शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

पुस्तक संदर्शिका Pustak Sangdarshika

पुस्तक संदर्शिका Android App में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ के पुस्तकालय में उपलब्ध पुस्तकों तथा पाण्डुलिपियों की सूची दी गई है। यह App संस्कृत जिज्ञासुओं तथा शोधार्थियों के लिए अत्यन्त ही उपयोगी है। मैंने विगत 10 वर्षों तक अनवरत श्रम कर पुस्तकों तथा पांडुलिपियों की सूची तैयार कर रहा था। अपने यहाँ आने वाले पाठकों की सुविधा के लिए विना किसी रोकटोक और सहायता के सूचना का सरल प्रवाह का आसान तरीके उपलब्ध कराने में लगा था, ताकि पाठकों के समय की बचत की जा सके । मैंने सबसे पहले डेस्कटॉप आधारित पुस्तकालय का एक ऑफलाइन सॉफ्टवेयर बनवाया था। इसके उपयोग में पाठक दक्ष नहीं हो पा रहे थे अतः शब्दकोश क्रम में पुस्तकाकार पुस्तकों की सूची पाठकों को दी। कैटलाग तो था ही। अब पुस्तकों, लेखकों आदि की जानकारी के लिए पाठक के पास तीन विकल्प उपलब्ध हो गये।  घर बैठे या दूरदराज के पाठकों तक पुस्तकालय और यहाँ उपलब्ध पुस्तकों की जानकारी प्राप्त कराने के लिए एक वेबसाइट बनाया ताकि पाठक पुस्तकालय में उपलब्ध पुस्तकों के बारे में जानकारी घर बैठे प्राप्त कर सकें। वेबसाइट तो बन गया परन्तु अध्येताओं को बार-बार डाटा खर्च करना पड़ता था । यह सबके पहुँच में भी नहीं था,क्योंकि इसके लिए इन्टरनेट युक्त मोबाइल चाहिए था। रखरखाव के अभाव में यह बंद रहने लगा। मैंने सोचा क्यों न इसके लिए एक मोबाइल App बनावाया जाय। आज लगभग हर पाठक के पास android फोन होता है । क्यों न इस माध्यम से भंडार में रखी अज्ञात पुस्तकों की सूची को हर हाथ तक पहुंचा दिया जाय। दूर स्थित लोगों को भी जानकारी हो कि कहीं पढ़ने के लिए पुस्तक उपलब्ध है । वह भी बार बार विना डाटा खर्च किये। बस रास्ता मिल गया और परिणाम सम्मुख है। अब प्रो. मदनमोहन झा तथा उनके पुत्र श्री सृजन झा के सहयोग से पुस्तक संदर्शिका नामक एक  Android App  बना दिया गया। इस Android App के निर्माण में किसी से भी आर्थिक सहायता नहीं ली गयी।
पुस्तक संदर्शिका में लगभग 19000 पुस्तकें तथा 4000 पांडुलिपियों की सूची दी गई है। इसमें विविध विषयों पर हिंदी भाषा में लिखित लगभग 2000 पुस्तकों तथा संस्कृत विषय पर अंग्रेजी में लिखित 1000 पुस्तकों की सूची को भी सम्मिलित किया गया है।
देवनागरी लिपि तथा इंग्लिश में लिखित पुस्तकों के लिए 1. पुस्तक 2. लेखक 3. विषय के नाम से अलग-अलग खोज की सुविधा दी गई है। हस्तलिखित पांडुलिपियों को 1. हस्तलिपि के नाम से तथा 2. विषय के नाम से खोजने की सुविधा उपलब्ध है।
जिन संस्कृत पुस्तकों की अनेक प्रतियां अथवा टीका उपलब्ध है, उसपर क्लिक करने पर लेखक एवं टीकाकार का नाम खुलता है। यहां चयन कर पुस्तक का विस्तृत विवरण प्राप्त किया जा सकता है । जिन पुस्तकों के अनेक नाम प्राप्त होते हैं, उन्हें अलग-अलग प्रदर्शित किया गया है।
पुस्तक तथा लेखक नाम के पूर्व लिखे गये आलंकारिक उपाधियों, मंगलवाची पदों यथा श्री, अथ, डॉ., आचार्य आदि को हटाकर टंकित किया गया है,तथापि असावधानीवश कुछ शेष रह गये हैं। वर्तनी की विविधता के कारण एक ही पुस्तक तथा लेखक के नाम अलग अलग  हो जाते हैं। यथा तत्त्व तत्व, चिंतन चिन्तन, रघुवंशम् तथा रघुवंशमहाकाव्यम् , रामकिशोर राम किशोर आदि । अतः वर्णक्रम से खोज करने वाले खोजकर्ता  अलग - अलग वर्तनी तथा प्रचलित नाम के वर्णक्रम में भी देखें। उपर्युक्त के समाधान तथा आपकी सुविधा हेतु कीवर्ड सर्च की सुविधा दी गयी है । उपयोगकर्ताओं की सुविधा को ध्यान में रखकर किन्हीं उपविषयों को मूल वर्ग में तो किसी उपविषय को विषय के रूप में रखा गया है। कुछ पुस्तकों को अवर्गीकृत श्रेणी में रखा गया है। विषय से खोज के क्रम में यदि पुस्तक उपलब्ध नहीं हो तो पुस्तक नाम अथवा लेखक के नाम से ढूंढना चाहिए ।
पुस्तकालय में जिन पुस्तकों की एक प्रतियां उपलब्ध हैं, वहाँ एक परिग्रहण संख्या दी गयी है। एक से अधिक प्रतियों के लिए प्रत्येक पुस्तक की पृथक् - पृथक् परिग्रहण संख्या दर्शायी गयी है। अनेक भाग वाले पुस्तकों के भाग संख्या में , चिह्न देकर अन्य भाग की संख्या लिखी है। पुस्तकों का विषय विभाजन संस्कृत वाङ्मय को केंद्र में रखकर किया गया है। यहाँ तक सम्भव हो सका इसे युक्तियुक्त तथा सुविधाजनक बनाने का प्रयास किया गया। सम्भव है कि किसी संस्कृत पुस्तकालय के द्वारा इस प्रकार का किया गया यह प्रथम कार्य हो। मुझे खुशी है कि मैं अपने पाठक को रीडिंग टेवल पर ही पुस्तक सूची दे दिया।
आशा है सुधी उपयोगकर्ता उपयोग के द्वारा इसके सैद्धांतिक पक्ष से परिचित हो जाएंगे । इसमें अनेक त्रुटियां रह जाना स्वाभाविक है,क्योंकि हम करके सीखते हैं। भविष्य में इसमें और अधिक परिवर्तन तथा संशोधन किया जाता रहेगा। संस्कृत पुस्तकालयों को चाहिए कि वे भी पाठकों की सुविधा को ध्यान में रखकर इस प्रकार का अभिनव प्रयास करेंगें।
विजेन्द्र शर्मा भारद्वाज का प्रश्न-
इस app से केवल पुस्तक व लेखक का नाम ही जान पाते हैं, अगर वो पुस्तक ही पढ़नी हो तो क्या करें इस एप्प से...?
App की उपयोगिता
यदि आप किसी पुस्तकालय या विद्यालय के लिए पुस्तक खरीदने की योजना बना रहे है, किसी विषय पर कौन कौन पुस्तक बाजार में उपलब्ध है, इससे पता करें आदि अनेक उपयोग हैं। आपको कई ऐसे पुस्तकों की जानकारी भी मिलेगी,जिसे पढने की सलाह आजतक आपको किसी ने नहीं दिया होगा। अनुसंधान निर्देशक तथा कक्षा में पाठ्येतर सामग्री,सहायक ग्रन्थ की जानकारी देने के लिए यहाँ से सूचना पा सकेंगें। संस्कृत में सद्यः प्रकाशित ग्रन्थों को भी सूची में स्थान दिया गया है। ग्रन्थ और ग्रन्थकार का नाम पलक झपकते आपके पास होती है। अबतक आप लोग संस्कृत के 200 से 500 पुस्तकों के नामों, लेखकों से परिचित होंगें। अब आपका दायरा बढ जाएगा।  अबतक इस प्रकार का साधन और सुविधा आपको नहीं मिली थी। शोधार्थी तथा अन्य जिज्ञासु समय निकालकर हमारे पुस्तकालय में आकर पढ सकते हैं। इसे पुस्तक का नाम इन्टरनेट पर खोजकर पढा जा सकता है। पुस्तक संदर्शिका App में तीन कारणों से पुस्तक पढने की सुविधा उपलब्ध नहीं करायी गयी। 1- पुस्तकों की DTP (टाइप कराना) कराकर हम उन पुस्तकों को ही उपलब्ध करा सकते, जिसपर किसी का कापीराइट नहीं हो अथवा इस हेतु लेखक प्रकाशक हमें अनुमति दें। यह कार्य व्यय और श्रम साध्य है। यह कार्य कई लोग कर रहे हैं। अनेक बेवसाइट पर उपलब्ध है।
2- PDF के रूप में पुस्तकों उपलब्ध कराने के लिए भी लेखक प्रकाशक से अनुमति चाहिए। यह भी भिन्न प्रकृति का काम है। इसके लिए डाटा स्पेश चाहिए।
3- यदि कुछ पुस्तकों के लिए अनुमति मिल भी जाती है तो इससे App के Mb में वृद्धि होती। सभी उपयोगकर्ता को इसके लिए डाटा खर्च करना पडता। उतने में वे पुस्तक खरीद भी सकते हैं। मेरा लक्ष्य पुस्तक के बारे में जानकारी प्रदान करना है। अनेक पुस्तकें इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं। इस App की सहायता से कौन पुस्तक किस प्रकाशन से छपी है, पता कर खरीद लें अथवा इन्टरनेट पर जाकर पढ लें।
हमारा लक्ष्य 2 G उपयोक्ताओं तक पुस्तक सूची पहुँचाना है। हर पाठक के मोबाईल में कम स्थान ले। वह भी सिर्फ 1 बार 3 Mb डाटा खर्च कर। कई बार बडे साइज के कारण लोगों को App हटाना पडता है।
आप इस ऐप की उपयोगिता पर और भी प्रश्न कर सकते हैं।
प्रोफेसर मदनमोहन झा तथा इनके सुपुत्र श्री सृजन झा ने सर्वसुलभ इस पुस्तक संदर्शिका के द्वारा पुस्तकालय में भंडारित पुस्तकों तथा हस्तलेखों को जन-जन के Android फोन तक पहुँचाकर सबके लिए ज्ञान का द्वार उद्घाटित कर दिया है। इससे उपयोगकर्ताओं तक उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ के पुस्तकालय में उपलब्ध सभी प्रकार की पुस्तकों की जानकारी पहुंचेगी। सभी पुस्तकें प्रयोग में आने लगेगी। पुस्तक खोज के क्रम में अनेकों पुस्तकों के नाम अनायास ही याद हो जायेंगें। पुस्तक संदर्शिका निर्माण में मैं निमित्तमात्र हूं । संस्कृत जगत् प्रो. झा का चिर आभारी रहेगा । मैं किन शब्दों में कृतज्ञता अर्पित करूं? 
App Download करने के लिए पुस्तक सन्दर्शिका  इस लिंक पर क्लिक करें। संस्कृत के अन्य App डाउनलोड करने के लिए search करें srujan jha

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2016

कोजागर / कोजगरा

       आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इसी दिन कोजागर व्रत भी धूमधाम से मनाया जाता है। कोजागर का ही अपभ्रंश नाम कोजगरा है।  आश्विन मास की पूर्णिमा को कौमुदी भी कहा जाता है। 
       यह पूर्णिमा पहले दिन आधी रात तक हो तो पहले ही दिन व्रत करें। यदि दूसरे दिन पूर्णिमा आधी रात्रि तक हो तो दूसरे दिन व्रत करें। मिथिलांचल में इस दिन पान और मखान खाने का विधान है। नव परिणीता के मायके से मखान आता है। इस रात चंद्रमा की रोशनी में 108 बार सुई में धागा पिरोने से आंख की ज्योति बढ़ती है। पूर्णिमा की रात खीर को चांद की रोशनी में रखते हैं। सुबह इसका प्रसाद वितरित किया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन रात्रि में चंद्रमा अमृत की वर्षा करती हैं। कोजगरा में लक्ष्मी तथा इंद्र का पूजन किया जाता है । पूर्णिमा की रात्रि में जागरण करना और जुआ खेलने का विधान भी है। इसी दिन से कार्तिक के नियमों का प्रारंभ हो जाता है। इस दिन घरों और आवास के समक्ष मार्गों को साफ-सुथरा करना चाहिए। चंदन आदि के लेप से शरीर को सुगंधित करना चाहिए। स्त्रियों, बालकों, वृद्धों तथा मूर्खों को छोड़कर और लोगों को दिन में भोजन नहीं करना चाहिए। प्रदोष के समय द्वार की भित्ति पर हव्यवाहन, पूर्णेंदु, पत्नी के साथ रूद्र, स्कंद, नंदीश्वर मुनि,  सुरभि, निकुंभ, लक्ष्मी, इंद्र तथा कुबेर की पूजा करनी चाहिए। जिनके पास भेड़ हो वे वरुण की पूजा करें। जिनके पास हाथी हो वह विनायक की पूजा करें। जिनके पास घोड़े हो वह रेमंत की पूजा करें। जिनके पास गाय हो वे सुरभि की पूजा करें।
पूजा की विधि इस प्रकार है—
दैनिक क्रिया संपन्न कर व्रत किया हुआ व्यक्ति स्वच्छ आसन पर बैठकर गणपति आदि देवता सहित विष्णु की पूजा कर संकल्प करें। द्वार को जल से अभिसिंचित कर गंध, अक्षत से द्वारोर्ध्वभित्तिभ्यो  नमः कहकर वास्तु की पूजा करें। इस प्रकार पूजा विधि संपन्न कर कमल के आसन पर बैठी लक्ष्मी का ध्यान कर अक्षत के ढेर पर बैठी लक्ष्मी का लक्ष्म्यै नमः इस मंत्र से आवाहन कर षोडशोपचार पूजा करें । पूजा के अनंतर पुष्पांजलि देकर नमस्कार करें। 4 दांत वाले हाथी पर हाथ में वज्र लिए अनेक आभूषणों से अलंकृत शची के पति इंद्र को ध्यान करना चाहिए। नारियल और चूडा पितरों को समर्पित कर स्वयं इसका भक्षण करें। पूजा समाप्त होने के उपरांत प्रसाद ग्रहण कर बंधुओं के साथ भोजन करें। जुआ खेलना प्रारंभ करें। आधी रात में वरदान देने वाली लक्ष्मी यह देखती है कि कौन जगा हुआ है। ऐसा देखकर जो जुआ खेलता है उसे धन दूंगी यह कहती है।

स्कंद पुराण के अनुसार कोजगरा व्रत को सर्वश्रेष्ठ व्रत माना गया है।
    इसी दिन आश्वलायन शाखा वाले आश्वयुजी कर्म करते हैं।  

बुधवार, 19 अक्तूबर 2016

करक चतुर्थी / करवा चौथ

कार्तिककृष्णचतुर्थी करकचतुर्थी ।
सा चन्द्रोदय व्यापिनी ग्राह्या।
दिनद्वये तद्व्याप्त्यादौ संकष्टचतुर्थीवन्निर्णयः।
                        --निर्णयसिन्धुः ( कार्तिककृष्णचतुर्थी विचारः)
     हिन्दू काल गणना में 5 प्रकार के वर्ष होते हैं, जिनमें सौर वर्ष और चंद्र वर्ष प्रमुख हैं । सौर वर्ष में 365 दिन और चांद्र वर्ष में 354 दिन होते हैं। सौरवर्ष अब 15 अप्रैल को शुरू होने लगा है।  भारतीय संस्कार, पर्व- त्यौहार तथा व्रत चान्द्र वर्ष की गणना के अनुसार से संपन्न होते हैं। कुछ त्यौहार संक्रांति के अवसर पर भी मनाये जाते हैं
पर्व तथा व्रत में मौलिक अंतर यह है कि पर्व या त्यौहार जहां हर्ष उल्लास और वैभव के साथ मनाया जाता है, वही व्रत में संयम पूर्वक उपवास रखते हुए संकल्प पूर्वक कार्य पूर्ण किए जाते हैं। व्रत नैमित्तिक कार्य होते हैं। इसे सुनिश्चित अवधि के लिए पालन किया जाता है। तत्पश्चात् व्रत का समापन किया जाता है। व्रत नितान्त व्यक्तिगत होता है,  जबकि पर्व- त्यौहार सामुहिक। करवा चौथ एक ऐसा व्रत है, जो सामूहिक रूप से मनाया जाता है। किसी विशिष्ट इच्छा पूर्ति के लिए व्रत किए जाते हैं। व्रत में गंभीरता का भाव अत्यधिक होता है। यह जीवन को अनुशासित रखने का माध्यम है। व्रत एवं त्यौहार में समय के साथ विभिन्न प्रकार की कहानियां, लोकगीत और कलाएं जुड़कर इसे वैभवशाली बनाती गयी। जब इन व्रतों में प्रतीकों को समाविष्ट किया जाता है तब यह और भी उल्लास से भर उठता है। व्रत में व्रती को देवी गीतों, चित्रकारी तथा अन्य क्रियाकलापों के द्वारा व्यस्त रखने की परंपरा जुड़ती चली गई। पर्व- त्यौहार एवं व्रतों का मुख्य आधार पुराण हैं। प्रस्तुत लेख विभिन्न धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों के अनुशीलन के पश्चात् लिखा गया, ताकि लेख की प्रामाणिकता असंदिग्ध हो। लेख की प्रामाणिकता  के लिए इसके चित्र भी लगाये गये हैं, जिसमें हिन्दी अनुवाद के साथ भी विधि तथा कथा दी गयी है।




सौभाग्यवती स्त्रियों द्वारा किया जाने वाला प्रमुख व्रत करवा चौथ है । यह एक सामूहिक व्रत है । यह व्रत सौभाग्य की प्राप्ति, पति के स्वास्थ्य, दीर्घायु तथा मंगल कामना के लिए मनाया जाता है। निर्णय सिन्धु ग्रन्थ में इस व्रत को कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को तथा धर्मसिंधु में इसे आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्थी को करने का निर्देश प्राप्त होता है। दक्षिण देश में यह व्रत आश्विन कृष्ण चतुर्थी को मनाया जाता है। इसे केवल स्त्रियों को ही करने का अधिकार है। उसे ही फल का लाभ भी मिलता है। इसमें सौभाग्यवती स्त्रियां दिन भर निर्जल रहकर रात्रि में चंद्र दर्शन तथा अर्घ्य देने के पश्चात पूजा करती है तथा कथा कहने और सुनने के उपरांत व्रत पूर्ण कर लेती है।

इसकी अनेक विधियां प्राप्त होती है। एक विधि इस प्रकार है--

प्रातः काल उठकर सौभाग्यवती स्त्रियां शौचादि से निवृत होकर मास पक्ष आदि का उल्लेख कर मम सौभाग्यपुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्रीप्राप्तये करकचतुर्थी व्रतं करिष्ये कहकर व्रत का संकल्प लिया जाता है। वट लिखकर गणेश, शिव, कार्तिकेय और गौरी की प्रतिमा का स्थापन कर शास्त्र अथवा कुल परंपरा के अनुसार उनका षोडशोपचार पूजन किया जाता है। यह उपवास निर्जल होता है। चंद्र दर्शन के पश्चात् उसे अर्घ्य दान देकर भोजन ग्रहण करती हैं। तांबे या मिट्टी के साथ कुल्हड़ों में जल भरकर पूजा के पश्चात् उसे दान कर दिया जाता है। इस व्रत के माहात्म्य पर एक कथा महाभारत में मिलती है। एक बार धर्मराज युधिष्ठिर के छोटे भाई अर्जुन कील गिरी पर किसी अनुष्ठान को पूरा करने के लिए से चले गए। उस समय द्रौपदी ने अपने मन में सोचा कि यहां अनेक विघ्न-बाधाएं उपस्थित होती है और अर्जुन अभी यहां नहीं है इसीलिए क्या करना चाहिए ? संयोग से उसी दिन श्री कृष्ण उन लोगों से मिलने आ गए। द्रौपदी ने उनसे पूछा कि गृहस्थ जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए क्या प्रयत्न करना चाहिए ? श्री कृष्ण ने उन्हें करवा चौथ व्रत और पित्त प्रकोप को दमन करने वाले चंद्रदेव के पूजन का विधान बताया। कृष्ण की कही हुई विधि के अनुसार समय आने पर द्रौपदी पूजन की, जिसके फलस्वरूप उसकी विघ्न बाधाएं दूर हो गई और पांडवों को युद्ध में विजय मिली। तब से भारतीय स्त्रियाँ इस व्रत को अपना लिया और बड़ी श्रद्धा के साथ अब तक मनाती आ रही है। 

दूसरी विधि तथा कथा इस प्रकार है-

     इस अवसर पर सौभाग्यवती स्त्रियों द्वारा दीवाल पर करवा बनाया जाता है, जिसमें गणेश, चंद्रमा, सात भाई तथा एक बहन तथा सात भाभी बनाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें पेड़ के पीछे छलनी में दीया रखकर चांद दिखाता हुआ भाई,धोवन और ग्वालिन बनती है। मिट्टी के अथवा पीतल के करवे से पूजा होती है। करवे की टोंटी में चार सींकें डाली जाती है। करवे के ऊपर दीपक जला कर रखा जाता है। भूमि पर एेपन से चौक बनता है। करबे के भित्ति चित्र में शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, हनुमान, चंद्रमा, सूर्य, स्वस्तिक आदि की आकृतियां बनती है। करवा को रंग कर उस पर चित्रकारी कर सजाया जाता है। इसमें चार कथाएं कही जाती है। सभी सामग्रियां चार की संख्या में चढ़ती है। कहीं-कहीं कच्चे चावल की पिन्नी, पूडी, अक्षत आदि से 4 बार करवा बदली जाती है। करवा पूजन के समय सास को पकवान, मेवे, वस्त्र, द्रव्य आदि देकर उसका चरण स्पर्श किया जाता है। धोबन को सौभाग्य देने वाली माना गया है। हर सौभाग्य सूचक मांगलिक कर्म में धोबन को सम्मिलित किया जाता है। करवा पूजन के बाद धोबन को भोजन तथा द्रव्य देकर संतुष्ट किया जाता है, तदनन्तर सौभाग्यवती स्त्रियां धोबन का चरण स्पर्श कर भोजन करतीं हैं।   इसमें करवा चौथ की कथा के साथ गणेश की कथा और पार्वती द्वारा सुहाग बांटे जाने की कथा भी कही जाती है। कुछ लोग करवा में सोना धोवन की कथा भी कहते हैं ।


  कथा इस प्रकार है ----

सात भाइयों की एक बहन थी। विवाह के बाद पहली चौथ आई। बहन ने व्रत रखा। सातों भाइयों की लाडली बहन को निराजल व्रत करता देखकर भाई परेशान थे।  सबसे छोटा भाई उसके साथ के बिना खाना ही नहीं खाता था। वह भी दिन भर दौड़-दौड़ कर आता था और कहता था बहन चल कुछ तो खा ले। बहन ने कहा, मैं तो चांद देखकर पूजा करके ही खा सकती हूं। भाई बार -बार ऊपर देख कर आता था ।चांद का पता नहीं कब निकलेगा। फिर उसने एक तरकीब सोची पेड़ पर चढ़ कर उसने यह दीपक रख दिया और आगे आटा छानने वाली छलनी टांग दी।  घर में जाकर बहन से बोला चल बहन चांद निकल आया। चलकर पूजा कर ले। वह दौडी दौडी भाभियों के पास आई और बोली आओ पूजा करने चलें । भाभियां हंस कर बोली, जाओ अभी तुम्हारा चांद निकला है। हमारा नहीं। बालिका भाई के बताए अनुसार पूजा करके अर्घ्य देकर वापस लौटी और भोजन करने बैठ गई ।पहला कौर मुख में डालते हीं उसके मुख में बाल आ गया। दूसरा कौर मुख में डालते ही छींक हुई। तीसरा कौर जैसे ही मुख में डाला वैसे ही उसकी ससुराल का नाई आ गया और सूचना दी कि उसका पति मर गया। घर में रोना-पीटना कोहराम मच गया। बेटी रोती हुई ससुराल चली। मां ने कहा, बेटी रास्ते में जो भी मिले उसको पैर छूती जाना। वह रोती जा रही थी और सबके पैर छूती जा रही थी। एक वृद्धा स्त्री मिली। उसके पैर छुए तो आशीर्वाद देती हुई बोली- जाओ बेटी सदा सुहागिन रहो। दूधो नहाओ पूतो फलो। वह रोकर बोली- माता मेरा तो सुहाग उजर गया है। वृद्धा बोली- तुम ऐसा करना अपने पति की लाश को जलने ना देना। उसे लेकर जंगल में तपस्या करना। यह  करवा चौथ  दिन तुम्हारा सुहाग उजड़ा है। अगले महीने चौथ माता  आए तो उनके पैर पकड़ लेना और कहना कि मेरा सुहाग लौटा दीजिए। उस दुखियारी ने ऐसा ही किया। सास ससुर से बोली कि मेरे पति की लाश को नहीं जलाइए। मुझे दे दीजिए। जंगल में पति की लाश ले जाकर कुटी बनाकर रहने लगी। अगले महीने चौथा आई तो पैर पकड़ कर बोली। माता मेरा सुहाग दे दो। मेरे पति को जीवित कर दो। चौथ माता बोली- मुझसे बड़ी अगले महीने की चौथ है। वह आए तो उनसे मांगना। यह कह कर वह चली गई। इस प्रकार हर महीने की चौथ आयी। सबने कही कि मुझसे बड़ी अगले महीने की चौथ है। माघ माह की संकट चौथ को सब ने कहा कि वह बड़ी है।  वह आई तो बोली कि सबसे बड़ी करवा चौथ है, जो सौभाग्य देती है। वही तुम्हें सौभाग्य लौटा सकती है। 1 वर्ष बीता। अंत में करवाचौथ आई। बालिका ने रोकर उसके पांव पकड़ लिए और बोली माता मैं आपको बिना सुहाग दिए जाने नहीं दूंगी। करवा माता पैर छुड़ाते हुए बोली। मेरा पांव छोड़ दो बेटी। परन्तु वह अडिग रही। अंत में माता हार कर बोली। अच्छा जा बेटी। आज के दिन तेरे पति के मुख में कोई सुहागिन अपनी कनिष्ठा अंगुली चीरकर रक्त डाल देगी तो तेरा पति जीवित हो उठेगा। यह कहकर माता चली गई। वह दौड़ी- दौड़ी अपने मायके गई। भाभियों से बोली- भाभी मेरे पति के मुख में  अपनी कनिष्ठिका अंगुली चीरकर रक्त डाल दो।  भाभियों ने मना कर दिया और बोली। जा अपनी छोटी भाभी के पास, जिसके पति ने छलनी में दीया दिखाकर तेरा व्रत तोड़ा था और खंडित कर आया था। वह छोटी भाभी के पास चली गई। उसने अपनी अंगुली चीरकर उसका रक्त मृतक के मुख में डाल दिया। वह राम-राम करके बैठ गया। जैसे उसके दिन लौटे वैसे ही माता करवा सबके सौभाग्य की रक्षा करें, जो इस कथा को कहे उसका सौभाग्य अचल हो।

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

विशिष्टाद्वैत की परंपरा 1

 विशिष्टाद्वैत की लवार परंपरा 

        आलवार भक्ति परंपरा के संस्थापक आचार्य थे। आलवार शब्द तमिल भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है ईश्वर की भक्ति में लीन रहने वाला। ये विशिष्टाद्वैत के आदि आचार्य तथा दक्षिण भारत के प्राचीन वैष्णव संत थे। इनकी भाषा तमिल थी।  इनके द्वारा रचित संपूर्ण साहित्य तमिल भाषा में उपलब्ध है। इनमें विष्णु के प्रति भक्ति का अत्यधिक  उद्रेक था,  अतः इन्हें  विशिष्टाद्वैत के आचार्यों में  उच्चतम स्थान प्राप्त है।  इनका स्थिति काल सातवीं  अथवा  आठवीं  शताब्दी में  माना जाता है। आलवारों की  स्तुतियों का संग्रह नालचिर-प्रबंध नाम से  विख्यात है।  इसमें  ईश्वर की भक्ति तथा ईश्वर का प्रेम दर्शाया गया है। भागवत पुराण में उल्लेख है कि विष्णु के अधिकांश भक्त दक्षिण भारत में जन्म लेंगे। आलवार आचार्यों की संख्या मुख्यतया 12  है। इनके तमिल एवं  संस्कृत  दोनों नाम  प्राप्त होते हैं।  
               भूतं  सरश्च महताह्वयभट्टनाथ   
               श्रीभक्तिसारकुलशेखरयोगीवाहन् ।
               भक्ताङ्घ्रिरेणु परकाल-यतीन्द्रमिश्रान्
               श्रीमत्पराङ्कुशमुनिं प्रणतोस्मि नित्यम् ।।
भूतयोगी
सरयोगी 
 महदाह्वय योगी 
भट्टनाथ
 भक्तिसार योगी
कुलशेखर
योगीवाहन
 भक्तङ्घ्रिरेणु
 मधुरकवि
 शठकोप अथवा परांकुश मुनि
 विष्णुचित्त
गोदाम्बा
 परकाल मुनि

भूत योगी 

    भूत योगी अत्यंत प्राचीन अलवार हैं। इनका जन्म कांची में हुआ था। यह विष्णु के शंख अवतार  माने गए हैं।

महद्योगी  

    इनका जन्म  महाबलीपुरम में हुआ था। यह  विष्णु की गदा के अवतार माने गए हैं। इन्होंने तमिल भाषा में  भक्ति रस के सरस पदों की रचना की।

भक्तिसार

    इनका जन्म  तिरुमडिसै नामक स्थान पर हुआ था।

शठकोप

    ये विष्वक्सेन के अवतार माने गए हैं। वैष्णव धर्म के अत्यंत महत्वपूर्ण आचार्यों में  इनकी गणना की जाती है। इनका जन्म  ताम्रपर्णी  नदी के किनारे तिरु कुरकुरे नामक गांव में एक ब्राह्मण परिवार में  हुआ था। इन्होंने  चार ग्रंथों की  रचना की।

कुलशेखर 

    कुलशेखर के गुरु नम्भालवार थे। यह विष्णु के कौस्तुभ मणि के अवतार माने जाते हैं।

विष्णुचित्त

    इनका जन्म बित्तिपुत्तुर  में हुआ था। इनकी माता का नाम पदमा और पिता का नाम मुकुंद था।  यह विष्णु के गरूड अवतार माने जाते हैं। इन्होंने भी 2  प्रमुख ग्रंथों की रचना की। 

गोदा 

    गोदा पेरियालवार की दत्तक पुत्री थी। यह अपने इष्टदेव को पति रूप में  उपासना करती थी। अपनी मधुर तथा प्रेम भरी रचनाओं के कारण गोदा को दक्षिण भारत का मीरा माना जाता है।

भक्ताङ्घ्रिरेणु

    भक्ताङ्घ्रिरेणु का जन्म उच्च ब्राम्हण कुल में हुआ था। जीवन के युवावस्था में यह देव देवी के मोह पाश में बंध गए थे परंतु श्री रंगनाथ की कृपा से इससे मुक्त हो पाए। जिसके बाद इन्होंने अपना पूरा जीवन ईश्वर को समर्पित कर दिया।

योगीवाहन 

    योगीवाहन का पालन पोषण एक निसंतान दंपती द्वारा किया गया। इन्होंने अमलनादि विरान् में 10 श्लोकों की रचना की।
    आलवार संत भक्ति से आप्लावित स्वरचित पदों के द्वारा  जनमानस को  प्रभावित किया ।आलवारों के पश्चात्  उनकी परंपरा में  दार्शनिक आचार्यों की  श्रृंखला  प्राप्त होती है, जिन्होंने  वैष्णव परंपरा में  दार्शनिक पृष्ठभूमि  को तैयार किया। परवर्ती आचार्य तमिल के साथ-साथ  संस्कृत के भी प्रकांड विद्वान थे। इन्हें आचार्य शब्द से संबोधित किया गया। इन आचार्यों ने  आलवारों द्वारा रचित  तमिल वेद तथा  ब्रह्मसूत्र का एक साथ अध्ययन किया और इन दोनों के बीच संगति बैठाने का कार्य किया। परवर्ती आचार्यों को उभयवेदांती  कहा जाता है। 
                                  आगामी लेख में पढिये- विशिष्टाद्वैत की आचार्य परंपरा 

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

सुदर्शनशतकम्


श्रीकूरनारायणमुनिविरचितम्
।। श्रीसुदर्शनशतकम् ।।

रङ्गेशविज्ञप्तिकरामयस्य चकार चक्रेशनुतिं निवृत्तये ।
समाश्रयेऽहं वरपूरणीं यः तं कूरनारायणनामकं मुनिम् ।।

सौदर्शन्युज्जिहाना दिशि विदिशि तिरस्कृत्य सावित्रमर्चिः
      बाह्याबाह्यान्धकारक्षतजगदगदङ्कार भूम्ना स्वधाम्ना ।
दोःखर्जूदूरगर्जद्विबुधरिपुवधूकण्ठवैकल्यकल्या
      ज्वाला जाज्वल्यमाना वितरतु भवतां वीप्सयाऽभीप्सितानि ।। 1 ।।

प्रत्युद्यातं मयूखैर्नभसि दिनकृतः प्राप्तसेवं प्रभाभिः
      भूमौ सौमेरवीभिर्दिवि वरिवसितं दीप्तिभिर्देवधाम्नाम् ।
भूयस्यै भूतये वः स्फुरतु सकलदिग्भ्रान्तसान्द्रस्फुलिङ्गं
      चाक्रं जाग्रत्प्रतापं त्रिभुवनविजयव्यग्रमुग्रं महस्तत् ।। 2 ।।

पूर्णे पूरैः सुधानां सुमहति लसतः सोमबिम्बालवाले
      बाहाशाखावरुद्धक्षितिगगनदिवश्चक्रराजद्रुमस्य ।
ज्योतिश्छद्मा प्रवालः प्रकटितसुमनस्सम्पदुत्तंसलक्ष्मीं
      पुष्णन्नाशामुखेषु प्रविशतु भवतां सप्रकर्षं प्रहर्षम् ।। 3 ।।

अरादारात् सहस्राद्विसरति विमतक्षेपदक्षाद्यदक्षात्
      नाभेर्भास्वत्सनाभेर्निजविभवपरिच्छिन्नभूमेश्च नेमेः ।
आम्नायैरेककण्ठैः स्तुतमहिम महो माधवीयस्य हेतेः
      तद्वो दिक्ष्वेधमानं चतसृषु चतुरः पुष्यतात् पूरुषार्थान् ।। 4 ।।

श्यामं धामप्रसृत्या क्वचन भगवतः क्वापि बभ्रु प्रकृत्या
      शुभ्रं शेषस्य भासा क्वचन मणिरुचा क्वापि तस्यैव रक्तम् ।
नीलं श्रीनेत्रकान्त्या क्वचिदपि मिथुनस्यादिमस्येव चित्रां
      व्यातन्वानं वितानश्रियमुपचिनुताच्छर्म वश्चक्रभानम् ।। 5 ।।

शंसन्त्युन्मेषमुच्छोषितपरमहसो भास्वतः कैटभारेः
      इन्धे सन्ध्येव नक्तञ्चरविलयकरी या जगद्वन्दनीया ।
बन्धूकच्छायबन्धुच्छविघटितघनच्छेदमेदस्विनी सा
      राथाङ्गी रश्मिभंगी प्रणुदतु भवतां प्रत्यहोत्थानमेनः ।। 6 ।।

साम्यं धूम्याप्रवृद्ध्या प्रकटयति नभस्तारकाजालकानि
      स्फौलिङ्गीं यान्ति कान्तिं दिशति यदुदये मेरुरङ्गारशङ्काम् ।
अग्निमग्नार्चिरैक्यं  भजति दिननिशावल्लभौ दुर्लभाभौ
      ज्वालावर्ताविव स्तः प्रहरणपतिजं धामवस्तद्धिनोतु ।। 7 ।।

दृष्टेऽधिव्योम चक्रे विकचनवजपासन्निकाशे सकाशं
      स्वर्भानुर्भानुरेष स्फुटमिति कलयन्नागतो वेगतोऽस्य ।
निष्टप्तो यैर्निवृत्तो विधुमिव सहसा स्प्रष्टुमद्यापि नेष्टे
      घर्मांशुं ते घटन्तामहितविहतये भानवो भास्वरा वः ।। 8 ।।

देवं हेमाद्रितुङ्गं पृथुभुजशिखरं बिभ्रतीं मध्यदेशे
      नाभिद्वीपाभिरामामरविपिनवतीं शेषशीर्षासनस्थाम् ।
नेमिं पर्यायभूमिं दिनकरकिरणादृष्टसीमः परीत्य
      प्रीत्यै वश्चक्रवालाचल इव विलसन्नस्तु दिव्यास्त्ररश्मिः ।। 9 ।।

एकं लोकस्य चक्षुर्द्विविधमपनुदत्कर्म नम्रत्रिनेत्रं
      दात्रर्थानां चतुर्णां गमयदरिगणं पञ्चतां षड्गुणाढ्यम् ।
सप्तार्चिश्शोषिताष्टापदनवकिरणश्रेणिरज्यद्दशाशं
      पर्यस्याद्वश्शताङ्गावयवपरिवृढज्योतिरीतीः सहस्रम् ।। 10 ।।

उच्चण्डे यच्छिखण्डे निबिडयति नभःक्रोडमर्कोऽटति द्याम्
      अभ्यस्य प्रौढतापग्लपितवपुरपो विभ्रतीरभ्रपङ्क्तीः ।
धत्ते शुष्यत्सुधोत्सो विधुरपमधुनः क्षौद्रकोशस्य साम्यं
      रक्षन्त्वस्त्र प्रभोस्ते रचितसुचरितव्युष्टयो घृष्णयो वः ।। 11  ।।

पद्मौघो दीर्धिकाम्भस्यवनिधरतटे गैरिकाम्बुप्रपातः
      सिन्दूरं कुञ्जराणां दिशिदिशि गगने सान्ध्यमेघप्रबन्धः।
पारावारे प्रवालो वनभुवि च तथा प्रेक्ष्यमाणः प्रमुग्धैः
      साधिष्ठं वः प्रबोधं जनयतु दनुजद्वेषिणस्त्वैषराशिः ।। 12 ।।

भानो भा नो त्वदीया स्फुरति कुमुदिनीमित्र ते कुत्र तेजः
      तारास्थारादधीरोऽस्यनल न भवतः स्वैरमैरम्मदार्चिः ।
शंसन्तीत्थं नभःस्था यदुदयसमये चक्रराजांशवस्ते
      युष्माकं प्रौढतापप्रभवभवगदापक्रमाय क्रमन्ताम् ।। 13 ।।

जग्ध्वा कर्णेषु दूर्वाङ्कुरमरिसुदृशामक्षिषु स्वर्वधूनां
      पीत्वा चाम्भश्चरन्त्यः सवृषमनुगता वल्लवेनादिमेन ।
गावो वश्चक्रभर्तुः परममृतरसं प्रश्रितानां दुहाना
      ऋद्धिं स्वालोकलुप्तत्रिभुवनतमसः सानुबन्धां ददन्ताम् ।। 14 ।।

सेनां सेनां मघोनो महति रणमुखेऽलं भयं लम्भयन्तीः
      उत्सेकोष्णालुदोष्णां प्रथमदिविषदामावलीर्यावलीढे ।
विश्वं विश्वम्भराढ्यं रथपदधिपतेर्लीलया पालयन्ती
      वृद्धिः सा दीधितीनां वृजिनमनुजनुर्मार्जयत्वर्जितं वः ।। 15 ।।

तप्ता स्वेनोष्मणेन प्रतिभटवपुषामस्त्रधारां धयन्ती
      प्राप्तेव क्षीबभावं प्रतिदिशमसकृत् तन्वती घूर्णितानि ।
वंशास्थिस्फोटशब्दं प्रकटयति पटुन् याऽऽवहन्त्यट्टहासान्
      भाः सा वः स्यन्दनाङ्गप्रभुसमुदयिनी स्पन्दतां चिन्तिताय ।। 16 ।।

देवैरासेव्यमानो दनुजभटभुजादण्डदर्पोष्मतप्तैः
      आशारोधोतिलङ्घी लुठदुडुपटलीलक्ष्यडिण्डीरपिण्डः ।
रिङ्गज्ज्वालातरङ्गत्रुटितरिपुतरुव्रातपातोग्रमार्गः
      चाक्रो वः शोचिरोघः शमयतु दुरितापह्नवं दाववह्निम् ।। 17 ।।

भ्राम्यन्ती संश्रितानां भ्रमशमनकरी च्छन्नसूर्यप्रकाशा
      सूर्यालोकानुरूपा रिपुहृदयतमस्कारिणी निस्तमस्का ।
धारासंपातिनी च प्रकटितदहना दीप्तिरस्त्रेशितुर्वः
      चित्रा भद्राय विद्रावितविमतजना जायतामायताय ।। 18 ।।

निन्ये वन्येव काशी दवशिखिजटिलज्योतिषा येन दाहं
       कृत्या वृत्त्या विलिल्ये शलभसुलभया यत्र चित्रप्रभावे ।
रुद्रोऽप्यद्रेर्दुहित्रा सह गहनगुहां यद्भयादभ्ययासीत्
       दिश्याद्विश्वार्चितो वः स शुभमनिभृतं शौरिहेतिप्रतापः ।। 19 ।।

उद्यन् बिम्बादुदारान्नयनजलहिमं मार्जयन् निर्जरीणाम्
        अज्ञानध्वान्तमूर्च्छाकरजनिरजनीभञ्जनव्यञ्जिताध्वा ।
न्युक्कर्वाणो ग्रहाणां स्फुरणमपहरन्नर्चिषः पावकीयाः
        चक्रेशार्कप्रकाशो दिशतु दशदिशो व्यश्नुवानं यशो वः ।। 20 ।।

वर्गस्य स्वर्गधाम्रामपि दनुजनुषां विग्रहं निग्रहीतुं
       दातुं सद्योबलानां श्रियमतिशयिनीं पत्रभङ्गानुवृत्त्या ।
योक्तुं देदीप्यते या युगपदपि पुरो भूतिमय्या प्रकृत्या
       सा वो नुद्यादविद्यां द्युतिरमृतरसस्यन्दिनी स्यान्दनाङ्गी ।। 21 ।।

दाहं दाहं सपत्नान् समरभुवि लसद्भस्मना वर्त्मना यान्
       क्रव्यादप्रेतभूताद्यभिलषितपुषा प्रीतकापालिकेन ।
कङ्कालैः कालधौतं गिरिमिव कुरुते यः स्वकीर्तेर्विहर्तुं
      घृष्णिः सान्दृष्टिकं वः सकलमुपनयत्वायुधाग्रेसरस्य ।। 22 ।।

दग्धानां दानवानां सभसितनिचयैरस्थिभिः सर्वशुभ्रां
      पृथ्वीं कृत्वाऽपि भूयो नवरुधिरझरीकौतुकं कौणपेभ्यः ।
कुर्वाणं बाष्पपूरैः कुचतटघुसृणक्षालनैस्तद्वधूनां
     पापं पापच्यमानं शमयतु भवतामस्त्रराजस्य तेजः ।। 23 ।।

मा गान्मोषं ललाटानल इति मदनद्वेषिणा ध्यायतेव
       स्रष्टा प्रोन्निद्रवासाम्बुजदलपटलप्लोषमुत्पश्यतेव ।
वज्राग्निर्मा स्म नाशं व्रजदिति चकितेनेव शक्रेण बद्धैः
      स्तोत्रैरस्त्रेश्वरस्य द्यतु दुरितशतं द्योतमाना द्युतिर्वः ।। 24 ।।

शस्त्रास्त्रं शात्रवाणां शलभकुलमिव ज्वालया लेलिहाना
      घोषैः स्वैः क्षोभयन्ती विघटितभगवद्योगनिद्रान् समुद्रान् ।
व्यूढोरःप्रौढचारत्रुटितपटुरटत्कीकसक्षुण्णदैत्या
      नेमिस्सौदर्शनी वः श्रियमतिशयिनीं दाशतादा शताब्दम् ।। 25 ।।

धारा चक्रस्य तारागणकणविततिद्योतितद्युप्रचारा
       पारावाराम्बुपूरक्वथनपिशुनितोत्तालपातालयात्रा ।
गोत्राद्रिस्फोटशब्दप्रकटितवसुधामण्डलीचण्डयाना
       पन्थानं वः प्रदिश्यात् प्रशमनकुशला पाप्मनामात्मनीनम् ।। 26 ।।

यात्रा या त्रातलोका प्रकटितवरुणत्रासमुद्रे समुद्रे
       सत्त्वासत्वासहोष्मा कृतसगरुदगस्पन्ददानाददाना ।
हानिं हा निन्दितानां जगति परिषदां दानवीनां नवीनां
     चक्रे चक्रेशनेमिः शममुपहरतु सा सप्रभावप्रभा वः ।। 27 ।।

यत्रामित्रान् दिधक्षौ प्रविशति बलिनो धामनिः सीमधाम्नि
        ग्रस्तापस्तापशीर्णैः प्रगुणितसिकतो मौक्तिकैः शौक्तिकेयैः ।
राशिर्वारामपारां प्रकटयति पुनर्वैरिदाराश्रुपूरैः
        वृद्धिं निर्याति निर्यापयतु सदुरितान्यस्त्रराजप्रधिर्वः ।। 28 ।।

कक्ष्यातौल्येन कद्रूतनयफणमणीन् कल्यदीपस्य युञ्जन्
       पातालान्तःप्रपाती निखिलमपि तमःस्वेन धाम्ना निगीर्य ।
दैतेयप्रेयसीनां वमति हृदि हतप्रेयसां भूयसां यः
      चक्राग्रीयाग्रदेशो दहतु विलसितं बह्वसामंहसां वः ।। 29 ।।

कृष्णाम्भोदस्य भूषा कृतनयननयव्याहतिर्भार्गवस्य
        प्राप्तामावेदयन्ती प्रतिभटसुदृशामुद्भटां बाष्पवृष्टिम् ।
निष्टप्ताष्टापदश्रीः समममरचमूगर्जितैरुज्जिहाना
        कीर्तिं वः केतकीभिः प्रथयतु सदृशीं चञ्चला चक्रधारा ।। 30 ।।

वप्राणां भेदनी यः परिणतिमखिलश्लाघनीयां दधानः
       क्षुण्णां नक्षत्रमालां दिशि दिशि विकिरन्विद्युता तुल्यकक्ष्यः ।
निर्याणेनोत्कटेन प्रकटयति नवं दानवारिप्रकर्षं
      चक्राधीशस्य भद्रो वशयतु भवतां स प्रधिश्चित्तवृत्तिम् ।। 31 ।।

नाकौकः शत्रुजत्रुत्रुटनविघटितस्कन्धनीरन्ध्रनिर्यत्-
        नव्यक्रव्यास्रहव्यग्रसनरसलसज्ज्वालजिह्वालवह्निम् ।
यं दृष्ट्वा सांयुगीनं पुनरपि विदधत्याशिषो वीर्यवृद्ध्यै
       गीर्वाणा निर्वृणाना वितरतु स जयं विप्णुहेतिप्रधिर्वः ।। 32 ।।

धन्वाध्वन्यस्य धारासलिलमिव धनं दुर्गतस्येव दृष्टिः
       जात्यन्धस्येव पङ्गोः पदविहृतिरिव प्रीणनी प्रेमभाजाम् ।
पत्युर्मायाःक्रियायां प्रकटपरिणतिर्विश्वरक्षाक्षमायां
        मायामायामिनीं वस्त्रुटयतुमहती नेमिरस्त्रेश्वरस्य ।। 33 ।।

त्राणं या विष्टपानां वितरति च यया कल्प्यते कामपूर्तिः
       न स्थातुं यत्पुरस्तात् प्रभवति कलयाऽप्योषधीनामधीशः ।
उन्मेषो याति यस्या न समयनियतिं सा श्रियं वः प्रदेयात्
      न्यक्कृत्य द्योतमाना त्रिपुरहरदृशं नेमिरस्त्रेश्वरस्य ।। 34 ।।

नक्षत्रक्षोदभूतिप्रकरविकिरणश्वेतिताशावकाशा
       जीणैः पर्णैरिव द्यां जलधरपटलैश्चूर्णितैरूर्णुवाना ।
आजावाजानवाजानतरिपुजनतारण्यमावर्तमाना
      नेमिर्वात्येव चाक्री प्रणुदतु भवतां संहतं पापतूलम् ।। 35 ।।

क्षिप्त्वा नेपथ्यशाटीमिव जलदघटां जिष्णुकोदण्डचित्रां
       तारापुञ्जं प्रसूनाञ्जलिमिव विपुले व्योमरङ्गे विकीर्य ।
निर्वेदग्लानिचिन्ताप्रभृतिपरवशानन्तरा दानवेन्द्रान्
        नृत्यन्नानालयाढ्यं नट इव तनुतां शर्म चक्रप्रधिर्वः ।। 36 ।।

दौर्गत्यप्रौढतापप्रतिभटविभवा वित्तधाराः सृजन्ती
        गर्जन्ती चीत्क्रियाभिर्ज्वलदनलशिखोद्दामसौदामनीका ।
अव्यात् क्राव्याद्वधूटीनयनजलभरैर्दिक्षु नव्याननाव्यान्
      पुष्पन्ती सिन्धुपूरान् रथचरणपतेर्नेमिकादम्बिनी वः ।। 37 ।।

सन्दोहं दानवानामजसमजमिवाऽऽलभ्य जाज्वल्यमाने
     वह्नावह्नाय जुह्वत्त्रिदशपरिषदे स्वस्वभागप्रदायी ।
स्तोत्रैर्ब्रह्मादिगीतैर्मुखरपरिसरं श्लाघ्यशस्त्रप्रयोगं
    प्राप्तस्सङ्ग्रामसत्रं प्रधिरसुररिपोः प्रार्थितं प्रस्रुतां वः ।। 38 ।।

उत्पातालातकल्पान्यसुरपरिषदामाहवप्रार्थिनीनाम्
      अध्वानध्वावबोधक्षपणचणतमःक्षेपदीपोपमानि ।
त्रैलोक्यागार भारोद्वहनसहमणिस्तम्भसम्पत्सखानि
     त्रायन्तामन्तिमायां विपदि सपदि वोऽराणि सौदर्शनानि ।। 39 ।।

ज्वालाजालप्रवालस्तबकितशिरसो नाभिमावालयन्त्यः
       सिक्ता रक्ताश्रुपूरैः शकलितवपुषा शात्रवानीकिनीनाम् ।
चक्राक्रीडप्ररूढाभुजगशयभुजोपघ्ननिघ्नप्रचाराः
       पुष्प्यन्त्यः कीर्तिपुष्पाण्यरकनकलताः प्रीतये वः प्रथन्ताम् ।। 40 ।।

ज्वालाजालाब्धिमुद्रं क्षितिवलयमिवाबिभ्रती नेमिचक्रं
      नागेन्द्रस्येव नाभेः फणपरिषदिव प्रौढरत्नप्रकाशा ।
दत्तां वो दिव्यहेतेर्मतिमरविततिः ख्यातसाहस्रसङ्ख्या
       सङ्ख्यावत्सङ्घचित्तश्रवणहरगुणस्यन्दिसन्दर्भगर्भाम् ।। 41 ।।

ब्रह्मेशोपक्रमाणां बहुविधविमतक्षोदसंमोदितानां
       सेवायै देवतानां दनुजकुलरिपोः पिण्डिकाद्यङ्गभाजाम् ।
तत्तद्धामान्तसीमाविभजनविधये मानदण्डायमाना
      भूमानं भूयसां वो दिशतु दशशती भास्वराणामराणाम् ।। 42 ।।

ज्वालाकल्लोलमालानिबिडपरिसरां नेमिवेलां दधाने
     पूर्वणाक्रान्तमध्ये भुवनमयहविर्भोजिना पूरुषेण ।
प्रस्फूर्जत्प्राज्यरत्ने रथपदजलधावेधमानैः स्फुलिङ्गैः
     भद्रं वो विद्रुमाणां श्रियमरविततिः विस्तृणाना विधत्ताम् ।। 43 ।।

नासीरस्वैरभग्नप्रतिभटरुधिरासारधारावसेकान्
      एकान्तस्मेरपद्मप्रकरसहचरच्छायया प्राप्य नाभ्या ।
मुक्तानीवाङ्कुराणि स्फुरदनलशिखादर्शितप्राक्प्रवालानि
        अव्याघातेन भव्यं प्रददतु भवतां दिव्यहेतेरराणि।। 44 ।।

दावोल्कामण्डलीव द्रुमगणगहने वाडबस्येव वह्नेः
       ज्वालावृद्धिर्महाब्धौ प्रवयसि तमसि प्रातररर्कप्रभेव ।
चक्रे या दानवानां हयकरटिघटासङ्कटे जाघटीति
       प्राज्यं सा वः प्रदेयात्पदमरपरिषत् पद्मनाभायुधस्य ।। 45 ।।

तापाद्दैत्यप्रतापातपसमुपचितात् त्रायमाणं त्रिलोकीं
     लोलैर्ज्वालाकलापैः प्रकटयदभितश्छिन्नपट्टाञ्चलानि ।
छत्राकारं शलाका इव कनककृताश्शौरिदोर्दण्डलग्नं
      भूयासुर्भूषयन्त्यो रथचरणमरस्फूर्तयः कीर्तये वः ।। 46 ।।

नाभीशालानिखातां नहनसमुचितां वैरिलक्ष्मीवशानां
        संयद्वारीहृतानां समनुविदधती काञ्चनालानपङ्क्तिम् ।
राज्या च प्राज्यदैत्यव्रजविजयमहोत्तम्भितानां भुजानां
        तुल्या चक्रारमाला तुलयतु भवतां तूलवच्छत्रुलोकम् ।। 47 ।।

आ नेमेश्चक्रवालात्त्विष इव वितताः पिण्डिकाचण्डदीप्तेः
        दीप्ता दीपा इवाराद्गहनरणतमीगाहिनः पूरुषस्य ।
शाणे रेखायितानां रथचरणमये शत्रुशौण्डीर्यहेम्नां
      रेखाः प्रत्यग्रलग्ना इव भुवनमरश्रेणयः प्रीणयन्तु ।। 48 ।।

दीप्तैरर्चिःप्ररोहैर्दलवति विधृते बाहुनालेन विष्णोः
        उद्यत्प्रद्योतनाभं प्रथयति पुरुषं कर्णिकावर्णिकायाम् ।
चूडालं वेदमौलिं कलयति कमले चक्रनाम्नोपलक्ष्ये
       लक्ष्मीं स्फारामराणि प्रतिविदधतु वः केसरश्रीकराणि ।। 49 ।।

धातुस्यन्दैरमन्दैः कलुषितवपुषो निर्झराम्भःप्रपातान्
        अर्चिष्मत्या स्वमूर्त्या रथचरणगिरेर्नेमिनाभीतटस्य ।
व्याकुर्वाणाऽरपङ्क्तिर्वितरतु विभुताविस्तृतिं वित्तकोटी
       कोटीरच्छत्रपीठीकटककरिघटाचामरस्रग्विणीं वः ।। 50 ।।

एक्येन द्वादशानामशिशिरमहसां दर्शयन्ती प्रवृत्तिं
        दत्तः स्वर्लोकलक्ष्म्यास्तिलक इव मुखे पद्मरागद्रवेण ।
देयाद्दैतेयदर्पक्षतिकरणरणप्रीणिताम्भोजनाभिः
         नाभिर्नाभित्वमुर्व्यास्सुरपतिविभवस्पर्शि सौदर्शनी वः ।। 51 ।।

शस्त्रश्यामे शताङ्गक्षितिभृति तरलैरुत्तरङ्गे तुरङ्गैः
      त्वङ्गन्मातङ्गनक्रे कुपितभटमुखच्छायमुग्धप्रवाले
अस्तोकं प्रस्तुवाना प्रतिभटजलधौ पाटवं वाडवस्य
       श्रेयो वः संविधत्तां श्रितदुरितहरा श्रीधरास्त्रस्य नाभिः ।। 52 ।।

ज्वालाचूडालकालानल-चलन-समाडम्बरा साम्परायं
      यासावासाद्य माद्यत्सुरसुभटभुजास्फोट-कोलाहलाढ्यम् ।
दैत्यारण्यं दहन्ती विरचयति यशोभूतिशुभ्रां धरित्रीं
    सा वश्चक्रस्य नक्रस्यदमृदित गजत्रायिणी नाभिरव्यात् ।। 53 ।।

विन्दन्ती सान्ध्यमर्चिर्विदलितवपुषः प्रत्यनीकस्य रक्तैः
      स्फायन्नक्षत्रराशिर्दिशिदिशि कणशः कीकसैः कीर्यमाणैः ।
नाकौकः पक्ष्मलाक्षी नवमदहसितच्छायया चन्द्रपादान्
        राथाङ्गी विस्तृणाना रचयतु कुशलं पिण्डका यामिनी वः ।। 54 ।।

निस्सीमं निस्सृताया भुजधरणिधराघाटतः कैटभारेः
      आशाकूलङ्कषर्द्धेरहितबलमहाम्भोधिमासादयन्त्याः।
चक्रज्वालापगायाश्चलदरलहरीमालिकादन्तुरायाः
     बिभ्रत्यावर्तभावं भ्रमयतु भुवने पिण्डिका वः प्रशस्तिम् ।। 55 ।।

पाणौ कृत्वाहवाग्रे प्रतिभट विजयोपार्जितां वीरलक्ष्मीं
      आनीतायास्ततोस्याः स्वसविधमसुरद्वेषिणा पूरूषेण ।
प्रासादं वासहेतोर्विरचितमरुणै रश्मिभिस्सूचयन्ती
     नाभिर्वो निर्मिमीतां रथचरणपतेर्निर्वृतिं निर्विघाताम् ।। 56 ।।

डिण्डिरापाण्डुगण्डैररियुवतिमुखैः पिण्डिका कृष्णहेतेः
         उच्चण्डाश्रुप्रवर्षैरुपरत-तिलकैरुक्तशौण्डीर्य-चर्या ।
द्वित्रग्रामाधिपत्य-द्रुहिणमदमषीदूषिताक्षक्षमाभृत्
        सेवाहेवाकपाकं शमयतु भवतां कर्म शर्म प्रतीपम् ।। 57 ।।

पर्याप्तामुन्नतिं या प्रथयति कमलं या तिरोभाव्य भाति
      स्त्रष्टुस्सृष्टेर्दवीयः कुवलयमहितं या बिभर्ति स्वरूपम्।
भुम्ना स्वेनान्तरिक्षं कवलयति च या सा विचित्रा विधत्तां
      दैतेयारातिनाभिर्द्रविणपतिपदद्वेषिणीं सम्पदं वः ।। 58 ।।

वाणीवाङ्गैश्चतुर्भिः सदसि सुमनसां द्योतमानस्वरूपा
        वाह्वन्तस्था मुरारेरभिमतमखिलं श्रीरिव स्पर्शयन्ती
दुर्गेवोग्राकृतिर्या त्रिभुवनजननस्थेमसंहारधुर्या
        मर्यादालङ्घनं वः क्षपयतु महती हेतिवर्यस्य नाभिः ।। 59 ।।

स्रग्भिः सन्तानजाभिः मधुरमधुरसस्यन्दसन्दोहिनीभिः
      पाटीरैः प्रौढचन्द्रातपचयसुषमालोपनैर्लेपनैश्च
धूपैः कालागरूणामपि सुरसुदृशो विस्रमर्चासु यस्या
       गन्धं रुन्धन्ति सा वश्चिरमसुरभिदो नाभिरव्यादभव्यात् ।। 60 ।।

अंहः संहत्य दग्ध्वा प्रतिजनिजनितं प्रौढसंसारवन्या
       दूराध्वन्यानधन्यान् महति विनतिभिर्धामनि स्थापयन्ती ।
विश्रान्तिं शाश्वतीं या नयति रमयतां चक्रराजस्य नाभिः
      संयन्मोमुह्यमान-त्रिदशरिपुदशासाक्षिणी साऽक्षिणी वः ।। 61 ।

श्रुत्वायन्नामशब्दं श्रुतिपथकटुकं देवनक्रीडनेषु
        स्वर्वैरिस्वैरपत्न्यो भयविवशधियः कातरन्यस्तसाराः
मन्दाक्षं यान्त्यमन्दं प्रतियुवतिमुखैर्दर्शितोत्प्रासदर्पैः
        अक्षं सौदर्शनं तत्क्षपयतु भवतामेधमानां धनाशाम् ।। 62 ।।

व्यस्तस्कन्धं विशीर्णप्रसवपरिकरं प्रत्तपत्रोपमर्दं
        संयद्वर्षासु तर्षातुरखगपरिषत्पीतरक्तोदकासु ।
अक्षं रक्षस्तरूणामशनिवदशनैरापतन्मूर्ध्नि मूर्ध्नि
       स्तादस्त्राधीशितुर्वः स्तवकितयशसे द्वेषिणां प्लोषणाय ।। 63 ।।

दीक्षां सङ्ग्रामसत्रे महति कृतवतो दीप्तिभिः संहताभिः
        जिह्वाले सप्तजिह्वे दनुजकुलहविर्जुह्वतो नेमिजुह्वा ।
वैकुण्ठास्त्रस्य कुण्डं महदिव विलसत्पिण्डिकावेदिमध्ये
        दिश्यात् दिव्यर्द्धिदेश्यं पदमिह महतामक्षतोन्मेषमक्षम् ।। 64 ।।

तुङ्गाद्दोरद्रिशृङ्गाद्दनुजविजयिनः स्पष्टदानोद्यमानां
शत्रुस्तम्बेरमाणां शिरसि निपततः स्रस्तमुक्तास्थिपुञ्जे ।
रक्तैरभ्यक्तमूर्तेर्विदलनगलितैर्व्यक्तवीरायितर्द्धेः

हर्यक्षस्यारिभङ्गं जनयतु जगतामीडितं क्रीडितं वः ।। 65 ।।

उन्मीलत्पद्मरागं कटकमिवधृतं बाहुना यन्मुरारेः
दीप्तान् रश्मीन् दधानं नयनमिव यदुत्तारकं विष्टपस्य ।
चक्रेशार्कस्य यद्वा परिधिरभिदधद्दैत्यहत्यामिवद्राक्
अक्षं पक्षे पतित्वा परिघटयतु वस्तद्द्रढिष्ठां प्रतिष्ठाम् ।। 66 ।।

क्रीडत्प्राक्क्रोडदंष्ट्राहति दलितहिरण्याक्ष वक्षः कवाट
प्रादुर्भूतप्रभूतक्षतजसमुदितारुण्यमुद्रं समुद्रम् ।
उन्मीलत्किंशुकाभैरुपहसदमितैरंशुभिः संशयघ्नीम्
अक्षं चक्रस्य दत्तामघशतशमनं दाशुषीं  शेमुषीं वः।। 67 ।।

पद्मोल्लासप्रदं यज्जनयति जगतीमेधमानप्रबोधां
यस्यच्छायासमाना लसति परिसरे रोहिणी तारकाग्र्या ।
नानाहेत्युन्नतत्वं प्रकटयति च यत्प्राप्तकृष्णप्रयाणं
त्रेधा भिन्नस्य धाम्नः समुदय इव तत्पातु वश्चाक्रमक्षम् ।। 68 ।।

शोचिर्भिः पद्मरागद्रवसमसुषमैश्शोभमानावकाशं
प्रत्यग्राशोकरागप्रतिभटवपुषा भूषितं पूरुषेण ।
अन्तः स्वच्छन्दमग्नोत्थितभृगुतनयं क्षत्रियाणां क्षतानाम्
आरब्धं शोणितौघैस्सर इव भवतो दीव्यहेत्यक्षमव्यात् ।। 69 ।।।

मत्तानामिन्द्रियाणां कृतविषयमहाकाननक्रीडनानां
सृष्टं चक्रेश्वरेण ग्रहणधिषणया वारिवद्वारणानाम् ।
गम्भीरं यन्त्रगर्तं कमपि कृतधियो मन्वते यत्प्रदेयात्
अस्थूलां संविदं वस्त्रिजगदभिमतस्थूललक्षं तदक्षम् ।। 70 ।।

प्राणादीन् संनियम्य प्रणिहितमनसां योगिनामन्तरङ्गे
तुङ्गं सङ्कोच्य रूपं विरचितदहराकाशकृच्छ्रासिकेन ।
प्राप्तं यत्पूरुषेण स्वमहिमसदृशं धामकामप्रदं वो
भूयात् तद्भूर्भुवः  स्वस्त्रयवरिवसितं पुष्कराक्षायुधाक्षम् ।। 71 ।।

विद्धान्वीध्रेण धाम्ना चरणनखभुवा बद्धवासस्य मध्ये
चक्राध्यक्षस्य बिभ्रत्परिहसितजपापुष्पकोशान्  प्रकाशान् ।
शुभ्रैरभ्रैरदभ्रैश्शरदि तत इतो व्योम विभ्राजमानं
प्रातस्त्यादित्यरोचिस्ततमिव भवतः पातुराथाङ्गमक्षम् ।। 72।।

श्रीवाणीवाङ्मृडान्यो विदधति भजनं शक्तयो यस्य दिक्षु
प्राह व्यूहं यदाद्यं प्रथममपि गुणं भारती पाञ्चरात्री ।
घोरां शान्तां च मूर्तिं प्रथयति पुरुषः प्राक्तनः प्रार्थनाभिः
भक्तानां यस्य मध्ये दिशतु तदनघामक्षमध्यक्षतां वः ।। 73 ।।

रक्षःपक्षेण रक्षत्  क्षतममरगणं लक्ष्यवैलक्ष्यमाजौ
लक्ष्मीमक्षीयमाणां बलमथनभुजे वज्रशिक्षानपेक्षे ।
निक्षिप्य क्षिप्रमध्यक्षयति जगति यद्दक्षतां दिव्यहेतेः
अक्षामामक्षमक्षमां तत्  क्षपयतु भवतामक्षजिल्लक्षमक्षम् ।। 74 ।।

ज्योतिश्चूडालमौलिस्त्रिनयनवदनः षोडशोत्तुङ्गबाहुः
प्रत्यालीढेन तिष्ठन् प्रणवशशधराधार षट्कोणवर्ती ।
निस्सीमेन स्वधाम्ना निखिलमपि जगत् क्षेमवन्निर्मिमाणः
भूयात् सौदर्शनो वः प्रतिभटपरुषः पूरुषः पौरुषाय ।। 75 ।।

वाणी पौराणिकी यं प्रथयति महितं प्रेक्षणं कैटभारेः
शक्तिर्यस्येषु दंष्ट्रानखपरशुमुखव्यापिनी तद्विभूत्याम् ।
कर्तुं यत्तत्वबोधो न निशितमतिभिर्नारदाद्यैश्च शक्यः
दैवीं वो मानुषीं च क्षिपतु स विपदं दुस्तरामस्त्रराजः ।। 76 ।।

रूढस्तारालवाले रुचिरदलचयः श्यामलैश्शस्त्रजालैः
ज्वालाभिस्सप्रवालः प्रकटितकुसुमो बद्धसङ्घैः स्फुलिङ्गैः ।
प्राप्तानां पादमूलं प्रकृतिमधुरया च्छायया तापहृद्वो
दत्तामुद्दोःप्रकाण्डः फलमभिलषितं विष्णुसङ्कल्पवृक्षः ।। 77 ।।

धाम्नामैरम्मदानां निचयमिव चिरस्थायिनां द्वादशानां
मार्तण्डानां समूहं मह इव बहुलां रत्नभासामिवर्द्धिम् ।
अर्चिस्सङ्घातमेकीकृतमिव शिखिनां वाडवाग्रेसराणां
शङ्कन्ते यस्य रूपं स भवतु भवतां तेजसे चक्रराजः ।। 78 ।।

उग्रं पश्याक्षमुद्यद्भ्रकुटि समुकुटं कुण्डलस्पष्टदंष्ट्रं
चण्डास्त्रैर्बाहुदण्डैर्लसदनलसमक्षौमलक्ष्योरुकाण्डम् ।
प्रत्यालीढस्थपादं प्रथयतु भवतां पालनव्यग्रमग्रे
चक्रेशोऽकालकालेरितभटविकटाटोपलोपाय रूपम् ।। 79 ।।

चक्रं कुन्तं कृपाणं परशुहुतवहावङ्कुशं दण्डशक्ती
शङ्खं कोदण्डपाशौ हलमुसलगदावज्रशूलांश्च हेतीन् ।
दोर्भिः सव्यापसव्यैर्दधदतुलबलस्तम्भितारातिदर्पैः
व्युहस्तेजोभिमानी नरकविजयिनो जृम्भतां संपदे वः ।। 80 ।।

पीतं केशे रिपोरप्यसृजि रथपदे संश्रितेऽप्युत्कटाक्षं
चन्द्राधःकारि यन्त्रे वपुषि च दलने मण्डले च स्वराङ्कम् ।
हस्ते वक्त्रे च हेतिस्तबकितमसमं लोचने मोचने च
स्तादस्तोकाय धाम्ने सुरवरपरिषत्सेवितं दैवतं वः ।। 81 ।।

चित्राकारैः स्वचारैर्मितसकलजगज्जागरूकप्रतापः
मन्त्रं तन्त्रानुरूपं मनसि कलयतो मानयन्नात्मगुह्यान् ।
पञ्चाङ्गस्फूर्ति निर्वर्तित रिपुविजयो धामषष्णां गुणानां
लक्ष्मीं राजसनस्थो वितरतु भवतां पूरुषश्चक्रवर्ती ।। 82 ।।

अक्षावृत्ताभ्रमालान्यरविवरलुठच्चन्द्रचण्डद्युतीनि
ज्वालाजालावलीढ स्फुटदुडुपटली पाण्डुदिङ्मण्डलानि ।
चक्रान्ताक्रान्तचक्राचलचलितमही चक्रवालार्तशेषाणि
अस्त्रग्रामाग्रिमस्य प्रददतु भवतां प्रार्थितं प्रस्थितानि ।। 83 ।।

शूलं त्यक्तात्मशीलं सृणिरणुकघृणिः पट्टिशः स्पष्टसादः
शक्तिश्शालीनशक्तिः कुलिशमकुशलं कुण्ठधारः कुठारः ।
दण्डश्चण्डत्वशून्यो भवति तनु धनुर्यत्पुरस्तात्स वस्तात्
ग्रस्ताशेषास्त्रवर्गो रथचरणपतिः कर्मणे शार्मणाय ।। 84 ।।

क्षुण्णाजानेयवृन्दं क्षुभितरथगणं सन्नसान्नाह्य यूथं।
क्ष्वेलासंरम्भहेलाकलकलविगलत्पूर्वगीर्वाणगर्वम् ।
कुर्वाणस्सांपरायं रथचरणपतिः स्थेयसीं वः प्रशस्तिं
          दुग्धां दुग्धाब्धिभासं भयविवशसुनासीरनासीरवर्ती  ।। 85।।

द्रुह्यद्दोश्शालिमालिप्रहरणरभसोत्तानिते वैनतेये
विद्राति द्राक्प्रयुक्तः प्रथनभुवि परावर्तमानेन भर्त्रा ।
निर्जित्य प्रत्यनीकं निरवधिकचरद्धास्तिकाश्वीयरथ्यं
पथ्यं विश्वस्य दाश्वान् प्रथयतु भवतो हेतिरिन्द्रानुजस्य ।। 86।।

नन्दिन्यानन्दशून्ये गलति गणपतौ व्याकुले बाहुलेये
चण्डे चाकित्यकुण्ठे प्रमथपरिषदि प्राप्तवत्यां प्रमाथम् ।
उच्छिद्याजौ बलिष्ठं बलिजभुजवनं यो ददावादि भिक्षोः
भिक्षां तत्प्राणरूपां स भवदकुशलं कृष्णहेतिः क्षिणोतु ।। 87।।

रक्तौघाभ्यक्तमुक्ता फललुलितललद्वीचिवृद्धौ महाब्धौ 
सन्ध्यासम्बन्धताराजलधरशबलाकाशनीकाशकान्तो ।
गम्भीरारम्भमम्भश्चरमसुरकुलं वेदविघ्नं विनिघ्नन्
निर्विघ्नं वः प्रसूतां व्यपगतविपदं संपदं चक्रराजः ।। 88 ।।

काशीविप्लोषचैद्यक्षपणधरणिजध्वंससूर्यापिधान-
ग्राहद्वेधात्वमालित्रुटनमुखकथावस्तुसत्कीर्तिगाथाः ।
गीयन्ते किन्नरीभिः कनकगिरिगुहागेहिनीभिर्यदीया
देयाद्दैतेयवैरी स सकलभुवनश्लाघनीयां श्रियं वः ।। 89।।

नानावर्णान्विवृण्वन्  विरचितभुवनानुग्रहान् विग्रहान् यः
चक्रेष्वष्टासु मृष्टासुरवरतरुणी कण्ठकस्तूरिकेषु ।
आतारादर्णमालावधिषु वसति यः पूरुषो वस्सदेयात्
व्यध्वैरुद्धूतसत्त्वै रुपहितमबहिर्ध्वान्तमध्वान्तवर्ती ।। 90 ।।

द्वात्रिंशत् षोडशाष्टप्रभृतिपृथुभुजस्फूर्तिभिर्मूर्तिभेदैः
कालाद्ये चक्रषट्के प्रकटितविभवः पञ्चकृत्यानुरूपम् ।
अर्थानामर्थितानामहरहरखिलं निर्विलम्बैर्विलम्बैः
कुर्वाणो भक्तवर्गं कुशलिनमवतादायुधग्रामणीर्वः ।। 91 ।।

कोणैरर्णैस्सरोजैरपि कपिशगुणैः षड्भिरुद्भिन्नशोभे
श्रीवाणीपूर्विकाभिर्दधति विलसतः शक्तिभिः केशवादीन् ।
तारान्ते भूपुरादौ रथचरणगदाशार्ङ्गखड्गाङ्किताशे
यन्त्रे तन्त्रोदिते वः स्फुरतु कृतपदं लक्ष्मलक्ष्मीसखस्य ।। 92 ।।

दंष्ट्राकान्त्या कडारे कपटकिटितनोः कैटभारेरधस्तात्
ऊर्ध्वं हासेन विद्धे नरहरिवपुषो मण्डले वासवीये ।
प्राक्प्रत्यक्सान्ध्यसान्द्रच्छविभरभरिते व्योम्नि विद्योतमानः
दैतेयोत्पातशंसी रविरिव रहयत्वस्त्रराजो रुजं वः ।। 93 ।।

कोणे क्वापि स्थितोऽपि त्रिभुवनविततश्चन्द्रधामाऽपि रूक्षः
रुक्मच्छायोऽपि कृष्णाकृतिरनलमयोप्याश्रितत्राणकारी ।
धारासारोऽपिदीप्तो दिनकररुचिरोऽप्युल्लसत्तारक श्रीः
चक्रेशश्चित्रभूमा वितरतु विमतत्रासनं शासनं वः ।। 94 ।।

शुक्लः शक्र स्तवस्ते सह दहन कलां काल तेऽयं न कालः
किं वो रक्षांसि रक्षा तव फलतु पते यादसां पादसेवा ।
वायो  हृद्योऽसि भर्तुस्त्यज धनद मदं सेव्यतां त्र्यम्बकेति
प्राहुर्यद्यन्त्रपालाः स दनुजविजयी हन्तु तन्द्रालुतां वः ।। 95 ।।

गायत्र्यर्णारचक्रे प्रथममनुसखरस्मेरपत्रारविन्दे
बिम्बं वह्नेस्त्रिकोणं वहति जयिजयाद्यष्टशक्तौ निषण्णा ।
शोकं वोऽशोकमूले पदसविधलसद्भीमभीमाक्षभीमा
पुंसो दिव्यास्त्रधामा पुरुषहरिमयी मूर्तिरस्यत्वपूर्वा ।। 96 ।।

पाश्चात्याशोकपुष्पप्रकरनिपतितैः प्राप्तरागं परागैः
सन्ध्यारोचिस्सगन्धैः स्वपदशशधरं प्रेक्ष्य तारानुषक्तम् ।
पद्मानाबद्धकोशानिव सुरनिवहैरञ्जलीन् कल्पमानान्
चक्राधीशोऽभिनन्दन् प्रदिशतु सदृशीमुत्तमश्लोकतां वः ।। 97।।

रक्ताशोकस्य वेदस्य च निहितपदं प्राप्तशाखस्य मूले
चक्रैरस्त्रैस्तदाद्यैरपि महितचतुद्विश्चतुर्बाहुदण्डम् ।
आसीनं भासमानं स्थितमपि भयतस्त्रायतां तत्त्वमेकं
पश्चात्पूर्वत्र भागे स्फुटतरहरितामानुषं जानुषाद्वः ।। 98 ।।

प्राणे दत्तप्रयाणे मुषितदिशिदृशि त्यक्तसारे शरीरे
मत्यां व्यामोहवत्यां सतमसि मनसि व्याहृते व्याहृते च ।
चक्रान्तर्वर्ति मृत्युप्रतिभयमुभयाकारचित्रं पवित्रं
तेजस्तत्तिष्ठतां वस्त्रिदशकुलधनं त्रीक्षणं तीक्ष्णदंष्ट्रम् ।। 99 ।।

यस्मिन् विन्यस्य भारं विजयिनि भवतां जङ्गमस्थावराणां
लक्ष्मीनारायणाख्यं मिथुनमनुभवत्यत्युदारान् विहारान् ।
आरोग्यं भूतिमायुः कृतमिह बहुना यद्यदास्थापदं वः
तत्तत्सद्यः समस्तं दिशतु स पुरुषो दिव्यहेत्यक्षवर्ती ।। 100 ।।

पद्यानां तत्त्वविद्याद्युमणिगिरिशविध्यङ्गसंख्याधराणाम्
अर्चिःष्वङ्गेषु नेम्यादिषु च परमतः पुंसि षड्विंशतिश्च ।
सङ्घैस्सौदर्शनं यः पठति कृतमिदं कूरनारायणेन

स्तोत्रं निर्विष्टभोगो भजति स परमां चक्रसायुज्यलक्ष्मीम् ।। 101।।


इति श्रीकूरनारायणमुनिविरचितं सुदर्शनशतकं पूर्णम् ।।

निवेदन- मैंने इस पवित्र स्तोत्र को अनेक ग्रन्थों से मिलान कर यथासम्भव शुद्ध प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। पाठभेद वाले स्थल को नील रंग से चिह्नित भी कर दिया है। फिर भी यदि कहीं अशुद्ध पाठ हो तो सूचित करें। 9598011847