शनिवार, 30 अगस्त 2014

वाल्मीकि रामायण की टीका परम्परा और गोविन्दराज

        आजकल मै प्रतिदिन प्रातः वाल्मीकि रामायण का स्वाध्याय कर रहा हूँ। वर्ष 1990 के आसपास भी इसका नियमित पाठ करता था। तब मैं इसका मूल पाठ करता था। एक बार 2011 में संस्थान द्वारा प्रकाशित सटीक वाल्मीकि रामायण के हिन्दी अनुवाद पर चर्चा शुरु हुई। इसके अनुवाद के लिए रामायण पढ़े एक संस्कृत के विद्वान के नाम पर मैं सहमत हो गया था। आज 2014 में मुझे ज्ञान हुआ 2011 वाला निर्णय मेरे अल्पज्ञान का परिणाम था। दरअसल नौकरी पा जाने के लिए पढ़ना तथा ज्ञान हेतु पढ़ने में महान भेद है।
            संस्कृत विद्या के क्षेत्र में विद्यार्जन तथा शैक्षणिक प्रमाण पत्र अर्जन में और भी ज्यादा दूरी है। कला और प्राच्य विद्या गुरु की कृपा के बिना पल्लवित पुष्पित नहीं होती है। थोड़े बहुत कौशल आ जाय अलग बात है। प्राच्य विद्या का क्षेत्र बहु आयामी है। उदर पूर्ति की लालसा लिये तदनुरुप शिक्षा ग्रहण कर रहे शिक्षार्थियों से यह आशा कभी नहीं की जा सकती कि वह वाल्मीकि रामायण के टीकाओं का अनुशीलन करे। कम संस्कृत पढ़े लिखे तथा जिसने गुरुमुख से यथापरम्परा प्रस्थान त्रयी की व्याख्या अर्जित न किया हो, जिसने व्याकरण न पढ़ा हो। शास्त्र परम्पराओं (उत्तर तथा दक्षिण भारत के साहित्य तथा अन्य परम्परा) का ज्ञान न हो, वह उपजीव्य काव्यों तथा  इनकी टीकाओं के मर्म को नहीं जान सकता। मैंने यत्र तत्र टीका परम्परा की बहुतेरी आलोचना की है, कि यह केवल चीड़ फाड़ है और स्वतंत्र ज्ञान को आगे नहीं बढ़ने देती। प्रस्तुत प्रसंग में मैं ऐसा भी महसूस कर रहा हूँ कि टीका वह दीपक है, जिससे हम मूल पाठ के अर्थ को ढूढ़ते हैं।
          0 प्र0 संस्कृत संस्थान ने वाल्मीकि रामायण का तिलक, गोविन्दराजीय आदि कई टीकाओं सहित प्रकाशन किया है।
वाल्मीकि रामायण के तीन पाठ प्राप्त होते हैः-
1. दाक्षिणात्य पाठ
2. गौडीय पाठ
3. पश्चिमोत्तरीय पाठ
        इन तीन पाठों में केवल पाठ भेद ही नही प्राप्त होते अपितु कहीं-कहीं इसके सर्ग भी भिन्न  भिन्न है। इसकी 30 टीकाएं प्राप्त होती है। प्रमुख टीकाओं मेंः-
1. रामानुजीयम् 2. सर्वार्थ सार 3. रामायण दीपिका 4. बृहद विवरण 5. लधु विवरण 6. रामायण तत्वदीपिका 7. रामायण भूषण 8. वाल्मीकि हृदय 9. अमृत कतक 10. रामायण तिलक 11. रामायण शिरोमणि 12. मनोहर 13. धर्माकूतम् 14. तीर्थी 15. तनिश्लोकी 16. विषम पद विवृति।
गोविन्दराज ने वाल्मीकि रामायण पर रामायण भूषण नाम से व्याख्यान लिखा है। इसे गोविन्दराजीय या भूषण के नाम से भी कहा जाता है। जैसा कि उन्होंने अपनी टीका के प्रस्तावना श्लोक में लिखा है-
पूर्वाचार्यकृतप्रबन्धजलधेस्तात्पर्यरत्नावली-
ग्राहंग्राहमहं शठारिगुरुणा संदर्शितेनाघ्वना।
अन्यव्यकृतिजातरूपशकलैरायोज्य सज्जीकृतैः।
                        श्रीरामायणभूषणं विरचये पश्यन्तु निर्मत्सराः।। प्रस्तावना श्लोक 5।।
गोविन्दराज ने दाक्षिणात्य पाठ के आधार पर रामायण की व्याख्या की है। गोविन्दराज कांची निवासी कौशिक गोत्र में उत्पन्न वरदराज के पुत्र थे। इनके गुरु का नाम शठकोपदेशिक था। शठकोपदेशिक अहोविलनामक मठ के छठवें उत्तराधिकारी थे। इनका समय छठी शताब्दी माना गया है। ये विजय नगर के शासक रामराय के समकालीन थे। अपने व्याख्यान के प्रस्तावना श्लोक 2 में उन्होनें लिखा है कि
श्रीमत्यत्यंजनभूधरस्य शिखरे श्रीमारुतेः सन्निधा-
वग्रे वेंकटनायकस्य सदनद्वारे यतिक्ष्माभृतः।
नानादेशसमागतैर्बुधगणै रामायणव्याक्रियां
विस्तीर्णां रचयेति सादरमंह स्वप्नेस्मि संचोदितः।।प्रस्तावना श्लोक 2।।
मैं स्वप्न में भगवान वेंकटेश की प्रेरणा पाकर रामायण की व्याख्या कर रहा हूँ।
            गोविन्दराजीय व्याख्यान से पता चलता है कि गोविन्दराज बड़गलइ मत, जो रामानुजीय संम्प्रदाय का एक अंग है से प्रभावित थे और उस मत के आचार्य वेदान्त देशिक के प्रति अत्यन्त श्रद्धालु थे। तिरूपति के पास रहते हुए गोविन्द राज रामायण का व्याख्यान सुनाते थे।
            अपने व्याख्यान के मंगलाचरण श्लोकों में ये शठकोप, लक्ष्मण योगी तथा अन्य मुनियों का स्मरण किया है। मैं स्वयं रामानुजीय परम्परा में दीक्षित हूँ। भगवान रामानुज और आलवारों के प्रति मेरी भी गहरी आस्था है। जब भी गुरु परम्परा से जुड़े तथ्य या रचनाएं मेरे सम्मुख होता है, पढ़ने और लिखने को आतुर हो जाता हूँ।
 यदि ये टीकाएँ वाल्मीकि रामायण के साथ न हो तो हम यह नहीं जान सकते कि प्रसिद्व वैयाकरण नागेश भटृ की तिलक टीका में मूल रामायणम् में 100 श्लोकों का पाठ है, जबकि गोविन्दराज अपनी भूषण टीका में 97 श्लोक हीं मानते हैं। भूषण टीका के रहस्य (गूढ़ार्थ) को जानने के लिए प्रबन्ध साहित्य का ज्ञान आवश्यक है।
सुस्पष्टमष्टादशकृत्व एत्य श्रीशैलपूर्णाद्यतिशेखरोयम्।
शुश्राव रामायणसंप्रदायं वक्ष्ये तमाचार्यपरंपरात्तम्।। प्रस्तावना श्लोक 6।।
वाल्मीकि रामायण की टीका एवं टीकाकार                                                      विशेष प्रतिपाद्य
1. भूषण                                  गोविन्द राज                         रामानुजीय सिद्वान्त के   अनुसार व्याख्या
2. तिलक                                  नागेश भटृ                                  व्याकरण तथा कतक मत,
3. रामायण शिरोमणि                                                               पुराणों से प्रमाण दिये गये हैं।
                                                                                           रामानन्द परम्परा, भूषण का  खण्डन
4. रामायण तत्वदीपिका         महेश्वर तीर्थ                     प्रतिकूल वचनों का अनुकूल  अर्थ किया गया है।

5. अहोबल स्वामी       तनिश्लोकी                                रहस्य एवं पाण्डित्य, द्रविड़ भाषा में लिखे                                                                                                                    रामायण की  व्याख्या का अनुवाद

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

कितने व्यास कितने संकुचित

क्या तुम वही व्यास हो, जिसकी मां मत्स्यगंधा और पिता पराशर थे। कहा जाता है कि एक द्वापरयुगीन काला वर्ण वाला, यमुना के द्वीप में पैदा हुआ। बाद में वह बदरी वन में तपस्या किया। यदि तुम वही व्यास हो तो निश्चित है, तुम्हारा नाम पाराशर्य और कृष्णद्वैपायन रहा होगा। वेदों को विभाजित करने के कारण लोगों ने तुम्हारा नाम वेद व्यास रखा होगा। कहा जाता है कि तुमने ही अठ्ठारह पुराण, ब्रह्मसूत्र सहित एक लक्ष वाले महाभारत की भी रचना कर डाली। तुम जरूर क्रान्तिदर्शी रहे होगे परन्तु यह देखो, तुम्हारे नाम पर कितना बवाल उठ खड़ा हुआ है। लोगों ने तुम्हारे नाम व्यास को पद नाम मान लिया, क्योंकि कुछ सुयोग्य लोग तुम्हारे ही नाम से अनेकों पुराण, उप पुराण तथा औपोपपुराण लिख डाले। सब ने तुम्हारे कृतियों का व्यास किया। जहां चाहा, जिस रूप में चाहा, अपनी रचना धुसेर डाली। उस समय वह जरूर व्यास बने फिरते होंगें, जैसे आज लोग अनधिकृत होते हुए भी लालवत्ती वाली गाड़ी लिये घूमते हैं। मनु तो मनुस्मृति। याज्ञवल्क्य तो याज्ञवल्क्य स्मृति। बहुतेरे ऋषियों ने आचार संहिता बनायी, फिर तुम भी तो आज कल के लोगों की तरह युगद्रष्टा जो ठहरे। इस चक्कर में काशी चले गये। अपने नाम से स्मृति ग्रन्थ लिखने। तुमने इतनी सारी पोथी लिखी उसमें धर्म, राजनीति, आचार, भूगोल सबका वर्णन किया, बखूवी किया। यहां तक किया कि महाभारत मानवता का विश्वकोश हो गया।
                    अष्टादशपुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः।
                    पश्चात् भारतमाख्यानं चक्रे तदुपबृंहितम्॥ मत्स्य पु053/70
 देखो न, लोग कहते फिर रहे हैं यन्न भारते तन्न भारतम्। व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्।
                     अचतुर्वदनो ब्रह्मा द्विबाहुरपरो हरिः ।
                     अभाललोचनः शम्भुर्भगवान् बादरायणः ॥
भगवान बादरायण व्यास के चार मुख नहीं हैं, फिर भी वे ब्रह्मा है; दो बाहु है, फिर भी हरि है; मस्तिष्क पर तीसरा नेत्र नहीं है, फिर भी वे शम्भु है ।
                     धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ।
                    यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत क्वचित्।।
 हे भरत श्रेष्ठ इस ग्रंथ में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संबंध में जो बात है, वही अन्यत्र भी है, जो इसमें नही है, वह कहीं भी नही है।
            फिर तुम काशी क्यों गये? क्या इसलिए कि पण्डितों के सामने पण्डिताई बघारते। इसलिए कि काशी में प्रतिष्ठित होने पर तुम्हारी रचना को भारतीय जनमानस मार्गदर्शक मान लेता। आचार शास्त्र सर्वमान्य होता। लेकिन हा हत भाग! तुम्हें वहां से खदेड़ दिया गया। अरे चिरंजीवी तुम तो जान ही गये होगे। यहाँ पर तुलसी दास भी प्रताडि़त हुए थे। रामानन्द ही एक ऐसा वैरागी साधू निकला, जिसने अपने स्थानीय शिष्य और जिस जाति के लोग वहां आज भी बहुसंख्यक हैं के साथ झंडा ऊँचा किया। जाति पाति पूछे नहि कोई। हरि को भजै सो हरि का होई! मैं दावे के साथ कहता हूं तुम यदि मत्स्यगंधा पुत्र थे तो धीवर बन्धुओं को साथ ले लिये होते। कोई भी बाल वाॅका नही कर पाता। तुम्हें काशी छोड़कर राम नगर की ओर नहीं जाना पड़ता। तुम चिरंजीवी हो। अब सब कुछ जान समझ रहे होगे कि प्रजातंत्र में भी संख्या बल का ही महत्व है। बुद्धिबल आज भी हार जाता है।
            वैसे भी तुम्हारे कर्मक्षेत्र पर बहुत विवाद है। आज तुम सर्वाधिक विवादित लेखकों में से एक होते जा रहे हो। लोग लाख सफाई देते फिरें परन्तु तुम्हारा जन्म जिस ग्रह नक्षत्रों में हुआ होगा, उसमें सर्वक्षेत्र विवाद सहित का भी योग रहा होगा। तुम्हारे अविवादित मां पिता तथा जन्म, स्थान, रचना विवादित होने से समस्त कार्य विवाद के घेरे में है।
            सर्व प्रथम तुम्हारे जन्म तिथि पर ही विवाद कोई मोक्षदा एकादशी तो कोई गुरू पूर्णिमा को। दावे तो बहुत बड़े किये जाते हैं कि तुम्हारे जन्म के समय सभी ग्रह लग्न अनुकूल थे। यदि ऐसा था तो अपनी जन्मतिथि बताओ। तुमसे सम्भव नहीं तो ज्योतिषी को बुलाकर गणना करा डालो। पांच हजार वर्ष कोई ज्यादा पुराना समय थोड़े ही है। वैसे रहने दो तुम्हारे जयन्ती पर ही अब कौन विचार करते हैं ?
            जब चाहा जहां चाहा तुम्हारी जयन्ती मना डाली। मेरठ में अलग तो उत्तराखण्ड,बुन्देलखण्ड और वाराणसी में अलग-अलग। तुम्हारे सोच के विपरीत लोग तुम्हारे ही नाम पर राज्याश्रय से चिपके हैं। तुम्हें भी वहां वहां धुमायेंगें जहां-जहां तुम्हारे चरण रज पड़े होगें। अब तो गंगा का जल दूषित हो गया हैं। यमुना सर्वाधिक प्रदूषित है। गंगा यमुना त्रिवेणी धाम में आकर प्रदूषण को और गहरा कर गया। क्या ये कम है कि गंगा यमुना संस्कृति के किनारे लोग तुम्हारे नाम पर गीत गायें। ज्ञान के प्रतीक अब तो उस कमण्डल को रखना छोड़ दो। तुम्हारा कमण्डलू भगीरथ का तो हो भी नहीं सकता, कितना कुछ रखने को मिलेगा उस कमण्डल में ? जाओ व्यास जाओ, बदरिकाश्रम चले जाओ, वहां-वहां जाओ जहां-जहां लोग स्वयं को विस्तीर्ण करना चाहते हैं और तुम्हें संकुचित
            कुछ कथावाचक रोज रोज ऊँचे सिंहासन पर बैठकर ध्वनियंत्र से तुम्हारे संदेश का विस्तार कर रहे है। कुछ विद्वान् लिख लिख कर तुम्हें बढ़ा रहे हैं। लेकिन तुम हो कि संकुचित हुए जा रहे हो। व्यास कथा के नाम पर ठीक उसी प्रकार की कथा होने लगी जैसे सत्यनारायण व्रत कथा। लीलावती, कलावती की कथा तो सुनायी जाती है, परन्तु एक पंक्ति में तुम्हें समेट कर फिर से दूसरी कथा शुरू कर दी जाती है।
            देखो तुम्हारे लिखे संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए कितने लोग लगे हैं कैसे-कैसे उद्यम करते है? बड़े-बड़े होर्डिंग, वैनरों से पटा शहर, विशाल मंच, बड़े नामधारी आयोजक, पगड़ी बांधे सबसे आगे बैठते हैं। जैसे सर्पदंश की भविष्य वाणी उनके लिये ही की गयी हो। तितीक्षा के प्रतिमूर्ति आयोजक खूब धन धान्य सुतान्वितः का आशीर्वाद पाते हैं। लो मैं भी न अपनी काली कलम से मन को भी काला कर बैठा। तुम्हारी तरह तन काला मन गोरा थोड़े मेरा और उनका होगा।

            अब इस फैशन के दौड़ में तुम शास्त्र से उपर उठ चुके हो। लोग तुम्हें भी आधुनिक देखना चाहते हैं। बदरिकाश्रम न जा सको तो आओ तुम भी साथ हो जाओ। कुछ लोग मिलकर तुम्हारे नाम से (व्यास जी) अपना धंधा चमकायें। अवसर मिला कुछ कमाये। फिर ये मौका मिले न दुबारा।

सोमवार, 25 अगस्त 2014

हास्य काव्य परम्परा तथा संस्कृत के हास्य कवि

नव रस में एक रस हास्य सर्वतो आनन्दकर रहा है। जीवन में हर प्राणी हंसना चाहता है। प्राचीन राजा खुद को प्रसन्न रखने के लिए साथ में विदूषक को रखा करते थे। ऋग्वैदिक सूक्त से लेकर आज के कवि आचार्य वागीश शास्त्री, डा0 प्रशस्य मि़त्र शास्त्री, डा0 शिवस्वरुप तिवारी तक हास्य की एक अविच्छिन्न परम्परा संस्कृत साहित्य में प्राप्त होती है। हास्य व्यंग्य द्वारा भी उत्पन्न होता है। शास्त्रकारों ने शब्दशक्ति के रुप में व्यंजना को स्वीकार किया है। हास्य गद्य एवं पद्य उभय रुप में प्राप्त होते हैं तथा यह अनेकविध है। कुछ हास्य कथाएँ भी प्राचीन संस्कृत लेखकों ने लिखी हैं परन्तु उसे विशुद्ध हास्य कथा भी नहीं कहा जा सकता।
 हिन्दी साहित्य में इस विधा का प्रयोग स्वतंत्र रुप से किया जाने लगा है। इसका लघुतम रुप चुटकुला है। संस्कृत लेखकों ने भी अपनी रचनाओं में समसामयिक विषयों को समावेश करते हुए अनेकविध हास्य रचनाओं को जन्म दिया।
  साहित्यिक तथा भाषायी दृष्टि से डा0 प्रशस्य मिश्र शास्त्री, तथा डा0 शिवस्वरुप तिवारी की रचना प्रौढ़ नहीं हैं, लेकिन इनकी रचना इतनी सरल है कि अन्य भाषाभाषी भी सहजतया इसके अर्थ को समझ सकें। अभी तक संस्कृत की हास्य विधा कवि सम्मेलनों तथा संस्कृत  पत्रिकाओं तक ही सीमित थी। संस्कृत के प्रौढ़ रचनाकारों ने भी अनेक विधाओं पर रचना की है। दूसरे वर्ग के रचनाकार आधुनिक समसामयिक समस्याओं व व्यवस्थाओं पर लेखन करते रहे हैं। आज का सहृदय समाज में व्याप्त कुरीति, भ्रष्टाचार, स्वार्थ लोलुपता आदि पर जिस कवि के चुटीले अंदाज पर तालियां पीटा करता है, कवि जिस चुटीली कविता को सुनकर व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न खड़ा करता हैः उस चुटीले अंदाज वाली सरल कविता की कमी को डा0 प्रशस्य मिश्र शास्त्री ने पूर्ण किया। हंसते-हंसाते अपनी व्यंग्य कविता द्वारा किसी पर शब्द बाण छोड़ना प्राचीन परम्परा के परिपालक कवियों को आज भी रास नहीं आता। आज भी वे कवि प्राचीन राजाओं तथा देवी देवताओं की स्तुति में ही अपनी काव्य वाणी खर्चकर प्रसन्न होते है। कवि कर्म की दो धारा संस्कृत में फूट पड़ी है। एक वे जो पूर्ववर्ती कवियों की रचनाओं का अनुसरण करते हैं, जिनकी संख्या नगण्य रह गयी है। दूसरी धारा के कवि स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़े प्रसंगों, उनके नायकों, कश्मीर समस्या, दुःखितों, वंचितों की समस्या, गजलों का रुपान्तरण आदि पर मुखर होकर लिख रहे हैं। इनकी चर्चा हमने एक पृथक् लेख आधुनिक संस्कृत लेखक तथा उनकी रचनाएं में विस्तार पूर्वक किया है।
      प्रस्तुत प्रसंग को आधुनिक संस्कृत की एक विधा हास्यतक सीमित रखना उचित है।
            अल्पज्ञात नाम डा0 शिवस्वरुप तिवारी की एक मात्र रचना सुहासिका की सभी काव्य रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी लखनऊ से हो चुका है। सुहासिका में संकलित काव्य जितने मनोरम, आनन्दवर्धक तथा स्वस्थ हास्य युक्त है, उतना ही लेखक द्वारा लिखित प्राक्कथन भी।
       ग्रन्थारम्भ में गणेश वन्दना भी हास्य से ही शुरु की गयी है-
     नमस्तस्मै गणेशाय योऽतिभीतः पलायते।
      मूषकं वाहनं वीक्ष्य प्लेगाशंकाप्रपीडि़तः।।
भ्रष्टाचार की स्तुति निम्न पद्यों से कवि ने किया है-
            उत्कोचः परमं मित्रं धूर्तता धर्मसंगिनी।
            स्वार्थस्तु गुरुर्यस्य भ्रष्टाचारं भजाम्यहम्।
भ्रष्टाचार के त्रिविध रुप और भ्रष्टाचारियों की पहचान, लक्षण को जितने सरल शब्दों में यहाॅ प्रस्तुत किया है, इसकी सानी बहुत कम देखने को मिलती है। सुहासिका का प्रथम भाग हास्य व्यंग्य को समर्पित है। चाय स्तोत्रम् से लेकर क्वचिन्मर होते हुए उत्कोचसलिला तक कुल 29 विषयों की काव्यधारा में हरेक समसामयिक जीवन्त विषय पर चुटकी ली गयी है।
            डा0 प्रशस्य मिश्र शास्त्री हास्य के क्षेत्र में सर्वज्ञात कवि हैं। इन्होंने पद्य के अतिरिक्त गद्य में भी रचना की है। अनभीप्सितम् पुस्तक पर इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त है। इनकी लगभग प्रत्येक कृति पुरस्कृत है। हास्य संयोजन इतना तीव्र है कि पाठक लोटपोट  हो जाय। 2013 में प्रकाशित हास्यम् सुध्युपास्यम् के रचनाकाल में मेरी उनसे उनके ही आवास रायबरेली में भेंट हुई थी। कवि सम्मुख श्रोता देख कब चूकता है। घंटे भर उनकी यात्रा का भरपूर आनन्द लेता रहा। मंगलाचरण विटपस्थ कालिदासेभ्यो नमःसे करते हैं। इसमें उन नायकों को आड़े हाथ लिया है जो सत्ता को अपने मनमाफिक चलाते है।
                   कश्मीरपण्डित जनान् न हि चिन्तयन्ते।
                            लेहस्थ बौद्वजनतां न विचारयन्ते।
                    किं चाल्पसंख्यकपदेन न ते गृहीताः।
                           पृच्छामि तांस्तु विटपस्थित कालिदासान्।
 इस ग्रन्थ में राजनीति, प्रेम सम्बन्ध, पति, पत्नी पर बहुशः चुटकी ली गयी है। लेखक ने भी इन विषयों का पृथक् पृथक् प्रकरण बनाया है। इनकी भाषा इतनी सरल है कि संस्कृत का नूतन अभ्यासी को भी पढ़ते ही अर्थबोध हो जाय। विषय वर्णन के पश्चात् अंतिम पद्य में रहस्य खोलकर व्यंग्य मिश्रित हास्य घोलना कोई इनसे सीखे। मैं भी सरल और सहज हिन्दी लिखने में विश्वास करता हॅू। भाव सम्प्रेषण में पाण्डित्य की क्या आवश्यकता?
            कहीं कहीं तो ये हास्य उत्पादन की पीठिका इतना लम्बा बांधते है कि उब होने लगती है। जैसे अद्भुत सम्वाद। वस्तुतः यह एक नवीन विधा भी है, जो अंतिम पंक्ति में लिखित अधस्तात् क्रमशश्चोध्वं पठन्तु कृपया जनाः से हास्योत्पत्ति करते हैं। प्रेमिका प्रकरण में राजनैतिक चिह्नों को जोड़कर अर्थध्वनि उत्पन्न किया गया, जो संस्कृत जगत् में सर्वथा नूतन प्रयोग है।
            यथा त्वं भाजपा चिह्नं प्रिय! मह्यं प्रदत्तवान्।
            अहं कांग्रेसचिह्नं तत् तुभ्यं दत्तवती तथा।।
            नर्मदा पुस्तक में एकविंशी शताब्दी समायाति में आधुनिक व्यवस्था, सामाजिक विषमता आदि पर तीखा हमला बोला है-
            श्वानो गच्छति कारयानके
                                   मार्जारः पर्यड्के शेते
            किन्तु निर्धनो मानवबालः
                               बुभुक्षितो रोधनं विधत्ते।
            बाढ़ की विभिषिका का वर्णन करते हुये लिखते है
            एतमेव जलप्रलयं द्रष्टुम्
            नेता सपरिवारम् उड्डयते।

यहाँ मेरा उद्देश्य शोध पत्र लेखन नहीं है, न ही एक पुस्तक से दो बनाना। उद्येश्य है संस्कृत में लिखे जाने वाले हास्य व्यंग्य विधा से आपको परिचित कराना। थोड़ी सूचना देना और आपसे अनुरोध करना कि संस्कृत में भी उच्च कोटि के साहित्य उपलब्ध हैं। संस्कृत में आज भी निरंतर लिखे जा रहे है। इसका अपना पाठक वर्ग तैयार हो। इसमें मेरा भी योगदान हो और आपमें भी संस्कृत साहित्य को पढ़ने की रुचि जगे। इति शम्।