बुधवार, 4 दिसंबर 2013

मुगल सम्राट् अकबर और संस्कृत

            अकबर का संस्कृत-प्रेम और संस्कृत-वाङ्मय को इस मुग़ल सम्राट् का विशिष्ट योगदान बहुत संदर्भों में आश्चर्यचकित कर देने वाला है। मध्यकालीन इतिहास से परिचित और प्राच्य विद्या में रुचि रखने वाले व्यक्तियों को तो नहीं लेकिन इनसे अपरिचित और अल्पपरिचित व्यक्तियों को तो यकायक इस तथ्य पर यकीन ही नहीं होगा कि अकबर के आदेश, निर्देश या उसकी रुचि को महत्ता देते हुए समकालीन संस्कृत-पण्डितों, जैन आचार्यों तथा विविध दरबारी संस्कृत-सेवियों ने इतनी संख्या में संस्कृत-ग्रन्थों की भी रचना की।

         अकबरी दरबार में प्रणीत इन संस्कृत ग्रन्थों की इदमित्त्थं संख्या अभी न तो ज्ञात है और न ही बताई जा सकती है। सौभाग्य से इनमें अधिकांश ग्रन्थों का प्रकाशन हो चुका है लेकिन दुर्भाग्य यह भी यह है कि प्रकाशित संस्करण अप्रकाशित के समान ही दुर्लभ एवं विरल हैं।
              गुप्त-साम्राज्य, अन्तिम मौखरी-सम्राट् और इसके बाद के ज्ञात भारतीय इतिहास में परमार भोज के बाद लगभग छः सौ वर्षों बाद संस्कृत-साहित्य का स्वर्ण-युग पुनः एक बार मुग़ल-साम्राज्य और मुग़ल-सम्राट् अकबर के राजत्व में ही परिलक्षित होता है। इसे भी संयोग ही कहा जा सकता है कि गुप्त-सम्राटों, हर्षर्द्धन शीलादित्य और स्वयं भोजराज के विपरीत अकबर निरक्षर था लेकिन साहित्य, संगीत और कला को उपर्युक्त हिन्दू सम्राटों के किसी भी प्रकार के दाय से अकबर का योगदान कम नहीं आँका जा सकता। यूं विदेशी और अन्यद्धर्मी होने के बावजूद संस्कृत भाषा, वाङ्मय, साहित्य और इसके सेवियों को जो उदार संरक्षण और समृद्धि के प्रभूत साधन इस सम्राट् ने उपलब्ध कराए; इसके सापेक्ष इन हिन्दू साम्राज्यों और सम्राटों के समानान्तर होते हुए भी अकबर अपने आप में विशिष्ट हो जाता है।
                भारतीय संगीत और कला (चित्र एवं वास्तु) के संदर्भों में अकबर और उसके प्रदेय रूपायित भी हो चुके हैं और व्याख्यायित भी। संस्कृत वाङ्मय के इतिहास ने आज तक अपने संरक्षण या संवर्धन में इस सम्राट् के योगदान को व्यवस्थित रूप से रेखांकित नहीं किया है। अकबरी दरबार द्वारा संरक्षित संस्कृत-पण्डितों पर समकालीन साक्ष्यों में बहुत ही बारीक सूचनाएं उपलब्ध हैं जिनके समानान्तर अन्य समकालीन किन्तु बिखरी हुई सूचनाओं तथा परवर्ती उद्धरणों के सापेक्ष उनकी कृतियों के गंभीर विश्लेषण से मुग़ल-सम्राट् एवं साम्राज्य के द्वारा संस्कृत वाङ्मय के संरक्षण, संवर्धन एवं योगदान का व्यवस्थित आकलन प्रस्तुत किया जा सकता है।

मूल स्रोत- 
मुगल सम्राट् अकबर और संस्कृत                     

बुधवार, 27 नवंबर 2013

मेरी आवृत्ति

           जब मैं छोटा था। प्रथमा और मध्यमा में प्रातः उठकर पठित पाठयाद किये गये श्लोकों एवं सूत्रों की आवृत्ति करता था। प्रातः 7 से 9 के बीच आवृत्ति का समय सुनिश्चित होता था। अब जब मैं सेवा क्षेत्र में आ गया। एक पुस्तकालय के प्रबन्धन एवं संचालन का दायित्व मुझे सौपा गया था। यूं कहें सरकार के साथ 58 वर्ष तक की आयु तक के लिऐ वेतन के एवज में अनुबंध किया। तब से मेरे आवृत्ति की दिशा बदलने लगी। कभी निर्माण से सम्बन्धित कार्यो की आवृत्ति (मानसिक आवृति वाचिक नहीं) ऋण अदायगी की आवृत्ति आदि। धीरे-धीरे आवृत्तिक विषयों की संख्या में वृद्धि होती चली गयी। वाचिक आवृत्ति का स्थान मानसिक आवृत्ति ने ली। यह आवृत्ति सोते जागतेचलते-फिरतेलोगो से बातचीत करते या यूं कहें चतुर्दिक आवृत्ति होने लगी। घर से कार्यालयकार्यालय से घर हर जगह  संस्कृत के उन्नयन प्रचार-प्रसार की भावी योजना इसके स्वरूप और प्रभाव कार्यक्षेत्र सहित तमाम उपायों पर मानसिक आवृत्ति होती गयी।
                ऐसा होना स्वाभाविक एवं लाजमी था। बचपन से मैं जिन संस्कारों और वातावरण के साथ पला बढ़ा, उसमें संस्कृत के संरक्षण एवं संवर्धन की पीड़ा भरी गयी। मेरा जगत् संस्कृत जगत् था। मेरे परिचितशुभाकांक्षी भी संस्कृतज्ञ ही थे। इक्का दुक्का इधर-उधर के लोग।
               कभी संस्कृत छात्रों की कठिनाइयों को देखकर ‘निर्धन छात्र कोष‘ का निर्माण किया। एक बार तो मैं विमल फाउण्डेशन नामक संस्था का विधिवत् भव्य आयोजन कर आधारशिला भी रखी। संस्कृत छात्रों के लिये छात्रवृत्ति योजना लेकर आया। परन्तु अब एक संस्कृत के प्रचारक संस्था से जुड़ गया हूं। कई संस्थाओं के साथ कार्य करने का सुअवसर प्राप्त हो रहा है।
                सेवा क्षेत्र में आने पर पुस्तकालय के अतिरिक्त भी कई दायित्व का जिम्मा भी मुझे दे दिया गया। मैं अपनी पृष्ठभूमि पूर्व में आपको बता ही चुका हूं।  संस्कृत के क्षेत्र में कार्यानुभव के कारण इसके विकास एवं प्रचार की एक सुनिश्चित योजना एवं धारणा मेरे मन में पुष्ट हो चुका है। इन सब के साथ एक झाम फंस गया सरकारी तंत्र का। इसकी अपनी रीति-नीति एवं नियंता होते हैं।
           बात की जाय व्यास महोत्सव की तो इसकी पैदाइश सन् 2007 में हुआ। सम्भावित लक्ष्य व्यास की कृतियों का संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार था। योजना का स्वरूप शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों द्वारा व्यास साहित्य को जन-जन तक पहुँचाना। व्यास की कृतियां वेदवेदान्तपुराणधर्मशास्त्र एवं महाभारत पर विद्वानों की संगोष्ठी एवं गीता कण्ठस्थ पाठछन्दोगान (पुराणों पर आधारित) शोध छात्र संगोष्ठीचित्रकला प्रतियोगिता द्वारा महर्षि व्यास की कृतियों एवं संदेशों को पहुंचाना। आम जन तक या आम जन के लिए मनोरंजन का सशक्त माध्यम सांस्कृतिक कार्यक्रम (गीतानृत्यनाटक) का आयोजन। सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आधारपृष्ठभूमि महर्षि व्यास रचित वाड्मय रखा गया।
         मैंने भी पुरजोर कोशिश किया। प्रचार-प्रसार के समस्त सम्भावनाओं को खंगाला। इसे कार्य रूप देने के लिए रात दिन एक कर दिया। व्यास महोत्सव का बेबसाइट बनबाया। महोत्सव की दृष्टि से इसमें तमाम तकनीकि वारीकी को पिरोया, ताकि देश-विदेश के पर्यटक इस अवसर पर आ सकें। दिन रात महोत्सव के बारे में सोचना और उसे किसी भी तरह पूर्ण करना मेरी आदत सी हो गयी। वैसे भी मैं जो कुछ भी करता हूँ पूरी निष्ठा और लगन के साथ। पर्दे के पीछे से ही सही उसके लिए दीर्घकालीन नीति बनाना तथा परिणाम पर पैनी नजर रखना मेरी आदत है। 
           महोत्सव चल निकला। देश के दिग्गज एक मंच पर आने लगे। जोर शोर से महोत्सव को भव्य रूप दिया गया था। यहां एक भूल हो गयी। पथ-प्रदर्शन की भूमिका में विद्वद्जन तो थे परन्तु परिणाम की ओर उन्मुख करने वाला नेतृत्व सम्मुख नहीं था। जिसे नेतृत्व दिया गया वह अनिश्चित एवं रूचिमान नहीं हुआ। यहीं से महोत्सव में समस्याओं एवं विडम्बनाओं का दौर शुरू हुआ। अब हम इसकी पड़ताल शुरू करते हैं। शुरू के महोत्सव में लक्ष्य व्यास साहित्य के अवदान से विश्व जन मानस को परिचित करना था। इसके लिए विद्वान और छात्र तो थे। (यहाँ एक विशेष ध्यातव्य है कि व्यास की पूरी रचना संस्कृत भाषा में है व्यास पर चर्चा होते ही संस्कृत भी चर्चा शुरू हो जाती है। व्यास ने संस्कृत के विकास की परिकल्पना  स्वतः स्फुट है। अन्यथा तो हिन्दी सहित तमाम भाषाओं में रचित साहित्यकला संस्कृति के ग्रन्थों पर व्यास का अमिट छाप है ही।)
                बात हो रही थी व्यास महोत्सव के बारे में मेरी आवृत्ति की, जिसे मैं व्यास महोत्सव सम्भावना एवं तथ्य नाम से एक अलग पुस्तक लिख चुका हूं। व्यास के अवदान को प्रचारित करने के लिए संस्कृत के विद्वानों एवं छात्रों का विशाल समूह है ही परन्तु प्रचार-सामग्री में सोच-सोचकर ऐसे थीम की सर्जना करायी जिसे पूरा कथ्य स्पष्ट हो जाय। आज समस्त प्रचार सामग्री पर वही थीम प्रिंट की जाती है। बन्धुओं मैंने आज तक न तो संस्कृत के नाम पर माला पहनी न शाल ओढ़ा। न ही बतौर भाषण कर्ता मंच पर विराजित हुआ। आधार मजबूत करने वाले का फोटो कभी दिखाई नहीं देता क्योंकि फोटो खिचाने या नामोल्लेख की अभिलाषा से वहां डटे नहीं रहता। यह तो रूचि एवं स्वभाव से जुड़ा मामला हैं।
                कुछ वर्ष वेद पाठ भी हुए। विज़न आया। पेपर में न्यूज आये, परन्तु मेरा मन इनसे संतुष्ट नहीं हुआ। मैं चाहता रहा कि संस्कृत से जुड़े हर व्यक्ति तक व्यास महोत्सव की सूचना पहुंचे। उनके लिए भी एक कार्यक्रम हो जिसे कर वे उल्लसित हो सकें। मैं इसे एक लोक महोत्सव को रूप में देखना चाहता था। सांस्कृतिक कार्यक्रम को हाल से निकालकर खुले स्थान अस्सी घाट पर लाया। अस्सी घाट पर लाने के लिए विधिवत् कार्य योजना बनायी और उसे मूर्त रूप देने में सफल रहा।
                आप सोच रहे होंगे। मैंने सोचा और हो गया। ऐसा करना वाकई कठिन था। मैं निर्णय लेने की भूमिका में नहीं हूं। सिर्फ सोच सकता हूं। निर्दिष्ट कार्य को अमल में ला सकता हूं। परन्तु निर्णय लेने वाले लोग इस तरह निर्णय लें इसकी योजना तो बनानी ही पड़ती है फिर उसे वे व्यवहारिक व समयोचित समझ उसे मूर्त रूप देने में आनाकानी भी न करें। धन व्यवस्था भी तो जरूरी हैं। सबकुछ साफ एवं तैयार होलोग मान जायें ऐसी जगह श्रम की आवश्यकता होती है।  भारत में जो कार्य करते है, जिन्हें कार्यानुभव है, जो निश्छल भाव से कार्य को गति देना चाहते हैं, वें निर्णय नहीं लेते है और जो निर्णय लेते हैं, वे कार्य नहीं करते।
                अब प्रचार सामग्री में विविधता आयी। अधिक लोग व्यास महोत्सव को जानने लगे। पुस्तक मेलाव्यास कथा सहित कई अस्सी घाट पर तो व्यास महोत्सव का सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हो गया। जनसमूह जुड़े साथ में ढेर सारे विदेशी मेहमान भीपरन्तु स्टेज निर्माण में बहुत धन व्यय होने लगा। महोत्सव का लक्ष्य ‘संस्कृत संवर्धन‘ गुम होने लगा। प्रारम्भ काल में संस्कृत नाटक आयोजित किये जाते थे। वह अंत में आकर लुप्त हो गया। संस्कृति विभाग अपने बजट में मंच निर्माण से कलाकारों के रूकने, भोजन, आवास, मार्गव्यय एवं मानदेय देने तक की स्थिति में नही रहा। पहले मात्र घंटे दो घंटे के कार्यक्रम होते थे बाद में कलाकारां और कार्यक्रमों की संख्या बढने लगी। यहां संस्कृत या संस्कृत नहीं थाथा तो सिर्फ कला। केन्द्रीय सहायता बंद हो गयी। कई संस्थाओं द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम बंद होते गये। कार्यक्रमों की संख्या यथा पुस्तक मेलाव्यास कथा आदि जोड दिये गये। अंततः संयोजक संस्था उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान अपने बजट को अल्प पाते हुए सिर्फ शैक्षणिक कार्यक्रमों तक अपने को सीमित रखना उचित समझा क्योंकि इसके पास कोई और पुरूषार्थी व्यक्ति न होने से इसे घीरे-धीरे सीमित करता गया। 20 विद्वानों के स्थान पर 10 विद्वान संगोष्ठी में आने हेतु निमंत्रित किये गये।
                सबसे बड़ी समस्या दृढ इच्छा शक्ति वाले शक्तिमान व्यक्ति का अभाव पैदा हुआ। हर एक इसमें अपनी इच्छा शक्ति का स्त्रोत खोजना शुरू किया। जिसे जहाँ मौका मिला संस्कृतहित को दरकिनार कर व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति के उपाय खोजने में अपना श्रम व समय लगाया। वैसे भी संस्कृत क्षेत्र में पुजापा की आनादिकालीन परम्परा है। कुछ नया करने की चाहत सीखने सिखाने की परम्परा नहीं है।
                जिस महोत्सव की कार्ययोजना 6 माह पूर्व निर्मित किया जाना चाहिए उसे सप्रयास विलम्बित रखा जाने लगा। यहाँ तक की विद्वानों, छात्रों के पास आमंत्रण व सूचना अमूमन तीन माह पूर्व जाती हैताकि ट्रेनों में आरक्षण करा सके परन्तु इसे इतना विलम्ब से शुरू ही किया जाता है कि लोग आ ही नहीं पाते।
                संस्कृत जगत में परमुंडे फलहार तो सदियों से चली आ रही परम्परा है। आमदनी कितनी भी अधिक हो परन्तु सामाजिक कार्यों हेतु उनके पास सर्वदा धनाभाव ही रहता है। उचित मंच एवं अवसर के रहते हुए भी संस्कृतज्ञ अपनी एकजुटता नहीं दिखा पाते। उत्तर प्रदेश में तो कोई भी ऐसा मंच नहीं होता हैजहां से संस्कृतज्ञ यह संदेश दे सके कि मेरा भी एक समूह है जिसकी अनदेखी करना किसी के लिए असंभव हो। अत एव उपेक्षित संस्कृतज्ञ होते रहते हैं। सामाजिक अनादर को प्राप्त होते हैं। समाज इस विद्या को अपनाने में आनाकानी करने लगा। अस्तु संस्कृतज्ञ द्वारा उपार्जित धन असंस्कृतज्ञों का जेब खर्च होता ही है।
                 बात चली थी मेरी आवृत्ति और व्यास महोत्सव पर मेरी आवृत्ति की। मैं हमेशा चाहता रहता हूं कुछ ऐसा कार्य इसमें हो इसमें होजिससे कुछ अधिकाधिक लोग इससे जुडते़ जाये कारवां बढ़ता जाय। छात्रों को प्रोत्साहन मिले। गीता पढ़ने वाले छात्रों सहित अन्य प्रतियोगिता पुरस्कार धनराशि बढ़ाने में सफलता मिली।
 हजारों विद्वज्जनों को भी शोधपत्र वाचन का सुअवसर प्राप्त हो एतदर्थ द्वार खुलवाने में सफल रहा। वस्तुतः जो ऊचें पायदान को प्राप्त हैप्रतिष्ठित हैजिन्होंने ऊंचे ओहदे को प्राप्त कर मुकाम पा लिये उनके सिर्फ और सिर्फ आशीर्वाद की ही आवश्यकता है। जरूरी है कि उन लोगों को उच्चीकृत एवं प्रतिष्ठित किया जाय, जो संघर्षरत हैं।
          मुझे कई लोग कहते है, ऊंचे उठाउंगा। मैं विनम्रता पूर्वक कहता हूं। मैं उठना नहीं, उठाना चाहता हूंजिस दिन मैं इस दौर में शमिल हो जाऊॅ तो संस्कृत पीछे रह जाएगा। संस्कृत के शव पर पांव रख व्यक्तिगत उन्नति की कोई अभिलाषा नहीं। व्यक्तिगत स्वर्ग की कामना सामूहिक नर्क की सृष्टि करता है। यहां तो होड़ है ही। आ हम तुम्हें माला पहनाऊॅ तू मुझे पहना।
          मैं संस्कृतज्ञों में मठाधीशी स्वंय ब्रह्म भाव देखकर अंचभित हूं। भला जो विद्या निरंतर लोक अनादर की ओर प्रगति पथ पर हो, उसकी रोटी खाने वाले प्रहरी की भूमिका में क्यों नहीं आते। मैंने गुरूजनों में आश्चर्यजनक साक्षी भाव देखी है। ट्रेन का किराया मानदेय न मिला तो संगोष्ठी में नहीं जाना। क्या विद्वज्जन इतने प्रोफेशनल हो गयेसंस्कृत का बाजार इतना गर्म हो गया कि हर जगह पैसे की अहमियत आ गयी। क्या विद्वान् रूपये के लिये ही गोष्ठी में जाते हैं। ज्ञान बांटना अपना एक प्रशंसक वर्ग तैयार करना उनके कार्यक्रमों में शमिल ही नहीं हैं।

          व्यास महोत्सव की अवधारणा क्या थी। इसके द्वारा कौन सा लक्ष्य अर्जित करना था ? कितनी सफलता मिली ? वे कौन है जिनके लिए यह आयोजन शुरू हुआ ? इन प्रशनों का ही मन में अनेक उत्तर पाते रहता हूं। उसमें एक उत्तर आप भी जान लें। उच्च पदों पर विराजित चुनिंदा लोगो के लिए आयोजित यह महोत्सव उनकी मनोभिलाषा की पूर्ति का एक माध्यम थाजिसमें श्रोता तो नहीं रहे नहीं थे तो दसेक वक्ता।

बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

अखिल भारतीय महर्षि व्यास महोत्सव रिपोर्ट 2011

   उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ द्वारा आयोजित पंच दिवसीय अखिल भारतीय व्यास महोत्सव-2011 का  आयोजन मोक्षदा एकादशी गीता जयन्ती दिनांक 06 दिसम्बर 2011 से दिनांक 10 दिसम्बर 2011 तक वाराणसी में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ तथा अस्सी घाट पर आयोजित किया गया।
 इस आयोजन में विभिन्न शैक्षिक संगोष्ठियों, विद्वद गोष्ठियों, छात्र प्रतियोगिताओं तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। पंच दिवसीय अखिल भारतीय व्यास महोत्सव के इस भव्य समारोह में निम्न कार्यक्रम आयोजित किये गये। सम्पूर्ण कार्यक्रम का विवरण आपके समक्ष प्रस्तुत है-

      व्यास पूजन समारोह         

           अखिल भारतीय महर्षि व्यास महोत्सव की पूर्वसंध्या दिनांक 05 दिसम्बर को अपराहण 4.00 बजे से  व्यास मंदिर, चांदी तारा, साहूपुरी, जिला चन्दौली में व्यास पूजन का आयोजन कर समारोह का शुभारभ किया गया, व्यास पूजन समारोह में वाराणसी मण्डलायुक्त, श्री अजय कुमार उपाध्याय, चंदौली के जिलाधिकारी श्री विजय कुमार त्रिपाठी, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के वेद विभागाध्यक्ष प्रो0 युगल किशोर मिश्र, व्यास महोत्सव की नोडल अधिकारी प्रो0 मंजुला चतुर्वेदी, क्षेत्रीय सांस्कृतिक अधिकारी डा0 लवकुश द्विवेदी, 0प्र0 संस्कृत संस्थान के निदेशक श्री सत्येन्द्र सिंह तथा संस्थान कर्मचारियों के साथ अन्य गणमान्य विद्वानों ने उपसिथत होकर व्यास पूजन सम्पन्न किया। साथ ही मंदिर परिसर में आयोजित भजन संध्या में सुश्री मंगला विश्वकर्मा, वाराणसी द्वारा भजन प्रस्तुत किये गये और समस्त जनता में प्रसाद वितरण किया गया।

उदघाटन समारोह 

दिनांक 06 दिसम्बर 2011 को अस्सी घाट पर व्यास महोत्सव के उदघाटन समारोह का शुभारम्भ सायं 5.00 बजे से मुख्य अतिथि श्री सुभाष पाण्डेय, माननीय संस्कृति मंत्री जी उत्तर प्रदेश शासन द्वारा दीपप्रज्वलित कर किया गया। उदघाटन समारोह में श्री श्री 1008 श्री शीतलानन्द नाथ जी महाराज पीठाधीश्वर श्री ललिताश्रम, कानपुर, मण्डलायुक्त श्री अजय कुमार उपाध्याय, वाराणसी के जिलाधिकारी श्री रविन्द्र एवं उ0प्र0 संस्कृत संस्थान के निदेशक श्री सत्येन्द्र सिंह तथा प्रो0 कमलेश दत्त त्रिपाठी, समन्वयक इनि्दरा गाधी कला केन्द्र, वाराणसी, प्रो0 युगल किशोर मिश्र, वेद विभागाध्यक्ष, सं0 सं0 वि0वि0,वाराणसी उपसिथत थे। संस्थान के निदेशक श्री सत्येन्द्र सिंह द्वारा अतिथियों को पुष्प गुच्छ, अंग वस्त्र तथा स्मृति चिन्ह प्रदान कर स्वागत किया, तथा महोत्सव की संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत की गयी। संस्थान की अध्यक्ष डा0 रेखा बाजपेर्इ द्वारा स्वागत उदबोधन कर अतिथियों का वाचिक स्वागत किया गया। आयोजन के सम्बन्ध में बीज वक्तव्य प्रो0 कमलेश दत्त त्रिपाठी जी द्वारा किया गया। श्री श्री 108 श्री शीतलानन्द नाथ जी महाराज कान्यकुब्ज पीठाधीश्वर श्री ललिताश्रम, कानपुर द्वारा मंगलाशीष किया गया। मुख्य अतिथि श्री सुभाष पाण्डेय, मा0 संस्कृति मंत्री जी द्वारा भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र, मुंगरा बादशाहपुर की ओर से महर्षि वेद व्यास पीठ की स्थापना हेतु रूपये 2.00 लाख का चेक मण्डलयायुक्त, वाराणसी को भेंट दिया गया। उदघाटन समारोह के अन्त में श्री अजय कुमार उपाध्याय, मण्डलायुक्त, वाराणसी मण्डल द्वारा आभार प्रकट किया गया।

                सांस्कृतिक कार्यक्रम का शुभारम्भ रात्रि 6.35 बजे हुआ जिसमें शहनार्इ वादन श्री मुमताज हुसैन, वाराणसी, गीत गोविन्दम नृत्य वाटिका श्री आलोक पाण्डेय, वाराणसी, भजन श्री सुशील बावेजा, धनबाद द्वारा प्रस्तुत अस्सी घाट, वाराणसी पर किया गया।

 वेद की समस्त उपलब्ध शाखाओं के मूर्धन्य विद्वानों द्वारा वेद पाठ

द्वितीय दिवस दिनांक 07 दिसम्बर 2011 को विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन हुआ जिनमें पहले दिन उदघाटन के बाद अस्सी घाट पर वेद की समस्त उपलब्ध शाखाओं के मूर्धन्य विद्वानों द्वारा वेद पाठ (समस्त विकृतियों सहित) जिनमें श्री चिन्तामणि दीक्षित महाड़कर (वाराणसी), श्री मणिकान्त मिश्र (वाराणसी), श्री अनन्तेश्वर मिश्र (वाराणसी), श्री वेद प्रकाश चतुर्वेदी (वाराणसी), श्री रामचन्द्र देव (वाराणसी), श्री निवास लक्ष्मीकान्त पुराणिक (वाराणसी), श्री लक्ष्मीकान्त रामाचार्य पुराणिक (वाराणसी), श्री पाण्डुरंग लक्ष्मीकान्त पुराणिक (वाराणसी), श्री दीपेश कुमार दूबे (वाराणसी), श्री चेतन शर्मा (वाराणसी), श्री अनिरूद्ध पेठकर (वाराणसी), श्री के0वेंकटरमन शर्मा (वाराणसी), श्री महादेव घन पाठी (वाराणसी), श्री गणेश भटट (वाराणसी), श्री रामाघनपाठी (वाराणसी), श्री डि0वि0 राघव घनपाठी (वाराणसी), डा0 राममूर्ति चतुर्वेदी(वाराणसी), पं0 ओम प्रकाश मिश्र (वाराणसी), डा0 नीरज कुमार पाण्डेय (वाराणसी), श्री टेकनारायण उपाध्याय (वाराणसी), श्री प्रवीण कुमार पाण्डेय (वाराणसी), श्री विवके चन्द्र झा (वाराणसी), डा0 नारायण उपाध्याय (वाराणसी), श्री भाखचन्द्र विनायक बादल (वाराणसी), श्री वे0मू0 विनायक मंगलेचरण बादल (वाराणसी), श्री विवके नारायण राव औढेंकर (वाराणसी), श्री पशुपति नाथ मिश्र (वाराणसी), श्री कृष्ण कुमार चौलागार्इ (वाराणसी), श्री दीपक कुमार शर्मा (वाराणसी), श्री मणि कुमार झा (वाराणसी), डा0 शत्रुघन शरण व्यास (वाराणसी), श्री कैलाशचन्द्र दूबे (वाराणसी), श्री उमाशंकर (वाराणसी), श्री अनिल गोपाल घोडे़कर (वाराणसी), डा0 राजेन्द्र पाण्डेय (वाराणसी), श्री चन्द्र किशोर चतुर्वेदी (वाराणसी), डा0 नरंिसंह द्विवेदी (वाराणसी), पं0 काशी नाथ त्रिपाठी (वाराणसी), डा0 रामलला बाजपेर्इ (वाराणसी), श्री लक्ष्मीकान्त बाजपेर्इ (वाराणसी), डा0 गंगाधर मिश्र (वाराणसी), श्री ओम प्रकाश शर्मा (वाराणसी), डा0 चूड़ामणि त्रिवेदी (वाराणसी), श्री शालिग्राम शर्मा (वाराणसी), श्री गगन कुमार चêोपाध्याय (वाराणसी), श्री बालेन्दु नाथ मिश्र (वाराणसी), श्री शिवशंकर शर्मा (वाराणसी), श्री देवदत्त त्रिपाठी (वाराणसी), श्री शरद कुमार नागर (वाराणसी), श्री दिलीप राम नागर (वाराणसी), श्री श्यामसुन्दर तिवारी (वाराणसी), श्री पुण्डलिक कृष्ण भागवत (वाराणसी), श्री श्रवणयों बापट (वाराणसी), पं0 प्रभाकर बापट (वाराणसी), श्री धनंजय (वाराणसी), पं0 श्री विजय कुमार शर्मा (वाराणसी), श्री मनीष कुमार शर्मा (वाराणसी), श्री शम्भु लाल शर्मा (वाराणसी), श्री कृष्ण रामचन्द्र रटाटे (वाराणसी), श्री गोपाल रटाटे (वाराणसी), श्री मिथलेश कुमार पाण्डेय (वाराणसी), श्री ज्योति स्वरूप तिवारी (वाराणसी), श्री जयन्तपति त्रिपाठी (वाराणसी), श्री कृष्ण कुमार शर्मा (वाराणसी), श्री नीरज कुमार शर्मा (वाराणसी), श्री आलोक मिश्र (वाराणसी), श्री सर्वेश रमण तिवारी (वाराणसी) आदि विद्वानों ने भाग लिया। प्रथम सत्र वेद संगोष्ठी-वेदार्थ के सम्प्रेषण में महर्षि व्यास का योगदान पर का आयोजन गांधी अध्ययन पीठ, महात्मा गाधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी में हुआ जिसमें श्री सुकुमार चौधरी, (वाराणसी), प्रो0 ओम प्रकाश पाण्डेय, (लखनऊ), डा0 रेखा शुक्ला, (लखनऊ), डा0 महेन्द्र पाठक (वाराणसी), डा0 शैलेन्द्र नाथ दीक्षित (वाराणसी), डा0 कृष्ण कान्त (वाराणसी), डा0 चन्द्रकान्ता राय (वाराणसी), डा0 विजय कर्ण (लखनऊ), डा0 केशव मिश्र, (वाराणसी), डा0 दीपक (वाराणसी) आदि विद्वानाें ने भाग लिया। पूर्वाहन 1.00 बजे ललित कला विभाग, महात्मा गाधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी में चित्रकला प्रदर्शनी का उदघाटन उ0प्र0 संस्कृत संस्थान की अध्यक्ष डा0 रेखा बाजपेर्इ जी द्वारा किया गया। इस अवसर मा0गा0का0विद्यापीठ के कुलपति प्रो0 पृथ्वीश नाग उपसिथत थे। द्वितीय सत्र में समिति कक्ष, महात्मा गाधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी में वेदान्त संगोष्ठी-वादरायण व्यास एवं वेदान्त प्रस्थान-व्याख्या वैविध्य पर डा0 हरि राम मिश्र (दिल्ली), डा0 धनन्जय पाण्डेय (वाराणसी), डा0 शीतला प्रसाद पाण्डेय (वाराणसी), डा0 भकित पुत्र रोहतम (वाराणसी), प्रो0 गयाराम पाण्डेय (वाराणसी), डा0 रामेश्वर प्रसाद त्रिपाठी (गोरखपुर), प्रो0 उमारानी त्रिपाठी (वाराणसी), प्रो0 राजाराम शुक्ल (वाराणसी), प्रो0 कमलेश झा (वाराणसी) आदि विद्वानों ने भाग लिया। प्रतिदिन अपराहन 5.00 बजे से 6.00 बजे तक व्यास कथा का वाचन प्रो0 इच्छाराम द्विवेदी, अध्यक्ष पुराणेतिहास विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ नर्इ दिल्ली द्वारा अस्सी घाट पर किया गया।
                सायं सांस्कृतिक कार्यक्रम में राष्ट्रीय कथक संस्थान, लखनऊ द्वारा वसुन्धरा नृत्य नाटिका, श्री मेवा सपेरा, जयपुर द्वारा लंगा गायन, कालबेलिया, घूमर चरी एवं भवर्इ लोक नृत्य तथा उपशास्त्रीय गायन श्रीमती ममता शर्मा, वाराणसी द्वारा किया गया।

विद्वदगोष्ठी (पुराणधर्मशास्त्र)

तृतीय दिवस दिनांक 08 दिसम्बर 2011 को विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन हुआ जिनमें विद्वदगोष्ठी (पुराण, धर्मशास्त्र) का आयोजन समिति कक्ष, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी में हुआ। जिसमेें भारतीय शास्त्र परम्परा के सातत्य संरक्षण में अगि्नपुराण की भूमिका  विषय पर प्रो0 दीपित त्रिपाठी (दिल्ली), प्रो0 सत्यप्रकाश सिंह (दिल्ली), प्रो0 मुरलीमनोहर पाठक (गोरखपुर), प्रो0 रमेश चन्द्र पण्डा (वाराणसी), डा0 सरोज कुमार पाढी (वाराणसी), डा0 श्रीकृष्ण त्रिपाठी (वाराणसी), प्रो0 गयाराम पाण्डेय (वाराणसी), प्रो0 उमारानी त्रिपाठी (वाराणसी), डा0 राममूर्ति चतुर्वेदी (वाराणसी), डा0 कृष्णदत्त मिश्र (वाराणसी), श्रीनिवास (वाराणसी), श्री श्यामानन्द मिश्र (वाराणसी), डा0 रामतीर्थ मिश्र (वाराणसी), प्रो0 रमानाथ शर्मा (वाराणसी) ने व्याखान दिया।

 चित्रकला प्रतियोगिता

 शैक्षणिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया जिनमें बाल एवं युवा वर्ग की चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन ललित कला विभाग, महात्मा गाधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी में किया गया। जिनमें विभिन्न विधालयों के लगभग तीन सौं छात्रों ने भाग लिया। जिसमें कनिष्ठ वर्ग- चित्रकला प्रतियोगिता में पारस कुमार (सेन्ट्रल हिन्दू ब्वायज स्कूल, वाराणसी) ने प्रथम तथा पृथ्वी मिश्रा (डब्लू0एच0सिमथ मैमोरियल स्कूल ,वाराणसी) ने द्वितीय व अभिषेक वसाक(सनबीम एकेडेमी ब्वायज स्कूल वाराणसी) ने तृतीय और आशीष आनन्द (सेन्ट्रल हिन्दू ब्वायज स्कूल वाराणसी), अविनाश कुमार उपाध्याय(डी0पी0एस0,बी0एच0यू0), प्रोनिता पाल (डी0पी0एस0 वाराणसी), सुषिमता (सनबीम एकडेमी, सरायनन्दन वाराणसी), अजय कुमार गौंड (सेंट्रल हिन्दू ब्वायज स्कूल वाराणसी) ने सांत्वना पुरस्कार प्राप्त किया। वरिष्ठ वर्ग-चित्रकला प्रतियोगिता में दीपाली देवी (खैरागढ़ विश्वविद्यालय, छत्तीसगढ़) ने प्रथम व अविनेश कुमार मिश्र (म0गां0काशी विद्यापीठ, वाराणसी) ने द्वितीय तथा सुश्री पारूल गोलछा (हमीदिया कालेज भोपाल) ने तृतीय और आशीष रावत (ललित कला विभाग दीनदयाल उपाध्याय कालेज, गोरखपुर विश्वविधालय) , शाहिद कौसर अन्सारी (सन्त लाल इनिसटीटयूट आफ मैनेजमेंट), धीरज यादव (दृश्य कला विभाग, इलाहाबाद विश्वविधलाय), रमेश चन्द्र (आर्इ0एफ00वाराणसी), सदानन्द (वाराणसी काशी विद्यापीठ), ने सांत्वना पुरस्कार प्राप्त किया।
                अपराहन में छन्दोगान प्रतियोगिता का आयोजन प्रेक्षागृह, महात्मा गाधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी में किया गया। जिसमें विभिन्न महाविधालयों के छात्रों ने भाग लिया और मत्स्य पुराण पर आधारित छन्दोगान  का गायन किया। जिसमें वरिष्ठ वर्ग में प्रियंका पाठक-प्रथम, वेद प्रकाश-द्वितीय तथा श्रीयंका ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। तथा कनिष्ठ वर्ग में अर्पिता मिश्रा-प्रथम, भरत हर्डीकर,(राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान)-प्रथम, नूपूर दास-द्वितीय, शिवानी शुक्ला(भगवान दीन आर्य कन्या स्नातकोत्तर महाविधालय)-तृतीय तथा अर्चना व सुरूचि मिश्रा ने सान्त्वना पुरस्कार प्राप्त किया।
                सायं सांस्कृतिक कार्यक्रम में श्रीमती बीना सिंह, इलाहाबाद द्वारा अवधी लोक नृत्य, श्री विशाल कृष्णा एवं साथी, वाराणसी द्वारा रास रंग, श्री गणेश मिश्र, वाराणसी द्वारा उपशास्त्रीय गायन तथा ब्रज लोक संस्कृति एवं सेवा संस्थान, मथुरा द्वारा महारास किया गया।

 महाभारत गोष्ठी

                चतुर्थ दिवस दिनांक 09 दिसम्बर 2011 को विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन हुआ जिनमें विद्वदगोष्ठी का आयोजन समिति कक्ष, महात्मा गाधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी में किया गया। जिसमें महाभारत- भारतीय आख्यान परम्परा में महाभारत की व्यापित विषय पर प्रो0 कमलेश दत्त त्रिपाठी(वाराणसी), प्रो0 हरेराम त्रिपाठी (वाराणसी), प्रो0 कृष्ण मोहन पाण्डेय(वाराणसी), प्रो0श्रीनिवास ओझा (वाराणसी), प्रो0 कृष्ण मोहन पाण्डेय (वाराणसी), डा0 पवन कुमार शास्त्री (वाराणसी), प्रो0 गंगाधर पण्डा (वाराणसी), डा0 रमाकान्त पाण्डेय (वाराणसी), डा0 ब्रजबिहारी त्रिपाठी (वाराणसी), प्रो0 जयशंकर लाल त्रिपाठी (वाराणसी), डा0 राजकुमारी त्रिखा (दिल्ली), डा0 राममूर्ति चतुर्वेदी (वाराणसी), सीमा यादव (वाराणसी) ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किये।

शोध छात्र संगोष्ठी

 इसके साथ ही शोध छात्र संगोष्ठी का आयोजन प्रेक्षागृह, महात्मा गाधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी में किया गया। जिसमें व्यास वाडमय के अनुशीलन की दिशायें-अतीत एवं वर्तमान विषय पर विभिन्न विधालयों के छात्रों शोध पत्र पढ़े। जिसमें श्री मधुसूदन मिश्र-प्रथम, सुश्री दीपिका राय-द्वितीय, श्री प्रमोद भटट-तृतीय तथा श्री नवनीत भटट व श्री वृहस्पति भटटाचार्य को सान्त्वनां पुरस्कार प्राप्त किया। पूर्वाहन में सम्पूर्ण गीता कण्ठस्थ्य पाठ प्रतियोगिता का आयोजन प्रेक्षागृह, महात्मा गाधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी मंें किया गया। जिसमें विभिन्न विधालयों के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। जिसमें धीरू कुमार चौब, राहुल पाण्डेय, अक्षय आदित्य, प्राज्जल मिश्र, सरयू, सुरेश शर्मा, संजय कुमार शर्मा, पंकज शर्मा, शेबर मिश्र, दीपक मिश्र ने सम्पूर्ण गीता कठस्थ प्रतियोगिता में प्रथम दस स्थान पाकर प्रति 5000.00 रूपये का पुरस्कार प्राप्त किया। अन्य प्रतिभागियों में अरविन्द कुमार तिवारी, पुरातन शर्मा, मनीष शर्मा, शिवचरित द्विवेदी, विवके चन्द्र झा, वद्री नारायण गौतम, आदेश मिश्र, मनीष शर्मा, दुर्गादत्त मिश्र, रजीत दूबे, वेदव्रत शर्मा, शुभम पाण्डेय, संस्कृति चतुर्वेदी, वेद प्रकाश, अर्चा मिश्र ने रूपये एक-एक हजार का पुरस्कार प्राप्त किया। आदि छात्र-छात्राओं ने भाग लिया।
                सायं सांस्कृतिक कार्यक्रम में उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के सौजन्य से श्री शीशपाल चौहान, रोहतक द्वारा हरियाणवी लोकनृत्य, श्री सुधीर तिवारी, सागर द्वारा बधार्इ-नौरता गायन, श्री मदन लाल शर्मा, मथुरा द्वारा बज्र के लोक नृत्य तथा श्री विमल शाहाबादी, आरा द्वारा बिहार के लोक गीतो को प्रस्तुत किया गया।

संस्कृत संगोष्ठी

                अन्तिम समापन दिवस दिनांक 10 दिसम्बर 2011 को विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन हुआ जिनमें संस्कृत संगोष्ठी का आयोजन समिति कक्ष, महात्मा गाधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी में किया गया। जिसमें संस्कृत वाडमय के अनुशीलन सम्वर्धन एवं लोकप्रचार का दिशायें  विषय पर प्रो0 रमानाथ शर्मा आचार्य हवार्इ विश्वविधालय (हवार्इ), प्रो0 श्री किशोर मिश्र (वाराणसी), प्रो0 कौशलेन्द्र पाण्डेय (वाराणसी), प्रो0 यदुनाथ प्रसाद दूबे (वाराणसी), डा0 रजनीश कुमार शुक्ल (वाराणसी), प्रो0 हरिशंकर पाण्डेय (वाराणसी), प्रो0 हरिप्रसाद अधिकारी (वाराणसी), डा0 दिनेश कुमार गर्ग (वाराणसी), प्रो0 श्रीनिवास ओझा (वाराणसी), डा0 सुरेश चन्द्र चौबे (वाराणसी), डा0 अविमुक्त नाथ पाण्डेय (वाराणसी), डा0 शैलेश कुमार मिश्र (वाराणसी), डा0 रमेश चन्द्र पाण्डेय (वाराणसी), डा0 उपेन्द्र देव पाण्डेय (वाराणसी), प्रो0 गया राम पाण्डेय (वाराणसी)  आदि विद्वानों ने व्याख्यान दिया।

संस्कृत वाद स्पर्धा

 साथ ही संस्कृत वाद स्पर्धा का आयोजन प्रेक्षागृह, महात्मा गाधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी में किया गया, जिसमें -
                                श्रेयोमार्गोपदेष्टा तु लोककल्याणहेतवे।
                                व्यासं विहाय क: शक्त: दृश्यते जगतीतले।।

                विषय पर विभिन्न विश्वविधालयों के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। जिसमें कु0 प्रतिभा शास्त्री-प्रथम, र्इश्वर मूर्ति-द्वितीय, गणेश हेगडें-तृतीय तथा कु0 मुदिता-सान्त्वना पुरस्कार प्राप्त किया। सायं सांस्कृतिक कार्यक्रम में श्रीराम भारतीय कला केन्द्र, दिल्ली , अयोध्या शोध संस्थान द्वारा नाटक कर्ण तथा कज्जलिका गीत तथा प्रति दिन व्यास कथा के साथ-साथ पुस्तक मेला का आयोजन किया गया है। साथ ही संस्कृत-हिन्दी कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस कवि सम्मेलन में देश के विभिन्न भागों से आये निम्न कवियों ने भाग लिया। प्रो0 रमाकान्त शुक्ल,(दिल्ली), प्रो0 हरिराम आचार्य,(जयपुर), डा0 राम सुमेर यादव,(लखनऊ), डा0 कमला पाण्डेय, (वाराणसी), प्रो0 उमारानी त्रिपाठी(वाराणसी), डा0 सदाशिव कुमार द्विवेदी,(वाराणसी), प्रो0 रेवा प्रसाद द्विवेदी(वाराणसी), डा0 ब्रजेश कुमार शुक्ल(लखनऊ), डा0 कौशलेन्द्र पाण्डेय (वाराणसी),डा0 सदाशिव कुमार द्विवेदी(वाराणसी)आचार्य मनुदेव भटटाचार्य(वाराणसी), प्रो0 उपेन्द्र पाण्डेय (वाराणसी), डा0 शिवराम शर्मा, डा0 भगवत शरण, डा0 धर्मदत्त चतुर्वेदी, डा0 मनुलता शर्मा, प्रो0 इच्छाराम द्विवेदी, डा0 श्रीकृष्ण तिवारी, डा0 अशोक राय अज्ञान, डा0 रंजना राय, डा0 रविकान्त, डा0 मनमोहन मिश्र आदि कवियों ने भाग लिया।

                समापन समारोह का शुभारम्भ मुख्यातिथि श्री सुखदेव राजभर मा0अध्यक्ष विधान सभा द्वारा दीप प्रज्जवलन कर किया गया। मण्डलायुक्त महोदय द्वारा मा0 विधानसभा अध्यक्ष का स्वागत पुष्प गुच्छख् अंगवस्त्र, स्मृति चिन्ह द्वारा किया गया। स्वागत उदबोधन श्री सत्येन्द्र सिंह निदेशक द्वारा किया गया तथा व्यास महोत्सव पर सम्पूर्ण रिर्पोट प्रतुस्त की गयी। मुख्यातिथि श्री सुखदेव राजभर मा0अध्यक्ष विधान सभा द्वारा समस्त विजेता प्रतिभागी छात्रों को पुरस्कार वितरण किया गया। अध्यक्षीय सम्बोधन डा0 रेखा बाजपेर्इ अध्यक्ष उ0प्र0 संस्कृत संस्थान द्वारा किया गया। आभार तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो0 कमलेश दत्त त्रिपाठी द्वारा किया गया। समारोह के अन्त में श्रीराम भारतीय कला केन्द्र, दिल्ली तथा अयोध्या शोध संस्थान के सौजन्य से नाटक कर्ण की प्रस्तुती दी गयी। 

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

संस्कृत के प्रचार-विकास में आम जन की भागीदारी क्यों और कैसे

          संस्कृत भाषा के प्रचार के लिए हमें एक सुनिश्चित अवधि के लिए एक निश्चित लक्ष्य का निर्धारण करना होगा। हम जो भी योजना बनाये उसके केन्द्र में संस्कृत भाषा के लाभार्थियों की संख्या तथा उसमें उत्तरोत्तर वृद्धि को ध्यान में रखना होगा। दूसरे शब्दों में संस्कृत भाषा के प्रचार हेतु निर्मित योजना में संस्कृत भाषा का प्रचार होते दिखना चाहिए। प्रायशः भाषा का प्रचार उन क्षेत्रों तक सीमित रहता है जहाँ के लोग स्वतः इस भाषा से जुडे है। उनमें प्रचार न होकर गुणवत्ता का क्रमिक विकास दिखे ऐसा यत्न करना होगा। यथा वे बोलना नहीं चाहते तो बोलने के लिए सीखाना। प्रचार की दिशाएँ ज्ञात न हो तो प्रशिक्षण देकर सच्चा प्रचारक बनाना आदि।
 उनमें शास्त्र शिक्षण करना अनुपयोगी है।

            हमने अभी तक कोई ठीक-ठीक योजना का निर्माण ही नहीं किया। यदि ठीक-ठीक योजना निर्मित की गयी होती तो 65 वर्षो में उसके परिणाम सम्मुख होते। हम संस्कृत भाषियों संस्कृत प्रेमियों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होते हुए देखते।

              संस्कृत क्षेत्र को तीन भागो में विभक्त किया जा सकता हैं।

1- संस्कृत विषय को लेकर अध्ययन कर रहे या कर चुके व्यक्ति।
2- संस्कृत विषय लेकर जिन्होने अध्ययन नहीं किया है परन्तु संस्कृत के प्रति रूचि रखते है।
3-संस्कृत के  प्रति उदासीन या अनभिज्ञ व्यक्ति।

 तीनों प्रकार के व्यक्तियों में अलग-अलग ढंग से  संस्कृत का प्रचार -प्रसार करना चाहिए। सर्वप्रथमएक क्षेत्र का चयन कर उसमें विभाजन पुनः प्रसार किया जाना चहिए।                                                                  प्रायशः यह देखने में आता है कि योजना बनीलागू की गई परन्तु परिणाम की समीक्षा नहीं की जाती। जब तक परिणाम की समीक्षा नहीं की जायेगी योजना के प्रभाव का आकलन नहीं किया जा सकता।   योजना निर्माण में लक्ष्य संस्कृत भाषा का प्रचार मात्र होना चाहिए। प्रायशः भाषा प्रचार के स्थान साहित्यज्योतिषकर्मकाण्डवेद आदि विषय का प्रचार स्थान लेने लगता है। इसके प्रचार का माध्यम हिन्दी या तत्स्थानीय भाषाएँ होती है। प्रायः भ्रमवश आमजन कर्मकाण्डज्योतिषमंत्रतंत्र को ही संस्कृत समझते है।वस्तुतः ये ज्ञान और व्यवहार के विषय हैं न कि भाषा के। ज्ञान के विषय को किसी भी भाषा में लिखा पढा जा सकता है क्योंकि भाषा का कार्य भाव का सम्प्रेषण है। हाँ उपर्युक्त विषयों का उद्भव एवं पल्लवन संस्कृत भाषा के माध्यम से हुआ अतः संस्कृत भाषा का ज्ञान उपर्युक्त विषय के लिए आवश्यक है। 
             व्यास महोत्सव की प्रतिस्थापना-विविध स्थलों पर छोटे-छोटे कार्यक्रमों द्वारा प्रचार-प्रसार करना चाहिए परन्तु वर्ष दो वर्ष में एक वृहद् कार्यक्रम होना चाहिएअनुगूंज दूर तक तथा देर तक रहे। हजारों लीटर पानी नल द्वारा प्रवाहित किया जाय तो पानी में मात्रा एवं बेग की कमी के कारण लघुतम क्षेत्र को सिंचित का सकेगा। वहीं यदि हजारों लीटर पानी एक साथ एक बार में प्रवाहित कर दिया जाय मात्रा एवं बेग के अधिकता के कारण अधिकतम क्षेत्रफल सिंचित करेगी।                                                                                                   इस देश के प्रत्येक गाॅव में दो चार संस्कृतज्ञ है। इस प्रकार संस्कृतज्ञों की संख्या लाखों नहीं करोडों में है। असंगठित संस्कृतज्ञ अपना प्राप्तव्य सरकार से प्राप्त नहीं कर पाता। इस क्षेत्र में तमाम सामाजिक संगठनों की आवश्यकता है,जो संस्कृत का अलख जगा सके।   
संस्कृत भाषा के प्रचार के लिए द्विमुखी प्रचार पद्धति अपनाना चाहिए
 1- शिक्षा द्वारा 2 जनजागरण द्वारा
संस्कृत भाषा के प्रचार के दो उद्देश्य होने चाहिए।
 1- भाषा सीखना 
 2- प्रशंसक बनना
संस्कृत भाषा के विकास हेतु योजना-
 1-संस्कृत भाषा में पत्रिका का प्रकाशन
यह मासिक पत्रिका कक्षा 6 से एम.ए तक के लिए उपयोगी हो।
इसमें समसामयिक घटना क्रमसंस्कृत जगत से परिचय व्याकरणसामान्य  ज्ञानकहानियाँजीवनी आदि विषय हों।
वार्षिक मुल्य रु0 100-00 मात्र रखा जाय।
प्रत्येक संस्कृत विद्यालयमहाविविश्वविद्यालय के संस्कृत छात्र में ग्राहकता  बढाना ।
प्रचार के विविध तरीके को अपनाना।
 यथा-
छात्र प्रतियोगिता में विजयी को एक वर्ष के लिए निःशुल्क
सर्वाधिक अंक पाने वाले को छूट
सर्वोत्तम विद्यालय का चयन कर पुस्तकालय हेतु निःशुल्क
अच्छे लेख प्रेषित करने वाले छात्रों के लिए आदि।
जागरूकता हेतु प्रचार साहित्य मुद्रित कराना।
संस्कृत क्यों पढे। 
बच्चों के लिए संस्कृत में रोजगार आदि।
संस्कृत के प्रचार-विकास में आम जन की भागीदारी क्यों और कैसे ।
संस्कृत विद्यालयों की प्रति जनाकर्षण हेतु योजना-
 एक वर्ष एक जनपदों के संस्कृत विद्यालयों का चुनाव कर उस क्षेत्र में  संस्कृत शिक्षा को बढावा देने हेतु विविध आयोजन।
1- संस्कृत विद्यालय में संस्कृत भाषा में सांस्कृतिक कार्यक्रम
2- सांस्कृतिक कार्यक्रमोंगीतों हेतु स्थानीय बच्चों का चयन
3-स्थानीय बच्चों में संस्कृत ज्ञान परीक्षा
स्थानीय बच्चों के बीच सामुदायिक केन्द्रों में पंचायत तहसील स्तर पर  संस्कृत के बारे जन सम्वाद
5-जनता की शंका का समाधान
6-आदर्श संस्कृत के स्वरूप का प्रदर्शन
7-  गीत चित्र छोटे बच्चों के बीच संस्कृत में संवाद
8-भाषा पठन लेखन क्षमता का प्रदर्शन
 9-सर्वप्रथम प्रचारक संस्थानों को निर्मित किया जाये।
10 -छात्रों के शिक्षण हेतु प्रचार सामग्री
11. लघुकथा पुस्तक-सी.डी के साथ
12.  संस्कृत गीत सीडी डी. वी डी के साथ
 संस्कृत भाषा शिक्षण हेतु बालकोपयोगी दृश्य श्रव्यसाधन
1.यात्रा वर्णन
उत्सवों का सचित्र वर्णन
 विद्वानों से पत्राचार के समय संस्कृत भाषा का ही उपयोग किया जाय।
   जनजागरण हेतु प्रचार सामग्री
1.संस्कृत की सूक्तियों का प्रर्दशन
2.जीवनोपयोगी सूक्तियों का स्टीकर द्वारा प्रर्दशन वितरण
3.संस्कृत के महत्व एवं उपयोगिता को प्रदर्शित करने हेतु ध्वनिमुद्रिका का निर्माण
पत्रिका में निबन्ध गीत श्लोक लघु कथा लेखन हेतु छात्रो को प्रोत्साहित करना तथा उन्हें पुरस्कृत करना। 
वृत्त चित्र निर्माण, जिसमें संस्कृत की गतिविधियों को दिखाया जाय। संस्कृत सीखने वाले व्यक्तियों के सफलता को दिखाया जाय।
खेतिहर मजदूरों, रिक्शा चालकोंसपेरोंआँटो, रिक्शाबस आदि के ड्राइवरफेरी वालोंनिर्माण क्षेत्र में कार्य करने वाले मजदूरोंकिसानों आदि में इस भाषा की उपस्थिति बहुत दूर है। इनमें संस्कृत सीखने की जागृति आयी तो अपने सन्तति को संस्कृत अवश्य पढाँएगें।
       आवश्यकता है ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता की जो उन तक सन्देश लेकर जाए। संस्कृत शिक्षण केन्द्र के आस-पास के लोग भी यह नहीं जानते कि यहाँ संस्कृत शिक्षा दी जाती है। यद्यपि वकीलडाँ0पुलिस अधिकारी इनके बारे में आस-पास के लोगो को जानकारी होती है, परन्तु संस्कृतज्ञ को उनके पडोसी नहीं जानते।
प्रत्येक संस्कृत विद्यालय तथा संस्कृतज्ञ के घर के बाहर संस्कृत शब्द तो जरूर ही लिखा होना चाहिए।  
                                                                                निवेदनः-लेख की रेटिंग करना नहीं भूलें।
                                                                                              जगदानन्द झा