बुधवार, 20 दिसंबर 2017

उपहार में मिली पुस्तकें

कह नहीं सकता कि मैं बुद्धिजीवी समाज से हूं या नहीं, परंतु बुद्धिजीवी लोग मुझे बुद्धिजीवी ही मानते हैं। हो सकता है, उनमें से कुछ लोगों की यह धारणा मुझे बुद्धिजीवियों की पंक्ति में लाने की हो। वैसे भी एक बार एक राजनीति से जुड़ी महिला मुझे विद्वान् न मानते हुए मेरे द्वारा सम्पादित एक पत्रिका में से तथा एक दूसरी महिला ने एक पुस्तक से मेरा नाम हटवा चुकी है। तब से मैं भ्रमित भी हूँ और रह रहकर मुझे स्वयं पर सन्देह भी उठता है कि आखिर मैं क्या हूँ। मैं जब भी एकांत में होता हूं, इसपर सोचता हूं कि आखिर लेखक अपनी पुस्तकें मुझे उपहार में क्यों देते रहते हैं? उपहार में पुस्तकें पाना मेरे लिए सौभाग्य की बात होती है। मेरे लिए प्रिय वस्तुओं में पुस्तकों का स्थान सर्वोपरि है,अतः उपहार द्वारा प्राप्त पुस्तकें ज्ञानवर्धन के साथ आनंदवर्धन भी करती है।
        कुछ लोग मिलने पर और कुछ लोग डाक से भी पुस्तक भेजते हैं । इनमें से अधिकांश लेखकों का आग्रह होता है कि मैं उनकी कृतियों पर समीक्षा लिखूं। होना तो यह चाहिए कि जितना जल्द हो सके लेखक द्वारा प्राप्त पुस्तकों पर जल्द से जल्द समीक्षा लिखकर डाक से अथवा ईमेल से भेज दूं। परंतु प्रमादवश ऐसा नहीं हो पाया । मैंने भी निश्चय किया कि अपने ब्लॉग पर ही एक-एक कर क्रमशः पुस्तकों पर लिखता चलूँ। इनमें से अधिकांश पुस्तकें लेखकों की मौलिक रचना है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम पर लिखित समीक्षा पाठकों तक पहुंचाने का अधिक युक्ति युक्त माध्यम होगा।
   
       शक्ति प्रकाशन, इलाहाबाद से 2003 में प्रकाशित कनीनिका में कुल 75 गीतों की रचना उपलब्ध है। पुस्तक में अंतिम गीत का शीर्षक कनीनिका है, जिसके आधार पर इस पुस्तक का नामकरण किया गया है। सरस्वती, विन्ध्यवासिनी आदि की स्तुति के पश्चात् श्रावणमासे कृष्णारात्रिः दिशि दिशि विकरति रागं रे,
 पूर्वा प्रवहति मन्दं मन्दं हृदि हृदि जनयति कामं रे 
लिखकर कवि ऋतुओं पर मनोहारी गीतों का राग छेडकर पाठकों को मुग्ध करते है।  किसी विरहिणी की व्यथा कैसे उद्दीपित हो रही है, कवि उसके अन्तस् में उतरकर कह उठता है- प्रियं विना मे सदनं शून्यम्। केशव प्रसाद सरस राग के महान् गायक कवियों में से एक हैं। कवि ने पुरोवाक् में लिखते हुए अपनी इस उपलब्धि तक पहुँचने का वर्णन तो किया ही हैं ,साथ में पाठकों के लिए संदेश भी छोड़ जाते हैं। इन्होंने अपने गृह जनपद के प्रति अनुराग कौशाम्बीं प्रति में व्यक्त किया है। 
 प्रवहति यमुना रम्या सलिला। विलसति रुचिरा कौशाम्बिकला।।
2015 में प्रकाशित आचार्य लालमणि पाण्डेय की रचना संस्कृत गीतकन्दलिका का मूल स्वर आध्यात्मिक है।कवि गीतों के माध्यम से शारदा, गंगा की स्तुति कर प्रयाग तथा वृन्दावन तीर्थस्थलों के महिमा का गान करने लगते है। संस्कृतभाषा के कवि को संस्कृत की अत्यधिक चिंता है। सम्पूर्ण पुस्तक में  संस्कृत को लेकर कवि ने सर्वाधिक 8 गीतों की रचना की है। संस्कृत कवि सम्मेलन तथा अन्य मंच से कवि संस्कृत की रक्षा का आह्वान करते दिखते है।
शास्त्राणां नहि दर्शनन्न मनन्नाध्यापनं मन्थनम् --------सुधियः संरक्ष्यतां संस्कृतम्।।
  अभिनन्दनपत्र, स्वागत, श्रद्धांजलि आदि की परम्परा, पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तथा महेन्द्र सिंह यादव संयुक्त शिक्षा निदेशक पर आकर पूरी होती है। संस्कृत साहित्य की एक विधा समस्यापूर्ति की झलक भी हमें यहाँ देखने को मिलती है। समस्या पूर्ति कवित्व का निकष है। लालामणि पाण्डेय निःसन्देह सौदामिनी संस्कृत महाविद्यालय के संस्कृत कवि सम्मेलन रूपी उस निकष से गुजरते हुए  सौदामिनी राजते समस्या की पूर्ति करते है।
एका चन्द्रमुखी प्रिया रतिनिभा---  सौदामिनी राजते।।
 आत्मनिवेदन में कवि पुस्तक रचना का उद्येश्य संस्कृत का प्रचार लिखते हैं।
                         हीरालालं गुरुं नत्वा मानिकेन विभावितः।
                         संस्कृतस्य प्रचाराय कुर्वे कन्दलिकां मुदा।।


डॉ. प्रशस्यमित्र शास्त्री संस्कृत के जाने-माने हास्य लेखक और कथाकार हैं। अनभीप्सितम्, आषाढस्य प्रथमदिवसे तथा अनाघ्रातं पुष्पं के बाद मामकीनं गृहम् कथा संग्रह वर्ष 2016 में अक्षयवट प्रकाशन 26 बलरामपुर हाउस, इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ है । कथा लेखकों में प्रो. प्रभुनाथ द्विवेदी तथा बनमाली विश्वाल के बाद डॉ. शास्त्री मेरे पसंदीदा लेखक है। इनकी कथाओं में सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक समस्याओं का संघर्ष, वैयक्तिक उलझन, वृद्धजनों के प्रति उपेक्षा, संकीर्ण चिंतन आदि विषय वर्णित होते हैं। कथानक में सहसा मोड़ आता है जिससे पाठक रोमांचित हो उठता है। मामकीनं गृहम् में कुल 14 दीर्घ कथायें तथा 7 लघु कथाएं हैं। इसकी एक दीर्घ कथा है- विजाने भोक्तारं । इस कथानक में एक संस्कृत के धोती तथा शिखाधारी छात्र को विदेश से आई हुई एक छात्रा को पढ़ाने के लिए ट्यूशन मिल जाता है। इसकी जोरदार चर्चा कक्षा में होती है। एक दिन उसे अपने घर जाना पड़ता है । वह अपने स्थान पर दूसरे छात्र को ट्यूशन पढ़ाने हेतु भेजता है। यहां पर अभिज्ञानशाकुंतलम् और कालिदास पर रोचक चर्चा मिलती है । कहानी पढ़ते समय ऐसा लगता है कि विदेश से आई हुई छात्रा अपने दूसरे ट्विटर को पसंद करेगी, लेकिन अंततः धोतीधारी ट्विटर से उसकी शादी हो जाती है। पूरी कहानी संस्कृत शिक्षा, रूप सौंदर्य और सफलता के इर्द-गिर्द घूमती है। अंत में लेखक रूप-सौंदर्य के स्थान पर सफलता को प्रतिष्ठित करता है। यही कथा का सार है। 



सोमवार, 18 दिसंबर 2017

संस्कृत सम्भाषण शिविर चलाने के इच्छुकों से आवेदन आमंत्रण

अब मत कहना कि संस्कृत पढ़कर क्या होगा?
यदि आपने संस्कृत अध्ययन किया है और रोजगार की तलाश में हैं तब  उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ आपके लिए खुशियों की सौगात लेकर आया है। आपके लिए यहाँ सुनहरा अवसर यह है कि आप अपने घर के पास संभाषण की कक्षा चलाकर प्रतिमाह रू.10 हजार कमा सकते हैं। यह एक पार्ट टाइम जॉब है। एक त्रैमासिक संस्कृत संभाषण प्रशिक्षण की अवधि तीन माह की होगी। यदि आप सैलेक्ट हो जाते हैं तो मानिये घर के पास ही तीन माह में 30 हजार पा लिया। सबसे अच्छी बात यह है कि इसके लिए आपको कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ रहा है। इच्छुक अभ्यर्थी उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, नया हैदराबाद, लखनऊ 226 007 पते पर दिनांक 19 जनवरी 2017 तक आवेदन भेज सकते हैं। आवेदन पत्र का कोई शुल्क नहीं है। इसका विज्ञापन दैनिक समाचार पत्र उत्तर प्रदेश के सभी संस्करणों में दिनांक 19 दिसम्बर 2017 को प्रकाशित है। अब देर किसलिए फार्म डाउनलोड कीजिये,भरिये,डाक या ईमेल से भेज दीजिये।


 आवेदन पत्र उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान की वेबसाइट से डाउनलोड करें।
http://www.upsanskritsansthanam.org/pdf/Sambhashan-Avedan-patra-18dec17.pdf
अथवा इस लिंक से डाउनलोड किया जा सकता है ।
https://drive.google.com/file/d/0BzJLnI7PIoEqWGNacDlvTmRXYUdxOFJCeHhhRjl2UVZUUUww/view?usp=drivesdk

आवेदन करने की विधि

 यह आवेदन पत्र निःशुल्क है। 
अन्तिम तिथि 
आवेदन की अन्तिम तिथि 19 जनवरी 2018 के सायं 05ः00 बजे तक है।


फार्म के साथ यह डाक्यूमेंट लगाना नहीं भूलें।

(1) आवेदक स्वप्रमाणित आचार्य/एम0ए0 (संस्कृत) के अंक  पत्र की प्रतिलिपि संलग्न करें।
(2) सम्भाषण प्रशिक्षक द्वारा प्रदत्त सम्भाषण प्रशिक्षण प्राप्त करने का प्रमाण पत्र संलग्न करें।
(यदि आपने किसी संभाषण शिविर में प्रशिक्षण लिया है लेकिन उसका कोई प्रमाण पत्र नहीं मिला हो तो अपने प्रशिक्षक से लिखवाकर संलग्न करें कि आपने कब और कहाँ कितने दिनों का प्रशिक्षण लिया है)
(3) अभ्यर्थी आवेदन पत्र के साथ संस्कृत भाषा में एक पृष्ठ का तद् दिनांक का समाचार लिखकर संलग्न करें।
(4) किसी भी प्रकार की सेवा में संलग्न आवेदक को अपने नियोक्ता से एवं शोध अध्येतावृत्ति पा रहे को छात्र को अपने         निर्देशक से अनापत्ति प्रमाण पत्र देना होगा।
(5) आवेदन पत्र रजिस्टर्ड डाक द्वारानिदेशक, उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, न्यू हैदराबाद, लखनऊ के पते पर अथवा ई-मेल  upsanskritsansthanam@yahoo.com पर या सीधे कार्यालय में हाथों हाथ प्रेषित किया जा सकता है।
अन्य सूचनायें
(1) साक्षात्कार/परीक्षा की सूचना अभ्याथियों को ई-मेल/दूरभाष द्वारा दी जायेगी।
(2) साक्षात्कार/परीक्षा हेतु बुलाये जाने पर आवेदकों को मार्ग व्यय एवं किसी भी प्रकार का भत्ता नहीं दिया जायेगा।
(3) प्रशिक्षकों का चयन किया जाना इस बात की गारंटी नही है कि उन्हें प्रशिक्षण शिविर संचालन हेतु नियुक्त किया जाये।
(4) केवल न्यूनतम योग्यता/पात्रता की पूर्ति ही किसी को परीक्षा/साक्षात्कार हेतु बुलायेे जाने का आधार नहीं होगा। परीक्षा/      साक्षात्कार हेतु आमंत्रित किये जाने वाली सूची का निर्धारण संस्थान द्वारा किया जायेगा।
(5) आवेदन केवल उत्तर प्रदेश में रह रहे व्यक्तियों से आमंत्रित है, उत्तर प्रदेश के बाहर रहने वाले व्यक्ति को इस शर्त के      साथ आवेदन की अनुमति होगी कि वे प्रशिक्षण शिविर संचालन के समय उत्तर प्रदेश में निवास कर रहे होगें।
(6) प्रशिक्षक को अपने आवास आदि की व्यवस्था स्वयं देखनी होगी।
(7) साक्षात्कार/परीक्षा आदि अग्रिम सूचना हेतु कृपया संस्थान की वेबसाइट http://www.upsanskritsansthanam.org/ को देखें।
(8) साक्षात्कार/परीक्षा में उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को 15 दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण दिया जायेगा। तदनन्तर उनका चयन         किया जायेगा।
(9) 15 दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण शिविर में चयनित अभ्यार्थियों को संस्थान की आवश्यकता के अनुरूप उन्हें स्थानीय      स्तर पर केन्द्र आवंटित किये जायेगें।
(10) इस विज्ञापन को किसी भी समय वापस लेने/योजना बन्द करने का अधिकार निदेशक उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान,      लखनऊ को होगा।

रविवार, 17 दिसंबर 2017

व्याकरणशास्त्र परम्परा

नोट- मैंने फेसबुक पर प्रति शनिवार एवं रविवार को संस्कृतशास्त्रालोचनम् व्याख्यानमाला संचालित कराया है। व्याख्यानमाला का आरंभ व्याकरणशास्त्र परम्परा से हुआ,क्योंकि यह सभी शास्त्रों का मुख है। श्रोताओं के आग्रह पर यहाँ व्याख्यान के विषय को व्यवस्थित कर लिखा रहा हूँ।

व्याकरण शास्त्र के प्राचीन आचार्य-

व्याकरण शास्त्र का मूल आधार वेद है। वेद में व्याकरण के स्वरूप का वर्णन प्राप्त होता है।
          चत्वारि श्रृंगा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य ।
          त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महोदेवा मर्त्याम् आविवेश ।। (ऋग्वेद 4:58:3)
इस मंत्र में शब्द को वृषभ नाम से कहा गया है। इस वृषभ के स्वरूप का लर्णन किया गया है-  
नामआख्यातउपसर्गनिपात ये चार सींग,  भूतकालवर्तमानकालभविष्यकाल ये तीन पैर, सुप् (सुजस् आदि)तिङ् (तिप्तस्झि आदि) दो सींग (शीर्षे) प्रथमादि्वतीयातृतीयाचतुर्थीपंचमीषष्ठीसप्तमी ये सातों विभक्तियां इसके हाथ हैं, उरस्कण्ठःशिरस् इन तीन स्थानों से यह बंधा हुआ आबाज कर रहा है।
रामायण के किष्किन्धा कांड में राम हनुमान के बारे में लक्ष्मण से कहते हैं-  
              नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम्।
              बहु व्याहरतानेन न किंचिदपशब्दितम्। किष्किन्धा काण्ड, तृतीय सर्ग, श्लोक 29
निश्चित रुप से इसने सम्पूर्ण व्याकरण को भी सुना है,क्योंकि इसने बहुत बोला परन्तु कहीं भी व्याकरण की दृष्टि से एक भी अशुद्धि नहीं हुई।
महाभाष्य में पतञ्जलि ने भी व्याकरणशास्त्र परम्परा का उल्लेख करते हुए कहा है कि प्राचीन काल में संस्कार के बाद ब्राह्मण व्याकरण पढ़ते थे।
         "पुराकल्प एतदासीत् , संस्कारोत्तरकालं ब्राह्मणा व्याकरणं स्मधीयते ।" (महाभाष्य---1.1.1)
प्रश्न यह उठता है कि जब यह व्याकरण इतना प्राचीन है तो इसे सर्वप्रथम किसको किसने पढ़ाया? इसका उत्तर ऋक्तन्त्र 1.4 में मिलता है। व्याकरण के सर्व प्रथम प्रवक्ता ब्रह्मा थे।  ब्रह्मा वृहस्पतये प्रोवाच, वृहस्पतिरिन्द्राय, इन्द्रो भरद्वाजाय, भारद्वाजो ऋषिभ्यः। महाभाष्य के पस्पशाह्निक में शब्दों के बारे में प्रतिपादन करते हुए पतञ्जलि ने पुनः व्याकरणशास्त्र परम्परा का उल्लेख किया- वृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्दपारायणं प्रोवाच नान्तं जगाम, वृहस्पतिश्च प्रवक्ता, इन्द्रचाध्येता दिव्यं वर्षसहस्रमध्ययनकालो न चान्तं जगाम इति । इस परम्परा में अनेक आचार्यों का उल्लेख हुआ है। यह लगभग 10 हजार वर्ष की परम्परा है।
भरद्वाज-
भरद्वाज अंगिरस वृहस्पति के पुत्र तथा इन्द्र के शिष्य थे। युधिष्ठिर मीमांसक के अनुसार ये विक्रम सं. से 9300 वर्ष पूर्व उत्पन्न हुए। भरद्वाज काशी के राजा दिवोदास का पुत्र प्रतर्दन के पुरोहित थे।
भागुरि-  
भागुरि नाम का उल्लेख पाणिनि तथा पतंजलि ने किया है। न्यासकार ने इनके एक मत का उल्लेख किया है।
             वष्टि भागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयोः।
             आपं चैव हलन्तानां यथा वाचा निशा दिशा।।
पौष्करसादि-
महाभाष्यकारकार पतंजलि ने चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम् में पुष्करसादि के पुत्र पौष्करसादि के मत का उल्लेख किया है।
काशकृत्स्न-
पाणिनिना प्रोक्तं पाणिनीयम्, आपिशलम्, काशकृत्स्नम् इस महाभाष्य के वचन के अनुसार तथा वोपदेव कृत कविकल्पद्रुम के अनुसार काशकृत्स्न नामक वैयाकरण का पता चलता है। वस्तुतः महाभाष्य व्याकरण ज्ञान का मूल ऐतिह्य स्रोत है।
                 इन्द्रश्चन्द्रः काशकृत्स्नाऽपिशली शाकटायनः ।
                 पाणिन्यमरजैनेन्द्राः जयन्त्यष्टौ च शाब्दिकाः।।
शन्तनु- 
सम्प्रति इनके द्वारा रचित फिट् सूत्र प्राप्त होता है। शन्तनु द्वारा विरचित होने कारण इसे शान्तनव व्याकरण भी कहा जाता हैं। प्रातिपदिक अर्थात् मूल शब्द को फिट् नाम से कहा गया। इन सूत्रों में प्रातिपदिक के स्वरों (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित) का विधान किया गया है ।
गार्ग्य- अष्टाध्यायी में पाणिनि ने इस ऋषि के मत का उल्लेख अनेक सूत्रों में किया है।अड्गार्ग्यगालवयोः, ओतो गार्ग्यस्य आदि।
इस प्रकार पाणिनि ने अपने ग्रन्थ अष्टाध्यायी में शाकल्य, आपिशलि, काश्यप, चाक्रवर्मण, शाकटायन,व्याडि,शाकल्य आदि अनेक वैयाकरण आचार्यों के मत का उल्लेख किया है।

नोट- इस अधोलिखित भाग का सम्पादन तथा विस्तार करना शेष है।

व्याकरण ग्रन्थ परम्परा                                       

लेखक                            समय                             ग्रन्थ का नाम
पाणिनि                         2000 वर्ष पूर्व               अष्टाध्यायी
शालातुरो नाम ग्रामः, सोभिजनोस्यास्तीति शालातुरीयः तत्र भवान् पाणिनिः। 
कात्यायन                      3000  
पतंजलि                                                           महाभाष्य
चन्द्रगोभि                      12000 पू0                चान्द्रव्याकरण
क्षपणक                          विक्रम के एक शती में       उणादि की व्याख्या लिखा
भर्तृहरि                          4 शती                           वाक्यपदीप
देवनन्दी/जिनेन्द्र              5 3700 सूत्र                  जैनेन्द्र व्याकरण का औदीच्य प्राच्य पाठ मिलता है।
भोजदेव                         सं01075                      सरस्वतीकण्ठाभरण 6400 सूत्र
दयापालमुनि                  1082                           रूपसिद्वि शाकटायनव्याकरण नवीनी
वर्धमान                         1120                           गणरत्नमहोदधि
लंकास्थ बौद्व धर्मकीर्ति     1140                           रूपावतार
हेमचन्द्रसूरि       (जैनावर्ष) 1145                          सिद्वहैमशब्दानुशासन इस पर स्वोपज्ञा टीका‘ 6000
श्लोेक
क्रमदीश्वर                                                          संक्षिप्तसार
नरेन्द्राचार्य                     1250                           सारस्वत व्याकरण अनुभूतिस्वरूप की टीका सारस्वतप्रक्रिया
बोपदेव                         1325                           मुग्धबोधव्याकरण

पाणिनि -          
गुणरत्नमहोदधि में वर्धमान
पतंजलि इह पुष्यमित्रं याजयामः
टीका                             परम्परा                         
रामचन्दाचार्य                1450वि0                     प्रक्रिया कौमुदी
भट्टोजि दीक्षित               1570-1650                 वैयाकरण सिद्वान्त कौमुदी
ज्ञानेन्द्र सरस्वती             1551                           तत्वबोधिनी
जयादित्यवामन                                                  काशिका
दयानन्द सरस्वती                                               अष्टाध्यायी भाष्य कृत 30 आचार्य

कैयट                                         प्रदीप
अष्टाध्यायी के वृत्तिकार- व्याडि, कुणिः, माथुरः
वार्तिकभाष्यकार- हेलाराज- वार्तिकोन्मेष, राघवसूरि
व्याकरण के भाग
उणादि सूत्र, गणपाठ, धातुपाठ, शब्दानुशासन (खिलपाठ) परिभाषापाठ, फिट्सूत्र
व्याकरण के दर्शन ग्रन्थ
वाक्यपदीय        वृषभदेव ने स्वोपज्ञ टीका लिखी
पुष्यराज द्वितीय काण्ड पर टीका
हेलाचार्य तीनों पर लिखा परन्तु तृतीय पर उपलब्ध
मण्डन मिश्र        स्फोटसिद्वि
भरत मिश्र                      स्फोटसिद्वि त्रिवेन्द्रम से प्रकाशित
कौण्डभट्ट                       वैयाकरण भूषण सार
नागेश भट्ट          वैयाकरण सिद्वान्त मंजूषा
आधुनिक गुरूशिष्य परम्परा
गंगाराम त्रिपाठी
तरानाथ तर्क वाचस्पति
रामयश  त्रिपाठी             1884
गोपाल शास्त्री (त्रिपाठी) दर्शन केसरी
युधिष्ठिर मीमांसक

             
                                                
                                               लेखक- जगदानन्द झा
                                                  9598011847