मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

वेदों में वर्णित मांगलिक प्रतीक

भारतीय मांगलिक प्रतीकों का मूल स्रोत वेद है। मांगलिक प्रतीकों एवं प्रतीकों के भद्र रूप की कल्पना वेद में निसर्गतः प्राप्त है। जीवन के स्वस्तिभाव के प्रतीक स्वरुप स्वस्तिक की परिकल्पना की गयी। इसी प्रकार भद्रकलश (ऋग्वेद 3-52-15) पूर्ण कलश के रूप में धार्मिक अभिप्राय बना।देवताओं से जुड़े रहने के कारण प्रतीकों का मांगलिक स्वरूप स्वतः सिद्ध है। प्राचीन भारत के प्रमुख धर्मों यथा – ब्राह्मण, जैन एवं बौद्ध धर्म में मांगलिक प्रतीकों का महत्वपूर्ण  स्थान है। स्कंद पुराण, ललितविस्तर एवं रायपसेणीय सुत्त आदि विभिन्न ग्रंथों में विभिन्न मांगलिक अवसरों पर इन शुभ चिह्नों का वर्णन प्राप्त होता है। प्राचीन भारतीय कला में मांगलिक अभिप्रायों में लक्ष्मी का स्थान महत्वपूर्ण माना गया है। लक्ष्मी की कल्पना प्राचीन महाकाव्य के युग में पूर्ण रुप से साकार हुई। व्यापार एवं वाणिज्य की उन्नति एवं आर्थिक विकास तथा धन की बढ़ती हुई आवश्यकता और महत्व के फलस्वरूप लक्ष्मी पूजा उत्तरोत्तर लोकप्रिय होती गई। उपयोगी चिह्नों या मांगलिक प्रतीकों में गोधन (गोवंश)के कानों की सजावट में प्रयुक्त लक्ष्मांकन आते हैं। ऋग्वेद में गोरु के कान पर 8 के अंक जैसा चिह्न, अथर्ववेद में स्त्री-पुरुष युग्म या अन्य लक्ष्मों के दागे जाने का कथन महत्वपूर्ण है। मैत्रायणी संहिता के गोनामिका प्रकरण में गोधन के कानों पर विविध जनसमूहों द्वारा पहचान के लिए प्रयुक्त लक्ष्मों का परिचय तथा उसके बनाने का विधान मिलता है। गायों के लिए प्रचलित चिह्नों में स्थूणा (थूनी) कर्करी (वीणा या घट) सास्नाकृति (ललड़ी) प्रछिन्द्या  (कटी-फटी रेखा) दात्र (दराँती) आदि विशिष्ट थे।
 परिमंडल
जैमिनी ब्राह्मण में दी गई व्याख्या के अनुसार परिमंडल (अर्थात् वृत्त, चक्राकार, परिधि, गोल आदि) स्वरूप देवताओं एवं उनके दिव्य तथा अनंत गुणों का प्रतीक है –स एष प्रजापति ---- परिमंडलो भूत्वा अनन्ततो भूत्वा शये । ऋग्वेद में विष्णु से संबंधित चक्र के वर्णन में उसके मंडल के भीतर कुल मिलाकर 90 -90 की चार नवतियों का कथन है, जिसकी समग्र संख्या 360 होती है। यहां वृत के साथ-साथ उसके भीतर छुपे हुए दिशा- स्वस्तिक की चार भुजाओं का संकेत है। अथर्ववेद में किसी मंडलाकार कल्पना के अंतर्गत पद्म के विकसित फुल्ले का स्वरूप पुंडरीक “ शब्द से कथित है।
 स्वस्तिक

वृत्त के भीतर केंद्र से समकोण पर चतुर्दिक आकार- कल्पना को स्वस्तिक नाम दिया गया, जो सर्वोच्च मांगलिक एवं स्वस्ति कारक प्रतीक समझा जाता है। सैंधव शिल्प में भी इसका अंकन मिलता है। स्वस्ति के द्योतक कई मंत्र ऋग्वेद में है, किंतु शब्द के रूप में स्वस्तिक का प्रयोग नहीं हुआ है। ऋग्वेद में एक स्थान पर निसंदेह उसके नौ कोणों का कथन है, जिसके 8 पद और नवशक्ति वाली रूप को ऋत का स्पर्शी माना गया है। अवांतर दिशाओं की सूचक चार भुजाएं मिलाकर उसके 8 पद और नवशक्ति वाली रूप को ऋत का स्पर्शी माना गया है। अवांतर दिशाओं की सूचक चार भुजाएं मिलाकर उसके 8 पद (पैर, भुजा या रेखाचित्र) हैं, जिसके साथ केंद्र को लेकर 9 कोण बनते हैं। ऋग्वेद में 8 ककुभ या दिशाओं की कल्पना की गयी है। शतपथ ब्राह्मण में यह सूर्य की चतुर शक्ति है, जिसकी शक्तियां या कोण दिशाओं के सूचक हैं।
 प्रदक्षिणा
 ऋग्वेद में ही दाहिनी ओर कुंचित के सुंदर एवं शुभ कहे गए हैं (दक्षिणतः कपर्द)। प्रदक्षिणा-क्रम में परिक्रमा या परि- गमन ने आदरसूचक कृत्य के रूप में प्रदक्षिणा का सिद्धांत निर्धारित किया, जो सूर्य के उदय अस्त क्रम के अनुसार सृष्टि मार्ग माना गया। भारतीय विचारधारा में दिशाओं का क्रम सदैव इसी सिद्धांत पर वर्णित है- प्राची, दक्षिणा, प्रतीची एवं उदीची। दक्षिणा शब्द यज्ञ में दी जाने वाली आहुति और दान आदि के लिए इसी दृष्टि से शुरू हुआ। इसके अनुसार दक्षिण और वाम का शास्त्रीय निर्धारण समझा गया।
शूल एवं त्रिशूल
 षड्विंश ब्राह्मण में रुद्र को शूलपाणि बताया गया है, जो ऋग्वेद में रुद्र के पुत्र मरूद् देवों का विशेष आयुध है। ऐतरेय ब्राह्मण में रुद्र का इषु या बाण त्रिकांड है, जो परवर्ती त्रिशूल की प्राथमिक कल्पना का परिचायक है।
 लिंग
 लिंग पूजा अनादिकाल से प्रचलित लोक परंपरा रही है, जिसके साक्ष्य हड़प्पा सभ्यता से भी स्पष्ट ज्ञात है। ऋग्वेद में शिश्नदेवाः अर्थात लिंग को देवता मानने वाले लोगों का उल्लेख रोचक है। मूरदेवाः के रुप में भी संभवतः इसी पूजा पद्धति का संकेत है।
 गोष्पद, गोशफ
 अथर्ववेद, शतपथ ब्राह्मण, तैत्तिरीय संहिता के अनुसार गोधन के विशेष महत्व एवं धार्मिक महात्म्य की दृष्टि से गाय के खुर का चिह्न या छाप इस प्रतीक का मौलिक विचार था, जो प्रतीकात्मक भाषा में पशुधन का प्रतिनिधि माना गया।
  स्कम्भ
 सृष्टि-भवन के आधारभूत तत्व या टेक के रुप में स्कम्भ या ब्रह्म स्तंभ की कल्पना अत्यंत प्राचीन थी। ऋग्वेद में द्यावा पृथ्वी अथवा भुवनों को सहारा देने वाले सिद्धांत के लिए स्तंभ का उल्लेख कई बार हुआ है। इसी संदर्भ में इंद्र को सर्वोत्तम स्तंभ का स्वामी कहा गया है। अथर्ववेद में स्कम्भ को सर्वाधार कहा गया है, जिसके अंग-अंग में सृष्टि के विविध नियम, प्राकृतिक तत्व, लोक, देवता, काल, वेदादि की प्रतिष्ठा है।
 गरुत्मान् सुपर्ण
 वेदों में गरुत्मान्, सुपर्णश्येन आदि नामों से यह अभिप्राय विशेष प्रसिद्ध दिखाई देता है। उसे सर्वोच्च सत्ता, प्रजापति, संवत्सर, सूर्य आदि का प्रतीक समझा गया।
 इन्द्रमह
 इंद्र की ध्वजयष्टि के स्थापन का उत्सव कौशिक सूत्र में इंद्रमह नाम से वर्णित है। कला में उसका प्रतिनिधित्व इंद्रयष्टि या वैजयंती के मांगलिक प्रतीक द्वारा मिलता है।
 यूप
 यज्ञमय कर्मकांड में यूप स्थापना महत्वपूर्ण थी। जैमिनी ब्राह्मण में तो वीणा और यूप के विभिन्न भागों को क्रमशः समान गुणों या विशेषताओं वाला बताया गया है। तैत्तरीय ब्राह्मण में यूप को आदित्य का प्रतीक कहा गया है।
 स्तूप
 आचार्य वासुदेव शरण अग्रवाल के अनुसार स्तूप की कल्पना ऋग्वेद में पाई जाती है। वहां अग्नि की उठती हुई ज्वालाओं को स्तूप कहा गया है। जैन और बौद्ध संप्रदायों ने स्तूप- समाधि एवं उसकी पूजा को व्यापक रूप में अपनाया।
 पूर्ण कुंभ
 सर्व समृद्धि मंगल एवं पूर्णता के प्रतीक रूप में पूर्णकुम्भ ,वसुधानकोष, पूर्ण कलश, भद्रघट, मंगलकलश आदि नामों से अभिहित यह विलक्षण कल्पना भारतीय जीवन एवं कला का अभिन्न अंग है। ऋग्वेद में आ-पूर्ण कलश की स्थापना जीवन में उपलब्ध देवी समृद्धि और मांगलिक वैभव की सूचक ज्ञात होती है। अन्यत्र उसे सोम से भरा पात्र कहा गया है।
 यक्ष
 ऋग्वेद में यक्ष और उसके सद्म  का उल्लेख है। यक्ष पूजा को वरुण, मित्र आदि की पूजा से भिन्न एवं एवं नीचा कहा गया है। अग्नि तो यक्षों के भी अध्यक्ष कहे गए हैं ।भारद्वाज गृह्यसूत्र में विद्यार्थी को यक्ष के समान सुंदर होने का आशीर्वाद देने के साथ-साथ उसे महाराज कुबेर की सुरक्षा में दिया जाता था।
 गण एवं गणपति

गण, व्रात या समूह में बहुसंख्यक देवताओं की कल्पना ऋग्वेद से ही बद्धमूल दिखाई देती है। रुद्र, आदित्य, बसु तथा अश्विनीद्वय नामक देवों के चार प्रसिद्ध गण या वर्गों को मिलाकर 33 देवों का मंडल बनता है। मानव गृह्यसूत्र में 4 विनायकों के समूह या गण की शांति पूजा का विस्तृत संदर्भ विघ्नकारी गणों की मान्यता का सूचक है, जो विघ्नेश विनायक अर्थात् गणपति में समाहित हुई।

सोमवार, 9 अक्तूबर 2017

आयुर्वेद के अष्टाङ्ग

धन्वन्तरि जयन्ती (सं. 2074) पर विशेष ।

महापुरूषों के व्यक्तित्व तथा कृतित्व पर लेख लिखकर उनका पुण्यस्मरण करना मेरा स्वभाव है। उसी क्रम में इस वर्ष अपने इस ब्लाग पर आयुर्वेद के अष्टांग पर लेख लिखकर वर्षों से मानव जाति सहित अन्य प्राणियों के प्राणरक्षा करने में तत्पर रहे समस्त आयुर्वेदाचार्यों के प्रति अपना आदर व्यक्त कर रहा हूँ। मैं नहीं चाहता कि ये विद्यायें व्यक्ति या समूह विशेष तक सीमित रहे, जैसे पुरा काल में पाण्डुलिपियां रहती थी। स्वस्थ रहने का अधिकार सभी को है। अस्तु

 शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमारभृत्य, अगदतंत्र, रसायन तंत्र तथा वाजीकरण ये आयुर्वेद के आठ अंग है। अष्टांग हृदय में इसे ही इस रूप में विभाजित किया है- 
कायबालग्रहोर्ध्वांगशल्यदंष्ट्राजरावृषान्।
 अष्टावङ्गानि तस्याहुश्चिकित्सा येषु संश्रिता।। 5।।
 सुश्रुत संहिता में आये एक उल्लेख के अनुसार ब्रह्मा ने मनुष्य की सृष्टि के पूर्व ही आयुर्वेद का सृजन किया, जिसमें एक लाख श्लोक और एक हजार अध्याय थे।


1. शल्य तन्त्र

           संस्कृत के अनेक ग्रन्थों में आयुर्वेदीय अष्टाङ्ग के शल्य तंत्र का वर्णन प्राप्त होता है। इसके अन्तर्गत सन्धान कर्म (Plastic Surgery) तथा अंग प्रत्यारोपण दोनों प्रकार की चिकित्सा को लिया जाता है। अश्विनीकुमारों के चामत्कारिक कार्यों से तत्कालीन शल्य तंत्र की विकसित स्थिति का पता चलता है। अश्विनीकुमारों ने मधुविद्या तथा संधान विद्या का ज्ञान दधीचि से प्राप्त किया था, जिसका वर्णन उपनिषदो में है । कटे शिर को जोड़ने की कला प्रवण्यं विद्या कहलाती थी। इसी विद्या से अश्विनीकुमारों ने दधीचि और घोड़ों के सिर को एक दूसरे पर लगाया था।  इससे अंग-संरक्षण तथा अंग-प्रत्यारोपण का भी संकेत मिलता है। कौशिक सूत्र में शस्त्र आदि से अभिघात लगने से रूधिर प्रवाह या अस्थि भंग हो, तो लाक्षाक्वाथ से परिषेक तथा लाक्षाश्रृत दुग्धपान का विधान है। जैमनीय ब्राह्मण में एक आख्यान मिलता है, जिसके अनुसार किसी कुमार का शरीर रथचक्र से छिन्न हो गया था, उसे ठीक कर पुनजीर्वित किया गया। वाल्मीकीय रामायण में इन्द्र का अण्डकोश गिर जाने पर उनमें भेड के अण्डकोश के प्रत्यारोपण का आख्यान है। जैमनीय ब्राह्मण (2/77) में भी यही आख्यान मिलता है। इसी में मृतसंजीवनी, विशल्यकरणी, सवर्णकरणी और संधानी महौषधियों का भी उल्लेख मिलता है। महाभारत में भी शल्योधरण कोविद वैद्यों को निर्देश है। गुप्तकाल में भी शल्य क्रिया के समुन्नत होने का उल्लेख मिलता है।
शल्यक्रिया का प्रमुख ग्रन्थ सुश्रुत संहिता है। इसमें व्रणितागार, व्रण के साठ  उपक्रम, दग्ध, अष्टविध शस्त्रकर्म, उपयोगी यन्त्र शस्त्र, जलौका, सिराव्यध, अग्निकर्म तथा क्षारकर्म आदि का विस्तृत वर्णन है। आधुनिक शल्यशास्त्र ने सुश्रुत की ही बनायी गयी विधि अपनाई है। भारतीय शल्य की क्रिया अरब राष्ट्रों से होती हुई भूमध्य सागरवर्ती देशों में पहुँची। इटली में वर्ष 1545-1566 ई. में यह शल्य क्रिया सफलतापूर्वक होने की सूचना मिलती हैं। फ्रान्स में भी इसका प्रचार हुआ।
      दिवोदास धन्वन्तरि ने काशी में सुश्रुत प्रभृति शिष्यों को एवं तक्षशिला में प्रसिद्ध शल्यविद् जीवक को शल्य की शिक्षा प्रदान की थी। जो सफलतापूर्वक उदर और मस्तिष्क के कठिन शल्य कर्म करता था। राजाओं के सैन्य में सम्भवतः शल्य चिकित्सक अवश्य ही रहते रहे होंगे, किन्तु शनैः शनैः इनका ह्रास होने लगा तथा मध्य काल तक इनका क्षेत्र अत्यन्त संकुचित हो गया।
          अर्श और भगन्दर में क्षार सूत्र का प्रयोग चिरकाल से हो रहा है। क्षार का चिकित्सा और शल्य में व्यापक प्रयोग होने के कारण इसका एक विभाग क्षारतन्त्र के नाम से पृथक् विकसित हो गया, जिसके अन्तर्गत विभिन्न वनस्पतियों, क्षार निर्माण विधि तथा आमयिक प्रयोग का अध्ययन होता था। शस्त्र कर्म में जब मन्दता आयी तब सम्भवतः लोग विकल्प के रूप में क्षारकर्म, अग्निकर्म और रक्त मोक्षक आदि कर्मों को अपनाने लगे।
सुश्रुत संहिता के अतिरिक्त निम्नांकित तन्त्र शल्य सम्बन्धी हैं, जो सम्प्रति उद्धरण मात्र में उपलब्ध हैं।
1. औपघेनवतन्त्र, 2. औरभ्रतन्त्र, 3. पौष्कलावत तन्त्र, 4. वैतरण तन्त्र, 5. कृतवीर्य तन्त्र, 6. करवीर्य तन्त्र आदि।          इसके अतिरिक्त निम्नलिखित शल्य सम्बन्धी ग्रन्थ विशेष रूप से उल्लेखनीय है-
1.         शल्यतन्त्र समुच्चय-पं. वामदेव मिश्र
2.         सौश्रुति-पं. रमानाथ द्विवेदी
3.         संक्षिप्त शल्य विज्ञान-मुकुन्दस्वरूप वर्मा
4.         आधुनिक शल्य चिकित्सा के सिद्धान्त (आयुर्वेदीय एवं तिब्बती अकादमी लखनऊ द्वारा प्रकाशित)
5.         सर्जिकल इथिक्स इन आयुर्वेद (जी.डी. सिंघल)

2. शालाक्य तन्त्र

सुश्रुत संहिता में शालाक्य का वर्णन प्राप्त होता है। इसकी स्वतन्त्र संहितायें भी अनेक थीं।1 सम्प्रदाय में अनेक आचार्यो का उल्लेख प्राप्त होता हैं, जिन्होंने अपनी-अपनी विशिष्ट परम्परा का प्रवर्तन किया है। इन परम्पराओं में सबका अपना-अपना मौलिक वैशिष्ट्य रहता था। वैदिक वाङ्मय में शालाक्य तन्त्र सम्बन्धी सामग्री प्रभूत मात्रा में प्राप्त होती हैं। ब्राह्मण ग्रन्थों तथा कौशिक सूत्र में भी शालाक्य तन्त्र सम्बन्धी, सामग्री प्रचुर मात्रा में प्राप्त होती है। अश्विनीकुमारों द्वारा भी शालाक्य सम्बन्धी अनेक चमत्कारों को किये जाने का उल्लेख मिलता है।
आधुनिक काल में कुछ शिक्षण संस्थानों द्वारा प्राचीन शालाक्य को पुनरूज्जीवित करने का प्रयास हुआ है। इस कड़ी में आयुर्वेद महाविद्यालय पटना के प्राध्यापक पं. वामदेव मिश्र, राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय लखनऊ के डाॅ. रामानुज मिश्र तथा वाराणसी के डाॅ. श्रीधर पाठक एवं रामविहारी शुक्ल का प्रयास सराहनीय रहा। आयुर्वेदीय विधि से उन्होंने अनेक शालाक्य विकारों की सफल चिकित्सा किया।
प्रमुख शालाक्य ग्रन्थों में उल्लेखनीय हैं -
1.         शालाक्य तन्त्र-       पं. रमानाथ द्विवेदी।
2.         नेत्र रोग-               डा. मुज्जे।
3.         अभिनव नेत्र रोग चिकित्सा विज्ञान-पं. विश्वनाथ द्विवेदी।
4.         शालाक्य तन्त्र-       डा. रवीन्द्र चन्द्र चौधरी।

3. काय चिकित्सा

यद्यपि आयुर्वेद अष्टाङ्ग है तथापि उसका आद्य रूप त्रिसूत्र या त्रिस्कन्ध है। हेतु, लिंग और औषध यही आयुर्वेद का मुख्य लक्ष्यभूत प्रतिपाद्य विषय है। इसी का पल्लवित एवं विकसित रूप अष्टाङ्ग हैं। इस प्रकार निदान और चिकित्सा ही मुख्य हो जाता है। इसलिए काय चिकित्सा की सभी अंगों में प्रधानता है। अतएव निदान और चिकित्सा ये दो पक्ष काय चिकित्सा के माने गये। यद्यपि प्रारम्भ में इनमें कोई विभाजन नहीं था, परन्तु आगे चलकर दोनों का स्पष्ट विभाजन हो गया और दोनों पर ही पृथक् पृथक् वाङ्मय लिखे जाने लगे। अतः दोनों पर ही पृथक् पृथक् विचार किया जाना ही उपर्युक्त होगा।
निदान-यह शब्द मूल रूप में कारण वाचक है, लेकिन क्रमशः वह रोग विनिश्चय का कारण बना, इसलिये निदानपंचक को रोग विज्ञान कहा गया। हेतु, पूर्वरूप, रूप, सम्प्रप्ति तथा उपशय का ज्ञान किये बिना रोग का पूर्वज्ञान नहीं हो सकता और उसके बिना चिकित्सा कैसे हो सकती है ? इसीलिये आचार्यो ने इस पर निरन्तर बल दिया कि रोग का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् ही चिकित्सा कर्म में चिकित्सक को प्रवृत्त होना चाहिये, अन्यथा सफलता संदिग्ध ही रहेगी। इसी कारण चिकित्सा का प्रथम सूत्र निदान परिवर्जन है।
अत्यन्त प्राचीन काल में मनुष्य रोगांे के निदान की खोज करता रहा है। आयुर्वेद की दृष्टि से शरीर दोषधातु मलात्मक है। इसी से विकार के परिणामों स्वरूप विकृति का ज्ञान होता है। यह विकृति ही विकृति विज्ञान के रूप में प्रत्यक्ष तथा अनुमान के रूप में प्राप्त होती है। रोगी परीक्षा का विषय मुख्यतः प्रत्यक्ष के अन्तर्गत आता है।
वैदिक वाङ्मय में अनेक रोगों का उल्लेख मिलता है। जिनमें तक्श, जायान्य, क्षत्रिय, किलास, हरिमा उन्माद, कुष्ठ, शीतला औपसर्गिक रोग तथा नानात्मज्ज विकार उल्लेखनीय है। निदान के अन्तर्गत अंजन निदान, सिद्धान्त निदान, नाड़ी विज्ञान तथा अरिष्ट विज्ञान आदि निदान प्रमुख हैं।
चिकित्सा-आयुर्वेद का प्रमुख उद्देश्य रोग का निवारण है। कित रोगापनयनधातु से निष्पन्न चिकित्साशब्द इसी अर्थ का द्योतक है। धातुओं का वैषम्य ही विकार है। इसलिये चिकित्सा कर्म का लक्ष्य दोषों को साम्यावस्था में लाना है। इसके लिए प्राचीन काल में ही निरन्तर अन्वेषण कर अनेकों उपाय खोज निकाले। इन उपायों की सैद्धान्तिक भिन्नता से ही विविध चिकित्सा पद्धतियों का आविर्भाव होता है। महर्षि चरक ने अनेक ऐसे भिषक् शास्त्रों का उल्लेख किया है, जो उस काल में प्रचलित थे।
वैदिक काल से ही विभिन्न चिकित्सा विधियों का संकेत मिलता है जिनमें परवर्ती दैवव्यपाश्रय, युक्तिव्यपाश्रय तथा सत्वावजय इस त्रिविधि चिकित्सा का रूप चरक काल में व्यवस्थित हुआ। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि वैदिक कालीन चिकित्सा अत्यन्त सरल एवं प्राकृतिक है। रोग निवारण हेतु प्राकृतिक देवों-वरूण, रूद्र, इन्द्र, सूर्य आदि की प्रार्थना की जाती थी। इसके अतिरिक्त सूर्य-रश्मि, जल और वायु का उपयोग भी रोग निवारण में होता था।
चरक की चिकित्सा भी प्राकृतिक पृष्ठभूमि पर थी। अतः आयुर्वेदीय चिकित्सा में सर्वद्रव्यीय दृष्टिकोण सबसे बड़ी विशेषता रही है। आयुर्वेदीय चिकित्सा का क्रमिक विकास प्राचीन वैदिक काल से अनवरत आधुनिक काल तक होता रहा। इन चिकित्सा पद्धतियों में पंचकर्म, षट्कर्म तथा शिराव्यध पद्धतियाँ प्रमुख हैं।
आयुर्वेदीय चिकित्सा ग्रन्थों में माधव चिकित्सित, वृन्दसंग्रह, चिकित्सा कलिका, चक्रदत्त, बंगसेनकृत चिकित्सा सारसंग्रह, योगतरंगिणी, योगरत्नाकर, भैषज्यरत्नावली, चिकित्सा दर्शन तथा चिकित्सा प्रदीप आदि प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं।

4. भूतविद्या

अथर्ववेद भूतविद्या का मूल ग्रन्थ है। उस युग में यह अंग प्रबल था, किन्तु चरक के काल में यद्यपि किसी अन्य युक्ति को साथ लेकर चिकित्सा व्यवस्थित हुई। इसके साथ ही देवता की उपासना आदि का उपक्रम भी समानांतर चलते रहे। भूत-प्रेत, पिशाच-राक्षस, इनका रोगों की उत्त्पत्ति में अदृष्ट कारण माना जाता रहा। विशेषतः मानस रोगों (उन्माद, अपस्मार आदि) की उत्पत्ति में इनकी कारणता प्रमुख थी। अतः संहिताओं में भूत विद्या के प्रसंग में इन रोगों का वर्णन प्राप्त होता है। शल्यतन्त्र में भूतों से प्राणों की रक्षा करने का विधान है। अतः आधुनिक विद्वानों में कुछ भूत विद्या से मानस रोगों का ग्रहण करते हैं और कुछ भूत से जीवाणु का ग्रहण कर जीवाणु विज्ञान लेते हैं। ऐसे विकार जिनमें अप्रत्याशित लक्षण एकाएक उत्पन्न हो और जिनका कारण समझ में नहीं आये, उसे अदृष्ट भूतजन्य माना जाता था। सभी चिकित्साशास्त्रों की प्रारम्भिक स्थिति ऐसी ही रही है। अदृश्य कारणों का महत्व सदा रहा है और जब स्थिति मानव की पकड़ में नहीं आती, तो भूतों की ओर ध्यान जाता है। यही भूत विद्या का आधार है। आयुर्वेद की प्राचीन संहिताओं में इसका वर्णन किया गया है। इसमें युक्तियों का सहारा लेने के साथ-साथ देवता का सहारा लेकर चिकित्सा का भी विधान किया गया है।

5. कौमारभृत्य

आयुर्वेद के आठ अंगों में इस अंग को काश्यप संहिता में श्रेष्ठ अंग माना गया है। वस्तुतः समस्त जगत शिशु पर ही आधारित है, अतः उसका महत्व उचित ही है। कुमारकार्तिकेय का भी एक नाम है।  प्रसूतितन्त्र कौमारभृत्य का एक अंग है।  कौमारभृत्य के अन्तर्गत कुमारभरण,धात्रीक्षीरदोष संशोधन और दुष्टस्तन्य ग्रहजन्य व्याधियों के उपशमन का वर्णन है।
आयुर्वेदीय कौमारभृत्य में बाल ग्रहों का विशेष महत्व है। सुश्रुतोक्त 9 ग्रहों में वाग्भट्टनेश्वग्रह, पितृग्रह और शुष्करेवती ये तीन ग्रह जोड़कर इनकी संख्या 12 कर दी। चुंकि गर्भ का पोषण नाभि के माध्यम से ही होता है, अतः नाभि में प्राणों की स्थिति मानी गयी  है। सुश्रुत ने भी नाभि में प्राणों की स्थिति मानी है। ज्योतिस्थान जो गर्भ के विकास के लिये महत्वपूर्ण है तथा नाभि को शिराओं का मूल मंत्र माना है। कुमारागार का वर्णन चरक संहितामें किया गया है। बाणभट्ट की रचनाओं में भी कुमारागार और कुमार सम्बन्धी विधानों का चित्रण मिलता है। काश्यपसंहिता के अतिरिक्त वृद्धकाश्यप संहिता, पर्वतकतन्त्र, बन्धकतन्त्र, हिरण्याक्षतन्त्र तथा कुमारतन्त्र, कौमारभृत्य के उपजीत्य तन्त्र थे। इसके अतिरिक्त कौमारभृत्य के अन्य आधुनिक प्रमुख ग्रन्थों में कविराजयामिनीभूषण राय कृत कुमारतन्त्र तथा आचार्य राधाकृष्ण नाथ कृत कौमारभृत्य प्रमुख हैं।

6. अगदतन्त्र

अगदतन्त्र में विष और निर्विषीकरण के विचार अथर्ववेद में उपलब्ध हैं। आश्वलायन श्रौतसूत्र में परिगणित विद्याओं में विषविद्या का उल्लेख मिलता है। कौशिकसूत्र में विषभैषज्य का वर्णन मिलता है।
महाभारत, ब्रह्मवैवर्त पुराण में तद्युगीन विषवैद्यक की स्थिति का ज्ञान होता है। चरक, सुश्रुत आदि संहिताओं में भी जंगम तथा स्थावर विषों के लक्षणों तथा चिकित्सा का वर्णन है। सुश्रुत ने स्थावर एवं जांगम विषों का वर्गीकरण विस्तार से किया है। विष की आशुकारिता को देखकर इसका उपयोग चिकित्सा कार्य में भी होने लगा।
सर्वप्रथम वाग्भट्ट ने अष्टाङ्ग संग्रहमें विषोपयोगी अध्याय में इसका प्रारम्भ किया है। विशेषतः जांगम विष की चिकित्सा में मन्त्र और औषध दोनों का प्रयोग होता था। छान्दोग्योपनिषद (7/12) में शास्त्रों की उल्लिखित सूची में सर्पविद्या का प्रयोग मिलता है। यही विषविद्या का मौलिक रूप है। कादम्बरी में विषापहरणका उल्लेख मिलता है। सर्प के काटने से बहुत लोगों की मृत्यु होती थी, इसलिये इसके उपचार का उपाय यथासंभव औषध तथा मन्त्र द्वारा किया जाता था। विष चिकित्सकों का एक पृथक् सम्प्रदाय था। दक्षिण भारत में ऐेसे चिकित्सक आज भी लोकप्रिय हैं। अगदतन्त्र पर आचार्यो के प्रचुर ग्रन्थ थे, जो आज उपलब्ध नहीं हैं। 

7. रसायन

रसायन तन्त्र का मुख्य उद्देश्य समस्त धातुओं के प्रयोग से शरीर और मन को पूर्ण स्वस्थ रखना है। रोगों के प्रतिषेध की दृष्टि से इसका विशेष महत्व है, यद्यपि निवारण में भी यह उपयोगी होता है। यह शरीर में ओज की वृद्धि करता है। फलस्वरूप रोग शरीर को प्रभावित नहीं कर पाता। वैदिक वाङ्मय में सर्वप्रथम इसका उल्लेख प्राप्त होता है। शतपथ ब्राह्मण से ही च्यवन की कथा आती है, जो रसायनराज च्यवनप्राश का नायक है। अथर्ववेद (10/8/32) के देवस्य पश्य काव्यं न ममार, न जीर्यतिइस मन्त्र में मनुष्य के अजर अमर करने की इच्छा निहित है जो रसायन की आधारशिला है। इसके अनुसार रसायन यदि अमर न बना सके, तो अजर और दीर्घायु तो बना ही दे। वृद्धावस्था में मनुष्य कुछ भी कर सकने में अपने को असमर्थ पाता है और उसका शरीर एक भार स्वरूप हो जाता है, अतः जरा का प्रतिषेध होकर मनुष्य की सशक्त युवावस्था बनी रहे, यही रसायन का लक्ष्य है।
सभी संहिताओं में रसायन का प्रकरण प्राप्त होता है। चरक और सुश्रुत में दिव्य औषधियों का इस कार्य में प्रयोग है। ऋग्वेद में जो सोम का वर्णन है, वही आगे चलकर सम्पूर्ण रसायन का प्रतीक बना। गुप्तयुगीन वाङ्मय में रसायन का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। परवर्ती ग्रन्थों में भी ऐसे कल्प मिलते हैं। रसायन औषधियों का ऐसा प्रयोग जो कायाकल्प कर दे कल्पकहा गया है। मध्ययुग में  अनेक स्वतन्त्र कल्प ग्रन्थों की रचना हुई। आधुनिक काल में इस विषय पर पक्षधर झा कृत रसायन तन्त्र जैसे कुछ स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखे गये। 

8. वाजीकरण

यौन जीवन को सुखी बनाना तथा स्वस्थ सन्तति का उत्पादन वाजीकरण का मुख्य उद्देश्य है। काम व्यापार (सेक्स) गुप्त होने के कारण सम्भवतः इसे वाजीकरण अर्थात् रहस्यात्मक विशेषण दिया गया है। स्वस्थ पुरुष के लिये यह विधान है कि वह वाजीकरण का सेवन करने के पश्चात् मैथुन करे, जिसमें यौन सुख तो प्राप्त हो ही, आवश्यक शुक्रक्षय भी न होने पाये। सम्भावित क्षय की आपूर्ति पहले ही कर ली जाय। कामशास्त्र के ग्रन्थों में इसका विशेष वर्णन मिलता है। इस सम्बन्ध में कुचुमारतन्त्र अनंगरंग, पंचसायक आदि ग्रन्थ उल्लेखनीय है। सम्प्रति कामप्रधान युग में वाजीकरण की प्रभूत उपयोगिता है। परिवार नियोजन के दूसरे पक्ष को यह समृद्ध करता है। मध्ययुगीन ग्रन्थों में लिंगवृद्धि, योनिगाढ़ीकरण, स्तनकठिनीकरण आदि के लिये अनेक योगों का विधान है। अष्टागहृदयम् के सूत्र स्थान में संभोग के बारे में विस्तार से दिशा निर्देश दिये गये हैं।
                                                                                 आपका स्नेही स्वजन
                                                                                   जगदानन्द झा