शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

ज्योतिष में योग

        योग शब्द का अर्थ होता है मेल (मिलाना) अथवा जोड़ना। योगशास्त्र में शक्ति का शिव से मिलन अर्थात् मूलाधार की कुण्डलिनी शक्ति को सहस्रार में सदाशिव से मिलाना ही योग है किन्तु ज्योतिषशास्त्र में काल के दो अवयवों को मिलाना ही योग नाम से जाना जाता है। पञ्चाङ्गों में दो प्रकार के योगों की गणना की जाती है। सात वारों तथा अभिजित सहित अश्विनी आदि अट्ठाईस नक्षत्रों को मिलाने से आन्दादि २८ योग बनते हैं।
प्रथम वार रविवार तथा प्रथम नक्षत्र अश्विनी इन दोनों के योग से प्रथम आनन्द योग बनता है। पुन: सोमवार के दिन (अश्विनी को लेकर ४ नक्षत्र तक छोड़कर ५ वां) मृगशिरा नक्षत्र के मूल से दूसरा काल दण्ड योग बनता है। इसी प्रकार अन्य नक्षत्रों का अन्य वारों में योग होने पर समस्त अट्ठाईस योग बनते हैं। इसमें अभिजित नक्षत्र को भी सम्मिलित किया जाता है जो उत्तराषाढ़ा का अन्तिम चरण तथा श्रवण के प्रथम चरण की ४ घटी अर्थात् ५३ कला २० विकला कुल १९ घटी का माना जाता है। ये योग इस प्रकार हैं
१. आनन्द, २. कालदण्ड, ३. ध्रूम, ४. धाता, ५. सौम्य, ६. ध्वांक्ष, ७. केतु, ८. श्रीवत्स, ९. वङ्का, १०. मुद्गर, ११. छत्र, १२. मित्र, १३. मानस, १४. पद्म, १५. लुम्ब, १६. उत्पात, १७. मृत्यु, १८. काण, १९. सिद्धि, २०. शुभ, २१. अमृत, २२. मुसल, २३. गद, २४. मातंग, २५. रक्ष, २६. चर, २७. सुस्थिर और २८. प्रवर्धमान।
इसमें आनन्द, धाता, सौम्य, श्रीवत्स, धन, मित्र, मानस, सिद्धि, शुभ, अमृत, मातंग, सुस्थिर तथा प्रवर्धमान ये सभी कार्यों के लिये शुभ होते हैं, शेष अन्य योग प्राय: अशुभ होते हैं।
सूर्य तथा चन्द्रमा के राशि अंशों के मेल से बनने वाले योग २७ होते हैं। सूर्य चन्द्रमा के स्पष्ट राशि अंशों को जोड़कर कलायें बनाकर ८०० का भाग देने पर गत योगों की संख्या आती है। यथा कर्कान्त के चन्द्रमा का अंश १२० तुला के सूर्य का अंश २१० दोनों का योग ३३० कला बनाने के लिये ६० से गुणा किया ३३र्० े ६० = १९८०० इसमें ८०० का भाग देने पर शेष २४ आता है अत: २५वां योग चल रहा है। इसका आशय यह है कि जब अश्विनी नक्षत्र के आरम्भ से सूर्य और चन्द्रमा दोनों मिलकर ८०० कला से आगे चलेंगे तब एक योग व्यतीत होता है। जब १६०० कलायें बीतती हैं तब दो योग पूर्ण होता है इसी प्रकार २१ हजार ६०० कलायें पूर्ण होने पर २७ योग पूर्ण हो जाते हैं। इन योगों के नाम और इनके स्वामी इस प्रकार हैं




योग                   स्वामी

विष्कुम्भ            यमराज
प्रीति                विष्णु
आयुष्मान          चन्द्रमा
सौभाग्य             ब्रह्मा
शोभन              बृहस्पति
अतिगण्ड           चन्द्रमा
सुकर्मा              इन्द्र
धृति                 जल
शूल                  सर्प
गण्ड                अग्नि
वृद्धि                सूर्य
ध्रुव                भूमि
व्याघात          वायु
हर्षण             भग
वङ्का           वरुण
सिद्धि            गणेश
व्यतिपात           रुद्र
वरीयान            कुबेर
परिघ              विश्वकर्मा
शिव                मित्र
सिद्ध               कार्तिकेय
साध्य              सावित्री
शुभ                 लक्ष्मी
शुक्ल              पार्वती
ब्रह्म                अश्विनीकुमार
ऐन्द्र               पितर
वैधृति            दिति
इन योगों में वैधृति एवं व्यतिपात योग अत्यन्त अनिष्टकारक है तथा विष्णु, कुम्भ, वङ्का, व्याघात, गण्ड, अतिगण्ड तथा शूल आदि योग भी अशुभ हैं। शेष योग शुभफल देने वाले होते हैं। जन्म कुण्डली में इन्हीं योगों का उल्लेख किया जाता है तथा इनका फल जातक के जीवन में देखने को मिलता है।

वर्जित घटि में -

              विरुद्धसंज्ञा इह ये च योगास्तेषामनिष्ट: खलु पाद आद्य:।
              सवैधृतिस्तु व्यतिपातनामा सर्वोऽप्यनिष्ट: परिघस्य चाद्र्धम् ।।
             तिस्रस्तु योगे प्रथमे च वङ्को व्याघातसंज्ञे नवपञ्चशूले।
             गण्डेऽतिगण्डे च षडेव नाड्य: शुभेषु कार्येषु विवर्जनीया:।।
इन योगों में जो निन्दित नाम वाले योग हैं उनका पहिला चरण अनिष्टकारक होता है, परन्तु वैधृति तथा व्यतीपात नाम वाले जो योग हैं उनके चारों चरण और परिघ योग के दो चरण अनिष्ट हैं। किन्हीं आचार्यों का मत है कि विष्कुम्भ तथा वङ्कायोग में तीन नाड़ियां, व्याघात योग में ९ नाड़ियां, शूल योग में ५ नाड़ियां, गण्ड तथा अतिगण्ड योगों में ६ नाड़ियां, शुभ कार्यों में वर्जित करनी चाहिये।
आनन्दादि योगों के फल -
आनन्दादि योगों का फल यह है - आनन्द (सिद्धि), कालदण्ड (मृत्यु), धूम्र (असुख), धाता (सौभाग्य, सौम्य (बहुसुख), ध्वांक्ष (धनक्षय), केतु (दौर्भाग्य), श्रीवत्स (सुख सम्पत्ति), व्रङ्का (क्षय), मुद्गर (लक्ष्मीनाश), छत्र (राज सम्मान), मित्र (पुष्टि), मानस (सौभाग्य), पद्म (धनागम), लुम्ब (धनक्षय), उत्पात (प्राणनाश), मृत्यु (प्राणनाश), काण (क्लेश), सिद्धि (कार्यसिद्धि), शुभ (सुख), अमृत (राजसम्मान), मुसल (धनक्षय), गद (रोग), मातङ्ग (कुलवृद्धि), रक्ष (महाकष्ट), चर (कार्यसिद्धि), सुस्थिर (गृहारम्भ), प्रवर्धमान (विवाह)।
आनन्दादि योगों का ज्ञान -
                      दास्रादर्के मृगादिन्दौ सार्पाद्भौमेक राद्बुधे।
                      मैत्राद्गुरौ भृगौ वैश्वाद्गण्या मन्दे च वारुणात् ।।
आनन्दादि योग जानने का उपाय यह है कि रविवार को अश्विनी नक्षत्र से गिने, सोमवार को मृगशिरा से गिने, मङ्गलवार को आश्लेषा से गिने, बृहस्पतिवार को अनुराधा से गिने, शुक्रवार को उत्तराषाढ़ा से गिने और शनिवार को शतभिषा से गिने। रविवार को अश्विनी हो तो आनन्द योग, भरणी हो तो कालदण्ड इत्यादि। इसी प्रकार से सोमवार को मृगशिरा हो तो आनन्द, आद्रा हो तो कालदण्ड इत्यादि जानना चाहिये।
र्वािजत नाडियां -
                   ध्वाङ्क्षे वङ्को मुद्गरे चेषुनाड्यो वज्र्या वेदा: पद्मलुम्बे गदेऽश्वा:।
                    धूम्रे काणे मौसले भूद्वंयं द्वे रक्षोमृत्यूत्पातकालाश्च सर्वे।।
                   ध्वाङ्क्षमुद्गरवङ्कााणां घटीपञ्चकमादिषु।
                   काणमौसलयोद्र्वेदे चतस्र: पद्मलुम्बयो:।।
                   एकाधूम्रेगदे सप्तचरे तिस्रो घटीस्त्यजेत् ।
                  त्यजेत्सर्वान् शुभे मृत्यु कालोत्पाताख्यराक्षसान् ।।
                  कुयोगास्थितिवारोत्थास्तिभोत्था भवारजा:।
                   हूणवङ्गखसेष्वेव वज्र्यास्त्रितयजास्तथा।।

ध्वांक्ष, मुद्गर और वङ्का योगों की आदि की ५ घड़ियां, काण और मुसल योगों की दो-दो घड़ियां, पद्म और लुम्ब योगों की चार-चार घड़ियां वर्जित करनी चाहिये। ध्रूम योग में एक घड़ी, गद योग में ७ घड़ियां, चर योग में ३ घड़ियां छोड़नी चाहिये। मृत्यु, काल, उत्पात और राक्षस योगों की सब घड़ियां शुभ कार्यों में वर्जित करनी चाहिए। ये आनन्दादि योग वार तथा नक्षत्र के मेल से बनते हैं, इसलिये इनमें से कुत्सित योग केवल हूण, वङ्ग तथा खस देशों में वर्जित हैं।

ज्योतिष में करण

तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं। अर्थात् एक तिथि में दो करण होते हैं। सूर्य से चन्द्रमा के ६ अंश का अन्तर ही एक करण का कारण बनता है। अत: चान्द्रमास के अनुसार १ महीने में ६० करण होते हैं। कुल ११ करणों के नाम इस प्रकार हैं। वव, वालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न। स्थिर करण प्रत्येक चान्द्रमास में एक बार ही आते हैं जबकि चर करणों की आवृत्ति प्रत्येक चान्द्रमास में आठ बार होती है। र्८ x ७ = ५६ चर करण तथा ४ स्थिर करण = ६० करण। तिथि, नक्षत्र, योग के समान करणों के भी स्वामी होते हैं। वव का स्वामी इन्द्र, वालव का ब्रह्मा, कौलव का सूर्य तथा तैतिल का भी सूर्य, गर का पृथ्वी, वणिज की लक्ष्मी, विष्टि का यम, शकुनि का कलियुग, चतुष्पद का रुद्र, नाग का सर्प तथा किंस्तुघ्न का स्वामी वायु है।
कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के उत्तरार्ध से प्रारम्भ होकर अमावस्या तथा शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के पूर्वार्ध तक चारों स्थिर करण अपरिर्वितत रहने के कारण ही इन्हें स्थिर करण कहा जाता है। इसमें विष्टिकरण को ही भद्रा कहते हैं। ज्योतिषशास्त्र की मान्यता के अनुसार भद्रा में शुभकार्य निषिद्ध हैं। किन्तु वध, बन्धन, विष प्रयोग, अभिचार कर्म, अग्निदाह कर्म भद्रा में विहित हैं।
        विष्टि (भद्रा) करण प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया का उत्तरार्ध, सप्तमी का पूर्वार्ध, दशमी का उत्तरार्ध तथा चतुर्दशी का पूर्वार्ध इसी प्रकार प्रत्येक मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी उत्तरार्ध, अष्टमी के पूर्वार्ध, एकादशी के उत्तरार्ध तथा पूर्णिमा के पूर्वार्ध में रहता है। मुहूर्त चिन्तामणिकार ने लिखा है
                    शुक्ले पूर्वार्धेऽष्टमीपञ्चदश्योर्भद्रैकादश्यां चतुथ्र्यां परार्धे।
                    कृष्णेऽन्त्यार्धेस्यात्तृतीयादशम्यो: पूर्वे भागे सप्तमीशम्भुतिथ्यो:।। मुहुर्त चिन्तामणि,  ४३
भद्रा का मुख एवं पुच्छ भी जानना आवश्यक होता है। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के पांचवें प्रहर के आदि की ५ घटी में भद्रा का मुख होता है। इसी प्रकार अष्टमी के दूसरे प्रहर में, एकादशी के आठवें प्रहर में, पूर्णिमा के चतुर्थ प्रहर और कृष्णपक्ष की तृतीया में आठवें प्रहर में, सप्तमी के तीसरे प्रहर में, दशमी के छठें प्रहर और चतुर्दशी के प्रथम प्रहर की आदि की ५ घटियों में भद्रा का मुख होता है। यह शुभ कार्यों में अशुभ होता है।
शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि के अष्टम प्रहर के अन्त्य की, अष्टमी के प्रथम प्रहर के, एकादशी के छठें प्रहर की, पूर्णिमा के तीसरे प्रहर की और कृष्णपक्ष के तृतीया के सप्तम प्रहर की, सप्तमी के द्वितीय प्रहर की, दशमी के पांचवें प्रहर की और चतुर्दशी के चौथे प्रहर की अन्त्य की तीन घटियों में भद्रा का पुच्छ होता है जो शुभ माना जाता है।
तिथि के सम्पूर्ण मान (घटी) में आठ से भाग देने पर लब्धि का मान गत प्रहर होता है।
तिथि भोग ¸ = लब्धि ± शेष ³ = गत प्रहर ± = वर्तमान प्रहर।
कृष्णपक्ष की भद्रा को र्सिपणी तथा शुक्लपक्ष की भद्रा का नाम वृश्चिकी है।
करणों में कर्तव्य कर्म
                 ववे पौष्टिकं वालवे सुस्थिरं सद्द्विजादेहितं कौलवे स्त्रीषु मैत्र्यम् ।
                 चरेत्तैतिले स्वाश्रयं यद्गरे भूकृषिं बीजवापं वणिज्ये वणिज्यम् ।।
                 खलानां हृतिं दारुणं कर्म विष्ट्यां तथा शाकुने मन्त्रयन्त्रौषधाद्यम् ।
                गवां ब्राह्मणादे: पित्रिज्यां पशौ तद्भुजङ्गे ध्रुवोग्रं परस्मिन्कलाद्यम् ।।

वव करण में पुष्टि के निमित्त कर्म, बालव में वास्तु, गृहप्रवेश, निधिस्थापन आदि शुभ स्थिर कर्म, ब्राह्मणों के हितकारक कर्म, कौलव में स्त्री सम्बन्धी तथा सज्जन मैत्री आदि कर्म, तैतिल में सज्जन सेवा, राजसेवादि कर्म, गर में भूमि, कृषि सम्बन्धी, बीज बोना इत्यादि तथा वणिज में क्रय-विक्रयादि कर्म करना चाहिये। विष्टि करण (भद्रा) में दुष्ट चोर आदि का वध, बन्धन जैसे उग्र कर्म करना चाहिये। शकुनि करण में मंत्र, यंत्र, औषध आदि कर्म करना चाहिये। चतुष्पद करण में गाय तथा ब्राह्मण की पूजा, पितरों का श्राद्ध आदि करना चाहिए। नाग करण में स्थिर कर्म, भूतादिसाधन तथा िंकस्तुघ्न करण में चित्र खींचना, नाचना, गाना इत्यादि कर्म करने चाहिये।

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

संस्कृत सर्जना त्रैमासिक ई-पत्रिका का विषय वस्तु

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       संस्कृत सर्जना त्रैमासिक ई-पत्रिका में प्रकाशित होने वाले लेखों के विषय वस्तु को इस लेख में स्पष्ट किया जा रहा हैं। इस पत्रिका का मुख्य उद्देश्य मौलिक लेखन को प्रोत्साहित करना  हैं। इस पत्रिका में मुख्यतः अधोलिखित विषयों पर लेख प्रकाशित किये जाते हैं-

1- संस्मरण-

      अपने प्रयोगधर्मी गतिविधियों द्वारा  जन-जन तक संस्कृत को पहुँचाने के लिये जीवन अर्पित किये विद्वानों के प्रेरणादायी जीवन का संस्मरण।

2- साक्षात्कार

       ऐसे व्यक्ति जो अपने सार्वजनिक तथा बहुआयामी जीवन द्वारा संस्कृत का प्रचार-प्रसार कर रहें हो़ उनका  समसामयिक, ज्वलंत तथा सर्वस्पर्शी विषयों पर साक्षात्कार। 

3- वैचारिक निबन्ध

      संस्कृत के विकास एवं प्रसार के लिये चिन्तन तथा युगानुरूप अनुप्रयोग करने वाले बुद्धिजीवियों के वैचारिक निबन्ध।

4- पर्व तथा उत्सव

      संस्कृत भाषा में निरुपित सद्यः आने वाले पर्वों तथा उत्सवों का जन जीवन पर पडे प्रभाव का विश्लेषण।

5- जनोपयोगी संस्कृत विषयक सामग्री

      जन सामान्य के दैनन्दिन उपयोग में आने वाले ज्योतिष, धर्मशास्त्रीय निर्णय, आयुर्वेद आदि विषय। 

6- शिक्षा

     छात्रों एवं संस्कृत सीखने के इच्छुक व्यक्तियों के लिए  संस्कृत शिक्षा से जुड़ी सामग्री और शोध कार्य में सहायक पुस्तकें, संस्कृत सीखने के लिए पाठ्यक्रम, प्रतियोगी परीक्षा के तैयारी के लिए सुझाव आदि।

7- तकनीकि शिक्षा

 आज के तकनीकि से परिचित नहीं होने के कारण संस्कृत क्षेत्र के बहुशः लोग जीवन में इसका प्रयोग नहीं कर पाते हैं। फलतः अन्तर्जाल पर उपलब्ध सामग्री का उपयोग कर पाते है न ही अभिदान। संस्कृतज्ञ त्वरित सूचना के प्रवाह से अछूते  न रहें  एतदर्थ तकनीकि शिक्षा।
(संस्कृत विषयक सामग्री इण्टरनेट पर बहुतायत में उपलब्ध हैं, जिसकी जानकारी आम संस्कृतज्ञ को नहीं होती हैं।   इस माध्यम से एकत्रित जानकारी  यहां उपलब्ध करायी जाती हैं। )

8-पुस्तक परिचय

        कुछ लेखक अपने पुस्तक का स्वयं प्रकाशन करते हैं, उसका प्रचार नहीं हो पाता है। पुस्तक समीक्षा के माध्यम से  पुस्तक का प्रचार किया जाता है। 

9- सर्जना- 

         नयी पीढी के संस्कृत लेखकों की कथा, कविता आदि मौलिक रचना।

10-वार्ता

      सामान्यतः संस्कृत क्षेत्र की वार्तायें भी इसमें प्रकाशित होती हैं।

11- पर्यटन 

          तीर्थस्थलों  तथा अन्य पर्यटन स्थलों के बारे में सचित्र संस्कृत भाषा में लेख प्रस्तुत करना। इसमें पर्यटन स्थल पर ठहरने, गमनागमन के साधन, आसपास के दर्शनीय स्थल तथा अन्य उपयोगी सुझाव ।

12- संस्था परिचय

          संस्कृत विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, शोध केन्द्रों, पुस्तकालयों आदि में प्रवेश के नियम, उपलब्ध संसाधन आदि की जानकारी लेख के माध्यम से जनसामान्य को उपलब्ध कराना ताकि लोग वेहतर विकल्प का चयन कर सकें। उन संस्थाओं से लाभ ले सकें।
यह पत्रिका संस्कृत के प्रचार के लिये कटिबद्ध कुछ स्वयंसेवियों द्वारा आरम्भ किया गया, जिसका मूल उद्देश्य मात्र संस्कृत भाषा का प्रचार करना हैं।

  इस पत्रिका से सम्बन्धित कुछ प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं, जिसका समाधान यहां प्रस्तुत हैं-

प्रश्न-    क्या मेरा लेख इसमें प्रकाशित हो पाएगा ? क्या शुल्क लगेगा ?
उत्तर-  इस पत्रिका में सभी लेख निःशुल्क प्रकाशित किये जाते हैं वशर्ते कि आपने इस पत्रिका की सदस्यता ले ली होजो कि निःशुल्क हैं। सदस्यता के लिए यहाँ क्लिक करें।

प्रश्न-   इस पत्रिका में प्रकाशित होने वाले लेख का विषय वस्तु क्या होता हैं ?
उत्तर-  शास्त्रीय शोध निबन्ध ( जो प्रायः पाठ्यक्रमों में निर्धारित हैं ) को छोड़कर सभी प्रकार के लेख इसमें प्रकाशित होते है। लेखों की भाषा संस्कृत/हिन्दी होनी चाहिये और संयत होनी चाहिए। आप अपनी कल्पना को संस्कृत भाषा में पिरोकर उपलब्ध करायें। यथा- गोरैया संरक्षण, जंगली एवं पालतू पशुओं का परिचय आदि प्रकाशित किया जायेगा। विषयवस्तु की कोई भी सीमा नहीं हैं।

प्रश्न-    क्या कलात्मक अभिरूचियों को यदि संस्कृत भाषा में लिखा जाये तो यहां प्रकाशित हो सकता हैं ?
उत्तर-  अवश्य। मान लीजिये आपकी अभिरूचि नेल पालिश, केश सज्जा, रंगोली, व्यंजन निर्माण, अचार निर्माण की विधि, गृह सज्जा, पेंटिग, कढ़ाई आदि क्षेत्रों में हैं और आपके पास इस प्रकार के चित्रों का संग्रह भी हैं। संस्कृत भाषा में उसके निर्माण की विधि, कलात्मकता, उसका सौन्दर्य वर्णन लिख कर चित्र के साथ भेजे जाने पर प्रकाशित किये जाते हैं। इसमें कलाओं को भाषायी अभिव्यक्ति दिया जाना मुख्य हैं। जैसे-आपने कहीं किसी के हाथों में मेंहदी सुसज्जित किया हो, बस उसका एक चित्र खींचकर उसका पूरा वर्णन संस्कृत में लिख कर भेजें।

प्रश्न-    क्या हम अपने पालतू पशुओं के रूप सौन्दर्य,संस्मरण का भी वर्णन यहां प्रकाशित करा सकते हैं ?
उत्तर-   जी हाँ, यदि आपके घर में कोई पालतू पशु हो तो उसकी दिनचर्या, संस्मरण, व्यवहारों आदि का वर्णन संस्कृत  भाषा में लिखे होने पर सचित्र प्रकाशित किये जाते है।

प्रश्न-    अपनी रचना या लेख के साथ और क्या-क्या चीज भेजा जाना आवश्यक है ?
उत्तर-  आपके अपने ई-मेल से लेख या रचना भेजा गया हो। 2. लेखक का फोटो, संक्षिप्त परिचय तथा विषयवस्तु से  सम्बद्ध छाया चित्र साथ में भेजा जाना चाहिए। 3. यह पत्रिका किसी के यशोगान या प्रचार का माध्यम नहीं हैं। अतः इस प्रकार के लेखों/रचनाओं से बचना चाहिए

प्रश्न-     क्या हम अपने क्षेत्र के विद्यालयों/संस्कृत प्रचार में संलग्न संस्थाओं का परिचय भेज सकते हैं ?
उत्तर-   आप अपने क्षेत्र के उन सभी विद्यालयों, संस्थाओं, व्यक्तियों के बारे में लेख दे सकते हैं। जिनकी जानकारी पाकर   लोग उनसे जुड़ सके। क्षेत्र विशेष में संस्कृत शिक्षा की स्थिति आदि पर भी आप लेखन कर सकते हैं।

प्रश्न-     क्या इसमें हास्य विनोद, चुटकुले, सुभाषित आदि भी प्रकाशित किये जाते हैं ?
उत्तर-   जी इतना ही नहीं आप अपना संस्मरण, यात्रा वृतान्त, आदतें भी संस्कृत में लिख कर भेजे इसमें अवश्य  प्रकाशित किया जायेगा। जैसे-आपने अपने कुछ मित्रों के साथ कोई सुखद यात्रा की हो, उस सुखद संस्मरण  को संस्कृत में लिख कर चित्र के साथ भेजे। हास्य विनोद चुटकुले आदि तो प्रकाशित किये ही जाते हैं

प्रश्न-    मेरे क्षेत्र में स्थानीय मेला लगता हैं। कभी वह धार्मिक उत्सव का मेला होता हैं तो कभी वाणिज्यिक। क्या मैं उन  मेलों के बारे में अपना लेख आपके पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेज सकता हूँ।
उत्तर-   आप जो कुछ भी कल्पना कर सकते हों, जो कुछ भी घटित हो रहा हो उसका सचित्र वर्णन भेज सकते हैं। शर्त  यह हैं कि उसकी भाषा संस्कृत होनी चाहिये यदि आपके क्षेत्र में कोई मधुमक्खी पालन, बकरी, मत्स्य आदि  पालन का व्यवसाय किया हो उसके बारे में भी आप पूरी जानकारी संस्कृत भाषा के माध्यम से भेज सकते हैं।

प्रश्न-    क्या यह पत्रिका डाक द्वारा मेरे पते पर आ सकती है? इसे मंगवाने के लिए क्या करना होगा और क्या 
       चार्ज  लगेगा?  बहुश: शुभकामना: महोदय, एषा पत्रिका अस्माकं पार्श्वे कथम् आगमिष्यति ।।
उत्तर-   यह एक ई- पत्रिका है। इसे आप अपने मोबाइल/लैपटाप/कम्प्यूटर पर ऑनलाइन पढ सकते हैं। इसे कागज पर  प्रिंट नहीं किया जाता। इस पत्रिका का कोई मान्य नियम नहीं हैं। न ही यह किसी भी सर्जनात्मक परिधि से बंधा है। बस भाषा अश्लील न हो, किसी को ठेस न पहुंचाने वाली हो, इस प्रकार समस्त रचनाओं का यहां स्वागत है।

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