शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

असमय एक गुरु का चला जाना

गुरुदेव नहीं रहे। सुबह उठते ही फेसबुक पर पढ़ने को मिला। विश्वास ही नहीं हो रहा था। मित्र सुब्रह्मण्यम् को फोन किया। दुखद समाचार की पुष्टि हो गयी। फेसबुक पर जब-जब शोक समाचार पढ़ रहा हूं, असहज हो उठता हूं । गुरुदेव के जाने से पूरा सेशलमीडिया रो रहा है। जब भी कोई लिखते हैं श्रद्धाञ्जलि। सहसा गुरुदेव का चित्र सामने खड़ा हो आता है। तब वे दाढी नहीं रखते थे। 
      उन्होंने मुझे शिक्षाशास्त्री में पढ़ाया था । राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के पुरी परिसर में आचार्य रामानुज देवनाथन् से मेरा परिचय हुआ। उनके अनेकों संस्मरण आज भी याद है। नियमित कक्षा में आकर पढाना। नियत समय पर कक्षा में प्रवेश और समय पर पाठ खत्म करना। इतना नियमित अध्यापक मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा । पढ़ाने की शैली इतनी अच्छी कि एक बार जो पढ़ा दें,वह सदा के लिए स्मरण रह जाता था। वह मुझे शिक्षा मनोविज्ञान पढ़ाया करते थे और मैं उनका प्रिय छात्र था। आप संस्कृत, हिन्दी, तमिल, तेलगू, उड़िया, कन्नड, मलयालम और अंग्रेजी भाषाओं के ज्ञाता थे। आपका जन्म Aheendrapuram, Cuddalore District, तमिलनाडू में 2 अप्रैल 1959 को हुआ था। आपके माता का नाम कनकावली और पिता का नाम एस. रामानुजाचार्य था। वे जितने अच्छे विद्वान् शिक्षाशास्त्र के थे,उतने ही अच्छे वेदांत और व्याकरण के भी थे । वे एक कुशल वक्ता थे। मुझमें संस्कृत बोलने का अभ्यास उन्हीं से आया। एक बार समय से लेशन प्लान न बनाने पर गुरुदेव ने मुझे डांट दिया था। मैं तत्कालीन शिक्षाशास्त्र विभागाध्यक्ष आदरणीय प्रोफेसर सच्चिदानंद जी से आगे शिक्षाशास्त्र में नहीं पढने की बात कही। गुरुदेव ने स्नेह पूर्वक मुझे समझाया था। मैं छात्र अवस्था में बहुत ही चंचल था। गुरुदेव बार-बार मुझे गंभीर होने की नसीहत देते रहते थे । समय का पालन,कठोर अनुशासन मैंने गुरुदेव से ही सीखा है। शिक्षाशास्त्र की कक्षा के छात्रों को सामुहिक नसीहत देने से नहीं चूकते थे। एक बार राजस्थान के एक छात्र को उन्होंने व्यंग्य भरे लहजे में बोला, आज कल तुम बहुत तेल पी रहे हो। शाम को उन्होंने उस छात्र के हाथ में एक बोतल देख लिया था। उस समय टेलीविजन की कम ही उपलब्धता थी। टेलीविजन पर आने वाले समाचारों की चर्चा करते हुए कहा करते थे कि काश छात्रों को भी यह ज्ञान देने वाली सुविधा उपलब्ध हो पाती। एक छात्र, किसी छात्रा को प्रपोज करने के लिए पत्र लिखा था। उसमें लिखा था आई लव यू। मैंने वह पत्र उनके टेबल के नीचे रख दिया। कक्षा में आते ही उन्होंने उस पत्र को निकाला और उस छात्र का नाम लेते हुए बोले मैं तुमसे प्यार नहीं करता। पूरा कक्ष ठहाकों से गूंज उठा । पुरी से मैं भी वापस आ गया। वहाँ से आप तिरुपति चले गए। वहां की भी सूचना मुझे निरंतर मिलती रही। जब आप राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में कुलसचिव होकर लौटे,उस समय भी और जब आप जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में कुलपति के पद पर आसीन थे। तब भी आप से दूरभाष पर मेरा निरंतर संपर्क बना रहा। हर एक काम में आपका मार्गदर्शन मिलता रहा। संस्कृतसर्जना पत्रिका की वेबसाइट बनवाते समय Home का संस्कृत आपने मुझे बताया था । twitter पर मैं आपको फॉलो करता था और मैं आपके हर tweet को पढ़ा करता था। आज भी आपके ट्वीटर पर 380 चित्र 13.8 हजार tweet  उपलब्ध हैं। आपके tweet को बहुत ही पसन्द किया जाता है। 31 दिसम्बर 16 को twitter पर आपका अंतिम श्लोकबद्ध  tweet आया।
                 भूयाच्छुभदे व्यावहारिके प्रत्ने फलदे पश्चिमावहे ।
                 अब्दे सततं मङ्गलं सुखं राष्ट्रं परमां वृद्धिमाप्नुयात् ॥
Happy VyAvahArika New Year

          हमें सुखी रहने और राष्ट्र की समृद्धि की कामना कर आप नहीं रहे। मैं किस से मार्गदर्शन लूंगा और संस्कृत के उत्थान की प्रेरणा किससे प्राप्त करूंगा। अच्छा नहीं लगा गुरुदेव। असमय आप चले गए। बहुत शोकाकुल हूँ। शब्द नहीं हैं। लिखने का भी मन नहीं करता। यह नहीं होना चाहिए था।
       एक अच्छा गुरु सर्वव्यापी और सर्व समर्थ होता है। हमें सभी प्रकार से शिक्षित करता है। कौन कहता है मेरे गुरु मेरे बीच नहीं हैं। उनका ज्ञान शरीर हमारे बीच है।




रविवार, 1 जनवरी 2017

नया साल बनाम Happy New year

   मैं सोचता हूं भारत की धरा पर प्रकृति में आज किसी प्रकार का बदलाव नहीं आया है। ठीक कल जैसा ही आज भी है। कुछ लोगों का कहना है कि आज नया साल आ गया है। हाँ सरकारी व्यवहार में दिखने वाला तथा धार्मिक कारणों से यह नववर्ष है। व्यवहार में इसी लिए आया क्योंकि हम गुलाम हो गये थे। अन्यथा हमने ही विश्व को समय को मापना सिखाया था। आज भी वह विद्या मेरे पास सुरक्षित है। नया वर्ष मानने के पीछे खगोलीय सिद्धांत नहीं, बल्कि एक मानसिक अवस्था कारण है। आज तो कुछ लोग एक पन्ना भर पलटते है। मुझे पलटने की जरुरत नहीं पडती। मकर संक्रान्ति से नया वर्ष क्यों नहीं शुरु हो सकता। उसी दिन से 1,2,3,4 की गिनती शुरु कर लो। आज के दिन की प्रतीक पूजा क्यों?

   यहां हमारे पूर्वज हजारों वर्षों से रहते आ रहे हैं । हम कहीं बाहर से आकर यहां नहीं बसे हैं । हमारी संस्कृति, हमारी धार्मिक चेतना, हमारी परंपराएं यहीं पली-बढ़ी है और हम आयातित धर्मों, सिद्धांतों, मान्यताओं, परंपराओं को आत्मसात तो करते हैं परंतु अपना बनाकर। अपनी शर्तों पर। हम जब विदेशी नामों का भी भारतीयकरण कर देते रहें हैं तो संस्कृतियों का क्यों नहीं ? अभी भारतीय किसानों के खेत की फसलें नहीं काटी जा रही है । न हीं बागों में फूल खिले हैं । पेडों में फल भी आने शुरू नहीं हुए, फिर किस बात का उल्लास? जब मैं इस नव वर्ष को उल्लास के साथ मनाने को सोचता हूं, अपने को जोड़ने की कोशिश करता हूं तो मुझे इसमें किसी भी प्रकार की तार्किकता नजर नहीं आती । नयापन नजर नहीं आता।किसी भी कैलेंडर का निर्माण समय के सिद्धांत पर होता है । समय का मापन धरती के भ्रमण के आधार पर होता है । आज सूर्य उत्तरायण या दक्षिणायन नहीं हुए अर्थात् समय की गति में भी किसी प्रकार का बदलाव नहीं हो रहा। मेरे किसी भी पूर्वजों, पौराणिक पुरुषों का संबंध इस नववर्ष से नहीं रहा है । भारत भूमि पर उत्पन्न हुए किसी संतों महापुरुषों का संबंध इस नव वर्ष से नहीं रहा है । इस नव वर्ष का धार्मिक या समय के सिद्धांतों (ऋतु चक्र परिवर्तन ) से सम्बन्ध भी नहीं है। फिर यह नववर्ष किसका और किसलिए? क्या अब मुझे उल्लास मनाने के लिए आयातित परंपराओं पर निर्भर रहना पड़ेगा? क्या हमारा इतिहास और गणित इतना कमतर है कि मुझे दूसरी परंपरा का अनुसरण करना पडे।     आप बहस कर सकते हैं कि आज का दैनिक व्यवहार इसी कैलेंडर के आधार पर निर्भर है। मैं अंशतः स्वीकार करता हूं । एक बार एक ज्योतिषी से भी यही प्रश्न पूछा गया कि मुझे तिथियां याद नहीं रहती, जबकि दिनांक याद रहते हैं उन्होंने छूटते ही उत्तर दिया। यदि आपको तिथि के आधार पर पेमेंट और छुट्टी दिया जाए तो सारी तिथियां याद रहेगी। कहने का आशय यह है कि जिसे हम दैनिक व्यवहार में लाते हैं, वह याद रहने लगता है । जैसे गांव के किसानों को नक्षत्रों के नाम। मेरे पास एक नहीं अनेकों कैलेंडर है और वह मुझे सुविधा देते हैं। भारत में ही काल गणना के अनुसार 8 प्रकार के वर्ष होते हैं। हम अपना पर्व त्यौहार और व्रत चंद्र वर्ष के अनुसार तथा कुछ कार्य सौर वर्ष के अनुसार मनाते हैं । सौर वर्ष में भी 365 दिन ही होते हैं ।             मिथिला,उडिया सहित अनेकों सांस्कृतिक परम्पराओं में अलग-अलग नववर्ष का आरंभ होता है। मुझे कब घर में रहना है और कब कौन सा मार्ग अवरुद्ध रहेगा, गुरु गोविंद सिंह जयंती कब है यह सब कुछ मैं उस कैलेंडर में देख कर निर्धारित करता हूं । अपने अन्य धर्मावलंबी मित्रों को बधाई भी तो मुझे देनी है। जानकारी के लिए सब कुछ रखना चाहिए, परंतु गर्व करने के लिए अपना ही होना चाहिए। मैं हिंदू और सब विचारधाराओं को आत्मसात करने का माद्दा भी रखता हूं । हमारी अपनी सनातन परंपरा और धर्म-दर्शन है । जीवन पद्धति है और प्रत्येक उल्लास के पीछे कोई न कोई हमारा इतिहास जुड़ा है । वह मुझे अतीत का स्मरण करता है। गर्व अनुभव करने में मददगार होता है । इस नव वर्ष में ऐसा कुछ नहीं लगता इसलिए मैं आत्मसात नहीं कर पाता हूं । जब तक इसका भारतीयकरण नहीं किया जाता तब तक इससे जुड़ना कठिन लगता है । इसमें भोगवादी प्रवृति दिखाई देती है । इसमें ईश्वर और मानवता के लिए समर्पण नहीं है ।
     हम वर्षों से जिन संस्था (कई महापुरुष भी संस्थागत रूप होते हैं ) से जुडते रहे हैं, जिससे हम लाभान्वित होते रहते हैं । उस संस्था के स्थापना दिवस/ पुण्यदिवस पर शुभकामना देना भूल जाते हैं । अच्छा होता जब हम अपने आदर्श चरित्रों को याद कर उनके जन्मदिन या पुण्यतिथि पर एक दूसरे को बधाई देते । यह नववर्ष भोगवादी और बाजारवादी प्रवृत्ति का नमूना है अतः मुझे इसमें कुछ भी नयापन नहीं लगता। मैं एक बुद्धिजीवी प्राणी हूं और मेरा विवेक आज तक इसमें कोई भी तत्व ढूंढ नहीं पाया।