मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

अखिल भारतीय व्यास महोत्सव एक परिचय


अखिल भारतीय व्यास महोत्सव एक परिचय
        अखिल भारतीय व्यास महोत्सव पिछले  वर्षों से पवित्र नगर काशी में अखिल भारतीय महर्षि व्यास महोत्सव का भव्य आयोजन उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ द्वारा किया जा रहा है, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार के साथ केन्द्रीय सरकार भी सहयोग कर रही है।
यह कहा जाता है कि एक बार रोष में आकर उन्होंने गंगा के दूसरे तट पर एक अन्य काशी की सृष्टि करनी चाही। किन्तु भगवान्‌ गणेश की क्रीड़ापरक हस्तक्षेप के कारण उन्होंने अन्ततः ये विचार छोड़ दिया। उन्होंने काशी से लगे हुए रामनगर में निवास किया। जिस क्षेत्र में वे रहे वहॉं एक देवालय आज भी है और वह क्षेत्र व्यास काशी कहलाता है। माघ के महीने में काशी के नागरिक उस देवालय में विशेष रूप से जाते हैं। उनकी प्रशंसा में एक सुप्रसिद्ध श्लोक है कि ब्रहमा हैं, यद्यपि ब्रहमा की तरह उनके चार मुख नहीं है। वे विष्णु हैं जिनकी दो भुजायें ही हैं (चार भुजाएं नहीं है।) और वे शम्भु हैं यद्यपि उनके भाल पर (त्रिलोचन शम्भु की तरह) नेत्र नहीं हैं:-

      महर्षि व्यास जी भारतीय चिन्तन-परम्परा के आदि स्त्रोत रहे है। वेद को चार भागों-ऋग्‌, यजुष‌, साम एवं अथर्व- में विभक्त करके आपने कृष्ण द्वैपायन से महर्षि वेदव्यास की उपाधि प्राप्त की तथा महाभारत एवं पुराणों की रचना की।
  यह प्रसिद्ध है कि वेद-व्यास ने अपना कर्मक्षेत्र भगवान विश्वनाथ शंकर के त्रिशूल एवं उत्तर वाहिनी मां गंगा के तट पर बसी मोक्ष-दायिनी नगरी वाराणसी अथवा काशी को बनाया। यह वजह है कि आज हम विश्व के इस प्राचीनतम नगर में संस्कृत के शिखर विद्वानों और भारतीय परम्परा के जानकारों के बीच भगवान वेद-व्यास को स्मरण करने के लिए कुछ कार्यक्रमों के साथ आये है, जिन्हें मोट-मोटे तौर पर बताना उचित होगा। महर्षि व्यास जी भारतीय चिन्तन-परम्परा के आदि स्त्रोत रहे है। वेद की चार भागों- ऋग्‌, यजुष‌, साम एवं अथर्व - में विभक्त करके आपने कृष्ण द्वैपायन से महर्षि वेदव्यास की उपाधि प्राप्त की तथा महाभारत एवं पुराणों की रचना की ।
      वस्तुतः महर्षि व्यास जी ने महाभारत लिखकर केवल युद्धों का वर्णन नहीं किया है, बल्कि उनका अभिप्राय था, इस भौतिक जीवन की निःसारता दिखाकर मानवों को मोक्ष के लिए जागरूक एवं उत्सुक करना।  
   भारतीय संस्कृति का प्राण धर्म ही है, जिसकी उपेक्षा आज हो रही है। उनका स्पष्ट मत है कि अधर्म से देश का नाश होता है और धर्म से राष्ट्र का अभ्युत्थान होता है। वे कहते है, कि धर्म का परित्याग किसी भी स्थिति में, भय से या लोभ से, कभी नहीं करना चाहिए।
      अतः समस्त व्यास साहित्य से सभी धर्मों से शिक्षा मिलती है। नई पीढ़ी में इस ज्ञान का प्रचार-प्रसार हो इसी कामना से महोत्सव का आयोजन किया जाता है।

  
 
 
अखिल भारतीय व्यास महोत्सव का उद्‌देश्य-

      अखिल भारतीय व्यास महोत्सव भारत के दार्शनिक एवे बौद्धिक परम्परा के महान्‌ व्याख्याता तथा भारतीय सर्जनात्मक कलाओं के स्त्रोत महर्षि व्यास की स्मृति को संरक्षित करने के लिए आयोजित किया जाता है। व्यास वैदिक चिन्तन-परम्परा के महान् व्याख्याता है। उ.प्र. शासन, भारत सरकार तथा देशभर के विद्वान्, चिन्तक एवं छात्र इस महान् और अमर परम्परा के व्याख्याता के प्रति अपना आदर व्यक्त करने के लिए एकत्र होते है।

महर्षि व्यास एक परिचय


महर्षि व्यास एक परिचय

       महर्षि कृष्ण द्वैपायन बादरायण व्यास का आविर्भाव द्वापर युग में हुआ। उनका बहुत सा समय काशी में व्यतीत हुअ। पुराणों के अनुसार व्यास ऋषि पराशर और सत्यवती के पुत्र थे। सर्वप्रथम उन्होंने वेद का प्रतिभाग करके श्रौतयज्ञ की आवश्यकता के अनुसार चार वेदों में सम्पादित किया, इसलिए वे 'वेदव्यास' कहलाते हैं। पुराणों के द्वारा वेद का उपबृंहण या व्याख्यात्मक विस्तार करने का कारण उन्हें व्यास कहा गया। वे 18 पुराणों और श्रीमद्‌भगवद्‌गीता के सहित महाभारत, ब्रहम्सूत्र (जो भारतीय दर्शन की वेदान्त धारा के सीमान्त प्रस्थानों का शाश्वत स्त्रोत है) और पतंजलि कृत सूत्रों पर व्यासभाष्य के भी प्रणेता माने जाते है।  वेदों के परमार्थ को, जो उपनिषदों में प्रतिष्ठित है, सूत्रबद्ध कर 'ब्रह्मसूत्र' की रचना करके उन्होंने भारतीय दार्शनिक चिन्तन का आधार प्रस्तुत कर दिया, जिसकी शताब्दियों तक विभिन्न दार्शनिक प्रस्थान अपनी-अपनी तरह से व्याख्या करते रहे। 'व्यास-स्मृति' के प्रणेता के रूप में वे स्मृतिकार हैं। उनका सच्चे अर्थों में चमत्कारिक व्यक्तित्व है।

        महाभारत ऐसा धार्मिक ग्र्न्थ है कि जिसमें सब प्रकार के मनुष्य अपने जीवन को सुधारने के लिए सामग्री प्राप्त कर सकते है। राजनीति का तो वह सर्वस्व ही है। राजा और प्रजा के अलग-अलग कर्तव्यों तथा अधिकारों का समुचित वर्णन महाभारत की बहुत बड़ी विशेषता हैं।
      महाभारत ग्रन्थ के मध्य में विराजमान श्रीमद्‌भगवद्‌गीता में कर्म, ज्ञान और भक्ति का जैसा सुन्दर समन्वय किया गया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। आज संसार का मानव यदि केवल गीता के उपदेच्चों को सही ढंग से आत्मसात्‌ कर ले, तो अनेक समस्याओं का समाधान स्वतः हो जायेगा। व्यासजी कर्मवादी आचार्य हैं। कर्म ही मनुष्य का पक्का लक्षण है। कर्म से पराड्‌मुख मानव, मानव की पदवी से सदा वंचित रहता है। इसलिए उन्होंने अपना संदेश मनुष्यों के लिए देते हुए कहा है कि ''यदि मनुष्य सच का अभिलाषी है तो उसका श्रेष्ठ कर्त्तव्य धर्म का सेवन ही है।
      अतएव यह भव्य भारत वर्ष कर्मभूमि है। इस विशाल ब्रह्माण्ड में मनुष्य ही सबसे श्रेष्ठ प्राणी है, जिसके कल्याण के लिए विविध पदार्थों की सृष्ट होती है तथा समाज की व्यवस्था की जाती है।
      व्यासजी की राष्ट्रभावना बड़ी उदात्त है, उनका मानना है कि राजा ही राष्ट्र का केन्द्र होता है और वह प्रजा का सब प्रकार से हितचिन्तक, मंगलसाधक तथा संरक्षक होता है। धर्म की व्यवस्था तथा संचालन का दायित्व राजा के ही ऊपर एकमात्र रहता है। यदि राजा प्रजा का पालन न करें, तो प्रजा ही एक दूसरे को विनाश कर देगी। वेद-व्यास का योगदान भारतीय संस्कृति के विकास में इतना महत्वपूर्ण था कि हमारे पूर्वजों ने उन्हें भगवान के विशेषण से अलंकृत किया है। उन्होंने अपने जीवन में श्रुति परम्परा से प्राप्त अपौरूद्गोय वेदों का ऋक, यजु, साम, अथर्व इन चार में विभाजन किया। 18 पुराणों की रचना की जिनके माध्यम से आज हम  सबको अपनी संस्कृति और इतिहास के विभिन्न पक्षों की जानकारी होती है। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ श्रीमद्‌ भागवत पुराण तथा महाभारत की रचना की। यह प्रसिद्ध है कि श्री महाभारत को लेखनीबद्ध करने के लिए स्वयं श्री गणेश जी आये थे और यह शर्त रखी थी कि व्यास को एक श्लोक के बाद दूसरे श्लोक को सोचने के लिए समय नहीं दिया जायेगा, जहां सोचने के लिए रूके वहीं लेखन बन्द हो जायेगा। श्री व्यास ने एक लाख श्लोकों की रचना की बिना रूके हुए और आज महाभारत उसी स्वरूप हमारे सामने मौजूद है।
     महाभारत ऐसा धार्मिक ग्रन्थ है कि जिसमें सब प्रकार के मनुष्य अपने जीवन को सुधारने के लिए सामग्री प्राप्त कर सकते है। राजनीति का तो वह सर्वस्व ही है। राजा और प्रजा के अलग-अलग कर्त्तव्यों तथा अधिकारों का समुचित वर्णन महाभारत की बहुत बड़ी विशेषता है। महर्षि व्यास जी ने महाभारत में भारत की अर्थनीति, राजनीति तथा अध्यात्मशास्त्र के सिद्धान्तों का सारांश इतनी सुन्दरता से प्रतुस्त किया है, कि यह ग्रन्थरत्न वास्तव में भारत के धर्म एवं तत्वज्ञान का विश्वकोष है।
          महाभारत ग्रन्थ के मध्य में विराजमान श्रीमद्‌भमवद्‌गीता में कर्म, ज्ञान और भक्ति का जैसा सुन्दर समन्वय किया गया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। आज संसार का मानव यदि केवल गीता के उपदेशों को सही ढंग से आत्मसात्‌ कर ले, तो अनेक समस्याओं का समाधान स्वतः हो जायेगा।

      महर्षि व्यासजी ने महाभारत में भारत की अर्थनीति, राजनीति तथा अध्यात्मशास्त्र के सिद्धान्तों का सारांश इतनी सुन्दरता से प्रस्तुत किया है, कि यह ग्रन्थरत्न वास्तव में भारत के धर्म एवं तत्वज्ञान का विश्वकोष है। वस्तुतः महर्षि व्यासजी ने महाभारत लिखकर केवल युद्धों का वर्णन नहीं किया हैं, बल्कि उनका अभिप्राय था, इस भौतिक जीवन की निःसारता दिखलाकर मानवों को मोक्ष के लिए जागरूक एवं उत्सुक करना।
      भारतीय संस्कृति का प्राण धर्म ही है, जिसकी उपेक्षा आज हो रही है। उनका स्पष्ट मत है कि अधर्म से देश का नाश होता है और धर्म से राष्ट्र का अभ्युत्थान होता है। वे कहते हैं, कि धर्म का परित्याग किसी भी स्थिति में, भय से या लोभ से, कभी नहीं करना चाहिए।
      व्यास जी कर्मवादी आचार्य हैं। कर्म ही मनुष्य का पक्का लक्षण है। कर्म से पराङ्‌मुख मानव मानव की पदवी से सदा वंचित रहता है। इसलिए उन्होंने अपना सन्देश मनुष्यों के लिए देते हुए कहा है कि 'यदि मनुष्य सश का अभिलाषी है तो उसका श्रेष्ठ कर्त्तव्य धर्म का सेवन ही है।
      अतएव यह भव्य भारत वर्ष कर्मभूमि है। इस विशाल ब्रह्याण्ड में मनुष्य ही सबसे श्रेष्ठ वस्तु है, जिसके कल्याण के लिए विविध पदार्थों की सृष्टि होती है तथा समाज की व्यवस्था की जाती है।
      व्यास जी की राष्ट्रभावना बड़ी उदात्त है, उनका मानना है कि राजा ही राष्ट्र का केन्द्र होता है और वह प्रजा का सब प्रकार से हितचिन्तक, मंगलसाधक तथा संरक्षक होता है। धर्म की व्यवस्था तथा संचालन का दायित्व राजा के ही ऊपर एकमात्र रहता है। यदि राजा प्रजा का पालन न करे, तो प्रजा ही एक दूसरे को खा नहीं डालेगी।

अखिल भारतीय व्यास महोत्सव

                    शोध छात्र संगोष्ठी-
·        अखिल भारतीय व्यास महोत्सव के शोध छात्र संगोष्ठी में भारत के विश्वविद्यालयों से कोई भी छात्र भाग ले सकता है।
·        इस संगोष्ठी में भाषा एवं ज्ञान के क्षेत्र का काई बंधन नहीं हैं।
·        प्रतियोगिता का विषय सर्वग्राही एवं सर्वस्पर्च्ची रखी गई है, ताकि ज्ञान के समस्त क्षेत्र के शोधार्थी इसमें भाग ले सकें।
·        प्रतिवर्ष की भॉंति इस वर्ष भी एक सुनिश्चित इतिहास के कालखण्ड में रचित/सम्पादित/उद्‌भूत/प्रकट, ज्ञान के क्षेत्र पर व्यास साहित्य के प्रभाव को खोजना है।
·        रचित गवेषणा पत्र (शोध पत्र) तैयार करने के पूर्व गवेषक के लिए अति आवच्च्यक है कि वह व्यास रचित साहित्य के बारे में सम्यक्‌ जानकारी प्राप्त कर ले।
·        व्यास को महर्षि व्यास, वेद व्यास, कृष्णद्वैपायन आदि अनेक नामों से अभिहित किया गया है।
1-  व्यास वाड्‌मय को पॉच भागों में प्रविभक्त किया जाता है।
2-  वेद एवं उसकी शाखाएं
3-  दर्शन (ब्रह्‌मसूत्र, उपनिषद्‌, गीता)
4-  पुराण
5-  इतिहास (महाभारत)
·        धर्मशास्त्र (विष्णुस्मृति)
·        भारतीय धर्मशाखाओं का उत्स ब्रह्‌मसूत्र है। इससे अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत आदि अनेक सिद्धान्तों का प्रादुर्भाव हुआ। आचार्य शंकर से लेकर अब तक अनेक धर्मशाखाओं एवं तत्सम्बद्ध साहित्य का सृजन होता आ रहा है।
·        आचार्य शंकर के प्रादुर्भाव के पश्चात्‌ रचित अनेक भारतीय साहित्य का स्त्रोत व्यास का वाड्‌मय है। यथा- हिन्दी साहित्य में जयशंकर प्रसाद का कामायनी
·        पुराणों में वेदों द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों की उपकल्पना तथा कथानकों द्वारा विस्तार प्रदान किया गया। परवर्ती भारतीय भारतीय साहित्य पर एवं जीवन पद्धति को लक्ष्य कर रचित रचनाओं पर व्यास का प्रभाव अक्षुण्ण रहा।
·        पुराण में वर्णित कथाओं से अनेक लोक कथाओं, लोक गायन द्रौलियों, शिल्पों का प्रादुर्भाव हुआ। भारत ही नहीं एशिया महाद्वीप के प्रत्येक काल खण्ड में इसका प्रभाव पड़ा है।
     कहा जाता हैं यन्न भारते तन्न भारते। जो महाभारत में नहीं, वह भारत में नहीं। भारत में जो कुछ ज्ञात है, उसका किसी न किसी रूप में महाभारत में वर्णन जरूर प्राप्त हैं। जो महाभारत में नहीं है वह भारतीय नहीं। यह समस्त ज्ञान राशि का आकर ग्रन्थ है।
·        राजनैतिक सिद्धान्त (विदुर, शुक्र आदि नीति) का यह उद्गम स्थल है। रामायण एवं महाभारत को परवर्ती साहित्य का उद्गम स्थल माना गया है।
·        व्यास ने युगानुकुल विष्णु स्मृति की रचना कर पूर्ववर्ती स्मृतियों (विधिसंहिता) में नया आयाम स्थापित किया।
·        स्म्‌तियॉं में आचार दण्ड का वर्णन प्राप्त होता है। यह भारतीय विधिशास्त्र है, जिससे प्रजा शासित होती थी।
·        उपर्युक्त विषयों पर महर्षि व्यास के अवदान को सम्मुख रखकर (मुगलकालीन) प्रदत्त कालखण्ड में उद्‌भुत ज्ञान के समस्त क्षेत्र, किस रूप में किस अंच्च तक प्रभावित हुआ को सिद्ध करना है।
 उपर्युक्त से सुस्पष्ट है कि शोध विषय अत्यन्त व्यापक हैं तथा सभी क्षेत्र के छात्र इसमें भाग ले सकते हैं।
 
 
·        चित्रकला प्रतियोगिता-
·        निर्धारित विषय का वर्णन व्यास सहित्य में प्राप्त होता है।
  उपर्युक्त साहित्य तथा उससे प्रभावित रचनाओं में प्रदत्त विषय को जिस  रूप एवं    भाव में चित्रित किया गया, उसे फलक पर उकेरना है।