गुरुवार, 6 मार्च 2014

संस्कृत भाषा के विकास हेतु कार्ययोजना

        संस्कृत भाषा के प्रचार के लिए हमें एक सुनिश्चित अवधि के लिए एक निश्चित लक्ष्य का निर्धारण करना होगा। हम जो भी योजना बनाये उसके केन्द्र में संस्कृत भाषा के लाभार्थियों की संख्या तथा उसमें उत्तरोत्तर वृद्वि को ध्यान में रखना होगा। दूसरे शब्दों में संस्कृत भाषा के प्रचार हेतु निर्मित योजना में संस्कृत भाषा का प्रचार होते दिखना चाहिए। प्रायश: भाषा का प्रचार उन क्षेत्रों तक सीमित रहता है जहाँ के लोग स्वत: इस भाषा से जुडे हैं। उनमें प्रचार न होकर गुणवत्ता का क्रमिक विकास दिखे ऐसा यत्न करना होगा। यथा वे बोलना नहीं चाहते तो बोलने के लिए सिखाना। प्रचार की दिशाएँ ज्ञात न हो तो प्रशिक्षण देकर सच्चा प्रचारक बनाना आदि।  उनमें शास्त्र शिक्षण करना अनुपयोगी है। हमने अभी तक कोर्इ ठीक-ठीक योजना का निर्माण ही नहीं किया। यदि ठीक-ठीक योजना निर्मित की गयी होती तो 65 वर्षो में उसके परिणाम सम्मुख होते। हम संस्कृत भाषियों, संस्कृत प्रेमियों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्वि होते हुए देखते।
संस्कृत क्षेत्र को तीन भागो में विभक्त किया जा सकता हैं।
1.संस्कृत विषय को लेकर अध्ययन कर रहे या कर चुके व्यक्ति
 2.संस्कृत विषय लेकर जिन्होने अध्ययन नहीं किया है, परन्तु संस्कृत के प्रति रूचि रखते हैं।
 3.संस्कृत के प्रति उदासीन या अनभिज्ञ व्यक्ति।
तीनों प्रकार के व्यक्तियों में अलग-अलग ढंग से संस्कृत का प्रचार -प्रसार करना चाहिए।  सर्व प्रथम, एक क्षेत्र का चयन कर उसमें विभाजन पुन: प्रसार किया जाना चहिए।  प्रायश: यह देखने में आता है कि योजना बनी, लागू की गर्इ परन्तु परिणाम की समीक्षा नहीं की जाती। जब तक परिणाम की समीक्षा नहीं की जायेगी योजना के प्रभाव का आकलन नहीं किया जा सकता।योजना निर्माण में लक्ष्य संस्कृत भाषा का प्रचार मात्र होना चाहिए प्रायश: साहित्य, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, वेद आदि विषय का प्रचार को भाषा प्रचार मान लिया जाता है,बल्कि यह माध्यम है । इसके प्रचार का माध्यम हिन्दी य तत्स्थानीय भाषाएँ होती है।
            प्राय: भ्रमवश आम जन कर्मकाण्ड, ज्योतिष, मंत्र, तंत्र को ही संस्कृत समझते है।वस्तुत: ये ज्ञान और व्यवहार के विषय हैं, न कि भाषा के। ज्ञान के विषय को किसी भी भाषा में लिखा पढा जा सकता है क्योंकि भाषा का कार्य है भाव का सम्प्रेषण । हा उपर्युक्त विषयों का उद्भव एवं पल्लवन संस्कृत भाषा के माध्यम से हुआ अत: संस्कृत भाषा ज्ञान उपर्युक्त विषय के लिए आवश्यक है।
वर्ष दो वर्ष में संस्कृत का एक वृहद कार्यक्रम होना चाहिए, अनुगूंज दूर तक तथा देर तक रहे। यदि हजारों लीटर पानी नल द्वारा धीरे धीरे प्रवाहित कर दिया जाय तो पानी में मात्रा एवं बेग की कमी के कारण लघुतम क्षेत्र को ही सिंचित करता है। वहीं यदि उसी पानी को एक साथ एक बार में प्रवाहित कर दिया जाय मात्रा एवं बेग के अधिकता के कारण अधिकतम क्षेत्रफल सिंचित करेगी।              
वृत्त चित्र,कथा कथन आदि माध्यमों द्वारा संस्कृत के लिए जीवन जीये महापुरुषों के प्रेरक प्रसंगों को दिखाना सुनाना चाहिए।  संस्कृत सीखने वाले व्यक्तियों के सफलता को दिखाया जाय।
     खेतिहर मजदूरों, रिक्शा चालकों, सपेरों, आटो रिक्शा, बस आदि के ड्राइवर, फेरी वालों,निर्माण क्षेत्र में कार्य करने वाले मजदूरों, किसानों और उनके परिवारों में इस भाषा की उपस्थिति बहुत दूर है। इनमें संस्कृत सीखने की जागृति आयी तो अपने सन्तति को संस्कृत अवश्य पढाएगें। आवश्यकता है ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता की, जो उनतक सन्देश लेकर जाए। दुर्भाग्य है कि संस्कृत शिक्षण केन्द्र के आस-पास के लोग भी यह नहीं जानते कि यहाँ संस्कृत शिक्षा दी जाती है। वकील, डा, पुलिस अधिकारी इनके बारे में आस-पास के लोगों को जानकारी होती है परन्तु संस्कृतज्ञ को उनके पडोसी भी नहीं जानते।
प्रत्येक संस्कृत विद्यालय तथा संस्कृतज्ञ के घर के बाहर संस्कृत शब्द तो जरूर ही लिखा होना चाहिए।     इस देश के प्रत्येक गाँव में दो चार संस्कृतज्ञ है। इस प्रकार संस्कृतज्ञों की संख्या लाखों नहीं करोडों में है। असंगठित संस्कृतज्ञ अपना प्राप्तव्य सरकार से प्राप्त नहीं कर पाता। इस क्षेत्र में तमाम सामाजिक संगठनों की आवश्यकता है,जो संस्कृत का अलख जगा सके।
संस्कृत भाषा के प्रचार के लिए द्विमुखी प्रचार पद्धति अपनाना चाहिए।
 1.शिक्षा द्वारा 2.जनजागरण द्वारा
   संस्कृत भाषा के प्रचार का दो उद्देश्य होना चाहिएः-
 1. भाषा सीखाना 2. प्रशंसक बनाना
संस्कृत भाषा के विकास हेतु योजना-
  1.छात्रों के लिए संस्कृत भाषा में पत्रिका का प्रकाशन। यह मासिक पत्रिका कक्षा 6 से एम.ए तक के लिए उपयोगी हो। इसमें समसामयिक घटना क्रम, संस्कृत जगत से परिचय, व्याकरण, सामान्य  ज्ञान, कहानियाँ, जीवनी आदि विषय हों। वार्षिक मुल्य रु0 100.00 मात्र रखा जाय। प्रत्येक संस्कृत विद्यालय, महावि0, विश्वविद्यालय के संस्कृत छात्र में ग्राहकता  बढाना । प्रचार के विविध तरीके को अपनाना। यथा छात्र प्रतियोगिता में विजयी को एक वर्ष के लिए नि:शुल्क,सर्वाधिक अंक पाने वाले को छूट, सर्वोत्तम विद्यालय का चयन कर पुस्तकालय हेतु नि:शुल्क, अच्छे लेख प्रेषित करने वाले छात्रों के लिए छूट आदि।
    संस्कृत के प्रति जन जागरूकता हेतु प्रचार साहित्य मुदि्रत कराना।
  -: संस्कृत क्यों पढे ?
  -: बच्चों के लिए संस्कृत में रोजगार आदि।
  -: संस्कृत के प्रचार-विकास में आम जन की भागीदारी क्यों और कैसे ।
संस्कृत विद्यालयों की प्रति जनाकर्षण हेतु योजना-
-: एक वर्ष एक जनपद में स्थित संस्कृत विद्यालयों का चुनाव कर उस क्षेत्र में  संस्कृत शिक्षा को बढावा देने             हेतु विविध आयोजन
  1.संस्कृत विद्यालय में संस्कृत भाषा में सांस्कृतिक कार्यक्रम
  2. सांस्कृतिक कार्यक्रमों, गीतों हेतु स्थानीय बच्चों का चयन
  3.स्थानीय बच्चों में संस्कृत ज्ञान परीक्षा
4.स्थानीय बच्चों के बीच सामुदायिक केन्द्रों में पंचायत, तहसील स्तर पर  संस्कृत के बारे जन सम्वाद
-: जनता की शंका का समाधान
आदर्श संस्कृत के स्वरूप का प्रदर्शन
 गीत,चित्र, छोटे बच्चों के बीच संस्कृत में संवाद। भाषा पठन, लेखन क्षमता का प्रदर्शन
प्रचारक संस्थानों का निर्माण किया जाये।
 -: छात्रों के शिक्षण हेतु प्रचार सामग्री
1. लघुकथा पुस्तक-सी.डी के साथ
2. संस्कृत गीत, सीडी, डी. वी डी के साथ
3. संस्कृत भाषा शिक्षण हेतु
बालकोपयोगी दृश्य श्रव्यसाधन
   1.यात्रा वर्णन
    2. उत्सवों का सचित्र वर्णन
  विद्वानों से पत्राचार के समय संस्कृत भाषा का ही उपयोग किया जाय।
  -:जनजागरण हेतु प्रचार सामग्री
  1.संस्कृत की सूक्तियों का प्रर्दशन
  2.जीवनोपयोगी सूक्तियों का स्टीकर द्वारा प्रर्दशन वितरण
  3.संस्कृत के महत्व एवं उपयोगिता को प्रदर्शित करने हेतु ध्वनिमुदि्रका का निर्माण
  पत्रिका में निबन्ध, गीत, श्लोक ,लघु कथा लेखन हेतु छात्रो को प्रोत्साहित करना तथा उन्हें पुरस्कृत करना।
1-  मेरे पुस्तकालय में अधिकांश शोध छात्र/ छात्राएँ आती हैं । वे शोध के नाम पर पुस्तक से कापी पर नकल
      कर  कर्तव्य का इतिश्री कर लेते हैं। क्या इसी का नाम शोध है ?
2-   संस्कृत के छात्र संस्कृत पत्रिका नहीं पढते है। पत्रिकाओं के प्रति रुचि उत्पन्न करना,पत्रिकाओं की
       उपलब्धता सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी हम सब की है।
3-   कल मैं संस्कृत के एक व्याख्यान में गया था। तंत्र विषय पर मार्क डिस्कोत्स्की अव्यवस्थित भी बोल रहे
      थे।उपस्थित छात्रों में से कुछ शोर कर रहे थे, कुछ facebook  खोले थे,शेष सो रहे थे। ऐसा क्यों था? आज भी  सोच रहा हूँ। शिक्षार्थी मे कुछ सीखने की ललक एवं उत्सुकता नही है। वह लोग केवल डिग्री प्राप्त करने के उद्येश्य से संस्कृत विषय का चयन करते हैं।
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                 जगदानन्द झा

संस्कृत भाषा और छन्दोबद्धता

       संस्कृत भाषा को छन्दोबद्ध करने का श्रेय महर्षि वाल्मीकि को जाता है। संस्कृत भाषा को दो विभागों में विभक्त किया जाता है। 1-वैदिक संस्कृत 2-लौकिक संस्कृत। वैदिक संस्कृत को भी छन्दोबद्ध किया गया। शास्त्रीय ग्रन्थों की रचना सूत्र रुप में कर उसकी व्याख्या की परम्परा रही है। शास्त्रों से जनसामान्य का विशेष सरोकार नहीं रहा है। काव्य, व्याकरण, दर्शन, आदि विषयों के ग्रन्थ सू़त्रात्मक है तो जन सामान्य के लिए उपयोगी शास्त्र जैसे धर्मशास्त्र, स्मृतियाँ, ज्योतिष आदि के शास्त्रीय ग्रन्थ भी श्लोकबद्ध (अनेक छन्दों में रचित कविता जिसमें गेयात्मता या लयात्मकता होती है) किये गये।
          आखिर कुछ साहित्य श्लोकबद्ध तो कुछ गद्य युक्त क्यों रहें। क्या ग्रन्थों को कालक्रमिक विकास के कारण ऐसा कुछ हुआ जैसे कि इतिहासविद् सूत्रकाल आदि द्वारा उसका विभाग करते है या अन्य भी कुछ? मेरा मानना है कि कुछ सीमा तक शास्त्रों के रचनाओं को हम कालखण्ड में बांटकर सूत्र गद्य श्लोक आदि अलग-अलग विधा पर रचना को स्वीकार कर सकते हैं परन्तु या पूर्णतः सत्य नहीं है
     मैंने संस्कृत रचनाओं का दो विभाग किया है। 1. आम जन के लिए की गयी रचनाएं श्लोकबद्ध 2. बुद्विजीवियों के लिए उपयोगी रचनाएं गद्य युक्त। ये परवर्ती काल में भी शास्त्रीय ग्रन्थ और उस पर भाष्य, टीका परम्परा गद्य रुप में ही पातें है यथा ब्रहम्सूत्र, उपनिषद् के भाष्य।
          इसके पीछे श्रुति परम्परा महत्वपूर्ण कारक रहा है। लयात्मक (छन्दोबद्ध) रचना को याद रखना सहज होता है। स्मृति संरक्षण हेतु आम जन के योग्य ग्रन्थ के श्लोकबद्ध करने की परम्परा चल पड़ी। जबकि गद्य युक्त ग्रन्थ सन्दर्भ प्रधान होते थे उच्च श्रेणी के श्रेष्ठ विद्वानों के बीच चर्चा किये जाने वाले इन शास्त्रों को कण्ठस्थ करना उतना आवश्यक नहीं था। वहीं जब से विद्वान् जन समूह के बीच अपनी बात रखते थे तो वह छन्दोवद्ध होता था। जैसे जगन्नाथ। रस गंगाधर या प्रौढ़ मनोरमा की टीका गद्य युक्त है तो गंगालहरी पद्य युक्त।
          याद रखने आम जन के बीच उसे उद्धत करने हेतु, छन्दोबद्ध श्लोक उदाहरण स्वरुप रखे जाते थे। यही कारण रहा होगा छन्दोबद्ध ग्रन्थ सृजन के पीछे।
          सर्वप्रथम अनुष्टुप छन्द में काव्य सर्जना शुरु हुई। जहाँ इस छन्द में कवि अपने भावों को अभिव्यक्त करने में कठिनाई महसूस किया दूसरे प्रकार के छन्द उपस्थित हुए। गेयात्मा बनी रही। इतिहास तथा धार्मिक ग्रन्थ श्लोकबद्ध रचित हुए।
          पुराणों की रचना करते करते महर्षि व्यास में विचारों की बाढ़ सी आ गयी होगी। सभी प्रकार के छन्दों को आजमाने के बाद भी वे अपनी बात रखने में असमर्थ हो गये होंगें। व्यास की पौढ़ और अंतिम रचना भागवत मानी जाती है यहाँ अन्ततः उन्हे अपनी बात गद्य में रखनी पड़ी। क्लिष्ट संस्कृत या पौढ़ संस्कृत कादम्बरी में देखने को मिलता है जो बाण की रचना है। श्री हर्ष की रचना नैषधीय चरितम् में भी प्रौढ़ भाषा का प्रयोग किया गया। कारण शब्दों की व्यंजकता, अर्थगाम्भीर्य। इस प्रकार के ग्रन्थ अपने पाण्डित्य को प्रदर्शित करने या बुद्विजीवियों के बीच खुद को स्थापित करने के होड़ में लिखे गये। इस प्रकार के ग्रन्थों की भाषा आम जन जल्द समझ नहीं पाते और इसके बाद संस्कृत आम जन से दूर होता चला गया।
          कण्ठस्थी में सुलभता, जल्द याद हो जाना गेयात्मा आदि गुणों के कारण जिस लौकिक छन्दोबद्ध कविता को लवकुश ने गा गाकर आम जन तक पहुँचाया। जिसे छन्दोबद्ध कर कवि वाल्मीकि ने इसे सरल स्वरुप प्रदान किया। वही संस्कृत बौद्विकता के बोझ तले दबकर कुछ लोगों के बीच सिमटकर रह गया।

          पंचतंत्र में भी कहानियों की चासनी में पिरोकर जिस नीति को कहा गया वह छन्दोबद्ध था। जीवनोपयोगी संदेश को वाचिक परम्परा में जीवित रखने हेतु छन्दों का सहारा लिया गया। इससे यह सन्देश वाचिक परम्परा में रहते हुए जन सामान्य के बीच उद्धृत होते रहे।

संस्कृत की पुस्तकें वाया संस्कृत संस्थान

         पुस्तकों का संसार मुझे अत्यन्त रोमांचित करते रहा है। बचपन से ही पुस्तकों को पढ़ना और उसे संग्रह करना मेरी दिनचर्या थी। कोई भी पुस्तक मिल जाये उसे जल्द से जल्द पढ़ने को मैं उतावला हो उठता हूँ। ईश्वर ने मेरी सुन ली और मुझे पुस्तकों के बीच ला खड़ा कर दिया।
          पुस्तक अध्ययन की दो संस्थाएँ घर और शैक्षणिक संस्थाओं में पुस्तकें मुझे विरासत में मिली। मेरे पैतृक घर में संस्कृत पुस्तकों से सुसज्जित एक अलमारी थी। बाद में मुझे स्मरण है कि मैं प्रथमा का छात्र था। मेरे बड़े भाई एम. ए. की परीक्षा दे रहे थे। पाठ्यक्रम में पंचदशी एवं अग्निपुराण था। पंचदशी तो समझ में नहीं आया परन्तु अग्निपुराण सभी शास्त्रों का एक ग्रन्थ। पुराण वाङ्मय पर आम धारणा के उलट यहाँ जब मुझे पढ़ने को मिला तो ज्ञानचक्षु खुल गये।
          तब से मैंने एक डायरी बना ली। उसमें जिन पुस्तकों को मैं पढ़ लेता था उस पुस्तक का तथा लेखक का नाम लिख लेता था। मध्यमा तक आते-आते हिन्दी साहित्य एवं संस्कृत के लगभग 105 पुस्तकें मैंने पढ़ डाली। दिनकर, बच्चन, महादेवी वर्मा, प्रसाद, प्रेमचंद, गुरुदत्त, सहजानन्द सरस्वती हिन्दी के मेरे प्रिय कवि एवं लेखक थे। संस्कृत की पुस्तकों का कोई ओर- छोड़ नहीं था। मनुस्मृति मिले या महाभाष्य नह्निदत्त पंचविंशतिका मिले या चरक संहिता। मैं सर्वपाठी था।
          बाद में वाराणसी आने पर नागरी प्रचारणी सभा तथा कुछ अन्य पुस्तकालयों से भीे पुस्तकें लेकर पढ़ने लगा। इसमें स्त्री विमर्श पर लिखे उपन्यास मुझे बहुत प्रभावित करते थे। यहाँ संस्कृत ग्रन्थों का पठन-पाठन कम हो गया है। कारण संस्कृत के सार्वजनिक पुस्तकालयों का अभाव। खोजवां में स्थित अभिमन्यु पुस्तकालय में दो चार ही संस्कृत के पुस्तक थे। वह भी कोर्स के, जिन्हे मैं बहुत पहले ही पढ़ चुका था।
          आचार्य करने तक मेरी पहुँच सन्दर्भ ग्रन्थों तक नहीं हुई थी। मैंने जीवनी संग्रह का भी कार्य किया। संस्कृतज्ञ विद्वानों की जीवनी भी अत्यल्प मात्रा में प्राप्त हुई। हिन्दी साहित्य में ग्रन्थकार की जीवनी व्यक्तित्व कृतित्व की चर्चा पद-पद पर प्राप्त होता रहा परन्तु संस्कृत ग्रन्थों के सम्पादक तदनुरूप लेखन नहीं कर पाये हैं। हिन्दी साहित्य में समालोचना का कार्य बहुत देर से आरम्भ हुआ, जबकि काव्यशास्त्रकारों ने काव्यों पर ढ़ेर सारी समालोचना कर रखी है। संस्कृत के समालोचक तथा हिन्दी समालोचको में महान् भेद होता है। संस्कृत में शब्द और अर्थ के बीच समालोचना घूमती है। रस चर्चा होती है। काव्य के विन्यास पर ज्यादा जोड़ है परन्तु कथ्य पर आलोचना कम। जबकि हिन्दी में कथ्य या काव्य के सन्देशों पर ज्यादा आलोचना की जाती है। लेखकीय पृष्ठभूमि पर विचार मंथन चलता है।
          इसमें लेखक का व्यक्तित्व प्रकाशित होता है। हिन्दी में समाज सुधारक, वैज्ञानिक, स्वतंत्रता संग्राम के नायक, चित्रकार, वास्तुकार, रंगकर्मी, पत्रकार, राजनेता, गायक आदि तमाम क्षेत्र के व्यक्तियों की जीवनी रोचक ढंग से लिखे गये। ये सहजतया मुझे उपलब्ध होते रहे परन्तु संस्कृत में इस प्रकार का लेखन अत्यल्प होने से मैं इससे वंचित ही रहा।
  संस्कृत के क्षेत्र में बच्चों के लिए बहुत ही कम सामग्री मिल पाती है। पाठक वर्ग की कमी कहें या लेखकों की उदासीनता पंचतंत्र तथा हितोपदेश के बाद इसकी कहानियाँ नहीं बढ़ पायी। संस्कृत का सरलीकरण नहीं किया गया। मनोरंजक गणित हो या जलीय जीव। पशु पक्षी के बारे में जानकरियाँ, रोचक शब्द कोश, संस्कृत में उपस्थिति नगण्य है। अभिराज राजेन्द्र मिश्र, सम्पदानन्द मिश्र, विश्वास जैसे  कुछेक लेखकों ने बाल साहित्य पर लिखा है। हिन्दी भाषा में बच्चो के लिए प्रभूत सामग्री मिल जाती है।
          महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय के पुस्तकालयों में निर्वाध प्रवेश प्रणाली की व्यवस्था न होने से भी मैं संस्कृत के तमाम क्षेत्र से अब तक अनभिज्ञ ही था।
          शोध में प्रवेश लेने के उपरान्त काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में निर्वाध प्रवेश प्रणाली थी परन्तु यहाँ संस्कृत की पर्याप्त मात्रा में पुस्तकें उपलब्ध नहीं थी। विशाल पुस्तकालय में जब तक सहयोगी साथ न हो पुस्तक ढूढ़ना कष्टप्रद ही रहता है।
          अपने अतीत के अनुभव से मैं यह कह सकता हूँ कि उच्च शिक्षा में प्रवेशार्थी छात्रों को पुस्तकालय के उपयोग की शिक्षा दी जानी चाहिए।
          पुस्तकालय में पुस्तकों को किस प्रकार वर्गीकरण (विषय के अनुसार एकत्रीकरण) कर निधानियों पर रखा गया है। निधानियों (आलमारी रैक) में पुस्तकें कैसे खोजी जाय आदि की शिक्षा देने से जिज्ञासुओं को महान् लाभ मिलता है। अब तो पुस्तकालयो में पुस्तक सूची को कम्प्यूटरीकृत किया जा रहा है। कहीं आनलाइन सूची भी उपलब्ध है तो कहीं ई फार्मेट में पुस्तकें भी जिसकी चर्चा हम अग्रिम लेख में करेंगे।
          मुझे उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के पुस्तकालय में 1999 से कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भण्डार सत्यापन के दौरान संस्कृत पुस्तकों की विविधता एवं विशालता से परिचित हुआ। जिन तमाम क्षेत्रों की चर्चा में मौखिक सुना करता था उनके मूल ग्रन्थ यहाँ देखने को मिले। कृषि विज्ञान, संहिता शास्त्र, धर्मशास्त्र, निबन्ध ग्रन्थ, कला विषयक ग्रन्थ और सबसे अधिक संस्कृत भाषा में आधुनिक रचनाएँ। यहाँ अनेक कोश, चरित्र कोश, पत्रिकाएँ, स्मारिकाएँ, अभिनन्दन ग्रन्थ, पाण्डुलिपि आदि विषयों पर तमाम ग्रन्थ एवं जानकारी प्राप्त हुई। अब सोचता हूँ काश! कोई ऐसा मार्गदर्शक मुझे मिला होता जो इसकी गम्भीरता से भी मुझे परिचित करता।
          इस पुस्तकालय में ग्रन्थों की बहुलता या प्रचूरता तो है ही साथ-साथ अध्येता भी। मैंने सर्वप्रथम पुस्तकों को व्यवस्थित किया ताकि पाठक सुलभता पूर्वक अपनी पाठ्य सामग्री खोज सकें। मैंने बाल पुस्तकालय का एक सेल तथा पत्रिकाओं का एक सेल गठित किया।
          विषयों के विभाग प्रविभाग कर उसके वर्गाकों की कल्पना पुनः पुस्तकालय का आधुनिकीकरण करते हुए आॅनलाइन पुस्तक सूची उपलब्ध कराने का प्रयास किया। आर्थिक पेचीदगी के रहते भी पुस्तकालय हेतु निर्मित वेबसाइट में नवीन आगत पुस्तकों की सूची, पत्रिकाएँ अवकाश आदि तमाम जानकारियां तथा सुविधाएँ उपलब्ध करा दी गयी है। 

          उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान पुस्तकालय के पुस्तकों को आनलाइन करने के पूर्व मैंने तमाम पुस्तकालयों में चल रहे साफ्टवेयर का परीक्षण किया। इसमें यह विशेष ध्यान रखा कि इस क्षेत्र में अल्प जानकारी रखने वाला पाठक भी सरलतया पुस्तक खोज सके। पुस्तकालय से जुड़ी तमाम जानकारी उसे प्राप्त हो सकें।  
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दिनांक 26.08.17
 पुस्तकालय की वेबसाइट अब बंद हो चुकी है।  मैंने विजुअल वेसिक के आधार पर पुस्तकालय प्रबन्धन नामक साफ्टवेयर बनवाया था। आज नवीन आगत पुस्तकों की डाटाइंट्री, डाटा में संशोधन आदि का कार्य उसी के माध्यम से हो रहा है। पाठकों को पुस्तक की जानकारी लेने में हो रही असुविधा को ध्यान में रखकर प्रो. मदनमोहन झा के पुत्र सृजन झा के सहयोग से मैंने एक मोबाइल ऐप बनाकर संस्कृत प्रेमियों को अपने जन्मदिन 30.12.2016 को उपहार स्वरूप भेंट किया। यह ऐप गूगल प्ले स्टोर पर निःशुल्क उपलब्ध है।

मंगलवार, 4 मार्च 2014

Learn Hieratic in Hindi Part -5 उपनयन संस्कार

        उपनयन के दिन प्रातः कुमार के पिता शुभ आसन पर पूरब की ओर बैठकरआचमनप्राणायाम कर दक्षिण हाथ में अक्षतफूल लेकर आ नो भद्रादि’ úल मंत्रा को तथा सुमुखश्चैकदन्तश्च’ आदि श्लोक का पाठ करें।
तत्पश्चात् हाथ में फल अक्षत जल और द्रव्य लेकर देशकाल आदि का नाम लेते हुए संकल्प करें।ॐविष्णु...................अमुक गोत्रोत्पन्नः शर्माऽहं मम अस्य कुमारस्य (अनयोः कुमारयोःवा एषां कुमाराणां) श्वःअद्य वा करिष्यमाणोपनयन-विहितं स्वस्ति-पुण्याहवाचनं मातृकापूजनंवसोद्र्धारा-पूजनम् आयुष्यमन्त्रजपंसाøल्पिकेन विधिना नान्दीश्राद्धं चाऽहं करिष्ये। तत्रादौ निर्विघ्नतासिद्धîर्थं गणेशाऽम्बिकयोः पूजनमहं करिष्ये।
ऐसा बोलकर पृथ्वी पर जल छोड़े।
(नोटः-गौरी-गणेश पूजनकलश स्थापन एवं पूजन आदि कृत्य की प्रक्रिया ‘‘सामान्य पूजन विधि’’ शीर्षक के अनुसार यथाविधि सम्पन्न कर आगे दिये विधि को करें।)
यदि उपनयन का समय बीत गया होतो प्रायश्चित्त रूप गोदान करे।वह इस प्रकार है-दाहिने हाथ में जल लेकर, ‘देशकालौ संकीत्र्य0’ से लेकर दातुमहमुत्सृजे’ तक संकल्प-वाक्य पढ़े- देशकालौ सङ्कीत्र्यगोत्रोत्पन्नः शर्माऽहम् अस्य बटुकस्य (अनयोः बटुकयोःएषां बटुकानां वा उपनयन कालातिक्रमदोष- परिहारार्थं प्राजापत्यत्रायं गोनिष्क्रयभूतं द्रव्यं रजतं चन्द्रदैवतं नानानामगोत्रोभ्यो ब्राह्मणेभ्यो विभज्य दातुमहमुत्सृजे। भूमि में जल छोड़ दे।
उसके बाद यज्ञोपवीत के दिन कुमार-पिता अथवा आचार्य पूर्वाभिमुख हो आचमन प्राणायाम कर हाथ में जल लेकर देशकालौ संकीत्र्य0, से दातुमहमुत्सृजे’ तक संकल्प पढ़े। देशकालौ सङ्कीत्र्यगोत्रोत्पन्नः शर्माऽहं मम अस्य बटुकस्य (अनयोः बटुकयोःवा एषां बटुकानाम्) उपनयन-कर्मानधिकारिता-प्रयोजक- कायिकादि-निखिल-पापक्षयार्थं तत्राऽधिकारसिद्धिद्वाराश्रीपरमेश्वर-प्रीत्यर्थ कृच्छ्रत्रायात्मक-प्रायश्चित्तं गोनिष्क्रयभूतं द्रव्यं रजतं चन्द्र-दैवतं यथानामगोत्रोभ्यो ब्राहणेभ्यो विभज्य दातुमहमुत्सृजे।
इसी प्रकार बटु (कुमार) भी आचमनप्राणायाम कर हाथ में जल लेकर देशकालौ संकीत्र्य0’ से दातुमहमुत्सृजे’ पर्यन्त संकल्प-वाक्य पढ़े। देशकालौ सङ्कीत्र्यगोत्राः बटुकोऽहं मम कामचार-कामवाद-कामभक्षणादिदोषनिरसन-पूर्वकोपनयन- वेदारम्भ-समावर्तनेष्वधिकारसिद्धि-द्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं कृच्छ्रत्रायात्मकं प्रायश्चित्तं गोनिष्क्रयभूतं द्रव्यं रजतं चन्द्रदैवतं यथायथा-नामगोत्रोभ्यो ब्राह्मणेभ्यो विभज्य दातुमहमुत्सृजे’ ऐसा बोलकर भूमि पर जल छोड़ दे।
उसके बाद कुमार-पिता या आचार्य हाथ में जल लेकर देशकालौ संकीत्र्य0’ से ब्राह्मणद्वारऽहं कारयिष्ये’ तक संकल्प-वाक्य पढ़े। देशकालौ सङ्कीत्र्यगोत्रोत्पन्नः शर्माऽहम् अस्य बटुकस्य (अनयोः बटुकयोःवा एषां बटुकानां) गाय
युपदेशाऽधिकारसिद्धिद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं द्वादशोत्तरसहó- सङ्खîाक-गायत्रीजपं ब्राह्मणद्वाराऽहं कारयिष्ये।’ पुनः अस्मिन् गायत्रीजपकर्मणि0’ से त्वामहं वृणे’ तक उच्चारण करें भूमि में जल छोड़ दे। अस्मिन् गायत्रीजपकर्मणि एभिर्वरणद्रव्यैरमुकगोत्राममुकशर्माणं ब्राह्मणं द्वादशोत्तरसहस्र-गायत्रीजपार्थं त्वामहं वृणे।’ ब्राह्मण भी, ‘वृतोऽस्मि’ इस प्रकार कहे।
पुनः आचार्यहाथ में जल लेकर अस्य बटुकस्य0’ से ब्राह्मणत्रायं भोजयिष्ये’ तक पढ़कर संकल्प करे। अस्य बटुकस्य (अनयोः बटुकयोःवा एषां बटुकानाम्) उपनयनपूर्वाङ्गतया विहितं ब्राह्मणत्रायं भोजयिष्ये। और उस पंक्ति में बटुक को भी कुछ मिष्ठान्न खिलावे। पुनः हाथ में जल लेकर अस्य बटुकस्य0’ से वपनं कारयिष्ये’ एवं अस्मिन्नुपनयनाख्ये कर्मणि0’ से अग्निस्थापनं च करिष्ये’ तक संकल्प-वाक्य पढ़ें। अस्य बटुकस्य (अनयोः बटुकयोःवा एषां बटुकानाम्) उपनयन-पूर्वाङ्गभूतं वपनं कारयिष्ये।’ एवम् अस्मिन्नुपनयनाख्ये कर्मणि पञ्चभूसंस्कारपूर्वकं समुद्भवनामाऽग्निस्थापनं च करिष्ये।’ भूमि में जल छोड़ दे।
पञ्चभू संस्कार
इसके बाद आचार्य मुट्ठी भर कुशा हाथ में लेकर वेदी को झाड़े और उस कुशा को ईशान कोण में फेंक दे। उस वेदी को गोबर और जल से लीपेपुनः òुवा के मूल से वेदी में तीन रेखा करेरेखा के क्रम से अनामिका अँगुलि एवं अँगुठे द्वारा रेखा की मिट्टी को उठावेपुनः रेखा पर जल छिड़के। काँसे के पात्रा (थाली) में अग्नि अपने मुख की ओर करके वेदी में स्थापन करे।
उसके बाद आचार्यअथवा कुमार-पिता हाथ में जल लेकर अस्य बटुकस्य0’ से उपनयनमहं करिष्ये’ तक संकल्प-वाक्य उच्चारण करे। अस्य बटुकस्य (अनयोः बटुकयोःवा एषां बटुकानां) ब्राह्मण्याभिव्यक्ति-द्विजत्वसिद्धîर्थं
वेदाध्ययनाधिकारार्थं चोपनयनमहं करिष्ये’ भूमि में जल छोड़ दे।
उसके बाद ब्राह्मण एवं बटुक को भोजन कराकर क्षौर किये एवं मङ्गल स्नान  किये हुएतथा सिर पर रोरी द्वारा स्वस्तिक चिद्द से अंकितअक्षतफल हाथ में लिये हुए बटुक को आचार्य के समीप ले आवे। और अग्नि के पीछे पूर्वाभिमुख बटुक को बैठाकर आचार्य ॐ मनो जूतिः0’ से प्रतिष्ठ’ तक मन्त्र पढ़े।
मनो ज्जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञ ˜ समिमं दघातु। विश्वेदेवास ऽइह मादयन्तामों प्रतिष्ठ।।
तत्पश्चात् आचार्य कुमार से ब्रह्मचर्यमागामि’ इस प्रकार कहे। पुनः आचार्य कुमार से ब्रह्मचार्यसानि’ इस प्रकार कहे।
उसके बाद आचार्यॐयेनेन्द्राय बृहस्पतिर्वासः पर्यदधादमृतम्। तेन त्वा परिदधाम्यायुषे दीर्घायुत्वाय बलाय वर्चसे।। तक मन्त्र पढ़कर कुमार को वó पहनावे। पुनः बटुक को आचमन करावे। निम्न मन्त्र पढ़कर बटुक को खड़ाकर आचार्य उसकी कमर में मेखला बाँधे।ॐइयं दुरूक्तं परिबाधमाना वर्णं पवित्रंा पुनती म आगात्। प्राणापानाभ्यां बलमादधाना स्वसा देवी सुभगा मेखलेयम्।।
तत्पश्चात् आचार्य बटुक को बैठाकर आचमन करावे और बटुक हाथ में जल लेकर अष्टभाण्ड (आठ पुरवा या गिलास) में चावलयज्ञोपवीत एवं द्रव्य रखकर संकल्प करे। देशकालौ सङ्कीत्र्यगोत्रोत्पन्नः बटुकोऽहं स्वकीयोपनयन- कर्मविषयक- सत्संस्कारप्राप्त्यर्थं तथा च द्विजत्वसिद्धि-वेदाध्ययनाधिकारार्थं
यज्ञोपवीतधारणार्थं च श्रीसवितृसूर्य नारायणप्रीतये इमान्यष्टौ भाण्डानि स-यज्ञोपवीत-फलाक्षतदक्षिणासहितानि यथायथा-नामगोत्रोभ्यो ब्राह्मणेभ्यो दातुमह-मुत्सृजे
यज्ञोपवीत संस्कार
आचार्य निम्नलिखित तीन मंत्रों को पढ़कर यज्ञोपवीत का प्रक्षालन करें।
ॐ आपो हिष्ठामयो भुवस्ता न ऽउज्र्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे।।1।।
ॐ यो वः शिवतमोरसस्तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः।।2।।
ॐ तस्मा ऽअरङ्गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जनयथा च नः।।3।।
उसके बाद आचार्य पुनःॐब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन ऽआवः। स बुध्न्या ऽउपमा ऽअस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च व्विवः।।1।।ॐइदं विणुर्विचक्रमे त्रोधा निदधे पदम्। समूढमस्य पा ˜ सुरे स्वाहा।।2।।ॐनमस्ते रुद्र मन्यव ऽउतो त ऽइषवे नमः। बाहुभ्यामुत ते नमः।।3।। तीन मन्त्रों से हाथ के दोनों अँगूठे द्वारा यज्ञोपवीत को घुमावे।
तदनन्तर उस यज्ञोपवीत को कसोरे में रखकर यज्ञोपवीत के नवतन्तुओं में देवताओं का न्यास करे। वह इस प्राकर है-बाँयें हाथ में अक्षत लेकरदाहिने हाथ से ॐकारं प्रथमतन्तौ न्यसामि।।1।।ॐअग्ंिन द्वितीयतन्तौ न्यसामि।।2।।ॐनागांस्तृतीयतन्तौ न्यसामि।।3।।ॐसोमं चतुर्थतन्तौ न्यसामि।।4।।ॐइन्द्रं पञ्चमतन्तौ न्यसामि।।5।।ॐप्रजापतिं षष्ठतन्तौ न्यसामि।।6।।ॐवायुं सप्तमतन्तौ न्यसामि।।7।।ॐसूर्यमष्टमतन्तौ न्यसामि।।8।।ॐविश्वेदेवान् नवमतन्तौ न्यसामि।।9।। उच्चारण कर यज्ञोपवीत के नवतन्तुओं में अक्षत चढ़ावे।
तथाॐउपयामगृहीतोऽसि सवित्रोऽसि चनोधाश्चनाधा ऽअसि चनो मयि धेहि। जिन्वि यां जिन्व यज्ञपतिं भगाय देवाय त्वा सवित्रो।। मन्त्र पढ़कर यज्ञोपवीत को सूर्य की ओर दिखावे। पुनः यज्ञोपवीत को बाँयें हाथ की हथेली में रखउसे दाँयें हाथ की हथेली से ढँककर दश बार गायत्री का जप करे। फिर हाथ में जल लेकर यज्ञोपवीतमि’ त्यस्य परमेष्ठी ऋषिःत्रिष्टुप्-छन्दःलिङ्गोक्ता देवतानित्य-नैमित्तिक-कर्मानुष्ठानफल-सिद्धîर्थे यज्ञोपवीत-धारणे विनियोगः’ पढ़कर भूमि पर जल छोड़ दे औरॐयज्ञोपवीतं परमं पवित्रां प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्रîं प्रतिमुञ्च शुभं्र यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।। यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि।। तक मन्त्र पढ़कर कुमार को यज्ञोपवीत धारण करावे एवं कुमार से दो बार आचमन भी करावे।
उसके बाद आचार्यॐमित्रास्य चक्षुर्द्धरुणं बलीयस्तेजो यशस्वि स्थविर ˜ समिद्धिम्। अनाहनस्यं वसनं जरिष्णुं परीदं वाज्यजिनं दधेऽहम्।। मन्त्र उच्चारण कर कुमार को चुपचाप अजिन (मृगचर्म) धारण करावे और उससे दो बार आचमन भी करावे। पुनः आचार्यॐयो मे दण्डः परा-पतद्वैहायसोऽधिभूम्याम्। तमहं पुनरादद आयुषे ब्रह्मणे ब्रह्मवर्चसाय।। मन्त्र पढ़कर बटुक के केशपर्यन्त पलाश दण्ड चुपचाप दे और कुमार भी उस दण्ड को ग्रहण करे।
तत्पश्चात् आचार्य अपनी अंजलि में जल भरकर बटुक की अंजलि में जल दे। और ॐ आपो हिष्ठा0’ से आपो जनयथा च नः’ पर्यन्त तीन मन्त्रों से बटुक उस जलको ऊपर की ओर उछाल दे।
ॐ आपो हिष्ठामयो भुवस्ता न ऽउज्र्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे।।1।।
ॐ यो वः शिवतमोरसस्तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः।।2।।
ॐ तस्मा ऽअरङ्गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जनयथा च नः।।3।।
उसके बाद सूर्यमुदीक्षस्व’ अर्थात् सूर्य को देखोइस प्रकार आचार्य की आज्ञा के बाद कुमारॐतच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत ˜ श्रृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्।। मन्त्र उच्चारण कर सूर्य की ओर देखे।
पुनः आचार्य माणवक के दाहिने कन्धे पर से अपने दाहिने हाथ द्वाराॐमम व्रते ते हृदयं दधामि। मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु। मम वाचमेकमना जुषस्व। बृहस्पतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम्।। मन्त्र पढ़कर उसके हृदय का स्पर्श करे।
तत्पश्चात् आचार्य बटुक के दाहिने हाथ को पकड़कर उससे पूछते हैं को नामाऽसि ? ‘तुम्हारा क्या नाम है ?’ कुमार भी अमुकशर्माऽहं भोः !’ इस प्रकार प्रत्युत्तर देता है। कस्य ब्रह्मचर्यसि तुम किसके ब्रह्मचारी हो ?’ इस प्रकार आचार्य के कहने पर कुमार भवतः’ अर्थात् आपका हीइस प्राकर प्रत्युत्तर देता है। पुनः आचार्यॐइन्द्रस्य ब्रह्मचार्यस्यग्निराचार्यस्तवाहमाचार्यः श्रीअमुकशर्मन्। कुमार से मन्त्र कहते हैं।
पुनः आचार्यॐप्रजापतये त्वा परिददामिइति प्राच्याम्।।1।।
ॐ देवाय त्वा सवित्रो परिददामि इति दक्षिणस्याम् ।।।2।।ॐ
अद्भ्यस्तत्त्वौषधीम्यां  परिददामिइति प्रतीच्याम्।।3।।ॐद्यावापृथिवीभ्यां त्वा परिददामिइत्युदीच्याम्।।4।।ॐविश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः परिददामि,
इत्यधः।। 5।।ॐसर्वेभ्यस्त्वा परिददामिइत्यूध्र्वम्। मन्त्र पढ़कर कुमार से सभी दिशाओं में उपस्थान (प्रणाम) करावे। उसके बाद अग्नि की प्रदक्षिणाकर आचार्य की दाहिनी ओर माणवक बैठे।
ब्रह्मवरण-पुनः आचार्य पुष्पचन्दनताम्बूल एवं वó आदि वरण-सामग्री हाथ में लेकर अद्य कर्तव्योपनयन-होमकर्मणि कृताऽकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मकर्तुम् अमुकगोत्राममुकशर्माणं ब्राह्मणमेभिः पुष्प-चन्दन-ताम्बूल-वासोभिः ब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे। उच्चारण कर ब्रह्मा का वरण करें। ब्रह्मा भी वृतोऽिस्म’ इस प्रकार कहें।
नोटः-अग्नि स्थापन के बाद शेष कुशकण्डिका एवं स्विष्टकृद् होम तक की विधि होम प्रकरण से करावें।
उसके बाद संश्रव प्राशन आचमन करॐसुमित्रिया नऽआपऽओषधयः सन्तु कहकर प्रणीता के जल से अपने ऊपर मार्जन करें।
दाहिने हाथ मे जल लेकर अद्य कृतस्योपनयनहोमकर्मणोऽङ्गतया विहितम् इदं पूर्णपात्रां प्रजापतिदैवतममुकगोत्रायाऽमुकशर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रददे।’ संकल्प-वाक्य उच्चारण कर भूमि में जल छोड़ दे। ब्रह्मा भी, ‘स्वस्ति’ तथाॐद्यौस्त्वा ददातु पृथिवी त्वा प्रतिगृह्णातु। इस मन्त्र भाग का उच्चारण करें।
अग्नि के पश्चिम भाग या ईशान कोण में ॐदुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः।। इस आधे मन्त्र को पढ़कर प्रणीतापात्रा भूमि पर उलट दे। उसके बाद उपयमन कुशाओं से ॐआपः शिवाः शिवतमाः शान्ताः शान्ततमास्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्।। इस मन्त्र भाग को पढ़कर भूमि पर गिरे हुए प्रणीता का जल यजमान के मस्तक पर सिंचन करे (छिड़के) और उन उपयमन कुशाओं को अग्नि में छोड़ दे।
आचार्य कुमार का अनुशासन करते हैं। वह इस प्रकार है-आचार्य कहे ब्रह्मचार्यसि। ब्रह्मचारी कहे भवामि। आचार्य-आपोऽशान। ब्रह्मचारी-अशानि। आचार्य-कर्म कुरू। ब्रह्मचारी-करवाणि। आचार्य-दिवा मा सुषुप्स्व। ब्रह्मचारी-न स्वपानि। आचार्य-वाचं यच्छ। ब्रह्मचारी-यच्छानि। आचार्य-अध्ययनं सम्पादय। ब्रह्मचारी-सम्पादयामि। आचार्य-समिधमाधेहि। ब्रह्मचारी-आदधामि। आचार्य-आपोऽशान। ब्रह्मचारी-अशानि। इस प्रकार आचार्य कुमार का अनुशासन करे।
गायत्री उपदेश-अग्नि के उत्तर की ओर पश्चिमाभिमुख बैठे हुए आचार्यके चरण एवं उनको (आचार्य को) ब्रह्मचारी भली-भाँति देखे। आचार्य भी बटुक को देखते हुए मांगलिक शंख तथा अन्य बाजे आदि को बन्द कर शुभ समय में आचार्य गायत्री का उपदेश करे। सर्व-प्रथम काँसेकी थाली में चावल फैलाकर सोने की शलाका से ॐकार पूर्वक गायत्री मन्त्र लिखे और संकल्प के साथ गायत्री आदि का पूजन करे। वह इस प्रकार है-
ब्रह्मचारी दाहिने हाथ में जल लेकर अद्य पूर्वोच्चारित-ग्रहगुण- गणविशेषण-विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौगोत्राः शर्माऽहं मम ब्रह्मवर्चससिद्धîर्थं वेदाध्ययनाधिकारार्थं च गायÿत्रयुपदेशाङ्गविहितं गायत्री-सावित्राी- सरस्वतीपूर्वकमाचार्यपूजनं करिष्ये।’ संकल्प-वाक्य पढ़कर भूमि पर जल डोड़ दे।
चावल फैले हुए काँसे की थाली में तीन सोपारी रखकर हाथ में चावल ले ॐता ˜ सवितुर्वरेण्यस्य चित्रामहं वृणे सुमतिं विश्वजन्याम्। यामस्य कण्वो ऽअदुहत्प्रपीना ˜ सहòधारा पयसा महीं गाम्।।1।। पर्यन्त मन्त्र तथा ॐ गायÿत्रायै नमःगायत्रीमावाहयामि’ तक पढ़कर पहली सोपारी पर अक्षत छिड़के। सवित्रा प्रसवित्रा सरस्वत्या वाचा त्वष्ट्रा रूपैः पूष्णा पशुभिरिन्द्रेणास्मे बृहस्पतिना ब्रह्मणा वरुणेनौजसाऽग्निना तेजसा सोमेन राज्ञा विष्णुना दशम्या देवताया प्रसूतः प्रसर्पामि।। ॐ साविÿत्रयै नमःसावित्राीमावाहयामि’ कहकर दूसरी सोपारी पर अक्षत छोड़े।ॐपावका नः सरस्वती व्वाजेभिर्वाजिनीवती। यज्ञं व्वष्टु
धियावसुः।। और ॐ सरस्वत्यै नमःसरस्वतीमावाहयामि’ उच्चारण कर तीसरी सोपारी पर अक्षत छिड़के।
पुनःॐबृहस्पते ऽअति यदर्यो ऽअर्हाद्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऽऋतप्रजा तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्राम्।।ॐगुरवे नमःगुरुमावाहयामि।। 4।। पढ़कर आचार्य के ऊपर अक्षत छोड़े। फिर हाथ में अक्षत लेकर ॐ मनो जूतिः0’ इस मन्त्र से गायत्री आदि पर अक्षत छिड़क कर प्रतिष्ठा करें। और गायत्रीसावित्राीसरस्वती तथा गुरु का पंचोपचार से पूजन करे।
इस गायत्री मन्त्र के तीन भाग करे। प्रथम में केवल ॐकार का उच्चारण करे। द्वितीय भाग में आधा मन्त्र एवं तृतीय भाग में समस्त गायत्री का उपदेश करे। गायत्री मन्त्र-ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ॐ।। इसी प्रकार तीन बार गायत्री मन्त्र का बटुक के दाहिने कान में उपदेश करे। इस गायत्री मन्त्र के पहले और अन्त में प्रणव (ॐपूर्वक स्वस्ति’ का उच्चारण करे।
इसी प्रकार आचार्य क्षत्रिय कुमार को त्रिष्टुप् सवित्रा गायत्री काओर वैश्य कुमार को जगती नाम की गायत्री का अथवा ब्राह्मणक्षत्रिय ओर वैश्य तीनों को ब्रह्मगायत्री का उपदेश करें। इस प्रकार गायत्री उपदेश समाप्त।
उसके बाद ब्रह्मचारी आचार्य के दक्षिण एवं अग्नि के पश्चिम भाग में बैठकर घी में डुबोये हुए सूखे गोबर के कण्डे द्वारा पाँचों मन्त्रों से हवन करे।
ॐ अग्ने सुश्रवः सुश्रवसं मा कुरु ।। 1।। ॐयथा त्वमग्ने सुश्रवः सुश्रवा ऽअसि ।। 2।।ॐएवं मा˜ सुश्रवः सौश्रवसं कुरु।। 3।।ॐयथा त्वमग्ने देवानां यज्ञस्य निधिपा ऽअसि।।4।।ॐएवमहं मनुष्याणां वेदस्य निधिपो भूयासम्।। 5।।
उसके बाद जल द्वारा अग्नि के चारों ओर प्रदक्षिणा करे अर्थात् जल घुमावे। पुनः बटुक उठाकर घी लगे हुए तीन पलाश की समिधा (लकड़ी) लेकरॐअग्नये
समिधमाहार्यं बृहते जातवेदसे। यथा त्वमग्ने समिधा समिध्यस एवमहमायुषा मेधया वर्चसा प्रजया पशुभिब्र्रह्मवर्चसेन जीवपुत्रो ममाचार्यो
मेधाव्यहमसान्यनिराकरिष्णुर्यशस्वी तेजस्वी ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भूयास ˜ स्वाहा।। पढ़कर पहली समिधा अग्नि में छोड़ दे।
तथा उक्त मन्त्र से ही दूसरी एवं तीसरी समिधा का भी अग्नि में हवन करें।
पुनः घी में डुबाये हुए सूखे कण्डे सेॐअग्ने सुश्रवः सुश्रवसं मा कुरु ।। 1।। ॐयथा त्वमग्ने सुश्रवः सुश्रवा ऽअसि ।। 2।।ॐएवं मा˜ सुश्रवः सौश्रवसं कुरु।। 3।।ॐयथा त्वमग्ने देवानां यज्ञस्य निधिपा ऽअसि।।4।।ॐएवमहं मनुष्याणां वेदस्य निधिपो भूयासम्।। 5।। पाँच मन्त्र पढ़कर अग्नि में हवन करे।
उसके बाद अग्नि के चारों ओर जल घुमाकर दोनों हाथों की हथेली अग्नि में तपाकरॐतनूपा अग्नेऽसि तन्वं मे पाहि।। 1।।ॐआयुर्दा अग्नेऽस्यायुर्मे देहि।।2।।ॐवर्चोदा अग्नेऽसि वर्चो मे देहि।। 3।।ॐअग्ने यन्मे तन्वा ऊनं तन्म ऽआपृण।।4।।ॐमेधां मे देवः सविता आदधातु।।5।।ॐमेधां मे देवी सरस्वती आदधात।। 6।।ॐमेधामश्विनौ देवावाधत्तां पुष्पकरòजौ।।7।। सात मन्त्र द्वारा अपने मुख का स्पर्श करे।
पुनः ॐ अङ्गानि च मऽआप्यायन्ताम्’ इस मन्त्र से दोनों हाथों की हथेली का मस्तक से लेकर पैर पर्यन्त सभी अंगों का स्पर्श करे। तदनन्तर दाहिने हाथ की पाँचों अँगुलियों के अग्रभाग सेॐवाक्च म ऽआप्यायताम्। इति मुखालम्भनम्।ॐप्राणश्च म आप्यायताम्। इति नासिकयोरालम्भनम्।ॐचक्षुश्च म ऽआप्यायताम्।
इति चक्षुषी युगपत्।ॐश्रोत्रां च म ऽआप्यायताम्। इति श्रोत्रायोः मन्त्रवृत्या।ॐयशोबलं च म ऽआप्यायताम्। इति बाह्नोरुपस्पर्शनम्। पर्यन्त मन्त्र उच्चारण कर मुखदोनों नासिका के अग्रभागदोनों नेत्रादोनों कान और दोनों भुजाओं का स्पर्श करे।
त्रयायुषकरण-òुवा के मूलभाग से वेदी का भस्म लेकर त्रयायुष करे। वह इस प्रकार है-ॐ त्रयायुषं जमदग्नेः’ इति ललाटे। ॐ कश्यपस्य त्रयायुषम्’ इति ग्रीवायाम्। ॐ यद्देवेषु त्रयायुषम्’ इति दक्षिणबाहुमूले। ॐ तन्नो ऽअस्तु त्रयायुषम् इति हृदि। मन्त्र पढ़कर मस्तकग्रीवादाहिने बाहु मूल और हृदय में भस्म लगावे।
तत्पश्चात् बटुक सीधे दोनों हाथ से पृथ्वी का स्पर्श करते हुए गोत्राप्रवरनाम पूर्वक वैश्वानरादि का अभिवादन करे। वह इस प्रकार है-अमुकसगोत्राः अमुकप्रवरान्वितः अमुकशर्माऽहं भो वैश्वानर ! त्वामभिवादये। अमुकसगोत्राः अमुकप्रवरान्वितः अमुकशर्माऽहं भो वरुण ! त्वामभिवादये। अमुकसगोत्राः अमुकप्रवरान्वितः अमुकशर्माऽहं भो सूर्य ! त्वामभिवादये। अमुकसगोत्राः अमुकप्रवराऽन्वितः अमुकशर्माऽहं भो आचार्य !भो अध्यापक !भो गुरो! त्वामभिवादये। वाक्य कहकर बटुक वैश्वानर (अग्नि)वरुणसूर्य एवं आचार्य को अभिवादन (प्रणाम) करे। आचार्य भीअभिवादयस्व आयुष्मान् भव सौम्य श्रीअमुकशर्मन्!। पर्यन्त वाक्य कहे।
भिक्षाचर्यचरण (भिक्षा माँगना)-बाँयें कन्धे पर पीले वó की झोली लटका कर सब से पहले माता के पास जाकर भवति भिक्षां देहि’ (अर्थात् आप मुझे भिक्षा दें) यह वाक्य कहकर भिक्षा ग्रहण करे। भिक्षा लेने के बाद ब्रह्मचारी बटुक ॐ स्वस्ति’ इस प्रकार कहे। क्षत्रिय-कुमार भिक्षा ग्रहण के समय भिक्षां देहि भवति’ यह वाक्य कहे। माता के द्वारा दी हुई सभी भिक्षा आचार्य को प्रदान करे। उसी प्रकार अन्य कुटुम्बी जनों (चाचाचाचीमामामामीबुआ आदि को) से भिक्षा ग्रहण करे। आचार्य द्वारा भिक्षा ग्रहण करो’ इस प्रकार आज्ञा प्राप्त होने पर अन्य कुटुम्बी जनों की भिक्षा बटुक ग्रहण करे। किन्हीं आचार्यों के मत में भिक्षा ग्रहण के पश्चात्प्रथम वेदी में पूर्णाहुति का विधान है।
नियमोपदेश-उसके बाद आचार्य ब्रह्मचारी बटुक को  अधःशायी स्यात्। अक्षारलवण-शी स्यात्। दण्डकृष्णाजिनं च धारणम्। अरण्यात् स्वयं प्रशीर्णाः समिध आहरणम्। सायंप्रातः सन्ध्योपासनपूर्वकं परिसमूहनादि-त्रयायुषकरणान्तं यथोक्तं कर्म कर्तव्यम्। गुरुशुश्रूषा कर्तव्या। सायं प्रातर्भोजनार्थे
जनसन्निधाने वारद्वयं भिक्षाचरणं कर्तव्यम्। मधुमांसाऽशनं न कर्तव्यम्। मज्जनं न कर्तव्यम्।
कुशासनोपरि मसूरिकादि उपधानं कृत्वा नोपविशेत्। óीणां मध्ये अवस्थानं न कर्तव्यम्। अनृतं न वक्तव्यम्। अदत्तं न गृह्णीयात्। स्मृत्यन्तरोक्ता यम-नियमा अनुष्ठेयाः। परिधानवóं क्षालनं विना न दधीत। भग्नं सुसंल्लग्नितं विकृतं वóं न दधीत। उदयास्तसमये भास्करावलोकनं न कुर्यात्। शुष्कवदनं परिवादादि वर्जयेत्। पर्युषितमन्नं च न भक्षयेत्। कांस्या-ऽऽयस-वङ्ग-मृत्पात्रो भोजनं तेन पानं च न कुर्यात्। ताम्बूलभक्षणं न कुर्यात्। अभ्यङ्गमक्ष्णोरञ्ज- नमुपानच्छत्रादर्शं च वर्जयेत्। ब्रह्मचारी के नियम पालन करने का उपदेश दे। भूमि पर शयन करना। खारी एवं चटपटी (चाटपकौड़ी) आदि वस्तु सेवन न करे। दण्ड एवं मृगचर्म धारण करे। जंगल से स्वयं गिरी हुई  समिधा ग्रहण करे। सायंकाल एवं प्रातः समय परिसमूहन लेकर त्रयायुष पर्यन्त वेदी के समस्त कार्य सम्पादित करे। गुरु की सेवा करे। सायंकाल एवं प्रातः समय अपने भोजन निमित्त गृहस्थ के घर से दो बार भिक्षा माँग ले आवे। मद्य-मांस आदि सेवन न करें जल को उछाल कर स्नान न करे।
कुश के आसन पर रूई के गद्दे आदि बिछाकर न बैठे। óियों के मध्य न बैठे। मिथ्या भाषण न करे। बिना दिये हुए दूसरे की वस्तु ग्रहण न करे। धर्मशाó के अनुसार यम-नियम-निदिध्यासन आदि नियमों का पालन करे। पहने हुए वó को दूसरे दिन बिना धोये धारण न करे। फटेदूसरे वó से जोड़े (पिंउदा लगे) हुएऔर निकृष्ट वó (बिना कच्छके लुंगी आदि) धारण न करे। उदय और अस्त के समय सूर्य को न देखे। बासी एवं सड़े हुए अन्न भोजन न करे। काँसेलोहेराँगे एवं मिट्टी के बरतन में भोजन न करे तथा भोजन किये हुए पात्रा में जल न पीये। पान न खाये। उबटनआँख में अंजनजूताछाता और शीशा का परित्याग करे। इतने नियम ब्रह्मचारी को करना चाहिए।
उस दिन ब्रह्मचारी मौन होकर दिन बितावे। उसके बाद सायंकाल की सन्ध्या कर वेदी की अग्नि में प्रातः कालीन कृत्य के समान पर्युक्षण एवं परिसमूहन कार्य कर मौन का परित्याग करे। (परिसमूहन के बाद अग्नि में सूखी लकड़ी डाल दे) तथा प्रतिदिन सन्ध्या वन्दनादि कार्य (जब तक ब्रह्मचर्य व्रत धारण करे तब तक) नियम पूर्वक करें। अथवा कम से कम तीन दिन तक ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करें। कृतस्योपनयनकर्मणः साङ्गतासिद्धîर्थं दशसंख्याकान् ब्राह्मणान् भोजयिष्ये।
पुनः हाथ में जल लेकर कृतस्योपनयन-कर्मणः साङ्गतासिद्धîर्थम् आचार्याय दक्षिणां दातुमहमुत्सृजे। भूयसी-दक्षिणां च दातुमहमुत्सृजे। संकल्प वाक्य पढ़कर भूमि में जल छोड़ दें।
यह श्लोक पढ़कर क्षमा प्रार्थना करें।
                        प्रमादात्  कुर्वतां  कर्म  प्रच्यवेताध्वरेषु   यत्।
                        स्मरणादेव तद्-विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः।।