शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

संस्कृत, रोजगार और सामाजिक विकास


कामन्दकीय नीतिसार में राजाओं के लिए कहा गया है कि –
    अहापयन्नृपः कालं भृत्यानामनुवर्तिनां ।    कर्मणामानुरूप्येण वृत्तिं समनुकल्पयेत् ।। 64
    काले स्थाने च पात्रे च नहि वृत्तिं विलोपयेत्। एतद्वृत्ति विलोपेन राजा भवति गर्हितः।। 65
राजा बिना समय गवाएं अपने अधीनस्थों के कार्य के अनुरूप रोजगार का सृजन करे। स्थान, काल और पात्र को देखकर इनके लिए रोजगार का सृजन करे। इनके रोजगार खत्म होने से राजा निंदित हो जाता है।
संस्कृत पढ़ने वालों के लिए अब रोजगार की कमी नहीं रह गई है। बस आपको संसकृत आनी चाहिए। आज जितने लोगों को काम दिया जा सकता है,उतने लोग मिल नहीं रहे हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान ने प्रदेश के विभिन्न जनपदों में त्रैमासिक संस्कृत संभाषण प्रशिक्षण शिविर चलाने के लिए समाचार पत्र में विज्ञापन दिया था। इसके एवज में बहुत कम ही आवेदन आ सके। इस संस्था को 500 प्रशिक्षकों की आवश्यकता है।  दिनांक 17 फरवरी 2018 को दैनिक जागरण तथा अमर उजाला समाचार पत्र के सभी संस्करणों में विज्ञापन दिया गया है। आवेदन करने की अंतिम तिथि 28 फरवरी 2018 है। आप डाक द्वारा अथवा upsanskritsansthanam@yahoo.com इस ईमेल पर भी आवेदन पत्र भेज सकते हैं। 
जो आवेदक उत्तर प्रदेश के जिस जनपद तथा तहसील का निवासी होगा,उसे उसी जिले तथा तहसील में मौका दिया जाएगा। जिला स्तर पर प्रशिक्षण देने वालों का मानदेय प्रतिमाह रु. 20000 तथा तहसील स्तर पर प्रशिक्षण देने वालों का मानदेय रु.15000 है। इसके अतिरिक्त कुछ प्रासंगिक खर्चों के लिए बर महीने एकमुश्त धनराशि दी जाएगी। विद्यालयों में कार्यरत अध्यापक,जो संस्कृत संभाषण शिविर चलाने में निपुण हैं यदि वे प्रशिक्षक बनना चाहते हैं तो वे भी आवेदन कर दें। प्रयास होगा कि ऐसे योग्य प्रशिक्षकों को कार्य अवकाश दिलाकर इस योजना को आगे बढ़ाया जाए।
  इसमें आयु सीमा का कोई बंधन नहीं है। जो संस्कृत बोलना जानते हो और संभाषण शिविर चला चुके है, ऐसे लोगों मौका दिया जाएगा। 

रोजगार विज्ञापन


इस प्रकार के कार्यों के लिए आवेदकों की संख्या बहुत कम रहने के पीछे कारण यह हो सकता है कि सरकारी नौकरी तथा संस्कृत से संबंधित किसी भी नौकरी में संस्कृत भाषा में प्रश्न नहीं पूछे जाते और उनका उत्तर संस्कृत में देना अनिवार्य भी नहीं होता। जहां साक्षात्कार के माध्यम से नियुक्तियां होती हैं, वहां भी संस्कृत भाषा में साक्षात्कार नहीं लिए जाते। अर्थात् संस्कृत पढ़कर भी यदि आप संस्कृत भाषा नहीं जानते तो चलेगा। संस्कृत विषय लेकर पढ़ने वाले छात्र भी यह बखूबी जानते हैं कि नौकरी पाने के लिए संस्कृत भाषा का ज्ञान उतना आवश्यक नहीं है जितना कि विषयों का ज्ञान। छात्र अपने सहपाठियों को देखते हैं, जिसे ठीक से संस्कृत की पुस्तक पढ़ना नहीं आता, वह भी धराधर सफलता की सीढी चढ़ते आगे बढ़ जाता है। संस्कृत शिक्षा में यह बहुत ही बड़ी विसंगति है। इसे जब तक दूर नहीं किया जाएगा, संस्कृत शिक्षा में अन्य सभी प्रकार के प्रयास निरर्थक हैं। आप पुस्तक लिखिये, पढेगा कौन? पत्रिका, गीत गाने सब कुछ ऐसे लोगों के लिए काला अक्षर भैंस बराबर है।
फिलहाल उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान इस प्रयास में लगा है कि माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाए, ताकि वह कक्षा में संस्कृत विषय को संस्कृत भाषा के माध्यम से पढ़ाने में दक्ष हो जाएँ। इन शिक्षकों को प्रशिक्षित करने से इन्टर, स्नातक आदि कक्षाओं के अध्यापकों को योग्य छात्र मिलने लगेगें। उन्हें उच्च कक्षाओं में संस्कृत की आरम्भिक जानकारी देने की आवश्यकता नहीं होगी। आज प्रायः महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय के अध्यापकों के पास दो समस्यायें आती हैं 1.योग्य छात्र का अभाव 2. छात्र संख्या का अभाव। आरम्भिक कक्षाओं में संस्कृत माध्यम से शिक्षण परम्परा आरम्भ करने से छात्रों में संस्कृत कठिन है का भाव या अनुभव जाता रहेगा। वे अधिकाधिक संख्या में उच्च कक्षाओं में प्रवेश लेने लगेंगें। इससे परम्परागत तथा आधुनिक दोंनों धाराओं के विद्यालयों को लाभ मिलेगा। 
परम्परागत अर्थात् प्रथमा, मध्यमा वाले विद्यालयों में प्रायः छात्र संख्या का अभाव होता है। जहाँ विपुल मात्रा में छात्र मिलते हैं, यदि वहाँ इस योजना को शुरु किया गया तो लाभ अधिक मिलेगा। परम्परागत संस्कृत विद्यालय का माध्यम संस्कृत है।यहाँ संस्कृत के योग्य अध्यापक होते हैं। यहाँ आन्तरिक व्यवस्था में सुधार मात्र करने से ही अध्ययन अध्यापन का माध्यम संस्कृत हो सकती है। जाहिर सी बात है, उत्तर प्रदेश के सभी विद्यालयों के अध्यापकों को पढाने या प्रशिक्षित करने के लिए प्रशिक्षक चाहिए। आप यदि संस्कृत बोलना जानते हैं तो उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान आपको ही खोज रहा है। आइए इस लिंक पर जाकर आवेदन डाउनलोड कीजिए। 28 फरवरी 2018 के पहले ईमेल अथवा डाक के द्वारा आवेदन फटाफट भेज दीजिए।

योजना के सफल संचालन में प्रशिक्षकों की महती भूमिका होगी। हो सकता है कि यह विज्ञापन जन जन तक नहीं पहुँच सके अथवा इतनी मात्रा में अभ्यर्थी आवेदन करने को उत्सुक न हों अतः इस क्षेत्र में संलग्न संस्थाओं से पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षकों की उपलब्धता हेतु संस्कृत प्रचार प्रसार में संलग्न संस्थाओं से भी प्रस्ताव मांगा गया है।


यदि पूरी कार्ययोजना पर ध्यान दिया जाए तो इस सेक्टर में जबरदस्त उछाल आने की संभावना है। एक ओर सैकड़ों लोगों को रोजगार उपलब्ध होगा तो दूसरी ओर संस्कृत के प्रति सामाजिक चेतना जागृत होगी। जो ज्ञानी अध्यापक निराशा में घिर गए हैं, उनमें उत्साह का संचार होगा। आने वाले दिनों में प्रदेश के हर घर का एक बच्चा संस्कृत में बोलेगा।

सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

संस्कृत को विकासपथ पर ले जाने की योजना

संस्कृत भाषा के व्यापक प्रचार – प्रसार तथा सर्वतोमुखी विकास के लिए यहाँ कुल 12 मुख्य कार्ययोजनायें उद्धृत हैं, जिसे मैंने अथक परिश्रम से निर्माण किया है। योजनाओं के साथ- साथ सम्बन्धित उपयोजनायें भी लिखी हैं। इसे लागू करने में अनुमानित व्ययाकलन भी साथ ही साथ प्रस्तुत हैं। योजनाओं के अंत में प्रत्येक उपयोजनाओं का संक्षिप्त परिचय, उद्देश्य तथा इसके भावी परिणाम को भी सम्मिलित किया गया है।  योजना के निर्माण में संस्कृत के सर्वांगीण पक्ष को ध्यान में रखा गया गया है।











प्रशिक्षण योजना संख्या 1 का विस्तार











संकल्पना टिप्पणी










अवधारणा एवं संकल्पना- जगदानन्द झा