरप्रदेश के जालौन जिले में हुसेपुरा के समीप स्थित टीहर नामक ग्राम में वैद्य प्रयागनारायण दीक्षित एवं उनकी सहधर्मचारिणी श्रीमती चन्द्रप्रभा दीक्षित के घर 15-10-1964 ई. को हुआ। डॉ. मीरा ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा वृन्दावन स्थित मानवसेवासंघ के बालमन्दिर (बालिकाछात्रावास) में रह करके प्राप्त की। नगरपालिका बालिका माध्यमिक विद्यालय वृन्दावन से माध्यमिकशिक्षापरिषद् उत्तरप्रदेश की हाईस्कूल परीक्षा तीन विषयों में विशेष योग्यता के साथ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् उच्चशिक्षा के लिये राजस्थान में स्थित महिला शिक्षा के लिये अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त वनस्थलीविद्यापीठ के अन्तेवासी छात्रा के रूप में संस्कृत विषय से मास्टर्स आॅफ आर्टस् की उपाधि प्राप्त की। अनन्तर साहित्य शास्त्रा में डाॅक्टर आॅफ फिलाॅसफीकी उपाधि ग्रहण की। डॉ. मीरा द्विवेदी ने इसी अवधि में पारम्परिक पद्धति से उपाध्याय, शास्त्राी और आचार्य परीक्षाएं भी प्रथम श्रेणी में समुत्तीर्ण कीं।
        वनस्थलीविद्यापीठ से उच्चशिक्षा प्राप्ति के बाद आपने वहीं संस्कृत विभाग में 22 वर्ष तक अध्यापन कार्य किया। इस दौरान आप वहां व्याख्याता, रीडर और विभागाध्यक्ष जैसे पदों को सुशोभित करती रहीं। सम्प्रति अक्टूबर 2010 ई. से दिल्ली-विश्वविद्यालय के संस्कृतविभाग में सह-आचार्य पद पर अध्ययन-अध्यापन और शोधादिकर्म में संलग्न रहकर संस्कृत सेवा कर रहीं हैं।
      समय-समय पर आप को विविध पुरस्कारों और सम्मानों से समलंकृत किया गया। 1996 ई. में प्राप्त उत्तर-प्रदेश संस्कृतसंस्थान का संस्कृत-साहित्य-पुरस्कार, 2007 ई. में मौलिक एकांकी की रचना के लिये दिल्ली-संस्कृत-अकादमी द्वारा प्रदत्त नाट्यलेखन पुरस्कार तथा 20090 में विक्रमविश्वविद्यालय-कालिदाससमिति द्वारा प्रदत्त विक्रम-कालिदासपुरस्कार विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
डॉ. द्विवेदी द्वारा लिखित आधुनिक संस्कृत महिला नाटककार’ ‘शब्दसंवाद’ ‘चिन्तनालोकनामक शोधात्मक उत्कृष्ट ग्रन्थ प्रकाशित हैं। चन्द्रापीडकथा’, ‘संस्कृतनाट्यनिर्झरम्’, ‘अभिनवचिन्तनम्ग्रन्थों का आपने सम्पादन किया है। आप द्वारा रचित काश्मीरक्रन्दनम्काश्मीरसमस्या को बनाकर रचित मौलिक एकांकियों का संग्रह है। आपके पचास से अधिक उत्कृष्ट शोधलेख विविध पत्रा-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। अनेक राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय शोधसंगोष्ठिओं में आपने लगभग 50 शोधपत्रा और व्याख्यान प्रस्तुत किये हैं। आप राजस्थान माध्यमिक शिक्षापरिषद् अजमेर और एन.सी.ई.आर.टी. दिल्ली के द्वारा प्रकाशित पुस्तकों के निर्माण में भी अपना योगदान करती रहीं हैं। मानव संसाधन विकास मन्त्रालय की ई-पीजीसंस्कृतपाठशाला परियोजना में संस्कृत-ई-पाठों के निर्माण में भी आपने सहयोग किया है। विविध विश्वविद्यालयों की अकादमिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक संस्थाओं की सदस्यता के साथ-साथ आप आकाशवाणी जैसे माध्यमों से संस्कृत भाषा एवं साहित्य के प्रचार-प्रसार में विशेष भूमिका निभा रहीं हैं। इस समय दिल्लीविश्वविद्यालय के दक्षिणपरिसर के संस्कृतविभाग में प्रभारी पद को अलंकृत करती हुई डॉ. मीरा द्विवेदी संस्कृत की सतत सारस्वत साधना में संलग्न है।

रमेशकुमार पाण्डेय

      श्रीलालबहादुरशास्त्राीराष्ट्रियसंस्कृतविद्यापीठस्य कुलपतिपदे विद्यमानस्य प्रो. रमेशकुमारपाण्डेयस्य जन्म उत्तरप्रदेशस्य जौनपुरमण्डलान्तर्गते मयन्दीपुरग्रामे प्रतिष्ठिते विद्वत्कुले पितुः चन्द्रशेखर पाण्डेय महोदयानां गेहे 01 फरवरी 1959 तमाब्दे जातम्। आर्यशीलः स्वाध्यायनिरतश्च पाण्डेयः काशीहिन्दूविश्वविद्यालयात् संस्कृतमधिकृत्य एम.ए. ततः पी-एच.डी. इत्युपाधिञ्चाधिगम्य सम्पूर्णानन्द-संस्कृत-विश्वविद्यालयस्य साहित्याचार्यं, कामेश्वरसिंहदरभङ्गासंस्कृतविश्वविद्यालयस्य च विद्यावाचस्पतिः (डी.लिट्.) इत्युपाधिमर्जितवान्। तदित्थमेषः प्राच्यपाश्चात्योभयविधेऽपि संस्कृताध्ययनक्रमेऽस्ति नदीष्णः।
      उत्कलप्रदेशस्य श्रीजगन्नाथपुर्यां राष्ट्रियसंस्कृतसंस्थानाङ्गीभूते श्रीसदाशिवकेन्द्रीय-संस्कृतविद्यापीठे अष्टौ वर्षाणि यावत् साहित्यशास्त्रामध्याप्य 1995 तः 1999 ख्रीष्टीय संवत्सरं यावत् नवदिल्ल्यां, श्रीलालबहादुरशास्त्रीराष्ट्रियसंस्कृतविद्यापीठस्य साहित्यसंस्कृतिसंकाये उपाचार्यपदे साहित्यम् अध्याप्य तत्रौव शोधप्रकाशनविभागे आचार्यपदं निव्र्यूढवान्। राष्ट्रियसंस्कृतसंस्थानस्य श्रीलाल-बहादुर-शास्त्री-राष्ट्रिय-संस्कृत-विद्यापीठस्य च पाठ्यक्रमनिर्माणसमितौ सम्मानितसदस्यः असौ विविध प्रशासनिकपदमपि निभालितवान्। अनेन विश्वविद्यालयेषु शैक्षणिक समितेः सदस्यपदमपि निब्र्यूढम्। अद्यावधि 18 पुस्तकानां लेखनं अथ च 12 पुस्तकानां सम्पादनं विहितम्। पत्रापत्रिकाषु च त्रिंशदधिकाः शोधलेखाः समाचारपत्रोष्वपि विविधविषयकाः लेखाः प्रकाशिताः। विद्यापीठस्य शोधप्रभा’-शोधपत्रिकायाः नियमितरूपेण प्रकाशनं सम्पादनञ्च विहितम्।
अनेन अनेकेषु राष्ट्रियान्ताराष्ट्रियसम्मेलनेषु भागं गृहीत्वा तत्रा तत्रा च शोधपत्रां प्रस्तूय सुरभारत्याः प्रचार-प्रसारे असाधारणं योगदानं विहितम्।
                                                                        हिन्दी
प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय का जन्म उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के अन्तर्गत मयन्दीपुर गाँव के एक प्रतिष्ठित विद्वत्कुल में 01-02-1959 में हुआ। आपके पिता का नाम चन्द्रशेखर पाण्डेय था। विनयशील एवं स्वाध्यायनिरत प्रो. पाण्डेय ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए., पी-एच.डी. की उपाधियों को प्राप्त कर सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से साहित्याचार्य एवं कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय से डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त की। इस प्रकार आप प्राच्य एवं पाश्चात्य उभय विधाओं में प्रचलित संस्कृत के अध्ययन परम्परा में निष्णात हैं।
उडीशा के श्री जगन्नाथपुरी में प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के श्री सदाशिवकेन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ में आठ वर्षों तक साहित्यशास्त्रा का अध्यापन कर 1995 से 1999 तक नई दिल्ली में स्थित श्री लाल बहादुर शास्त्राी राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ के साहित्य संस्कृति संकाय के अन्तर्गत साहित्य विभाग में उपाचार्य के रूप में अध्यापन किया पुनः उसी विद्यापीठ के शोध प्रकाशन विभाग में आचार्य पद को सुशोभित किया है।
आपने विद्यापीठ के अनेक ग्रन्थों का सम्पादन एवं प्रकाशन किया है। राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान तथा श्री लाल बहादुर शास्त्राी राष्ट्रिय संस्कृत विद्यापीठ के पाठ्यक्रम निर्माण समिति के आप सम्मानित सदस्य रहे हैं तथा अनेक प्रकार के प्रशासनिक पदों का भी निर्वाह किया है। विश्वविद्यालयों के शैक्षिक समिति के सदस्य रहे हैं। विद्यापीठ की शोधप्रभा नामक शोध पत्रिका का नियमित प्रकाशन एवं सम्पादन के साथ आपने अब तक कुल 18 पुस्तकों का लेखन तथा 12 पुस्तकों का सम्पादन किया है। राष्ट्रीय तथा अन्तराष्ट्रीय पत्रिकाआंे में लगभग 30 शोध लेख तथा राष्ट्रिय समाचार पत्रों में विविध विषयक लेख प्रकाशित हैं। आपने राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय अनेक सम्मेलनों में भाग लेकर एवं शोध एवं प्रस्तुत करके संस्कृत के प्रचार-प्रसार में असाधारण योगदान किया।
सम्प्रति आप श्री लाल बहादुर शास्त्राी राष्ट्रिय संस्कृत विद्यापीठ के कुलपति पद का निर्वहण कर रहे हैं।

वागीश शर्मा दिनकर

 डॉ. वागीश शर्मा दिनकरःज्येष्ठ-शुक्ल-तृतीयायां 2022 वैक्रमाब्दे जूनमासस्य द्वितारिकायां पञ्चषष्ठ्युत्तरैकोनविंशति- शततमे ख्रिस्ताब्दे (02-06-1965) उत्तर प्रदेशान्तर्गते गाजियाबाद-जनपदस्थे धौलाना-ग्रामे पूज्यपादयोः स्वनामधन्ययोः श्रीप्रकाशवती-आचार्य-रामनाथसुमनयोः मातापित्रोः पवित्रो गृहे जन्म लेभे।
संस्कृतव्याकरणसाहित्ययोः हिन्दी-संस्कृत-काव्यरचनायाश्च प्रारम्भिकं ज्ञानं तत्रा भवद्भिः स्वपितृचरणैरेवाधिगतम्। पूज्यः आचार्यसुमनमहाभागः पाणिनीयव्याकरणस्य महान् पण्डित आसीत्।
डॉ. वागीशः प्रारम्भिकीं माध्यमिकीञ्च शिक्षां स्वकीये ग्रामे एवाऽलभत। इण्टरमीडिएट परीक्षाम् आर.आर. इण्टर कालेज पिलखुवातः उत्तीर्णो जातः। तदनन्तरं पिलखुवास्थ-राणा-शिक्षा-शिविर-स्नातकोत्तरमहाविद्यालयात् बी.ए. परीक्षां प्रथमश्रेण्यामुत्तीर्य एम.ए. (संस्कृत) परीक्षां प्रथमश्रेण्यां एल.आर. कालेज साहिबाबादात् अर्जितवान्। ततो चैधरीचरणसिंहविश्वविद्यालयसम्बद्धे पिलखुवास्थ आर.एस.एस. स्नातकोत्तरमहाविद्यालये संस्कृतविभागे प्राध्यापकपदे नियुक्तोऽध्यापनं समारभत। अद्यापि तत्रौव महाविद्यालये संस्कृतविभागे अध्यक्ष/एसोसिएट प्रोफेसरपदे नियुक्तः सन् पठनपाठनेन विविधसाहित्यसर्जनकर्मणा च संस्कृतस्य श्रीवृद्धिं कृतवान् दिनकरः। तदनु एभिः चैधरीचरणसिंह विश्वविद्यालयादेव डॉ. रामकिशोरशर्ममहोदयानां मार्गनिर्देशने 2007 तमे वर्षे श्रीभार्गवराघवीयमहाकाव्यस्य समीक्षात्मकमध्ययनम् विषयमाश्रित्य पी-एच.डी. इत्युपाधिः प्राप्तः। सम्पूर्णानन्दसंस्कृतविश्वविद्यालय वाराणसी द्वारा ईशानुकथादर्शनबिन्दुः इति विषयमनुसन्धाय 2015 ईशवीये वर्षे विश्वविद्यालयस्य वाचस्पतिः’ (डी.लिट्) इत्युपाधिना अलंकृतः वागीश दिनकरः। उत्तरप्रदेशसंस्कृतसंस्थानेन ईशानुकथादर्शनबिन्दुः इत्याख्या कृतिः शंकर-पुरस्कारेण सभाजितः। अस्य पर्यवेक्षणे-निर्देशने संस्कृतसाहित्यस्य विविधपक्षानधिकृत्य अनेकशोधार्थिनः पी-एच.डी. उपाधिं लब्धवन्तः। अनेन बहूनि ग्रन्थरत्नानि प्रणीतानि। प्रतिष्ठिताभिः संस्थाभिः बहुधा पुरस्कृतोऽयं जनः। अमरीका-श्रीलंका- नेपाल-सिंगापुर देशेषु प्रो. दिनकरेण भूयांसि व्याख्यानानि प्रदत्तानि, काव्यपाठानि च प्रस्तुतानि। निखिलेऽपि भारते विदेशे च सुविदितोऽयं वीररससिद्धः कविरूपेण प्रसिद्धः। नैकेषां विश्वविद्यालयानां शोधोपाधिसमितौ पाठ्यक्रमसमितौ च आन्तरिक-बाह्यसदस्यत्वेनायं दायित्वानि समुद्ववाह। आकाशवाणी-दूरदर्शनयोः अनेन बहवः साहित्यिककार्यक्रमाः वार्ताः काव्यपाठाः प्रस्तूतयन्ते च।
आधुनिकसमये संस्कृतकविसम्मेलनानि अपि लोकप्रियाः भवेयुः इति जनान्दोलने महती भूमिकां निर्वहति।
                                                         हिन्दी
डॉ. वागीश शर्मा दिनकरका जन्म दो जून उन्नीस सौ पैंसठ को उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद जनपद के धौलाना ग्राम में स्वनामधन्य श्रीमती प्रकाशवती व आचार्य रामनाथ सुमन के पुत्रा के रूप में हुआ। आपको संस्कृत व्याकरण, साहित्य व काव्य रचना का प्रारम्भिक ज्ञान बाल्यकाल में ही अपने पूज्य पिताश्री प्रसिद्ध वैयाकरण एवं जाने माने मनीषी आचार्य सुमन जी से हो गया था।
वागीश दिनकर की प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा अपने ग्राम में ही हुई तथा इण्टर मीडिएट परीक्षा आर.आर. इण्टर कालिज, पिलखुवा से उत्तीर्ण कर यहीं राणा शिक्षा शिविर (पी.जी.) कालेज से बी.ए. परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। आपने एम.ए. संस्कृत उपाधि एल.आर. कालेज साहिबाबाद से अर्जित की। आप 1988 से आर.एस.एस. (पी.जी.) पिलखुवा में संस्कृत प्रवक्ता पद पर नियुक्त होकर अद्यावधि संस्कृत विभागाध्यक्ष व एसोसिएट प्रोफेसर पद पर रहकर साहित्य सृजन करते हुए संस्कृत के प्रति युवापीढ़ी को जाग्रत कर रहे हैं। आपने संस्कृत के उद्भट विद्वान स्वामी रामभट्टाचार्य जी के महाकाव्य श्रीभार्गवराघवीयम्पर डॉ. रामकिशोर शर्मा के निर्देशन में शोधकर पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी ने डाॅ0 दिनकर के अवतारवाद पर ग्रथित ग्रंथ ईशानुकथादर्शनबिन्दुःको अपनी सर्वोच्च उपाधि डी.लिट्. (वाचस्पति) प्रदान की तो वहीं उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान ने शंकर नामित पुरस्कार प्रदान किया। आपके शोधनिर्देशन में साहित्य के विविध पक्षों को लेकर अनेक शोधार्थियों ने संस्कृत में पी-एच.डी. उपाधि प्राप्त की। आपने अनेक ग्रंथ लिखे। अनेक प्रतिष्ठित प्रतिष्ठानों व सम्मानित संस्थाओं ने आपको अभिनन्दित-सम्मानित किया। अमेरिका, श्रीलंका, नेपाल, सिंगापुर आदि देशों में आपके व्याख्यानों व काव्य-पाठ किया है।
संस्कृत कवि सम्मेलन लोकप्रिय हो, इस दिशा में प्रयासरत हैं।

जनार्दन प्रसाद पाण्डेय

       प्रो. जनार्दनप्रसादपाण्डेयमणेर्जन्म उत्तरप्रदेशान्तर्गतजौनपुरजनपदस्य शकरानामके ग्रामे 1962 ईसवीये वर्षे अक्टूबरमासस्य द्वितारिकायामभवत्। एतेषां माता स्व. श्रीमती रमादेवी तथा च पिता आचार्यप्रवरपण्डित- कामताप्रसादपाण्डेयश्च स्तः। बाल्यकाले एव मातुरसमयनिधनवशान्मणेर्हृदि संवेदनानां सुतरामाधिक्यं समजायत। सैव संवेदना कालान्तरे कवितारूपे प्रकटिता जाता। प्रो. मणेः प्रारम्भिकशिक्षा ग्रामस्य विद्यालयेषु अभवत्। उच्चशिक्षा इलाहाबादविश्वविद्यालये अभवत्। संस्कृत-परास्नातक परीक्षायां मणिः इलाहाबादविश्वविद्यालयीयवरीयतासूच्यां स्थानमलभत्। अनेन ‘‘नाट्यशास्त्रो समुपलब्धानां काव्यशास्त्राीय-तत्त्वानां समीक्षात्मकमध्ययनम्’’ इति विषयं समवलब्य प्रो. अभिराजराजेन्द्रमिश्र-महोदयानां निर्देशने शोधकार्यं कृत्वा ‘‘डाॅक्टर आॅफ फिलासोफी’’ इति उपाधिः लब्धः। मणिना ‘‘संस्कृतवाङ्मये समुपलब्धानां प्रमुखरामकाव्यानां तुलनात्मकं साहित्यिकसमालोचनम्’’ इति विषयं नीत्वा इलाहाबाद विश्वविद्यालये पोस्टडाॅक्टरलशोधकार्यमपि कृतम्।
      मणेः प्रथमा नियुक्तिः उत्तराखण्डस्थराजकीयस्नातकोत्तरमहाविद्यालये संस्कृतप्रवक्तृपदे जाता। पुनश्च इमे राष्ट्रियसंस्कृतसंस्थानस्य मानित विश्वविद्यालयस्य गúानाथझापरिसरे प्रयागे प्रवाचकाः अभवन्। इदानीं तत्रौव साहित्यविभागे आचार्याः सन्ति। प्रो. मणिः संस्कृत-हिन्दी-लोकभाषानां कविः अस्ति।
    प्रो. जनार्दनमणिना अद्यावधि नवसंख्याकाः ग्रन्थाः विलिखिताः। ते सर्वे प्रकाशितास्तथा च उत्तर प्रदेश संस्कृतसंस्थान- दिल्ली संस्कृत अकादमी पक्षतः पुरस्कृताश्च सन्ति। तेषु-1. निस्यन्दिनी (1995) 2. जानकीगीतम् (1995) 3. नीराजना (2001) 4. रागिणी (2002) 5. सकलरससार सङ्ग्रहः (2011) 6. संस्कृतवाङ्मये कविशिक्षा (2011) 7. नृपविलासः (2011) 8. जिजीविषा (2011) 9. नन्दसमुच्चयः (2015) इति इमे परिगणिताः। प्रो. मणिना अष्टाधिक- शतराष्ट्रियान्ताराष्ट्रियसंगोष्ठीषु शोधपत्राणि पठितानि येषु षष्टि-शोधपत्राणि प्रकाशितानि सन्ति।
प्रो. जनार्दनेन अद्यावधि राष्ट्रपतेः महर्षि वादरायणव्याससम्मानसहिताः षोडशसम्मानाः लब्धाः। येषु-
1. महाकविकालिदाससम्मानः (1993) 2. विविध पुरस्कारः (1995) 3. पं. प्रतापनारायणस्मृतिपुरस्कारः (1995)
4. पण्डितराजजगन्नाथपुरस्कारः (1997) 5. सर्टिफिकेट आॅफ आॅनर (1997) 6. व्यासध्वजपुरस्कारः (2000)
7. विशेषपुरस्कारः (2001) (2002) 8. विविधपुरस्कारः (2002) 9. दीपाराधाकालिदासपुरस्कारः (2002)
10. महर्षिकण्वसम्मानः (2002) 11. साहित्यप्रवीणसम्मानः (2008) 12. प्रभाश्रीसम्मानः (2011) 13. साहित्यकारसम्मानः (2015) विशेषेण परिगण्यन्ते।
अनेन पञ्च-नाटकेषु अभिनयः कृतः। पञ्चदशाधिकनाट्यानां निर्देशनं कृतम्। आकाशवाणीदूरदर्शनमाध्यमेन एतेषां संस्कृतकवितानां प्रसारणं भवति।
                                                                              हिन्दी
प्रो. जनार्दन प्रसाद पाण्डेय मणिका जन्म उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद के शकरा नाम के गाँव में 02 अक्टूबर 1962 ई. को हुआ था। इनकी माता स्व. रमादेवी तथा पिता आचार्य प्रवर पं. कामताप्रसाद पाण्डेय हैं। बाल्यकाल में ही माता के असामयिक निधन से मणि के हृदय में संवेदनाओं का आधिक्य हो गया। वही संवेदना कालान्तर में कविता के रूप में प्रकट हुई।
प्रो. मणिकी उच्चशिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में सम्पन्न हुई। इन्होंने ‘‘नाट्यशास्त्रा में उपलब्ध काव्यशास्त्राीय तत्त्वों का समीक्षात्मक अध्ययन’’ विषय पर शोधकार्य करके डाॅक्टर आॅफ फिलासोफीउपाधि प्राप्त की। ‘‘संस्कृत-वाङ्मय में उपलब्ध प्रमुख राम काव्यों का तुलनात्मक साहित्यिक समालोचन’’ विषय पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पोस्ट डाॅक्टरल रिसर्च भी किया।
मणि की पहली नियुक्ति गवर्नमेण्ट पोस्ट ग्रेजुएट कालेज लेंसडाउन उत्तराखण्ड में प्रवक्तासंस्कृत के पद पर हुई। तदुपरान्त राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान (मानित विश्वविद्यालय) गंगानाथ झा रिसर्च कैम्पस इलाहाबाद में रीडर हुए। सम्प्रति वहीं प्रोफेसर हैं। प्रो. मणि संस्कृत हिन्दी लोकभाषा के कवि हैं।
प्रो. मणि ने अबतक पन्द्रह ग्रन्थों का लेखन किया है जिनमें नौ ग्रन्थ प्रकाशित हैं। ये ग्रन्थ उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान लखनऊ तथा दिल्ली संस्कृत अकादेमी से पुरस्कृत है। यथा- 1. निस्यन्दिनी (1995) 2. जानकीगीतम् (1995) 3. नीरजना (2001) 4. रागिणी (2002) 5. सकलरससार संग्रह (2011) 6. संस्कृतवाङ्मये कविशिक्षा (2011) 7. नृपविलासः (2011) 8. जिजीविषा (2011) 9. नन्दसमुच्चयः (2015)। आपने एक सौ आठ राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय शोध संगोष्टियों में शोधपत्रा पढ़ा है जिनमें साठ शोधपत्रा प्रकाशित हैं।
प्रो. मणि ने अब तक राष्ट्रपति प्रदत्त महर्षि वादरायण सम्मान सहित सोलह सम्मान प्राप्त किया है। जिनमें  महाकविकालिदास सम्मान (1993), पं. प्रतापनारायण स्मृति पुरस्कार (1995), पण्डितराजजगन्नाथ पुरस्कार (1997), व्यासध्वज पुरस्कार (2000), दीपाराधाकालिदास पुरस्कार (2002), महर्षि कण्व सम्मान (2002), साहित्य प्रवीण सम्मान (2008) आदि प्रमुख हैं। आपने पाँच नाटकों में अभिनय किया है तथा पन्द्रह से अधिक नाटकों का निर्देशन किया है। रेडियो एवं टेलीविजन से इनकी कविताओं का प्रसारण हुआ है।

बनमाली बिश्वाल

समकालिक-संस्कृत-साहित्य-प्रसङ्गे समर्थ-सर्जकस्य (कवेः गद्यकारस्य, नाट्यकारस्य), लब्धप्रतिष्ठ-समीक्षकस्य तथा सुप्रसिद्धसम्पादकस्य च प्रो. बनमाली बिश्वालस्य जन्म 4.5.1961 तमे दिनांके ओडिशा-प्रान्ते पूज्य-पितुः स्व. नारायण बिश्वालस्य तथा पूज्याया मातुः स्व. सत्यभामा देव्याश्च चतुर्थ-पुत्रारूपेण अभवत्। जन्मना उत्कलीयस्य डॉ. बिश्वालस्य कर्मतीर्थं विगतेभ्यः 27 वर्षेभ्यः तीर्थराजः प्रयाग एवास्ति। राष्ट्रिय-संस्कृत-संस्थानस्य, गङ्गानाथ-झा-परिसरे आचार्य-पदे प्रतिष्ठिताः डाॅ0 बिश्वाल-महोदयाः इदानीं पुराणेतिहास-प्रसिद्धायां प्रष्ठिानपुर्यां (झूंसी) स्थायी-रूपेण निवसन्तः सततं सारस्वत-साधनायां तत्पराः सन्ति तथा संस्कृत-भाषा-साहित्ययोः सेवायां पूर्णतया समर्पिताः सन्ति।
तेलिआख्य-स्वग्राम-समीपस्थे दधिवामन-संस्कृत-विद्यालये प्रथमां, पुरीस्थे जगन्नाथ-वेद-कर्मकाण्ड-महाविद्यालये मध्यमां, सदशिव-केन्द्रीय- संस्कृत-विद्यापीठे शास्त्री-परीक्षां तथा श्रीजगन्नाथ-संस्कृत-विश्वविद्यालये आचार्य-परीक्षां च प्रथम-श्रेण्याम् उत्तीर्य डॉ. बिश्वाल-महोदयेन पुणे-विश्वविद्यालयात् एम.ए. एम.फिल. एवं यू.जी.सी. जे.आर.एफ.-रूपेण पी.एच.डी. उपाधयः सफलतया समधिगताः। अनेन व्याकरण-दर्शन-वैदिक-लौकिक-साहित्य-पाण्डुलिपि-विज्ञान-शोधप्रविध्यादिषु विषयेषु यथासम्भवं विशेषज्ञता समर्जिता। आधुनिक-संस्कृत-साहित्य-क्षेत्रो एतेषां योगदानं महत्त्वपूर्णं वर्तते यत्रानेन स्व-कारयित्राी-प्रतिभायाः, भावयित्राी-प्रतिभायाश्च परिचयः प्रदत्तः। डॉ. बिश्वालस्य रचनादक्षता संस्कृत-हिन्दी-अंग्रेजी-ओडिआदि-चतसृषु भाषाभिः सर्जितेषु तत्साहित्येषु प्रतिफलिता दृश्यते।
डॉ. बिश्वालस्य प्रकाशित-रचनासु सङ्गमेनाभिरामा, व्यथा, ऋतुपर्णा, प्रियतमा, वेलेण्टाइन्डे-सन्देशः, दारुब्रह्म, यात्रा (मौलिक-संस्कृत-कवितासंग्रहाः), नीरवस्वनः, बुभुक्षा, जगन्नाथचरितम्, जिजीविषा (मौलिक-संस्कृत-कथासंग्रहाः), तारा अरुन्धती, विवेकलहरी (अनूदित-संस्कृत-कवितासंग्रहौ), जन्मान्धस्य स्वप्नः (अनूदित-संस्कृत-कथासंग्रहः), पत्रालयः (अनूदित-संस्कृत-नाटकम्), प्रमुखाः सन्ति।
  राष्ट्रीयस्तरे समायोजितेषु कविसमवायेषु डॉ. बिश्वालेन नैकवारं काव्यपाठः कृतः तथा आकाशवाणी-दूरदर्शनयोरपि एतेषां कविता-कथानां बहुधाप्रसारणमभूत्। शैक्षणिक-विदेश-यात्रा-प्रसंगे एते 2005 तमे वर्षे एकमासं यावत् जर्मनीदेशे (लाईप्चिक-विश्वविद्यालये तथा हाईडिलबर्ग-विश्वविद्यालये च) यात्रा कृता।
नैकासां पत्रा-पत्रिकाणां सफलतया सम्पादनं कृत्वा प्रो. बिश्वालेन संस्कृत-पत्राकारिता-क्षेत्रोऽपि महत्त्वपूर्णं योगदानं कृतम्। अनेन दृक्-नाम्न्याः संस्कृत-साहित्य-समीक्षा-पत्रिकायाः (31 अंकानां), संस्कृत-कथा-पत्रिकायाः कथासरितः (21 अंकानां), जर्नल आफ गड्गानाथ झा कैम्पस इत्याख्यायाः अन्ताराष्ट्रिय-शोधपत्रिकायाः (07 अंकानां) तथा कासाञ्िचदन्यासां पत्रा-पत्रिकाणां (पद्यबन्धा-8 अड्कानां, उशती-2 अड्कयोः, शाश्वती-5 अड्कानां, मधुछन्दा-7 अड्कानां) तथा नैकेषामभिनन्दन/स्मृति-ग्रन्थानां सम्पादनमपि कृतम्।
   स्वकीयानामेतासामुपलब्धीनां कृते प्रो. बिश्वाल-महोदयाः इतः पूर्वमपि उत्तरप्रदेश-संस्कृत-संस्थानेन, दिल्ली-संस्कृत-अकादम्या, लखनऊस्थेन भाउराव-देवरस-सेवान्यासेन, प्रयागस्थेन हिन्दी-साहित्य-सम्मेलनेन, भुवनेश्वरस्थेन उपेन्द्रभञ्जपीठेन, बालेश्वरस्थेन के.के. ओमेन्स महाविद्यालयेन, कोलकातास्थ-भारतीयभाषापरिषदादि-प्रतिष्ठित-संस्थाभिः पञ्चदशाधिकैः पुरस्कारैः/सम्मानैश्च सभाजिताः सन्ति।
                                                                 हिन्दी
समकालिक संस्कृत-साहित्य के समर्थ सर्जक (कवि, गद्यकार, नाट्यकार), प्रतिष्ठा-प्राप्त समीक्षक     
सुप्रसिद्ध सम्पादक प्रो. बनमाली बिश्वाल का जन्म ओडिशा के याजपुर जिला में दिनांक 04.05.1961 को पूज्य पिता स्व. नारायण बिश्वाल एवं पूज्या माता स्व. सत्यभामा देवी के चतुर्थ पुत्र के रूप में हुआ। जन्मना उत्कलीय डा. बिश्वाल का कर्मतीर्थ विगत 27 वर्षो से तीर्थराज प्रयाग ही रहा है। राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, गङ्गानाथ झा परिसर, प्रयाग में आचार्य पद पर प्रतिष्ठित डा. बिश्वाल इस समय पुराणेतिहास-प्रसिद्ध प्रतिष्ठानपुरी (झूंसी) में स्थायी रूप से वास करते हुए सतत सारस्वत साधना में तत्पर हैं और संस्कृत भाषा एवं साहित्य की सेवा में अपने को पूर्ण समर्पित किये हुए हैं।
      अपने गाँव तेलिआ के समीपस्थ दधिवामन संस्कृत विद्यालय से प्रथमा, पुरीस्थ जगन्नाथ वेद कर्मकाण्ड महाविद्यालय से मध्यमा, सदाशिव केन्दीय संस्कृत विद्यापीठ से शास्त्री एवं जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय से आचार्य परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होकर डा. बिश्वाल ने पुणे विश्वविद्यालय से एम.ए., एम.फिल. एवं यू.जी.सी. जे.आर.एफ. के रूप में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने व्याकरण, दर्शन, वैदिक व लौकिक साहित्य, पाण्डुलिपिविज्ञान, शोधप्रविधि आदि विषयों में यथासम्भव विशेषज्ञता अर्जित की। आधुनिक संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में भी उनका योगदान महत्त्वपूर्ण है जहाँ उन्होंने अपनी कारयित्री एवं भावयित्री दोनों ही प्रतिभाओं का परिचय दिया है। डा. बिश्वाल की रचना-दक्षता संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी एवं ओडिआ जैसी चार भाषाओं में सर्जित उनके साहित्य में प्रतिफलित है।
      प्रो. बिश्वाल की रचना-धर्मिता के अनेक पक्ष हैं। मौलिक शोध के साथ-साथ कविता, कथा, ललितनिबन्ध, उपन्यास, नाटक, बालसाहित्य आदि तमाम नवीन सर्जनात्मक विधाओं में उन्होने अपना रचना-सामर्थ्य सिद्ध किया है। अब तक उनके 50 से अधिक पुस्तकें (मौलिक, अनूदित, सम्पादित) प्रकाशित हैं और कई अन्य प्रकाशन की प्रतीक्षा में हैं। साथ ही डा. बिश्वाल के 120 शोधपत्र, 50 पुस्तक-समीक्षाएं, 15 साक्षात्कार तथा कई स्मृतिलेख विविध राष्ट्रिय/अन्ताराष्ट्रिय पत्र-पत्रिकाओं एवं अभिनन्दन/स्मृति-ग्रन्थों में प्रकाशित हैं। उन्होंने दशाधिक पुस्तकों का पुरोवाक्/अग्रलेख भी लिखा है। उनकी प्रकाशित रचनाओं में सङ्गमेनाभिरामा, व्यथा, ऋतुपर्णा, प्रियतमा, वेलेण्टाइन्डे-सन्देशः, दारुब्रह्म, यात्रा (संस्कृत-कवितासंग्रह), नीरवस्वनः, बुभुक्षा, जगन्नाथचरितम्, जिजीविषा (संस्कृत-कथासंग्रह), तारा अरुन्धती, विवेकलहरी (अनूदित संस्कृत-कवितासंग्रह), जन्मान्धस्य स्वप्नः (अनूदित संस्कृत-कथासंग्रह), पत्रालयः (अनूदित संस्कृत-नाटक), वञ्च तुमे मो आयुष नेइ, कश्चित्कान्ता....(ओडिआ कवितासंग्रह), सकालर मुहँ (ओडिआ कथासंग्रह), The समासशक्तिनिर्णय of  कौण्डभट्ट, The concept of उपदेश in Sanskrit Grammar, पतञ्जलि as a Philosopher and Grammarian, भर्तृहरि as a Philosopher and Grammarian, व्याकरणतत्त्वालोचनम्, Studies on Sanskrit Grammar and grammatical concepts, A new approach to Philosophy of Sanskrit Grammar, Orissan Contributions to Sanskrit Grammar (शोधपरक ग्रन्थ)योगरत्नावली, वाक्यवाद, लिङ्गप्रकाश, लिङ्गनिर्णय (हिन्दी एवं अंग्रेजी में अनूदित शास्त्रीय ग्रन्थ), वाक्यदीपिका, मनसिजसूत्रम्, कविरहस्य, प्रतिध्वनिः, जगन्नाथ-सुभाषितम् (दो भाग), सूक्तिमुक्तावली आदि (सम्पादित ग्रन्थ) उल्लेखनीय हैं। इस के अतिरिक्त डा. बिश्वाल ने राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान के विविध परियोजना के अन्तर्गत संस्कृत-स्वाध्याय-सामग्री (10 पुस्तकों), ई-टेक्स्ट (2 पुस्तकों) तथा दूरस्थ-शिक्षण-सामग्री (10 पुस्तकों) के लेखन एवं सम्पादन में अपना योगदान सुनिश्चित किया है।
      प्रो. बिश्वाल ने अब तक 120 राष्ट्रीय, अन्ताराष्ट्रीय सम्मेलन/संगोष्ठी/ कार्यशालाओं में न केवल शोधपत्र प्रस्तुत किया, किन्तु उनमें से अनेकों में सारस्वत अतिथि, मुख्यातिथि, विशिष्टातिथि या फिर सत्राध्यक्ष के रूप में विचार व्यक्त किये। आधारपुरुष के रूप में आमन्त्रित होकर वे अनेक संस्थाओं में विशिष्ट व्याख्यान भी दिये हैं। डा. बिश्वाल के निर्देशन में अब तक 30 शोधछात्र शोधकार्य सम्पन्न करके विद्यावारिधि (पीएच.डी.) उपाधि प्राप्त कर चुके हैं और 10 अन्य शोधछात्र सम्प्रति कार्यरत हैं।
      राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित कविसमवायों में डा. बिश्वाल ने अनेक वार काव्यपाठ किया तथा आकाशवाणी व दूरदर्शन से भी उनके काव्य/कथा आदि बहुधा प्रसारित हुए। शैक्षणिक विदेश-यात्रा के प्रसंग में उन्होंने 2005 में एक मास के लिए जर्मनी (लाईप्चिक यूनिवर्सिटी एवं हाईडिलबर्ग यूनिवर्सिटी) की यात्रा की। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में एम. फील एवं पी. एच. डी. हेतु कई शोधप्रबन्ध/लघुशोधविनिबन्ध लिखे गये हैं और कई अन्य लिखे जा रहे हैं।
      अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सफल सम्पादन कर डा. बिश्वाल ने संस्कृत-पत्रकारिता को भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने संस्कृत साहित्य-समीक्षा-पत्रिका दृक् (31 अंक), संस्कृत-कथा-पत्रिका कथासरित् (21 अंक), अन्ताराष्ट्रिय शोधपत्रिका जर्नल आफ गङ्गानाथ झा कैम्पस (07 अंक) तथा कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं (पद्यबन्धा - 8 अंक, उशती – 2 अंक, शाश्वती – 5 अंक, मधुछन्दा – 7 अंक, कई अन्य सोवेनियर) एवं अभिनन्दन ग्रन्थों का सम्पादन भी किया है।
      प्रो. बिश्वाल को इस से पहले उत्तरप्रदेश संस्कृत संस्थान, दिल्ली संस्कृत अकादमी, भाउराव देवरस सेवान्यास, लखनऊ (युवापुरस्कार), हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद, उपेन्द्रभञ्जपीठ, भुबनेश्वर, के. के. ओमेन्स कालेज, बालेश्वर, भारतीय भाषापरिषद्, कोलकाता जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं से 15 से अधिक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।

वासुदेव द्विवेदी


            संस्कृत की उन्नति के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले पं0 वासुदेव द्विवेदी शास्त्री का जन्म देवरिया जिले के भवानी छपरा नामक गांव में 1970 ई. में हुआ। इनके पिता का नाम यमुना प्रसाद द्विवेदी
            सनातन धर्म हाई स्कूल के व्यावर नगर के में जब ये प्रथमा कक्षा में पढ़ते थे उसी विद्यालय के मध्यमा कक्षा में गोवर्द्धन पीठ के पूर्व शंकराचार्य चन्द्रशेखर शर्मा भी मध्यमा कथा भी पढ़ते थे।
            चन्द्रशेखर के वाक् पटुता एवं धारा प्रवाह संस्कृत बोलने से प्रभावित होकर कठोर श्रम शुरू किया। अपने पिता के साथ हमेंशा संस्कृत में बोलना शुरू किया। कुछ ही समय में ये संस्कृत बोलने में पटु हो गये। 15 वर्ष की अल्पायु में इनका विवाह तथा पिता का निधन हो गया। इसके बाद पं0 द्विवेदी अपनी मां के कहने पर अपना अध्ययन चालू रखा तथा क्रमशः साहित्याचार्य एवं वेदाचार्य की उपाधि प्राप्त की।
            द्विवेदी जी प्रवृत्ति छात्रावास से ही देश और समाज की सेवा करने की तीव्र इच्छा थी। इन्होंने 1942 में स्वतंत्रता आन्दोलन में भी भाग लिया। कहने पर भी इन्होंने संस्कृत के प्रचार का सुनश्चय किया। परिवार के आर्थिक भरण पोषण करने हेतु इन की मां रोजगार के लिये बार-बार कहती थी परन्तु अपने संस्कृत प्रचार के काम के लिए मां को मना लिया। पत्नी भी जीवन पर्यन्त साथ दी।
            संस्कृत प्रचार का आरम्भ और दिशा
            भारत के स्वंतन्त्रता प्राप्ति के दिन ही यह देश भक्त भारत हित संस्कृत भाषा में देख रहा था और इस शुभ पुण्य का कार्य का शुभारम्भ भी। सार्वभौम प्रचार कार्यालय की स्थापना कर किया। अध्ययन काल से ही इनकी अभिरूचि संस्कृत की उन्नति और प्रचार मंे थी। इन्हें इस कार्य के लिए न तो किसी प्रकार के धन वैभव की इच्छा थी और नही कोई पद प्राप्त कर यश एवं धनार्जन की इच्छा। ये तो संस्कृत के सेवक थे और इसके उत्थान की तीव्र लालसा के लिये सम्पूर्ण देश के प्रत्येक नगर, ग्राम में घूम-घूम कर संस्कृत का नव जागरण करना था। इनका जीवन आडम्बर रहित भोग लिप्सा मान अपमान से उपर उठ चुका था। संस्कृत प्रचार में इनकी पत्नी का भी यथेच्छ सहयोग मिलता रहता। अपने पुत्र पौत्रों को भी संस्कृत पढ़ने के लिए प्रेरित कर इस कार्य से भी जोड़े रखा।
            देश का कोई ऐसा मंच शेष नहीं था कोई ऐसी संस्था या व्यक्ति, शेष नहीं था जहां ये उपस्थित न रहे हों। सभी जगह संस्कृत की उन्नति के लिए कोई भी मौका नहीं छोड़ते थे। एक ओर जहां सार्वभौम संस्कृत प्रचार कार्यालय जिसका बाद में नाम सार्वभौम संस्कृत प्रचार संस्थान रखा ये संस्कृत सम्भाषण (बोल चाल में संस्कृत) के लिए कार्य होता था वहीं ये स्वंय विविध संस्थाओं में उपस्थित होकर प्रचार करते थे। 1945 में सनातन धर्म सभा द्वारा गोरखपुर में आयोजित संस्कृत सम्मेलन को सम्बोधित करने पहुँचे सन् 1962 में आचार्य द्विवेदी को एक बार समाचार पत्र के विज्ञापन द्वारा ज्ञात हुआ कि आजमगढ़ के चिउटीडाॅ 5 ग्राम में एक संस्कृत सभा होने वाली हैं निमंत्रण पत्र के बिना ही ये उस गांव में प्रातः निर्धारित तिथि को पहुँच गये। वहाॅ ज्ञात हुआ कि सभा के तिथि में परिवर्तन कर दिया गया हैं। वहां थके हारे द्विवेदी एक सज्जन के घर भोजन कर दूर से बस स्टेशन तक पहुँचे।
            1947 में इन्होंने अपने ही गृह जनपद देवरिया में साइकिल को प्रचार रथ बनाकर विविध संस्कृत विद्यालयों, अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में जा जाकर संस्कृत का अलख जगाना शुरू किया। साइकिल में सार्वभौम संस्थान की नाम पट्टिका देखने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ हैं। जब इनके द्वारा संस्थापित स्ंास्थान का जीर्णोद्वार होना था इन्होंने सहयोग के लिए संस्कृत सेवियों का आह्वान किया। जब तक संस्थान का जीर्णोंद्धार कार्य चला तब तक अस्सी पर स्थित मुमुक्ष भवन से स्थान प्राप्त कर इस यज्ञ को सतत् रूप से संचालन करते रहे। संस्कृत प्रचार के लिए आचार्य द्धिवेदी नित नवीन योजनाओं का समावेश करते थे कभी अंग्रेजी स्पीकींग कोर्स के साथ जोड़कर तो कभी कुछ और। एक एक छात्र को वे संस्कृत सीखने के लिए प्रोत्साहित करते थे। चाय पिलाकर या मध्याह्न में चूड़ा दही खिलाकर लोगों को आत्मीय बना लेते थेेेेेेेे। संस्कृत प्रचार-प्रसार के लिए गठित संस्था उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान में भी इन्होंने रहकर एकमासात्मक सरल संस्कृत सम्भाषण शिविर का संचालन किया। प्रतिदिन की कक्षा को लेखवद्ध कर तत्कालीन निदेशक श्री प्रयागदत्त चतुर्वेदी ने इसे यहां से प्रकाशित कराया।
            अपने घर का नाम संस्कृत गृह रखने का ये आग्रह करते थे। तमाम प्रकार के भित्ति चित्र फोल्डर बनाकर बांटना। तथा विभिन्न संस्थाओं में लगवाना इनके प्रचार का एक अन्य प्रकल्प था। संस्कृत सम्वर्द्धन के लिए अनुकूल वातावरण और सामग्री निर्माण में आप सिद्ध हस्त थे।
            आरम्भिक काल में सार्वभौम संस्कृत प्रचार कार्यालय के लिए निजी भवन नहीं था इससे कार्य में वाधा आती थी। पडरौना नगर के निवासी परम विद्वान पं0 मातादीन शर्मा ने बंद पड़े खेतान संस्कृत विद्यालय को संस्कृत कार्य के लिए सार्वभौम कार्यालय को देने हेतु खेतान जी से आग्रह किया तत्कालीन जिलाधिकारी महेश प्रसाद की स्वीकृति के उपरान्त कोलकाता में सार्वभौम के नाम से उस संस्था का पंजीकरण हुआ। आचार्य द्विवेदी अपने शिष्यों का मनोवल हमेशा ऊँचा करते रहते थे। वहाँ से पढ़े लोगों का एक विशिष्ट पहचान था संस्कृत भाषा में बोलना, धारा प्रवाह बोलना। वक्तृत्व कला में निष्णात होने के कारण उनके छात्र हर सभा में विजय श्री पाते थे। एकहरे वदन के मितभाषी द्विवेदी अमृतभाषी थी। ग्रन्थों से उन्हें अत्यन्त अनुराग था। सार्वभौम संस्थान में उन्होंने एक पुस्तकालय भी बना रखे थे। वे संस्कृत के प्रति
हमेंशा सतर्क और अद्यतन रहते थे। हर प्रदेश के संस्कृत विद्वानों से उनका व्यक्तिगत सम्पर्क था। संस्कृत जगत की प्रत्येक घटनाओं की जानकारी रखते थे। जहाँ हस्तक्षेप की आवश्यकता हो वे आगे आते थे। आपने अद्यापि नाम से अपना एक संस्मरण ग्रन्थ जीवन के अंतिम समय में लिखा जब वे ह्दय रोग से ग्रस्थ थे। उसमें आचार्य द्विवेदी प्रत्येक विद्वान एवं संस्था का नाम्ना स्मरण किया है, जहाँ-जहाँ वे गये थे। यह ग्रन्थ वस्तुतः संस्कृत संस्थाओं एवं संस्कृतज्ञ व्यक्तियों का विश्वकोश (सन्दर्भ) ग्रन्थ है। यह संस्कृत जगत् के ऐतिहासिक घटनाओं, परिवर्तनों का भी प्रामाणिक संकलन हैं।

रामचन्द्र पाण्डेय

बी.34/118-38, मानस नगरदुर्गाकुण्डवाराणसी.

शैक्षणिक अनुभव-(33वर्ष)-
व्याख्याता-ज्योतिष- केन्द्रियसंस्कृतविद्यापीठ,जम्मू(राष्ट्रियसंस्कृतसंस्थाननईदिल्ली),1973-1980
रीडर- ज्योतिष विभागकाशी हिन्दू विश्वविद्यालयवाराणसी । 1980-1991
प्रोफेसर-ज्योतिषविभाग- काशी हिन्दू विश्वविद्यालयवाराणसी। 1991-2004
शोधनिर्देशन- 30, 25शोध उपाधि प्राप्त ।
प्रशासनिक अनुभव-
अध्यक्ष- ज्योतिष विभागकाशी हिन्दू विश्वविद्यालयवाराणसी। 1986-2003
संकायप्रमुख- संस्कृतविद्याधर्मविज्ञानसंकायकाशी हिन्दू विश्वविद्यालयवाराणसी।1991,1993-1995
सम्मानित पद-
पीठाध्यक्ष- सवाई जयसिंह ज्योतिर्विज्ञान पीठज.रा.राजस्थान संस्कृतविश्वविद्यालयजयपुर, 2006-2009
सदस्य- पञ्चाङ्गसुधारसमितिभारत सरकार, 1998-2000
अध्यक्ष- सार्वभौम संस्कृत प्रचार संस्थानवाराणसी।
सचिव/प्रबन्धक- नैसर्गिक शोध संस्थावाराणसी।
अध्यक्ष-भारतीय वैज्ञानिकों की विश्वस्तरीय मान्यता प्रतिष्ठापन समिति,
कोषाध्यक्ष- पट्टाभिराम वेदमीमांसानुसन्धान केन्द्रवाराणसी। 5वर्ष
सम्पादक-
प्रधान सम्पादक-विश्वपञ्चाङ्गकाशी हिन्दू विश्वविद्यालयवाराणसी ।1986-1995
प्रधान सम्पादक- काशिका ट्रिनीडाड पञ्चाङ्ग, 2वर्ष
सम्पादक- भारतीयवाङ्मय का वृहद् इतिहासउत्तरप्रदेश संस्कृत संस्थानलखनऊ ।
सम्पादक- नैसर्गिकी अर्धवार्षिक पत्रिका ।
शोध सहायक- सर्व भारतीय काशिराज न्यास, 1967-1973
संगोष्ठियों मे प्रतिभागिता (अध्यक्षमुख्यवक्तावक्ता)-
राष्ट्रिय- 55
अन्तरराष्ट्रिय- 12
संगोष्ठी आयोजन- 6
प्रकाशन-
पुस्तक-14
लेख-60
संयुक्त प्रकाशन- वामनपुराणकूर्म पुराण
शैक्षणिक योग्यता-
आचार्य(सिद्धान्त ज्योतिष) वा.संस्कृतविश्वविद्यालयवाराणसीप्रथम श्रेणीदो स्वर्णपदक प्राप्त ,   1965
विद्यावारिधि(पी-एच.डी)सिद्धान्त ज्योतिष, 1969,सं.वि.वि.वाराणसी। (शोधप्रबन्ध प्रकाशित)
आचार्य ( फलित ज्योतिष ) प्रथम श्रेणीवा.सं.वि.वि.वाराणसी। 1971
सम्मान-
राष्ट्रपति सम्मान-संस्कृतमहामहिम राष्ट्रपति द्वारा,राष्ट्रपतिभवननई दिल्ली । 2009
भास्कराचार्यसम्मानदिल्ली संस्कृत अकादमीनई दिल्ली, 2011
ब्रह्मर्षि सम्मान- महामहिम राष्ट्रपति द्वाराराष्ट्रपति भवननईदिल्ली,( अ.भा.प्रा.ज्यो.संस्थानद्वारा प्रयोजित।) 2011
आर्यभट सम्मान- राजभवनजयपुरअ.भा.प्रा.ज्यो.संस्थानजयपुर । 2007
विशिष्ट सम्मान- उत्तरप्रदेश संस्कृत संस्थानलखनऊ। 2007
विशिष्ट सम्मान - उत्तरप्रदेश संस्कृत संस्थानलखनऊ, 2004
कणाद सम्मान-  मेरठवेद-ज्योतिष अनुसन्धान संस्थानमोदीनगरउ.प्र.1998
अन्यकार्य-
नैसर्गिक शोध संस्था की स्थापना ।
प्रायोगिक ज्योतिष शिक्षण का प्रारम्भ,  जम्मू,वाराणसी,जयपुर ।
ज्योतिष प्रयोगशाला एवं लघु तारामण्डप की स्थापनाजम्मूवाराणसीजयपुर ।

Mahavir Agrawal Prof. (Dr.)

Professor & Head , Deptt. of Sanskrit
Acharya & Pro Vice Chancellor          
Gurukula Kangri Vishwavidyalaya, Haridwar (Uttarakhand)
Vice President, UttaraKhand  Sanskrit Acadamy, Haridwar
Educational Qualification                           
M.A. (Sanskrit, Veda, Hindi) (All First Div.), Vyakranacharya
            Ph. D. in Sanskrit    Topic       Valmiki Ramayan me Rasa Vimarsha
            D.Litt. in Sanskrit   Topic       Vedic Artha Vyavastha (Vedic Economics)

Merit Achievement                                        Always hold first position in all examination

Teaching Experience
                        UG/PG                                   39 years
Research experience                                     27 years
(i)              55 students have been awarded      Ph. D. degree on different streams of Sanskrit
           and Vedic literature.
(ii)            10 students are registered for Ph. D. degree.
Administrative Experience                         
(i) 3 years 6 months as Registrar of Gurukula Kangri Vishwavidyalaya, Haridwar
(ii) 6 years as Head of the Department
(iii) 2 year as Dean of the Faculty
(iv) Presently Working as Acharya & Pro Vice Chancellor of Gurukula Kangri Vishwavidyalaya, Haridwar since July 1, 2010
(v)   Hon’ble Chief Minister , Uttarakhand appointed Vice President of Uttarakhand Sanskrit Academy since 2007.
Publication                                                   
(i) Valmiki Ramayan mein rasa vimarsha
            (ii) Vedic artha vyavastha
            (iii) Sanskrit Gadya Latika
(iv)             Explanation of 1,2,5th chapters of Raghuvansha Mahakavya with detailed commentary.
(v)               Ric Sukta sangrah
(vi)             Maha Kavi Kalidas
Edition                                                          
Chief Editor of Research Journal “Gurukula Patrika” of Gurukula Kangri Vishwavidyalaya, Haridwar since last 13 years.
Research papers and Articles
Many research papers on different aspects of Sanskrit literature especially Vedic literature have been published in many research journals of country.

Member of Academic Bodies
(i)                 Resource person for Refresher courses organized by Academic Staff Colleges of    different universities under UGC, New Delhi.
(ii)               Expert Member for various developmental activities of UGC, New Delhi.
(iii)      Expert Member for various examinations conducted by UPSC, New Delhi.
(iv)       Expert Member to PSC, Uttaranchal.
(v)            Expert Member to PSCs of Uttar Pradesh, Madhya Pradesh, Rajasthan for their
various examinations.
(vi)          Nominee of Hon’ble VCs for Research Development Committees and Board of
Studies of CCS University, Meerut, SCJM University, Kanpur, MD University, Rohtak, DR. BRA University, Agra, RML Avadh University, Faizabad, Kurukshetra University, Kurukshetra.
(vii)        Examiner of MA, Ph.D. and D.litt. in different universities.

Member of Administrative/ Professional Bodies
(i)              Vice President of All India Oriental Conference during 2008-10.
(ii)            Presently Section President, Vedic Studies , All India Oriental Conference
(iii)          Presently President of Haridwar Chapter of Interational Goodwill Society of
India.
(iv)  Founder Manager of Saraswati Vidya Mandir Inter College, Mayapur, Haridwar
since last 20 years.
(v)      Expert Member of X and XI Plan team of UGC, New Delhi to visit various
universities.
(vi)  Expert Member of Panel for Career Advancement Scheme of various universities.
(vii)  Senator of Gurukula Kangri Vishwavidyalaya, Haridwar.
Participation in Seminars and Conferences
Participated and chaired various sessions on Vedic literature in National and International conferences held in different universities. Some of the important are
(i)                 IX and X World Sanskrit Conference at New Delhi and Bangalore respectively.
(ii)               Akhil Bhartiya three days Sanskrit Seminar by Delhi Sanskrit Academy, New
Delhi.
(iii)             All India Oriental conferences at Vishakhapattnam, Haridwar, Rohtak, Pune,
Baroda, Varanasi.
(iv)             Kalidas Samaroh, Ujjain
Seminar/ Conference Organization
(i)              Co OS for All India Oriental Conference at Gurukula Kangri Vishwavidyalaya, Haridwar
(ii)            Director of National Seminar at Uttaranchal Sanskrit Academy, Haridwar
(iii)          Organizing Secretary for National Seminar on Veda and Valmiki Ramayana at Gurukula Kangri Vishwavidyalaya, Haridwar.
(iv)          Organizing Secretary for International Veda Conference at Gurukula Kangri Vishwavidyalaya, Haridwar.
Foreign Tours                                                          
Visited USA  (University of Texas) to attend and chair a conference organized by
WAVES
Visited UK (London) to deliver lectures on Indian Value system.
Awards and Honours         
Veda Vedanga Award- from Arya Samaj Santacruz, Mumbai in January 2011.
Arya Vibhushan Award- from Rao Harishchandra Charitable Trust, Nagpur in October 2008.
Samanvaya Award- from Swami Satyamitranand ji, founder Bharat Mata Mandir, Haridwar on occasion of MahaKumbh 2010 at Haridwar
Special Honour by Arya Samaj Bara Bazar, Panipat in year 2007
Special Honour by Nirdhan Niketan Ashram, Haridwar 2007                     
Honored by different Arya Samaj, Social organizations like Lions Club, Rotary Club and Bharat Vikas Parishad, different Universities on different occasions.
Special Mention
·         A program titled “Upanishad Sudha” was telecasted on Astha Channel for 1.5 years. It was a weekly programme and each episode was of 30 minutes.
·         More than 2 dozen small talks on various subjects of Sanskrit were aired from All India  Radio.
·         DD telecasted a special programme “Ek Mulakat” which was one to one interview on
personal achievements and role of Sanskrit in modern society. 
·         Widely invited by different religious gatherings on topics of Indian Values, Vedic Philosophies, Sanskrit literature etc.