शुक्रवार, 24 जून 2016

संस्कृत पत्रकारिता की मानक भाषा


    भाषाई स्तर पर संस्कृत पत्रकारिता आज दो वर्गों में विभक्त है। 1. परम्परावादी, जिनकी आत्मा व्याकरण में बसती है। 2. व्यवहारवादी, जो भाषा को अभिगम और सम्प्रेषण का माध्यम मानते हैं। परम्परावादी भी सम्प्रेषणीयता को स्वीकार करते हैं पर कठिन शब्दावली का मोह नहीं छोड पाते। व्यवहारवादी शास्त्रीय संस्कृत लिखने वाले को हेय दृष्टि से देखते हैं,क्योंकि उनकी भाषा पाठक वर्ग के समझ से पड़े होता है। पत्रकारिता की भाषा इतनी सहज और सरल होनी चाहिए कि वह बड़े समूह को आसानी से समझ में आ सके। मैं अपने पूर्व के आलेख में लिख चुका हूँ कि ग्रन्थ लेखन की भाषा से पत्रकारिता की भाषा भिन्न होनी चाहिए। पुस्तक लिखने में आप तय करते हैं कि इसकी भाषा क्या हो? इसमें आप स्वतंत्र होते हैं,परन्तु पत्रिका की भाषा आम पाठक से तय होती है कि उसके समझ में किस प्रकार की भाषा आती है। पत्रकारिता का उद्येश्य भाषा ज्ञान प्रदर्शन नहीं है। भाषा का सामर्थ्य इसमें है कि पत्र- पत्रिका में जो कुछ लिखा जा रहा है,वह पाठक के समझ में आ रहा है कि नहीं।  संधि, समास, अनावश्यक विशेष्य विशेषण भाव, णिच आदि कठिन प्रत्यय युक्त, कर्मवाच्य की बहुलता,व्यंजना शैलीशास्त्रीयता का अति आग्रह  पत्रकारिता की भाषा की दुर्बलता है। कुल मिलाकर पत्रकारिता का लक्ष्य संदेश प्रेषण है,व्याकरण बोध कराना नहीं। इसमें छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग किया जाना चाहिए। तिङन्त पद (क्रिया पद ) सबसे अंत में रखना चाहिए। उदाहरण के लिए बेङ्गलूरु से प्रकाशित सम्भाषणसन्देशः में प्रयोग की जानी वाली भाषा देखें- तदा सः तरुणः अवदत्। पाक्षिक पत्रिका वाक् में अयं मेलः एकमासं यावत् प्रचलिष्यति। आरम्भदिने प्रथमं शाहीस्नानं आयोज्यते। इसी प्रकार त्रैमासिक ई-पत्रिका संस्कृतसर्जना http://sanskritsarjana.in/ में भी सुबोध शब्दों के प्रयोग किये जाते हैं। हरिद्वार से प्रकाशित होने वाली मासिक संस्कृत पत्रिका भारतोदय में लिखे एक वाक्य को देखें-तदीयमनल्पकल्पनाप्रसूतिमुपलभ्य। बच्चों के लिए दिल्ली से प्रकाशित मासिक संस्कृत बाल पत्रिका की भाषा कहीं- कहीं कठिन हो गयी है यथा- अस्मद्विधानां कस्मादप्यात्मक्षतादार्तिनं भवतिअनुकम्पितास्म्यनुग्रीतास्म्यहन्तोsमुना सहयोगभावेनात्रागमनेन। क्या इस प्रकार के भाषा का प्रयोग बच्चों के लिए उचित है? अस्तु।
                        आज संस्कृत पत्रकारिता की भाषा का मानक स्थिर करने की अति आवश्यक है। अन्यथा हम अल्पसंख्यक संस्कृतज्ञों और बहुसंख्यक संस्कृत प्रेमियों के बीच अपनी पैठ नहीं बना सकते।
पत्रकारिता में नये शब्दों के निर्माण एवं प्रयोग
      विश्व में लगभग प्रतिदिन नये खोज, नये अविष्कार होते रहते हैं। उनके लिए उपयुक्त शब्दों की आवश्यकता होती है। समाज की भाषा भी नित्य परिवर्तनशील है। मुद्रित माध्यम, दूरसंचार के चैनल तथा अन्तः संजाल द्वारा चालित जनसंचार पर नये-नये शब्द आते रहते हैं। जैसे- मनरेगा, (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम MNREGA)  सीसैट, (सिविल सर्विसेज एप्टीट्यूड टेस्ट ,सीसैट) एसटीपी, (सीवरेज वाटर ट्रीटमेंट प्लांट, एसटीपी)। कहीं अंग्रेजी के शब्दों को तो कहीं हिन्दी के शब्दों का संक्षेपीकरण कर व्यवहार में लाया जाता है। क्रीडा, शिक्षा,व्यापार,स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र वैश्विक होते हैं। यहाँ के अधिकांश शब्द अंग्रेजी तथा अन्य विदेशी भाषा के होते हैं। संस्कृत पत्रकारिता में उनमें से किन-किन शब्दों के अनुवाद की आवश्यकता है अथवा किन्हें सीधे स्वीकार कर प्रयोग में लाया जाय? इसी प्रकार भारत में ही अनेक आंचलिक शब्द हैं। महिलाओं के नाम पुलिंगवाची होते हैं। संस्कृत में सद्यः प्रसूत शब्दों के भाव को व्यक्त करने योग्य शब्दों के निर्माण का सामर्थ्य है। यही इसकी खामी भी है और खूबी भी। खामी यह कि एक शब्द के लिए अनेक विद्वानों द्वारा अनेक शब्द पैदा कर दिये जाते हैं, जो भोले पाठकों को भ्रमित और परेशान करने वाले होते हैं। उसे चलन में लाने में भारी असुविधा होती है। एक ही वस्तु या भाव के लिए अलग-अलग शब्दों का प्रयोग न कर एक ही शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए। । शब्द निर्माण की प्रक्रिया में कुछ संस्कृतज्ञ सम्पादक ऐसे कठिन शब्द का निर्माण कर बैठते हैं कि वह पाठकों को उच्चारण करने में असंभव सा दिखता है। नये शब्द ऐसे हों जो पाठकों को रंजित करे, भयभीत नहीं।
      नित नूतन उत्पन्न होने वाले शब्दों के मानकीकरण के लिए एक शब्दकोश के निर्माण की आवश्यकता है, जो पत्रिका के सम्पादकों तथा आम जन के लिए सहायक सिद्ध हो।
            पत्रिकाओं में लिखी जानी वाली भाषा स्पष्ट, सटीक तथा छोटे-छोटे वाक्य वाले हों। यहां यथा सम्भव व्यंजना तथा लक्षणा का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। कथा, उदाहरण के लिए कल्पित नाम में विविधता एवं समाज में प्रचलित नाम के अनुरुप होना चाहिए। देवदत्त और यज्ञदत्त ही न रख दिये जायें। पत्रकारिता का उद्देश्य सम्प्रेष्ण और अभिगम है। भाषा ज्ञान प्रदर्शन नहीं। समाज की भाषा से पत्रकारिता में प्रयुक्त संस्कृत भाषा बहुत पृथक् न दिखे। यह देखना चाहिए कि समाज में प्रचलित शब्दों में से कितने शब्द ऐसे हैं, जो वाक्य विन्यास की दृष्टि से भी भारतीय भाषा के निकट हो।  इसकी भाषा इतनी सहज और सरल हो कि संस्कृत की आरम्भिक कक्षा में पढ़ने वाले छात्र भी सहजतया समझ सकें। संधि, समास तथा विजन्त प्रयोग से बाहर निकलकर सरल तथा व्याकरण सम्मत वाक्य का प्रयोग किया जाना चाहिए। नये शब्दों को गढ़ने तथा प्रचलन में लाने में संस्कृत पत्रकारों की महती भूमिका है। कुछ ऐसी भी संस्कृत पत्रिका उद्भूत हुई है, जिसका नाम अंगेजी में रखा गया है। स्वयं को प्रगतिशील और संस्कृत के सरलीकरण के पुरोधा सम्पादक सरल संस्कृत के स्थान पर बनावटी संस्कृत का प्रयोग करने लगे हैं। सरलता के मोह में अनुशासनहीन भाषा कभी स्वीकार नहीं की जा सकती। उर्दू तथा अंग्रेजी के शब्दों को यथावत् स्वीकार कर संस्कृत रूप में प्रयोग कहाँ तक उचित है? हमेशा याद रखना चाहिए कि संस्कृत में शब्द निर्माण का सामर्थ्य है, परन्तु वह सामर्थ्य अनुशासन के परिधि से बाहर नहीं है। अनुशासन हमारी ऋषि परम्परा है। अथ शब्दानुशासनम्। अथ योगानुशासनम्। मैं जोर देकर कहता हूँ। पत्रिका की भाषा ऐसी हो कि मानक के विनिश्चय के लिए लोग संस्कृत पत्रिका को उठाकर देखें।
            पत्रिका की भाषा शालीन हो। अपनी बात पुरजोर ढंग से रखा जा सकता है। दूसरे से असहमति प्रकट की जा सकती, परन्तु संस्कृत परम्परा के अनुसार। हमारे शास्त्रकार/व्याख्याकार अपने मत की स्थापना और विरोघी मत का खण्डन के समय भी आदर सूचक शब्दों के प्रयोग करते हैं। यथाह गुरुः। वाक्यतत्वविदां मीमांसकानां पदतत्वविदां वैयाकरणानां च मतेन---। भावों को व्यक्त करने के लिए लगाये गये चित्र शालीन हों।  नये शब्दों के निर्माण, उसे चलन में लाना पत्रकारिता के लिए चुनौती है। सर्वप्रथम वही स्थिर करता है कि कौन सा शब्द समाज के लिए बोधगम्य होगा और किसे चलन में लाना है। इस प्रकार संस्कृत के उत्थान और नवनिर्माण में संस्कृत पत्रकारिता की महती भूमिका है। जिस पत्रिका की भाषा सरल और बोधगम्य होती है, उससे पाठक जुडना पसन्द करते हैं। आसानी से जुडते हैं।
संस्कृत की शोध पत्रिकायें और उसकी भाषा
 संस्कृत में बहुतायत शोध पत्रिकायें प्रकाशित होती है। अनेक  शोध पत्रिकाओं के प्रकाशक धन लेकर शोध पत्र छापने लगे हैं। उनका मूल उद्येश्य शोध पत्रिका द्वारा धनार्जन है।  यहाँ न तो शोध लेख की भाषा पर ध्यान दिया जाता है न ही विषय वस्तु पर। एक निर्धारित Font में लेख मंगवाने के बाद उसे यथावत् प्रकाशित कर दिया जाता है।इसका स्वामित्व किसी और के पास होता है। इसमें ऐसे- ऐसे लोग सम्पादक बनते हैं,जिन्हें संस्कृत में पकड़ तो होती ही नहीं, पत्रकारिता का ककहरा भी नहीं जानते। किसी पत्रकार सम्मेलन में नहीं जाते।  कुछ पत्रिकायें संस्कृत विषय पर हिन्दी तथा अन्य भाषा में लेख छापते हैं।  इस प्रकार की पत्रिका से भाषा के मानकीकरण की अपेक्षा नहीं की जा सकती। ऐसे सम्पादक द्वारा सम्पादित पत्रिका में वह भाषायी संस्कार नहीं दिखता, जो संस्कृत पत्रकारिता के लिए आवश्यक है।
  दूसरी श्रेणी की पत्रिका वह है, जो किसी सरकारी संस्था के स्वामित्व में प्रकाशित होती है। यहाँ के सम्पादकों को केवल भाषा चयन की स्वतंत्रता रहती है, विषय चयन की नहीं। ये सुनिश्चित मानदेय पर नियुक्त होते हैं। इनमें पत्रकारिता की वह धार नहीं होती। ये निष्पक्ष लेखन नहीं कर सकते। इनके कथ्य सीमित तथा शास्त्र के आवरण में लिपटा रह जाता है। अतः नये शब्दों के निर्माण, उसे प्रचलन में लाने से ये सर्वथा वंचित रहते हैं। फिर भी उनमें ये स्वतंत्रता शेष है कि वे पत्रिका की मानक भाषा का निर्धारण या अनुगमन कर सकें। यहाँ मालिकों का पूर्वाग्रह नहीं है। 
      संस्कृत का दुर्भाग्य यह है कि अभी हम पत्रकारिता के लिए ऐसे युवा पीढी को अधिक मात्रा में तैयार नहीं कर पा रहे हैं,जो समसामयिक विभिन्न मुद्दों पर पत्रकारिता की भाषा में आलेख लिख सकें। उनमें संस्कृत पत्रकारिता का जज्वा हो,उत्साह हो। जो उत्साह आदरणीय वीरभद्र मिश्र में था। डॉ.शिवबालक द्विवेदी में है। हमें शोध पत्रिकाओं में दो लेख छपवाने की मानसिकता से बाहर आना होगा। शोध पत्रिका की भाषा न तो आम लोगों के समझ में आती है, न ही उन्हें इसकी जरुरत है।
        अनेक संस्कृत पत्रिकाओं में अनुवाद की पत्रकारिता की जाती है।  सम्वाद या लेख प्रदाता इतना सशक्त नहीं होता कि वह सीधे संस्कृत में लेख या संवाद लिख कर भेज सके। यहाँ  किसी तरह अनुदित कर सूचना या आलेख को प्रकाशित कर दिया जाता है। वर्तमान की अनेक संस्कृत पत्रिकाओं के युवा सम्पादक संस्कृत में अच्छी पकड़ तो रखते ही  हैं, साथ ही वे पत्रकारिता की भाषा भी बखूवी जानते हैं। इन्हीं के दम पर संस्कृत पत्रकारिता जिन्दा है। इनके द्वारा सम्पादित पत्रिकाओं की भाषा बदलते हुए समय के अनुरुप बदल रही है। यहाँ नवाचारी प्रयोग भी देखने को मिलता है।ये युवा पीढियों तक पहुँच रही है । युवा पसन्द कर रहे हैं। बस निरन्तर सुधार के लिए मिलजुल कर सामुहिक अभियान चलाने की आवश्यकता है।


गुरुवार, 23 जून 2016

संस्कृत पत्रकारिता चुनौतियां तथा समाधान

             पत्रकारिता लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ माना जाता है। पत्रकार समसमयिक विषयों पर अपनी बेवाक राय रखते हैं। पत्रकारिता द्वारा जनता की समस्या और जनता की सोच को जनता के समक्ष रखकर, उन्हें जागरूक किया जाता है। आज की पत्रकारिता में राजनीति, खेल-कूद, प्राकृतिक आपदा, सामाजिक तथा राजनैतिक समस्याएं, आध्यात्म, ज्योतिष, मनोरंजन, खान-पान, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि से जुड़े मुद्दे समाहित हैं। स्थानीय पत्रकारिता से लेकर वैश्विक पत्रकारिता तक के लिए अनेक जनसंचार के माध्यम उपयोग में लाये जा रहे है।
संस्कृत पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशन दैनिक,साप्ताहिक,मासिक,द्वैमासिक,त्रैमासिक,षाण्मासिक एवं वार्षिक होते हैं। मैंने अपने इसी ब्लाग पर आवधिकता के क्रम पर आधारित पत्र पत्रिकाओं की सूची प्रकाशित की है,जिसे संस्कृत पत्रिकाओं के नाम एवं पता लिंक पर पढा जा सकता  है।
      सम्भाषणसंदेश, सत्यानन्दम् जैसे कुछ  पत्रिकाओं को छोड अधिकांश पत्रिकायें समय पर प्रकाशित नहीं होती। पत्रिकाओं का संयुक्त अंक प्रकाशित होना आम चलन में है। कई सम्पादक पत्रिकाओं के अग्रिम अंक मुद्रित कराकर रख लेते हैं। वस्तुतः इस प्रकार की पत्रिकायें  पुस्तक का ही दूसरा स्वरुप है। अधिकांश सस्कृत पत्रिकाओं में सूचनाओं का अभाव रहता है। यहाँ शोधपत्रिकायें अधिक मात्रा में प्रकाशित होती है। इस प्रकार की पत्रिका के प्रकाशक पुस्तक और पत्रिका में अन्तर नहीं समझते। पत्रिका के प्रकाशन में चार महत्वपूर्ण स्कन्ध हैं। 1. समाचारों का संकलन, विज्ञापन का संकलन 2. पत्रिका का मुद्रण 3. वितरण 4. ग्राहक बनाना। चुंकि संस्कृत पत्रिका के सम्पादकों/ प्रकाशकों के पास टीम नहीं होता और इनके पास पर्याप्त धन नहीं होते अतः दैनिक समाचार पत्रों की भांति समाचार संकलन के लिए पत्रकारों की नियुक्ति नहीं करते। यहाँ व्यावसायिक लेखन भी नहीं होता। यदि मैं यह कहूँ कि संस्कृत समाज प्रतिस्पस्द्धी समाज नहीं है तो कोई हानि नहीं है। प्रतिस्पर्धी न होने से इस क्षेत्र में न तो रोजगार का सृजन हो पाता है और न हीं पत्रिका के ग्राहकों की संख्या बढती है। आज का मिडिया विज्ञापन लाने के लिए एजेन्सियों की स्थापना किये है। कुछ सरकारी पत्रिकायें भी निकलती है परन्तु वह स्वायत्त नहीं है। अतः उनमें पत्रकारिता की धार नहीं होती। संस्कृत का क्षेत्र जज्वे से भरे लोगों के दम पर जिन्दा है। वाक् , संस्कृतवाणी जैसी श्रेष्ठ पत्रिका संस्कृत प्रेम का प्रतीक है। संस्कृत पत्रिका के समक्ष सबसे बडा संकट विज्ञापन जुटाने का है। संस्कृत के लिए काम करने वाली संस्थायें भी इन पत्रिकाओं में विज्ञापन देने में कंजूसी करती है। वितरण डाक के सहारे है। एक चौथायी पत्रिका डाक घरों में ही लुप्त हो जाती है। डाक द्वारा न्यनूतम दर पर पत्रिका को भेजने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि असंगठित समूह इसका लाभ नहीं ले पाता। ग्राहक बनाने के लिए कमीशन एजेंट की नियुक्ति करने से सम्भव है कि पत्रिका हर स्कूल, गाँव, मुहल्ले तक पहुँचे।
       संस्कृत पत्रकारिता के समझ सबसे बड़ी चुनौती भाषा का ज्ञान, इच्छा शक्ति, पहुंच, आर्थिक संसाधन तथा संगठित कार्य  है।
        संस्कृत के दैनिक पत्र जब तक एक स्थान से प्रकाशित होकर पाठक के सम्मुख पहुंचता है, तब तक समाचार गत वयस्क हो जाता है। कारण यह है कि संस्कृत के पत्र-पत्रिकाओं के पाठक कम-कम मात्रा में देश के विविध भू-भाग में फैले हुए हैं। एक ही स्थान पर बहुसंख्यक पाठक मिलने तथा समय से उन तक पत्रिका के पहुंचने पर इसके ग्राहक संख्या में वृद्धि आ सकती है। पत्र-पत्रिका में भी स्थायित्व लाया जा सकता है।  दूर-दूर तथा कम मात्रा में पाठकों के फैले होने के कारण संस्कृत में अधिकांशतः साहित्यिक पत्रकारिता होती है। ज्योतिष, साहित्य आदि विषय आधारित पत्रिका समय सापेक्ष नहीं होते।
            इन्टरनेट के आ जाने से संस्कृत के अनेक रेडियो चैनल, बेवसाइट पर संस्कृत वार्ता दृश्य श्रव्य माध्यम से प्रसारित होने लगी है। इसकी या तो आम लोगों को जानकारी नहीं होती या जानकारी होने पर भी अपेक्षित रूचि का अभाव होता है। व्यवहारिक भाषा के रूप में लोग हिन्दी, पंजाबी, मराठी, बंगला, तमिल, आदि का प्रयोग किया जाता है। संस्कृत केवल पाठ्यक्रम की पुस्तक तक सीमित होती है। व्यावहारिक भाष श्रम नही करना चाहते। महाविद्यालयों में भी संस्कृत को अध्ययन तथा बोलचाल में सम्मिलित नहीं किया जाता। परिणामतः आजन्म लोग संस्कृत से दूर ही रहते हैं। संस्कृत के लिए रूचि उत्पादन करना ही पड़ेगा। तभी संस्कृत पत्रिका की ओर छात्रों, अध्यापकों एवं संस्कृत जिज्ञासुओं का रूझान बढ़ पाएगा।
            एक छात्रा को मैंने संस्कृत पत्रिका की ग्राहकता लेने हेतु आग्रह किया उसने  जबाव दिया, मैं पत्रिका तो खरीदती हूं पर पढ़ती नहीं। संस्कृत के अध्यापकों के बीच एक बार सर्वे करने पर ज्ञात हुआ कि संस्कृत के कुछ ही नौकरीपेशा लोग  पत्रिका खरीदते हैं।  यहां कठिन श्रम कर रोजगार उत्पादन का अभ्यास नहीं है। रेल यात्रा में एक महिला ने मुझसे कहा। मैं शिक्षा के बाद कार्यालय में काम करने वाले के लिए यात्रा कार्यक्रम का व्यवसाय शुरू की। हर रोज कार्यालय तथा विद्यालय जाकर पता करती हूं कि कौन पर्यटन करने को उत्सुक हैं। उनके लिए टिकट से लेकर आवास, गाइड तक का प्रबंध मैं कर उनकी यात्रा का सुलभ प्रबंध करती हूं।
            संस्कृत पढ़े कोई भी वेरोजगार संस्कृत पत्रिका की ग्राहकता, आपूर्ति का रोजगार के लिए संगठित व्यवसाय नहीं किया जाता। कुछ लोग मिलकर विज्ञापन, प्रकाशन, वितरण, ग्राहकता बढ़ाने जैसे काम नहीं कर रहे। यहां पर्याप्त मात्रा में पूंजी निवेश नही है।
            इक्के-दुक्के असंगठित लोग उत्साह में आकर एक पत्रिका निकालना आरंभ करते हैं। निश्चित धनागम के अभाव से कुछ दिनों बाद पत्रिका बंद हो जाती है।
            संस्कृत पत्र-पत्रिकारिता का फलक विस्तृत होता जा रहा है। इसके लिए पाठ्यक्रम भी शुरू कर दिये गये हैं। आवश्यकता है विद्यालय स्तर से छात्रों में पत्रिका पढ़ने की अभ्यास डालने की। क्या कारण है कि माध्यमिक कक्षाओं में संस्कृत के लाखों छात्र हैं परन्तु वे पत्रिकाओं का ग्राहक नहीं बन पाते। मिलकर संगठित रूप से इसे जब तक प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचाया नहीं जाएगा। संस्कृत पत्रिका का भविष्य यथावत् बना रहेंगा।
          इससे सम्बन्धित और भी पढने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- संस्कृत पत्रकारिता की मानक भाषा 

            

मंगलवार, 21 जून 2016

योगः एक प्रायोगिक विज्ञान

विश्व योग दिवस पर विशेष--

                      तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
                       कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ गीता 6-46
योग एक शास्त्र है। इसमें मानव को सात्विक जीवन व्यतीत करने का उपाय बताया गया है। योगासान के अभ्यास से स्वास्थ्य में चमत्कारी परिवर्तन आता है। आइये, इसकी उत्पत्ति तथा विस्तार पर विहगावलोकन करें।
योग मधुविद्या है। योगप्रवृत्तिं प्रथमां वदन्ति कहकर श्वेताश्वतर उपनिषद् ने इसकी प्रशंसा की है। अमृतनादोपनिषद् अमृतबिन्दूपनिषद्, तेजोबिन्दूपनिषद्, योगतत्वोपनिषद्, त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् आदि उपनिषदों में योग के प्रसिद्ध छः अंगों, समाधि आदि का वर्णन किया गया है।
योगकुण्डल्युपनिषद् में खेचरी विद्या के प्रयोग की विधि, प्रणवाभ्यास, नाडीशोधन का वर्णन प्राप्त होता है। योगशाखोपनिषद्, मुण्डक, कठ, श्वेताश्वतरोपनिषद् सहित अनेक उपनिषदों में क्रियात्मक योग का वर्णन किया गया है। उपनिषदों के बाद कपिल के सांख्ययोग का प्रभाव क्रमशः कम होता गया। इस बात की की चर्चा गीता के अधोलिखित श्लोक में की गयी।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥ गीता 4.2
सांख्ययोग का उद्धार गीता के छठे अध्याय में किया गया। भगवद्गीता, जो महाभारत का एक अंश है, में कर्मसन्यास, विभूति, आत्मसंयम, गुणत्रय विभाग आदि अनेकविध योगों का वर्णन किया गया है, जिससे आप सुपरिचित ही होंगे।
भारतीय दर्शन का योग विद्या एक अंग  है। दर्शन का संस्कृतियों पर गहरा प्रभाव होता है। भारतीय कला में भी योग के विभिन्न मुद्राओं को उकेरा गया है। भगवान बुद्ध सर्वोत्कृष्ट योगी थे। बुद्ध की योगमुद्रायुक्त प्रस्तरकला विश्व विख्यात है। योगशास्त्र में वर्णित विभिन्न मुद्राओं का विकास नाट्यशास्त्र में देखने को मिलता है। भरत ने साठ हस्तमुद्राओं का उल्लेख किया है।
बौद्धमूर्ति कला में अभयमुद्रा, वरदमुद्रा, शिक्षामुद्रा, ज्ञानमुद्रा, भूमिस्पर्शमुद्रा आदि अनेक मुद्राओं को अंकित किया गया है। वस्तुतः बौद्ध और हिन्दू दोनों धर्मों में अनेक स्तर पर एकरूपता है। कुछ विन्दुओं को छोड़ पूरा बौद्ध सम्प्रदाय हिन्दू धर्म की भित्ति पर खड़ा है। बौद्ध के चारों तान्त्रिक श्रेणियों-- क्रियातन्त्र, चर्यातन्त्र, योगतन्त्र और अनुत्तरयोगतन्त्र पूर्ववर्ती योग क्रियाओं का विस्तार मात्र है। जिस  4 आर्यसत्य की चर्चा बौद्ध ग्रन्थों में मिलता है, वह योग का एक अंग यम और नियम  है। यम और नियम के विना योग पूर्णतः शारीरिक व्यायाम मात्र है। इससे मन का योग ही नहीं हो पाता। यम नियम में अहिंसा, सत्य, स्तेय, ब्रह्चर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान आते हैं। इसके अनन्तर क्रम आता है आसन और प्राणायाम का।  हठयोग प्रदीपिका में अधिक भोजन करना ,अधिक श्रम करना, व्यर्थ की बातें करना, नियम पालन में आग्रह,अधिक लोक सम्पर्क तथा मन की चंचलता इन 6 कार्य को योग का विनाशक कहा है।
            अत्याहारः प्रयासश्च प्रजल्पो नियमाग्रहः ।
             जनसङ्गश्च लौल्यं च षडभिर्योगो विनश्यति ।।
योग का अंग आसन
पतंजलि कृत योगसूत्र साधनापाद के स्थिरसुखमासनम् पर व्यास भाष्य में तद्यथा पद्मासनं वीरासनं भद्रासनं स्वस्तिकं दण्डासनं सोपाश्रयं पर्यङ्कं क्रौञ्चनिषदनं हस्तिनिषदनमुष्ट्रनिषदनं समसंस्थानं स्थिरसुखं यथासुखं चेत्येवमादीनि कह कर उदाहरण स्वरुप पद्मासन, वीरासन, भद्रासन, स्वस्तिक, दण्डासन, सोपाश्रय, पर्यङ्क,क्रौञ्चनिषदन (क्रौंच पक्षी की बैठने की रीति से बैठना), हस्तिनिषदन (क्रौंच पक्षी की बैठने की रीति से बैठना),, उष्ट्रनिषदन, समसंस्थानस्थिरसुख अर्थात् यथासुख का उल्लेख करते हुए चेत्येवमादीनि कहा अर्थात् इस प्रकार के और भी स्थिर आसन होते हैं। आदिशब्देन मयूराद्यासनानि ग्राह्यानि यावत्यो जीवजातयः तावन्त्येवासनानीति संक्षेपः (योगवार्तिक) घेरन्ड संहिता द्वितीयोपदेश में  32 आसनों के नाम एवं उसके प्रयोग की विधि बतायी गयी हैं
आसनानि समस्तानि यावन्तो जीवजन्तवः।
चतुरशीतिलक्षाणि शिवेन कथितानि च।।1।।
तेषां मध्ये विशिष्टानि षोडशोनंशतं कृतम्।
तेषां मध्ये मर्त्यलोके द्वात्रिंशदासनं शुभम्।।2।।
अथ आसनानां भेदाः।
सिद्धं पद्मं तथा भद्रं मुक्तं वज्रञ्च स्वस्तिकम्।
सिंहञ्च गोमुखं वीरं धनुरासनमेव च।।3।।
मृतं गुप्तं तथा मत्स्यं मत्येन्द्रासनमेव च।
गोरक्षं पश्चिमोत्तानं उत्कटं सङ्कटं तथा।।4।।
मयूरं कुक्कुटं कूर्म्मं तथाचोत्तानकूर्म्मकम्।
उत्तानमण्डुकं वृक्षं मण्डुकं गरुडं वृषम्।।5।।
शलभं मकरं चोष्ट्रं भुजङ्गञ्चयोगासनम्।
द्वात्रिंशदासनानितु मर्त्त्यलोकेहि सिद्धिदम्।।6।।
हठयोगप्रदीपिका पर क्लिक करें। यहाँ विभिन्न आसनों के नाम तथा उसे करने की विधि वर्णित है। आसन के सम्बन्ध में राजयोग की अपेक्षा हठयोग के ग्रन्थों में विस्तृत वर्णन प्राप्त होते हैं। चिन्तामणि अपरनाम स्वात्माराम योगीन्द्र कृत हठयोग प्रदीपिका के पूर्व इस विषय पर शिवसंहिता, गोरक्षसंहिता,विवेक मार्तण्ड, सिद्धसिद्धान्त पद्धति, घेरण्डसंहिता, योगबीज, तथा योगोपनिषद् जैसे आसन तथा नाडीशोधन विषय बहुलक ग्रन्थ प्रकाश में आ चुके थे।  हठयोग प्रदीपिका के लेखन का काल 1360 से 1650 के मध्य माना जाता है। इस पुस्तक में हठयोग के पूर्वोक्त गोरक्षशतक आदि ग्रन्थों के मत का सम्वर्धन किया गया है। इसमें 382 श्लोक तथा 4 अध्याय हैं। इस ग्रन्थ के प्रणयन के बाद योगचिन्तामणि, हठरत्नावली, हठसंकेत चन्द्रिका,हठनत्व कौमुदी आदि की रचना की गयी। हठयोग में रुचि रखने वाले जिज्ञासुओं को चाहिए कि उक्त ग्रन्थ में वर्णित आसन आदि के द्वारा मन की अमनस्कता का निवारण करें।  आसन के बारे में पुराणों में भी संक्षेप में जानकारी मिलती है।
गरुडपुराणम् अध्यायः २३८
          आसनं स्वस्तिकं प्रोक्तं पद्ममर्धासनं तथा ।। 1,238.11 ।।
प्राणः स्वदेहजो वायुरायामस्तन्निरोधनम् ।
कूर्मपुराणम्-उत्तरभागः/एकादशोऽध्यायः
आसनं स्वस्तिकं प्रोक्तं पद्ममर्द्धासनं तथा ।
साधनानां च सर्वेषामेतत्साधनमुत्तमम् ।। 11.43
ऊर्वोरुपरि विप्रेन्द्राः कृत्वा पादतले उभे ।
समासीनात्मनः पद्ममेतदासनमुत्तमम् ।। 11.44
एकं पादमथैकस्मिन् विष्टभ्योरसि सत्तमाः ।
आसीनार्द्धासनमिदं योगसाधनमुत्तमम् ।। 11.45
उभे कृत्वा पादतले जानूर्वोरन्तरेण हि ।
समासीतात्मनः प्रोक्तमासनं स्वस्तिकं परम् ।। 11.46
श्रीदत्तात्रेयकल्प तथा जाबालदर्शन उपनिषद् के खण्ड 3 में लगभग एक समान इन आसनों के नाम प्राप्त होते हैं।
आसनानि पृथग्वक्ष्ये श्रृणु वाचस्पतेऽधुना ।।
स्वस्तिकं गोमुखं पद्मं वीरं सिंहासनं तथा ।।1।।
भद्रं मुक्तासनं चैव मयूरासनमेव च ।
 सुखासनसमाख्यां च नवमं मुनिपुंगव ।।2।।
जानूर्वोरन्तरे विप्र कृत्वा पादतले उभे ।
            समग्रीवशिरः कायः स्वस्तिकं परिचक्षते ।।3।।
वामे दक्षिणगुल्फं तु पृष्ठपार्श्वे निवेशयेत् ‍ ।
            दक्षिणेपि तथा सव्यं गोमुखं परिचक्षते ।।4।।
अंगुष्ठावपि गृह्णीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमेण तु ।
 ऊर्वोरुपरि विप्रेन्द्र कृत्वा पादतलद्वयम् ।।5।।
पद्मासनं भवेदेतत्पापरोगभयापहम् ।
            दक्षिणोत्तरपादं तु सव्ये ऊरूणि विन्यसेत् ‍ ।।6।।
दक्षिणोत्तरपादं तु दक्षिणोरूणि विन्यसेत् ‍ ।
 ऋजुकायः सुखासीनो वीरासनमुदाहृतम् ।।7।।
गुल्फौ तु वृषणस्याधः सीवन्याः पार्श्वयोः क्षिपेत् ‍ ।
            दक्षिणं सव्यगुल्फेन वामं दक्षिणगुल्फतः ।।8।।
हस्तौ च जान्वोःसंस्थाप्य स्वांगुलीश्व प्रसार्य च ।
            नासाग्रं च निरीक्षेत भवेत्सिंहासनं हि तत् ‍ ।।9।।
पार्श्वपादौ च पाणिभ्यां द्दढं बध्वा सुनिश्चलम् ।
 भद्रासनं भवेदेतद्विषरोगविनाशनम् ।।10।।
निष्पीडय सीवनीं सूक्ष्मां दक्षिणोत्तरगुल्फतः ।
            वामं वामेन गुल्फेन मुक्तासनमिदं भवेत् ‌ ।।11।।
मेढ्रोपरि विनिक्षिप्य सव्यं गुल्फंततोपरि ।
 गुल्फांतरं च संक्षिप्य मुक्तासनमिदं भवेत् ‍ ।।12।।
कूर्पराग्रौ मुनिःश्रेष्ठ निक्षिपेन्नाभिपार्श्वयोः ।
            भूम्यां पादतलद्वन्द्वं निक्षिप्यैकाग्रमानसः ।।13।।
समुन्नतशिरः पादो दंडवद्वयोम्नि संस्थितः ।
 मयूरासनमेतत्स्यात्सर्वपापप्रणाशनम् ।।14।।
येनकेन प्रकारेण सुखं धैर्यं च जायते ।
            तत्सुखासनमित्युक्तमशक्तस्तत्समाश्रयेत् ‍ ।।15।।
आसनं विजितं येन जितं तेन जगत्रयम् ।
            आसनं सकलं प्रोक्तं मुने वेदविदां वर ।।16।।
अनेन विधिना युक्तः प्राणायामं सदा कुरु ।।17।।
देवीभागवत के चतुर्थ अध्याय देवीगीता में आसनविधि -
पद्मासनं स्वस्तिकं च भद्रं वज्रासनं तथा ।
            वीरासनमिति प्रोक्तं क्रमादासनपंचकम् ‍ ।।8।।
ऊर्वोरुपरि विन्यस्य सम्यक् ‍ पादतले उभे ।
 अंगुष्ठौ च निबध्नीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमात्ततः ।।9।।
पद्मासनमिति प्रोक्तं योगिनां हृदयङ्‍गमम् ।
            जानूर्वोरन्तरे सम्यक् ‍ कृत्वा पादतले उभे ।।10।।
ऋजुकायो विशेद्योगी स्वस्तिकं परिचक्षते ।
            सीवन्याः पार्श्वयोर्न्यस्य गुल्फयुग्मं सुनिश्चितः ।।11।।
वृषणाधः पादपार्ष्णि - पाणिभ्यां परिबंधयेत् ‍ ।
            भद्रासनमिति प्रोक्तं योगिभिः परिपूजितम् ‌ ।।12।।
ऊर्वौ पादं क्रमान्न्यस्य जान्वोः प्रत्यङ्‍मुखाङ्‍गुली ।
 करौ विदध्यादाख्यातं वज्रासनमनुत्तमम् ।।13।।
एकपादमधः कृत्वा विन्यस्योरु तथोत्तरे ।
 ऋजुकायो विशेद्योगी वीरासनमनुत्तमम् ।।14।। इति
 आसन नाडी शुद्धि आदि का विस्तार पूर्वक वर्णन और प्रयोग हठयोग के ग्न्थों में वर्णित हैं। बंध आदि मुद्रायें भी आसन के अन्तर्गत ही परिगणित किये जाते हैं। हठयोग प्रदीपिका के तृतीय उपदेश में 10 प्रकार के मुद्राओं को जरा और मरण को नाश करने वाला कहा गया है।
महामुद्रा महाबंधो महावेधश्च खेचरी।
उड्यानं मूलबंधश्च बंधो जालंधराभिध:।।
 करणी विपरीताख्या वज्रोली शक्तिचालनम्।
            इदं हि मुद्रादशकं जराभरणनाशनम्।। 7।।
घेरन्ड संहिता के तृतीयोपदेश में 25 मुद्राओं के नाम तथा प्रयोग कहे गये हैं।
महामुद्रा नभोमुद्रा उड्डीयानं जलन्धरम्।
मूलबन्धो महाबन्धो महावेधश्च खेचरी।1।।
विपरीतकरणी योनिर्वज्रोली शक्तिचालिनी।
ताडागीमाण्डवीमुद्रा शाम्भवीपञ्चधारणा।2।।
आश्विनी पाशिनी काकी मातंगी च भुजंगिनी।
पञ्चविंशति मुद्राणि सिद्धिदाश्चेहयोगिनाम्।।3।।
 इसके बारे में अनेक प्रकार की जानकारी उपलब्ध है। अतः यहां चर्चा करना अपेक्षित नहीं है। षट्कर्म का वर्णन हठयोग प्रदीपिका, शिव संहिता, घरेण्ड संहिता आदि योग के ग्रन्थों में विपुलता से प्राप्त है। आसन के सिद्ध होने पर साधक शीत उष्ण आदि द्वन्द्व से पीडित नहीं होता।
             धौती बस्ती तथा नेती त्राटकं नौलिकं तथा।
            कपाल माती चैतानि षट्कर्माणि प्रचक्षते।।
प्रत्यभिज्ञा दर्शन में शिव और आत्मा के अभेद ज्ञान को योग कहा गया है। तान्त्रिक परम्पराओं में कुण्डलिनी के स्वरूप सहित सुरति योग तक जग जाहिर है।
भारतीय परम्परा में परस्पर दो विरूद्ध विचारधारा एक साथ प्रवाहित होते दिखती है। एक ओर तान्त्रिकों का सुरतयोग तो दूसरी ओर रामायण, मनुस्मृति, महाभारत आदि ग्रन्थों का पातिव्रत योग।
अब आपको तय करना है कि आप किस योग के अनुयायी बनना चाहते हैं।