शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

धन्वन्तरि

      हरिवंश पुराण के अनुसार समुद्र मन्थन से अब्जदेवता का आविर्भाव हुआ। धन्व ने इस देवता की भक्तिपूर्वक आराधना की। प्रसन्न होकर यही देवता धन्व का पुत्र धन्वन्तरि के रुप में अवतरित हुआ। यह अब्ज देवता सोम है। सोम के अधिष्ठातृ  देवता इन्द्र हैं। इन्द्र और विष्णु दोनों सहोदर भाई थे। महाभारत तथा अग्निपुराण में भी यही उल्लेख प्राप्त होता है। अर्थात् अब्ज देवता भी विष्णु ही थे, जिसके अवतार धन्वन्तरि हुए। पौराणिक उपाख्यानों में तथा महाभारत में यह भी लिखा है कि धन्वन्तरि अमृत से भरे हुए कलश को हाथ में उठाये हुए समुद्र से अवतीर्ण हो गये।
   धन्वन्तरि धन्व का बेटा था। उसे इतिहास और पुराण कोई समुद्र का बेटा नहीं कहता। समुद्र में से आविर्भूत धन्वन्तरि पहले कहां थे ? काशी में ही कैसे पहुंच गये ? इसका उल्लेख न पुराण में है न इतिहास में।
            छन्दोग्य उपनिषद में लिखा है कि वस्तुतः देवता और असुर एक ही वंश की संतान थे। विचारों के भेद ने दोनों दलों में भारी भेद उत्पन्न कर दिया। देवता आस्तिक थे और असुर नास्तिक। देव आत्मा में विश्वास करते थे और असुर भौतिक देह में ही। इसी विचार भेद ने विश्व का इतिहास बदल दिया। धन्वन्तरि ने लिखा कि वस्तुतः प्राण के मोह में ही असुर मारे गये।
      सुश्रुत संहिता के अनुसार धन्वन्तरि ने इन्द्र से आयुर्वेद प्राप्त किया था। परन्तु हरिवंश पुराण में महार्षि भारद्वाज से भी धन्वन्तरि का विद्या ग्रहण करने का उल्लेख है।
धन्वन्तरि के विद्याग्रहण और अष्टांग विभाग करने के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न उल्लेख परस्पर विरोधी नहीं है। वास्तविकता यह है कि धन्वन्तरि ने इन्द्र से भी पढ़ा और भरद्वाज से भी। आत्रेय ने भी प्रथम भरद्वाज से ज्ञान प्राप्त किया, और तदन्तर रसायन विज्ञान अध्ययन करने के लिये हिमालय के सम्राट इन्द्र के विद्यालय में नन्दनबन भी गये। एक ही व्यक्ति अनेक विषयों का उतना विशेषज्ञ नहीं होता जितनी योग्यता भिन्न-भिन्न विशेषज्ञों को अपने-अपने विषयों के विशेषज्ञ विद्वानों द्वारा ज्ञान प्राप्त करने की परिपाटी भारत के विद्वानों में प्राचीन काल से रही है।
            इस प्रकार हम यह जानते हैं कि भगवान धन्वन्तरि उन महापुरूषों में से थे जिन की व्यवस्थायें परिषदों में सिद्वांत बन गई। धन्वन्तरि ने शल्य शास्त्र पर जो महत्वपूर्ण गवेषणायें की थीं, उनके प्रपौत्र दिवोदास ने उन्हें और परिमार्जित कर सुश्रुत आदि शिष्यों को उपदेश किया। सुश्रुत संहिता का प्रथम अध्याय इस बात को भली भांति स्पष्ट करता है। ग्रंथ प्रारंभ करते हुए ही इस भाव को प्रस्तुत किया गया है, ‘यथोवाच भगवान् धन्वन्तरि। किन्तु इसमें सन्देह नहीं कि दिवोदास की योग्यता भी चोटी तक पहुंची इसीलिये उनके सम्मान के लिये उनके प्रपितामह का नाम ही उनकी उपाधि वन गया-दिवोदास धन्वन्तरि। फलतः दिवोदास का शल्य शास्त्रीय उपदेश भगवान धन्वन्तरि की विरासत ही है।
       महाराज दिवोदास से पूर्व भगवान् धन्वन्तरि अथवा उनके किसी शिष्य ने कोई ग्रन्थ लिखा था या नहीं, यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। क्योंकि वैसा कोई ग्रन्थ अब उपलब्ध नहीं। फिर भी प्राचीन उल्लेखों के आधार पर प्रतीत होता है कि धन्वन्तरि-संहितानामक कोई ग्रन्थ अवश्य था। प्राचीन ग्रन्थों में धन्वन्तरिएवं ‘‘धान्वन्तर मतजैसे उल्लेख प्राप्त होते हैं। यह उसी संहिता का निर्देश देते प्रतीत होते है। परन्तु आज धन्वन्तरि के विज्ञान वैभव की बानगी महाराज देवोदास के उपदेशो में ही देखी जा सकती है।
पुराणों में भी कतिपय दिवोदासों का उल्लेख है। परन्तु यहां तो काशिराज दिवोदास की ही चर्चा करनी है। हरिवंश पुराण के 29 वें अध्याय में काश नामक राजा के वंश का वर्णन मिलता है। महाराज काश के ही वंश में धन्वन्तरि का जन्म हुआ था। दिवोदास भी इसी वंश के एक पुरूषरत्न थे। उक्तपुराण में काशी के राजवंश की परम्परा दी गई है।
                        प्रतीत होता है कि धन्वन्तरि के पिता ने परसीक पश्चिम ईराक तक विजय की। वह प्रदेश धन्व से छू गया हैं। इसलिये उनका विरूद धन्व ही रहा। किन्तु उनके बेटे ने धन्व के अन्त तक विजयश्री का डंका बजा दिया, इसलिये उसे धन्वन्तरि का गौरव प्रदान किया जाना उचित ही था। उल्हण ने अपनी सुश्रुत व्याख्या में धनुका अर्थ शल्य शास्त्र लिखा है।
            औरभ्र उर (बैबीलोन) के निवासी, तथा पारसी धर्म-ग्रंथ आवेस्ता में दिवोदास, सुश्रुत एवं करवीर्य करवीर पुर दृषद्वती या आमू (दरिया के तट पर) निवासी, तथा पारसी धर्मग्रंथ अवेस्ता में दिवोदास, सुश्रुत एवं करवीर्य आदि नामों की प्रतिच्छाया यह स्पष्ट करती कि धन्वन्तरि का विरूद भूमध्य के रेगिस्तानों को पार कर गया था।

स्थिति काल

 आयुर्वेद के  अंग

आयुर्वेद का अष्टांग विभाग करने का श्रेय कुछ प्राचीन ग्रंथकारों ने भरद्वाज को और कुछ ने धन्वन्तरि को दिया है। किन्तु सुश्रुत संहिता का कथन यह है कि स्वंय ब्रह्देव ने ही आयुर्वेद को आठ अंगो में विभाजित कर दिया था। वे आठ अंग वे है-
1.   शल्य
2.   शालाक्य
3.   कायचिकित्सा
4.   भूत विद्या
5.    कौमार भूत्य
6.   अगद तन्त्र
7.   रसायन तन्त्र
8.   वाजीकरण तन्त्र।
            धन्वन्तरि तथा अन्य महर्षियों ने इन आठ अंगो का विस्तार किया है सुश्रुत संहिता का प्रारंभिक गुरू सूत्र भी यही बतलाता है कि शल्य, शालाक्य आदि आयुर्वेंद के आठों अंग पृथक-पृथक पूर्व से थे ही, धन्वन्तरि ने उन्हें विस्तृत किया है।
            सुश्रुत संहिता एक व्यक्ति का नहीं, किन्तु धन्वन्तरि, दिवोदास और सुश्रुत इन तीन महापुरूषों के वैज्ञानिक जीवन का मूर्त रूप है। आज भले ही आयुर्वेद शल्यविज्ञान में शिथिल प्रतीत होता है, किन्तु इतिहास साक्षी है कि आयुर्वेद का वह विज्ञान प्राचीन काल में पराकाष्ठा तक पहुंचा हुआ था। पूषा के दांत, इन्द्र की भुजायें, और यज्ञ के ब्रह्ाा का कटा हुआ सिर जोड़ने वाले अश्विनी कुमार धन्वन्तरि से बहुत पूर्व स्वर्ग में ही विद्यमान थे। वह विज्ञान धन्वन्तरि जैसे प्रतिभाशाली महापुरूष की बुद्धि से विकसित विद्यमान थे। वह विज्ञान धन्वन्तरि जैसे प्रतिभाशाली महापुरूष की बुद्धि से विकसित होकर कई गुना समृद्ध हो गया था।

काशी से सम्बन्ध


            काशी जैसे समृद्ध साम्राज्य की नींव डालकर महाराज काश (काश्य) ने जो विशाल राष्ट्र निर्माण किया, भगवान् धन्वन्तरि ने विद्या एवं विज्ञान के अक्षय वैभव से सुसज्जित कर उसे वसुधा का स्वर्ग बना दिया। और महाराज दिवोदास ने इस स्वर्ग का अनूठा वैभव विश्व को वितरित करके अपने वंश के यश की धवल ध्वजा इतिहास के शिखर पर गाड़ दी। वह आज भी उनका परिचय दे रही है। भले ही भारत का प्राचीन इतिहास अन्धकार में चला गया हो, किन्तु दिवोदास और धन्वन्तरि उसके उज्जवल प्रकाश स्तम्भ है। प्रतिवर्ष उन्हीं की स्मृति में हम धन्वन्तरि त्रयोदशी (धन तेरस) का पर्व मानते हैं। 

गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

वैशेषिक दर्शन

        वैशेषिक दर्शन में पदार्थों का विश्लेषण किया गया है। यह दर्शन भौतिक शास्त्र का आद्य प्रवर्तक है, जिसमें पदार्थों के विशिष्टतत्व एवं पार्थक्य को दर्शाया गया है।
       कणाद द्वारा प्रणीत होने के कारण इसे कणाद दर्शन तथा प्रकाश का अभाव तमको प्रतिपादित किया जाने से औलूक दर्शन से भी अभिहित किया गया। श्री हर्ष अपने नैषधीयचरितम् में इसे इस प्रकार उल्लेख करते हैं।
                     ध्वान्तस्य वामोरु विचारणायां वैशेषिकं चारु मतं मतं मे।
                    औलूकमाहुः खलु दर्शनं तत्क्षमं तपस्तत्वनिरुपणाय।।
रचना काल
            बौद्व ग्रन्थ ललित विस्तार, मिलिन्द प्रश्न तथा लंकावतार सूत्र में वैशेषिक का उल्लेख प्राप्त होता है। चरक संहिता (ई0 80) में गुण, धर्म का विवेचन वैशेषिक के अनुसार प्राप्त होता है। अतः बौद्व के पूर्ववर्ती होने से इस दर्शन का समय ई0 पूर्व0 5 वीं शताब्दी हो सकती है।
ग्रन्थकार
            वायु पुराण के अनुसार वैशेषिक दर्शन के प्रर्वतक कणाद का जन्म द्वारिका के समीप प्रभास क्षेत्र में हुआ था। कणाद नाम के पीछे अनेक जनश्रुतियां प्रचलित है। खेतों से फसल काट लेने के पश्चात् बचे अन्न को एकत्र कर खाने के कारण तथा परमाणु की विवेचना करने के कारण इन्हें कणाद कहा गया।
            आँखें बन्द कर पदार्थ चिन्तन करते हुए विचरण करने वाले इस ऋषि को लोगों ने अक्षपाद नाम से भी अभिहित किया। राजशेखर के अनुसार भगवान् शिव उलूक रुप धारण कर इन्हें वैशेषिक दर्शन का उपदेश दिया अतः इस दर्शन का नाम औलुक्य दर्शन पड़ा।

वैशेषिक दर्शन के प्रतिपाद्य विषय

            वैशेषिक सूत्र दश अध्यायों में विभक्त है प्रत्येक अध्याय में दो आह्निक है। इसमें कुल 370 सूत्र है।
इसमें द्रव्य, गुण, कर्म, विभाग तथा सामान्य का निरुपण प्रथम अध्याय तक इन्हीं पदार्थों का उपविभाग है।

प्रशस्तपाद (500-6000)

प्रशस्तपाद ने वैशेषिक सूत्र पर स्वतंत्र भाष्य की रचना पदार्थधर्मसंग्रहनाम से किया है। व्योमशिखाचार्य ने पदार्थधर्मसंग्रह पर व्योमवती टीका लिखी। श्रीधराचार्य ने भी पदार्थधर्मसंग्रह पर न्यायकन्दली नाम से टीका लिखी।
            अभाव को सप्तम पदार्थ के रुप में प्रतिष्ठित करने वाले उदयनाचार्य (12000) ने किरणावली नामक टीका लिखी। इसके अतिरिक्ति वल्लभाचार्य की लीलावती टीका, चन्द्रानन की वृत्ति टीका, मिथिला विद्यापीठ से प्रकाशित मिथिला वृत्ति, शंकर मिश्र की वैशेषिक सूत्रोपस्कार भाष्य, जगदीश भटृाचार्य का भाष्यसूक्ति शिवादित्य मिश्र का सप्तपदार्थी तथा लक्षणमाला, पद्नाम मिश्र की सेतु नाम्नी टीका प्रसिद्ध है। उपर्युक्त टीकाएँ वैशेषिक सूत्र अथवा प्रशस्तवाद भाष्य पर की गयी।
            16वीं शताब्दी तक आते-आते वैशेषिक सिद्वान्त में कुल 7 पदार्थ मान लिये गये थे द्रव्य, गुण कर्म, सामान्य विशेष, समवाय और अभाव।
            16 शताब्दी के अनन्तर विश्वनाथ पंचानन ने वैशेषिक दर्शन पर 17 वीं शतीं में भाषा परिच्छेद नामक ग्रन्थ की रचना की। इसमें 168 कारिकाएँ है, इसी का विशदीकरण न्याय सिद्वान्त मुक्तावली नाम्नी टीका में किया गया। आज न्यायसिद्वान्तमुक्तावली का पाठ-पाठन अनेक विश्वविद्यालयों में किया जाता है।
            मुक्तावली पर दिनकरी तथा रामरुद्री दो प्रसिद्व टीकाएँ प्राप्त होती है। बाद में किरणावली सहित अनेक संस्कृत तथा हिन्दी में टीकाएँ की गयी। बालानां सुखबोधाय अन्नं भटृ ने तर्क संग्रह ग्रन्थ की रचना कर स्वयं इस पर दीपिका टीका भी लिखी। तर्क संग्रह पर न्यायबोधिनी, सिद्वान्तचन्द्रोदय, पदकृत्य, नीलकण्ठी, भास्करोदया आदि सहित एक साथ कुल 16 टीकाएँ भी प्रकाशित की गयी है।

वैशेषिक का पदार्थ विश्लेषण

            जैसा कि हम पूर्व में कह चुके है वैशेषिक द्रव्यादि 6 भाव पदार्थ एवं सप्तम अभाव को पदार्थ माना गया। पुनः द्रव्यादि पदार्थों का प्रविभाग किया गया। यथा
द्रव्य- पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा, मन।
                                                                        शेष पदार्थ विश्लेषण की चर्चा अग्रिम लेख में। शुभमस्तु।

मंगलवार, 28 अक्तूबर 2014

बौद्ध स्तोत्र

        ष्टुञ् स्तुतौ धातु से ष्ट्रन् प्रत्यय कर स्तोत्र शब्द बना है। अमरकोश में स्तवः स्तोत्रं स्तुतिर्नुतिः ये चार शब्द स्तोत्र के पर्यायवाची बताये गये है। स्तोत्र शब्द स्तुति का पर्यायवाची है। स्तुति काव्यों में देवताओं के प्रति समर्पण, सख्यभाव, प्रशंसा या गुणगान प्राप्त होता है।
          अलंकार शास्त्र के आचार्यों ने स्तोत्र काव्य को लघु काव्य या संघात काव्य माना है। भक्ति की प्रधानता के कारण इसे भक्ति काव्य भी कहा जा सकता है। इसे दसवें रस के रुप में मान्यता दी गयी। स्तोत्र में शाब्दिक चमत्कार या अर्थगाम्भीर्य आवश्यक नहीं है, सरल से सरल और कम से कम शब्दों में अपने हृद्गत भाव को आराध्य तक पहुँचा देना ही स्तोत्र का अभिप्राय है, परन्तु कुछ विद्वानों ने अपने पाण्डित्य का ऐसा कौशल दिखाया है कि उनकी रचनाएँ रस, ध्वनि, व्यञ्जना और अलंकारों से परिपूर्ण काव्य बनकर रह गये है।
 लौकिक संस्कृत काव्यों में यत्र-तत्र देव स्तुतियां विकीर्ण है। कुछ आचार्यों ने पृथक्तया भी स्तोत्रों की रचना की है।मत्स्य पुराणों में स्तोत्र के चार प्रकार बताये गये हैं-
                      द्रव्यस्तोत्रं कर्मस्तोत्रं विधिस्तोत्रं तथैव च।
                      तथैवभिजनस्तोत्रं स्तोत्रमेतच्चतुष्टयम्।            मत्स्य पु0 अ. 121
द्रव्यस्तोत्र में आराध्य के किसी एक आयुध, अंग को लेकर स्तुति की जाती है। जिन द्रव्यों से आराध्य का स्तवन किया जाता हैए उसे भी द्रव्य स्तोत्र कहते है। कर्म स्तोत्र में देवताओं के पराक्रम, वैभव एवं कल्याणकारी गुणों का वर्णन किया जाता है। विधि स्तोत्र में आराधक के कर्तव्यों का विधान तथा शेष स्तोत्र अभिजन कहे जाते है।
         सम्पूर्ण बौद्ध संस्कृत स्तोत्र रचनाएँ बुद्ध-भक्ति से अनुप्राणित है तथा अधिकांश बौद्ध-आचार्यो ने बुद्ध के प्रति अपने भक्ति-भाव पूर्ण उद्गारों को अभिव्यक्त किया है। बौद्ध धर्म के महायान शाखा के अधिकांश स्तोत्र संस्कृत में प्राप्त होते है। बौद्ध स्तोत्र काव्य के आदि रचयिता अश्वघोष हैं। अश्वघोष वैदिक-वाङ्मय के विद्वान थे तथा उनका पौराणिक ज्ञान भी गहन था। अतएव इस प्रकार के बौद्ध आचार्य द्वारा बुद्ध-भक्ति की, जो साधना की गई, वह इस बात का द्योतक है कि श्रौत परम्परा की  भक्ति-धारा का प्रभाव बौद्ध धर्म पर है। महाकवि अश्वघोष द्वारा बुद्ध-धर्म की प्रस्तुत की गई व्याख्या उपनिषदों से अधिक सादृश्य रखती है। अश्वघोष ने बुद्ध भक्ति को प्रथमतः प्रश्रय दिया तदनन्तर मातृचेट और नागार्जुन का नाम अत्यन्त आदर के साथ लिया जाता है। इसके अनन्तर तो प्रायः सम्पूर्ण महायानी रचनाओं में भी बुद्ध-भक्ति समाविष्ट हो गई। बुद्ध-भक्ति के प्रकृष्ट भावुक कवि शान्तिदेव हुए हैं। 
   नागार्जुन के चार स्तव-लोकातीतस्तव, अचिन्त्यस्तव, परमार्थस्तव और निरौपम्यस्तव, मातृचेट का अध्यर्ध शतक आदि कई स्तोत्र में बौद्ध धर्म एवं दर्शन के गूढ़ तत्त्वों को व्यक्त किया गया है।
  बौद्ध संस्कृत स्तोत्र को 1. महावस्तु 2. ललित-विस्तर 3.  अश्वघोष 4.तदनन्तर के स्तोत्र में बांटा जा सकता है।
   सम्प्रति उक्त बुद्ध-भक्ति से सम्बद्ध बौद्ध-स्तोत्रकारों के संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत हैं।

   बौद्ध-स्तोत्रकार       स्तोत्र

1.    अश्वघोष-     बुद्धगण्डी स्तव
2.  मातृचेट-    अध्यर्धशतक
3.    शान्तिदेव
4.    नागार्जुन-   परमार्थ- स्तव, सप्त-बुद्ध-स्तोत्रनेपालीय-देवता-कल्याण-पंचविंशतिका, निरौपम्य-स्तव
5.    हर्षवर्धन-    सुप्रभातम्स्तोत्र,स्त्रग्धरापंचक स्तोत्र,स्वयम्भूस्तव
6.     वज्रदत्त-     लोकेश्वर-शतक
7.     सर्वज्ञमित्र-   स्त्रग्धरा स्तोत्र
8.     रामचन्द्र कवि भारती-    भक्ति-शतक
9.      आर्यदेव-      गण्डीस्तव
10.    चन्द्रकीर्ति-     मध्यममक शास्त्र
    इनके सभी महत्त्वपूर्ण स्तोत्रों में से अधिकांश का यहाँ उल्लेख है। भिक्षुणी चन्द्रकान्ता, लक्षा भगवती, चरपति (चर्पटि) पाद, मंजुनाथ, वनरत्न, वन्धुदत्त, वज्रदत्त, विभूतिचन्द्र, आचार्य चन्द्रदास, वासुकिनाग, नवग्रह, ब्रहमा, विष्णु, शंकर और सुरपति आदि के स्तोत्र भी प्राप्त होते हैं।
     कुछ स्तोत्र महावस्तु, ललितविस्तार सदृश प्राचीन मूल ग्रन्थों में विद्यमान है। कविवर मातृचेट एक उच्चकोटि के स्तुतिकार हो चुके है, जिन्हें स्तोत्र-साहित्य का जनक कहा जाता है। इनकी स्तुतियाँ साहित्य-जगत् में पूर्ण प्रसिद्वि प्राप्त कर चुकी हैं।

1. आचार्य नागार्जुन

          शून्यवाद के प्रधान प्रतिष्ठापक नागार्जुन ने भक्ति-रस से परिपूरित चार स्तोत्रों की रचना की है। यह चतु-स्तवनाम से विख्यात् है। इनके तिब्बती भाषान्तर आज भी विद्यमान है। कवि द्वारा विरचित निरौपम्यस्तवतथा अचिन्त्य-स्तवनामक दो स्तोत्र सौभाग्य से संस्कृत में भी उपलब्ध हुए है। इनकी रचना सरस एवं भक्ति रस पूरित भाषा में हुई है। प्रायः लोग शून्यवाद को अभावात्मक मानते है, किन्तु जिन्हें नागार्जुन कृत स्तोत्रों के अध्ययन का सुअवसर प्राप्त हुआ है, वे इस बात को देखकर अत्यन्त ही विस्मित् होते हैं कि ये स्तोत्र अभावात्मक न होकर, आस्तिकता के परमोज्जल दृष्टान्त उपस्थित करते है। उदाहरण के रुप में निम्न उद्धरण देखें-
                          नामयो नाशुचिःकाये क्षुत्तृष्णासम्भवो न च।
                         त्वया लोकानुवृत्यर्थं दर्शिता लौकिकी क्रिया।।  निरौपम्य-स्तव 19

                         नित्यो ध्रुवः शिवः कायस्तव धर्ममयो जिन।
                         विनेयजनहेतोश्च दर्शिता निर्वृतिस्त्वया।।    निरौपम्य-स्तव 22

2. हर्षवर्धन (600-6400)


        स्तोत्र साहित्य में हर्षवर्धन कृत बौद्ध स्तोत्र एक उज्जवल नक्षत्र के समान अपनी आभा को फैलाये हुये है। हर्षवर्धन ने अपने जीवन के अन्तिम काल में सुप्रभात स्तोत्रनामक स्तुति-काव्य की रचना की थी। 24 श्लोकों में उपनिबद्ध  उषाकालीन, यह स्तोत्र भगवान बुद्ध की प्रशंसा में लिखा गया है। 
उदाहरण स्वरूप  निम्न श्लोक को देखें-
                      अशनवशनहीना भाव्यमाना विरूपा
                      अलमखिलविघातैः प्रेतवद्गधदेहाः।
                      उभयगतिविहीनास्तेपि नग्नाः प्रसुप्ता
                       दशबल तव नित्यं सुप्रभातम् प्रभातम्।। सुप्रभात स्तोत्र 15
अष्ट-महा-श्री-चैत्य-स्तोत्रइनकी इस प्रकार की द्वितीय रचना है, जो तिब्बती प्रति-लेखन के आधार पर, एस0 लेवी द्वारा अनूदित हुई है। शोभन छन्दों में ग्रथित इसमें अष्ट महनीय तीर्थ स्थानों की संस्तुति की गई है। स्त्रग्धरा स्तोत्र के विषय में कहा गया है कि वह महायान में नितान्त लोकप्रिय तारा का स्तोत्र है। स्तोत्र साहित्य में इसकी टक्कर के बहुत कम-स्तोत्र मिलेंगे। स्त्रग्धरा छन्द में निबद्ध यह स्तोत्र इतना प्रसिद्व हो गया कि बिना भगवती तारा का नाम जोड़े भी केवल स्त्रग्धरा स्तोत्र के नाम से ही इसका बोध हो जाता है। छन्द, अलंकार और अपनी गौडीय रीति के कारण यह स्तोत्र मेघदूत जैसे खण्ड काव्य में स्थान पाने का अधिकारी है। कहा जाता है कि काश्मीर-निवासी, कवि सर्वज्ञमित्र ने तारादेवी की स्तुति में एक स्त्रग्धरा स्तोत्र स्तुति-काव्य लिखा है,

3. वज्रदत्त

 महाराज देवपाल (नवम शती) के आश्रित कवि ने लोकेश्वर-शतककी रचना की थी, जिसमें शत-श्लोकों में बुद्ध लोकेश्वर की स्तुति की गई है। इसके विषय में ऐसी किम्वदन्ती है कवि अभिशाप के कारण कुष्ट रोग से ग्रस्त हो गया था। उसने अपने रक्षा-निमित्त अवलोकितेश्वर (बुद्ध) की प्रार्थना की तथा प्रतिदिन एक अलंकृत स्त्रग्धरा छन्द, उनकी स्तुति में लिखना प्रारम्भ कर दिया। जब इस प्रकार तीन मास व्यतीत हो गये और कवि ने एक सौ श्लोकों की रचना कर डाली, बोधि-सत्त्व ने उसे दर्शन दिया और इस भक्त कवि को व्याधि-मुक्त का दिया। इस परिश्रम-साध्य रचना में भगवान अवलोकितेश्वर का, अंगुलियों से लेकर अंगूठे तक, विस्तृत एवं भव्य चित्रण किया गया है। इसमें उनके पश्चात् अभिधानों की गणना तथा उनके गुण, प्रेम और उदारता की स्तुति काव्य-मयी सरस भाषा में की गई है।

4. नागार्जुन

        परमार्थ-संगीति एक ऐसा स्तोत्र है जिसका यजुर्वेद, महाभारत और प्रायः पुराणों में भी दर्शन होता है। यह धार्मिक प्रार्थनाओं से परिपूरित एक संक्षिप्त रचना है, जिसमें देवी-देवों के अभिधानों एवं संस्तुतिपूर्ण विशेषणों की गणना हुई है। एक अन्य कृति, जिसकी रचना मुख्यतः धार्मिक कृत्यों के निमित्त की गई है, नव श्लोकों की छन्दोबद्ध रचना है, जिसे सप्त-बुद्ध-स्तोत्रनाम से अभिहित किया गया है। यह सप्त बुद्धों का स्तवन् है, जिसमें विपश्यिन् से लेकर काश्यप तक के छः विगत कालीन बुद्धों तथा शाक्य-मुनि एवं भावी बुद्ध मैत्रेय के प्रति भक्ति-प्रदर्शित करते हुए, एक दूसरे के अनन्तर स्तुति की गई है।
 इसी ढ़ंग की रचना नेपालीय-देवता-कल्याण-पंचविंशतिकाहै, जिसके प्रणेता अमृतानन्दनामक एक कुशल कवि है, किन्तु इनके विषय की अधिकांश बातें अज्ञात है। इस कृति में 25 श्लोक स्त्रग्धारा छन्दों में निबद्ध है तथा यह एक मंगलमय स्तोत्र-काव्य है। इसमें नेपाली देवताओं, विशषतः स्वयंभू, बोधि-सत्त्व, हिन्दू देवी-देवताओं, बौद्धों द्वारा जड़ पदार्थोे का मानवीकरण, तीर्थ-स्थानों और चैत्यों की कल्याण-कामना के लिए, गौरवमयी स्तुति वर्णित है।
अचिन्त्ययस्तव में आचार्य नागार्जुन ने चतुष्कोटिविनिमुक्तं शून्यता और निःस्वाभावता सिद्धान्त की स्तुति के व्याज से सम्यक् प्रतिष्ठा की है।

4. सर्वज्ञमित्र

     इस कवि का प्रादुर्भाव अष्टम  शती के प्रथमार्ध में हुआ था। कल्हन् ने अपनी रचना में सर्वज्ञमित्र का उल्लेख किया है, काश्मीर-निवासी, कवि सर्वज्ञमित्र ने तारादेवी की स्तुति में एक स्तुति-काव्य लिखा है, जिसका नाम स्त्रग्धरा-स्तोत्र या आर्य-तारा-स्त्रग्धरा-स्तोत्रहै। परिष्कृत एवं सुन्दर काव्य-शैली में रचित, सप्तत्रिंशत् छन्दों की, यह एक अद्वितीय कृति है। स्त्रगधरा’ (धन की अधिष्ठात्री-देवी), तारा का एक विशेषण है और साथ ही इसका अर्थ स्त्रगधराछन्द से भी लिया गया है, जिसमें उक्त स्तोत्र की रचना हुई है। बौद्ध-देवी ताराकी स्तुति में भी प्रभूत मात्रा में स्तोत्रों की रचना हुई है। यह ताराअवलोकितेश्वर (बुद्ध) की स्त्री-प्रतिमूर्ति और मुक्ति-दात्री देवी है। जहाँ पर वह द्वितीय जिन के रुप में वर्णित है ये कय्य द्वारा निर्मित कय्य-बिहार में रहा करते थे। कय्यलाट के अधिपति और ललितादित्य, जो काश्मीर में (अष्टम् शती में) शासन करते थे, के अधीन थे। एक पौराणिक कथा के अनुसार, यह अपनी उदारता के लिए सर्वत्र विख्यात् एक उदार व्यक्तित्त्व थे। तारनाथ ने इन्हें काश्मीर-महाराज का जामातृ माना है, जिन्होनें अपना सम्पूर्ण राज-कोष दान कर दिया और अन्त में औषधि-वितरक एक सन्यासी के रुप में सर्वत्र भ्रमण करने लगे। एक समय में उनकी भेंट एक निर्धन ब्राहमण से हुई, जिसने अपनी निर्धनावस्था के कारण अपनी पुत्री का विवाह करने की असमर्थता प्रकट की। इस दीन ब्राहमण को धन देने की अभिलाषा में सर्वज्ञमित्र ने अपने को एक राजा के हाथ में बेंच दिया, जिसे नर-यज्ञ के निमित्त सौ व्यक्तियों की आवश्यकता थी। जब इस कवि ने यज्ञ में बलिदान किया जाने वाले अपने सहचर व्यक्तियों के करुण ह्दय ये करुणा फूट पड़ी और कवि द्वारा प्रार्थित तारा देवी ने दर्शन देकर बलि दिये जाने वाले समस्त व्यक्तियों को अभय-दान दिया। यह स्त्रग्धरा-स्तोत्र, काव्य की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण रचना है। इसके अतिरिक्त आर्य-तारा-नामस्तोत्रशतक-स्तोत्रतारा देवी के एक सौ आठ अभिधानों की संगीतमयी स्तुति है। यह साहित्यिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण न होकर, केवल देवी के विशेषणों और नामों का धार्मिक स्तवन है। इसी ढ़ंग की एक रचना एकविंशति-स्तोत्रहै, जिसमें तारा देवी की प्रशंसात्मक प्रार्थना, 21 अनुप्रयास युक्त श्लोक में की गई है, साथ ही यह तारा देवी की शिथिल, किन्तु उत्तेजना-वर्धक स्तुतियों से परिपूर्ण है। चन्द्रोगोमिन् तारा देवी के अनन्य भक्त थे, जिनके नाम से तारा-साधक-शतकनामक एक स्तुति-काव्य का उल्लेख है। षष्ठ शती में तारा-सम्प्रदाय परिचित था। ह्वेनसांग ने भारत में देखे तारा-बोधिसत्वकी मूर्तियों का उल्लेख किया है। आर्य-तारा की पूजा जावा (7780) में पूर्ण प्रचलित थी, जहां पर उनकी एक महनीय एवं पूर्ण समाधि है।

5.रामचन्द्र कवि भारती


बंगाल के एक ब्राहमण कवि थे। जिन्होनें बंगाल से लंका जाकर, वहाँ के अधिपति प्राक्रमवाहु (लगभग 1245 0) के आश्रय में बौद्ध-धर्म को स्वीकार कर लिया था। भक्ति-शतककवि की एक प्रधान रचना है, जिसमें भक्ति-पूर्ण सौ छन्द है। इसमें कवि ने, भारतीय ब्राहमण-भक्ति-विचार-धारा को बौद्ध-भक्ति-विचार-धारा का रुप प्रदान किया है। यह रचना भगवान बुद्ध की प्रशंसा में अलंकृत एवं छन्दोबद्ध भाषा में निबद्ध एक भक्तिपूर्ण कलात्मक काव्य-कृति है। इसमें बुद्ध के शिक्षक, मुक्ति-दाता एवं करुणा-सागर के स्वरुप का अंकन हुआ है। यह कृति महायान और हीनयान, दोनों सम्प्रदायों से समान रुप से सम्बद्ध है।