शनिवार, 22 सितंबर 2012

अन्नप्राशन संस्कार



विधिपूर्वक बालक को प्रथम भोजन कराने की प्रथा अत्यन्त प्राचीन है। वेदों और उपनिषदों में भी एतत्‌ सम्बन्धी मंत्रा उपलब्ध होते हैं। माता के दूध से पोषित होने वाले बालक को प्रथम बार अन्नप्राशन कराने का प्रचलन प्रायः प्राचीन काल से ही है जो एक विशेष उत्सव के रूप में सम्पन्न किया जाता है।
            जन्मतो मासि षष्ठे स्यात सौरेणोत्तममन्नदम्‌
            तदभावेऽष्टमे  मासे  नवमे दशमेऽपि वा।
            द्वादशे वापि  कुर्वीत  प्रथमान्नाशनं परम्‌
            संवत्सरे वा सम्पूर्णे केचिदिच्छन्ति पण्डिताः॥ - नारद, वी.मि.
            षण्मासद्द्रचैनमन्नं  प्राशयेल्लघु हितद्द्रच - सुश्रुत (शं. स्थान)
विधि-विधान-अन्नप्राशन संस्कार के दिन सर्वप्रथम यज्ञीय भोजन के पदार्थ वैदिक मन्त्राों के उच्चारण के साथ पकाये जायें। भोजन विविध प्रकार के हों तथा सुस्वादु हों। मधु-घृत-पायस से बालक को प्रथम कवल (ग्रास) दिया जाय। पद्धतियों में एतत्‌ संबंधी मंत्रा उपलब्ध हैं। गणेशार्चन करके व्याहृतियों से आहुति देकर एतत्‌ संबंधी ऋचाओं से हवन करके तत्पश्चात्‌ बालक को मंत्रापाठ के साथ अन्नप्राशन कराया जाय पुनः यथा लोकाचार उत्सव सम्पन्न किया जाय।


निष्क्रमण संस्कार

प्रथम बार शिशु के सूर्य दर्शन कराने के संस्कार को निष्क्रमण कहा गया है।
             ततस्तृतीये  कर्तव्यं  मासि सूर्यस्य दर्शनम्‌।
            चतुर्थे मासि कर्तव्य शिशोश्चन्द्रस्य दर्शनम्‌
अनेक स्मृतिकारों ने चतुर्थ मास स्वीकार किया है। इस संस्कार के बाद बालक को निरन्तर बाहर लाने का क्रम प्रारंभ किया जाता है।
विधि-भलीभांति अलंकृत बालक को माता गोद में लेकर बाहर आये और कुल देवता के समक्ष देवार्चन करे। पिता पुत्र को-   तच्चक्षुर्देव ........आदि मंत्र का जाप करके सूर्य का दर्शन करावे -
       ततस्त्वलंकृता धात्री बालकादाय पूजितम्‌।
       बहिर्निष्कासयेद्‌ गेहात्‌ शङ्‌ख पुण्याहनिः स्वनैः। - विष्णुधर्मोत्तर
आशीर्वाद -         अप्रमत्तं प्रमत्तं  वा दिवारात्रावथापि वा।
                  रक्षन्तु सततं सर्वे देवाः शक्र पुरोगमाः॥
गीत, मंगलाचरण और बालक के मातुल द्वारा भी आशीर्वाद दिलाया जाय।

नामकरण संस्कार

बाल्यावस्था के संस्कार- नामकरण

  नामकरण एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण संस्कार है जीवन में व्यवहार का  सम्पूर्ण आधार नाम पर ही निर्भर होता है
     नामाखिलस्य व्यवहारहेतुः शुभावहं कर्मसु भाग्यहेतुः
     नाम्नैव कीर्तिं लभेत मनुष्यस्ततः प्रशस्तं खलु नामकर्म।-बी.मि.भा. 1
उपर्युक्त स्मृतिकार बृहस्पति के वचन से प्रमाणित है कि व्यक्ति संज्ञा का जीवन में सर्वोपरि महत्त्व है अतः नामकरण संस्कार हिन्दू जीवन में बड़ा महत्त्व रखता है।
शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख है कि
      तस्माद्‌ पुत्रास्य जातस्य नाम कुर्यात्‌
      पिता नाम करोति एकाक्षरं द्वक्षरंत्रयक्षरम्‌ अपरिमिताक्षरम्‌ वेति-वी.मि.
       द्वक्षरं प्रतिष्ठाकामश्चतुरक्षरं ब्रह्मवर्चसकामः
प्रायः बालकों के नाम सम अक्षरों में रखना चाहिए। महाभाष्यकार ने व्याकरण के महत्व का प्रतिपादन करते हुए नामकरण संस्कार का उल्लेख किया ।
याज्ञिकाः पठन्ति-    ''दशम्युतरकालं जातस्य नाम विदध्यात्‌
                  घोष बदाद्यन्तरन्तस्थमवृद्धं त्रिापुरुषानुकम  नरिप्रतिष्ठितम्‌।
                  तद्धि प्रतिष्ठितमं भवति।
                  द्वक्षरं चतुरक्षरं वा नाम कुर्यात्‌ न तद्धितम्‌ इति।
                 न चान्तरेण व्याकरणकृतस्तद्धिता वा शक्या विज्ञातुम्‌।-महाभाष्य
उपर्युक्त कथन में तीन महत्त्वपूर्ण बातों का उल्लेख है-
(1) शब्द रचना (2) तीन पुस्त के पुरखों के अक्षरों का योग (3) तद्धितान्त नहीं होना चाहिए अर्थात्‌ विशेषणादि नहीं कृत्‌ प्रत्यान्त होना चाहिए।
विधि-विधान-गृह्य सूत्रों के सामान्य नियम के अनुसार नामकरण संस्कार शिशु के जन्म के पश्चात्‌ दसवें या बारहवें दिन सम्पन्न करना चाहिए -
         द्वादशाहे  दशाहे वा जन्मतोऽपि त्रायोदशे।
         षोडशैकोनविंशे वा द्वात्रिांशेवर्षतः क्रमात्‌॥
संक्रान्ति, ग्रहण, और श्राद्धकाल में संस्कार मंगलमय नही माना जाता। गणेशार्चन करके संक्षिप्त व्याहृतियों से हवन सम्पन्न कराकर कांस्य पात्रा में चावल फैलाकर पांच पीपल के पत्तों पर पांच नामों का उल्लेख करते हुए उनका पद्द्रचोपचार पूजन करे। पुनः माता की गोद में पूर्वाभिमुख बालक के दक्षिण कर्ण में घरके बड़े पुरुष द्वारा पूजित नामों में से निर्धारित नाम सुनावे। हे शिशो! तव नाम अमुक शर्म-वर्म गुप्त दासाद्यस्ति'' आशीर्वचन निम्न ऋचाओं का पाठ-
''क्क वेदोऽसि येन त्वं देव वेद देवेभ्यो वेदोभवस्तेन मह्यां वेदो भूयाः। क्क अङ्‌गादङ्‌गात्संभवसि हृदयादधिजायते आत्मा वै पुत्रा नामासि सद्द्रजीव शरदः शतम्‌'
  गोदान-छाया दान आदि कराया जाय। लोकाचार के अनुसार अन्य आचार सम्पादित किये जायें।
बालिकाओं के नामकरण के लिए तद्धितान्त नामकरणकी विधि है। बालिकाओं के नाम विषमाक्षर में किये जायें और वे आकारान्त या ईकारान्त हों। उच्चारण में सुखकर, सरल, मनोहर मङ्‌गलसूचक आशीर्वादात्मक होने चाहिए।
      स्त्रीणां च सुखम्‌क्रूरं विस्पष्टार्थं मनोहरम्‌।
      मत्त्ल्यं  दीर्घवर्णान्तमाशीर्वादाभिधानवत्‌। - वी.मि.

जातकर्म


बाल्यावस्था के संस्कार - जातकर्म


 
जातक के जन्मग्रहण के पश्चात्‌ पिता पुत्र मुख का दर्शन करे और तत्पश्चात्‌ नान्दी श्राद्धावसान जातकर्म विधि को सम्पन्न करे-

            जातं कुमारं स्वं दृष्ट्‌वा स्नात्वाऽनीय गुरुम्‌ पिता।
            नान्दी  श्राद्धावसाने   तु  जातकर्म   समाचरेत्‌

विधि-पिता स्वर्णशलाका या अपनी चौथी अंगुली से जातक को जीभ पर  मधु और घृत महाव्याहृतियों के उच्चारण के साथ चटावे। गायत्री मन्त्र के साथ ही घृत बिन्दु छोड़ा जाय। आयुर्वेद के ग्रंथों में जातकर्म-विधि का विधान चर्चित है कि पिता बच्चे के कान में दीर्घायुष्य मंत्रों का जाप करे। इस अवसर पर लग्नपत्रा बनाने और जातक के ग्रह नक्षत्रा की स्थिति की जानकारी भी प्राप्त करने की प्रथा है और तदनुसार बच्चे के भावी संस्कारों को भी निश्चित किया जाता है।

सीमन्तोन्नयन


गर्भ का तृतीय संस्कार सीमतोन्नयन था। इस संस्कार में गर्भिणी स्त्री के केशों (सीमन्त) को ऊपर करना
 सीमन्त उन्नीयते यस्मिन्‌ कर्मणि तत्‌ सीमन्तोन्नयनम्‌-वी.मि.

विधि-किसी पुरुष नक्षत्रा में चन्द्रमा के स्थित होने पर स्त्री-पुरुष को उस दिन फलाहार करके इस विधि को सम्पन्न किया जाता है। गणेशार्चन, नान्दी, प्राजापत्य आहुति देना चाहिए। पत्नी अग्नि के पश्चिम आसन पर आसीन होती है और पति गूलरके कच्चे फलों का गुच्छ, कुशा, साही के कांटे लेकर उससे पत्नी के केश संवारता है -महाव्याहृतियों का उच्चारण करते हुए।

अयभूर्ज्ज स्वतो वृक्ष ऊर्ज्ज्वेव फलिनी भव - पा.गृ. सूत्र

इस अवसर पर मंगल गान, ब्राह्मण भोजन आदि कराने की प्रथा थी।

पुंसवन संस्कार

गर्भधारण का निश्चय हो जाने के पश्चात्‌ शिशु को पुंसवन नामक संस्कार के द्वारा अभिषिक्त किया जाता था। इसका अभिप्राय-पुं-पुमान्‌ (पुरुष) का सवन (जन्म हो)।
      पुमान्‌ प्रसूयते येन कर्मणा तत्‌ पुंसवनमीरितम्‌ - बीरमित्रोदय
गर्भधारण का निश्चय हो जाने के तीसरे मास से चतुर्थ मास तक इस संस्कार का विधान बताया जाता है। अधिकांश स्मृतिकारों ने तीसरा माह ही गृहीत किया है।
                 तृतीये मासि कर्तव्यं गृष्टेरन्यत्रा शोभनम्‌।
                 गृष्टे  चतुर्थमासे तु षष्ठे मासेऽथवाष्टये। -वीरमित्रोदय
यह संस्कार चन्द्रमा के पुरुष नक्षत्रा में स्थित होने पर करना चाहिए। सामान्य गणेशार्चनादि करने के बाद गर्भिणी स्त्राी की नासिका के दाहिने छिद्र मे गर्भ-पोषण संरक्षण के लिए लक्ष्मणा, बटशुङ्‌ग, सहदेवी आदि औषधियों का रस छोड़ना चाहिए। सुश्रत नें सूत्र स्थान में कहा है-
''सुलक्ष्मणा-वटशुङ्‌रग, सहदेवी विश्वदेवानाभिमन्यतमम्‌ क्षीरेणाभिद्युष्टय त्रिचतुरो वा विन्दून दद्यात्‌ दक्षिणे-नासापुटे''-सुश्रत संहिता।
उपर्युक्त प्रक्रिया से जाहिर है कि इस संस्कार में वैज्ञानिक विधि का आश्रय है जिससे शिशु की पूर्णता प्राप्त हो और सर्वाङ्‌ग रक्षा हो।

गर्भाधान संस्कार

गर्भाधान जन्म से पूर्व के संस्कार

   गृह्य सूत्र गर्भाधान के साथ ही संस्कारों का प्रारंभ करते हैं क्योंकि जीवन का प्रारम्भ इसी संस्कार से शुरू होता है -निषिक्तो यत्प्रयोगेण गर्भः संधार्यते स्त्रिया।
      तद्‌
गर्भालम्भनंनाम कर्म प्रोक्तं मनीषिभिः। वीर मित्रोदय।

  स्त्री-पुरुष के संयोग रूप इस संस्कार की विस्तृत विवेचना शास्त्रों में मिलती है जिसमें अनेक विधि-निषेधों की चर्चा है जो मानव जीवन के लिए और आगे आने वाले संतति परम्परा की शुद्धि के लिए अत्यावश्यक है। दिव्य सन्तति की प्राप्ति के लिए बताये गये शास्त्रीय प्रयोग सफल होते हैं सन्तति-निग्रह भी होता है।

संस्कार

        संस्कार शब्द सम्‌ पूर्वक कृ‌-धातु से घञ्‌ प्रत्यय करके निष्पन्न होता है। संस्कार शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया जाता है। संस्कृत वाङ्‌मय में इसका प्रयोग शिक्षा, संस्कृति, प्रशिक्षण, सौजन्य पूर्णता, व्याकरण संबंधी शुद्धि, संस्करण, परिष्करण, शोभा आभूषण, प्रभाव, स्वरूप, स्वभाव, क्रिया, फलशक्ति, शुद्धि क्रिया, धार्मिक विधि विधान, अभिषेक, विचार भावना, धारणा, कार्य का परिणाम, क्रिया की विशेषता आदि व्यापक अर्थों में किया जाता है। अतः संस्कार शब्द अपने विशिष्ट अर्थ समूह को व्यक्त करता  और उक्त सम्पूर्ण अर्थ इस शब्द में समाहित हो गये हैं। अतः संस्कार, शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक शुद्धि के लिए किये जाने वाले अनुष्ठानों का श्रेष्ठ आचार है। इस अनुष्ठान प्रक्रिया से मनुष्य की बाह्याभ्यन्तर शुद्धि होती है जिससे वह समाज का श्रेष्ठ आचारवान्‌ नागरिक बन सके।
 हिन्दू संस्कारों में अनेक वैचारिक और धार्मिक विधियां सन्निविष्ट कर दी गयी हैं जिससे बाह्य परिष्कार के साथ ही व्यक्ति में सदाचार की पूर्णता का भी विकास हो सके। सविधि संस्कारों के अनुष्ठान से संस्कृत व्यक्ति में विलक्षण तथा अवर्णनीय गुणों का प्रादुर्भाव हो जाता हैङ्क
  आत्मशरीरान्यतरनिष्ठो विहित क्रियाजन्योऽतिशय विशेषः संस्कारः
                                             वीर मित्रोदय पृ. 191
कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च  म. स्मृ. 2/26
संस्कारों की संख्या-
संस्कारों के शास्त्राीय प्रयोग के सम्बन्ध में गृह्यसूत्रों को ही प्रमाण माना गया है। प्राचीन गृह्य सूत्रों में पारस्कर गृह्य सूत्र, अश्वलायन गृह्य सूत्र,बोधायन गृह्य सूत्र विशेष रूप से प्रामाणिक रूप से संस्कारों के अनुष्ठानों का विवरण, महत्त्व और मंत्राों का विवरण प्रस्तुत करते हैं। इनके अतिरिक्त पुराण सहित्य और विभिन्न स्मृतियां भी संस्कारों के आचार के संबंध तथा उनके महत्त्व का प्रतिपादन करती हैं। धर्म सूत्रों और धर्मशास्त्राों में भी इनके समन्वित रूपों का प्रतिपादन किया गया है। विभिन्न गृह्यसूत्रों एवं स्मृतियों में संस्कारों की संखया में मतैक्य नहीं हैं तदपि परवर्ती काल में संस्कारों की संखया का निर्धारण कर दिया गया। इन संस्कारों में जन्मपूर्व सलेकर बाल्यकाल के 10 संस्कार और शेष 6 शैक्षणिक तथा अन्त्येष्टि पर्यन्त के संस्कार परिगणित हैं
1. गर्भाधान            2.  पुंसवन
3. सीमन्तोन्नयन       4.  जात कर्म   
5. नामकरण           6.  निष्क्रमण
7. अन्नप्राशन          8.  चूड़ाकरण
9. कर्णवेध             10. विद्यारम्भ
11. उपनयन            12. वेदारंभ
13. केशान्त             14. समावर्तन
15.     विवाह 16.   अन्त्येष्टि
  कालक्रमानुसार प्राप्तभेद से अनुष्ठान पद्धतियों की रचना हो गई है। श्री दयानन्द सरस्वती के अनुयायियों एवं अन्य मतावलम्बियों ने भी अपने सम्प्रदायानुसार पद्धतियां बना ली हैं किन्तु देशज प्रक्रिया में भिन्नता रहते हुए भी शास्त्राीय विधि और मंत्रा प्रयोग यथावत्मिलते हैं। अनेक संस्कार काल वाह्य भी हो गये हैं तदपि उनकी कौल परम्परा अभी जीवित है। अतः इन संस्कारों का संक्षिप्त रूप से विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है। हिन्दू संस्कारों के समय मुहूर्त निर्धारण में ज्योतिष की भी मुखय भूमिका रहती है अतः प्रत्येक संस्कार के लिए नक्षत्रा योग के अनुसार ज्योतिष शास्त्र में मुहूर्तों का निर्धारण कर दिया है प्रचलित पञ्चाङ्‌गों में चक्रानुक्रम से उसका विवरण उपलब्ध रहता है। ज्योतिष के संक्षिप्त संकलन ग्रंथ भी इसमें सहायक हैं। संस्कारों के मुहूर्तों से सम्बन्धित सारिणी भी संलग्न कर दी जा रही है जिसमें संक्षेप में मुहूर्तों का विवरण है। मनु ने 'जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद्‌द्विज उच्यते' कहकर संस्कार की महत्ता का प्रतिपादन कर दिया है। संस्कार से ही द्विजत्व प्राप्त होता है। इसी वाक्य को आधार मानकर आर्य समाज के अधिष्ठाता स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सम्पूर्ण आर्य जाति को संस्कार से द्विजत्व प्राप्ति का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। षोडश संस्कारों के सबंध में संक्षिप्त परिचय, शास्त्राीय विधान का विवरण दिया जा रहा है। विशेष विवरण विभिन्न पद्धतियों से जानना चाहिये।

मेघदूत का रामगिरि कहाँ ?

फेसबुक पर एक मित्र का निवेदन है-
                  sir! can u speak me about ramagiri of meghadutta?
साथ ही यह भी पूछा
            where is it? and what is ur view?
प्रश्नोत्तर के रुप में यह लेख उपस्थित है-
         मेघदूत में यक्ष मेघ को रामगिरि से अलकापुरी तक जाने के लिए सविस्तार मार्ग बताता है। मार्ग में कौन-कौन से पर्वत पड़ेंगे, जिन पर कुछ क्षण के लिए मेघ को विश्राम करना है, किन नदियों से मेघ को थोड़ा जल ग्रहण करना है और कौन-कौन से ग्राम अथवा नगर पड़ेंगे, जहाँ बरसा कर उसे शीतलता प्रदान करना है, इन सबका उल्लेख करता है।
 मेघ का मार्ग-
          उज्जयिनी, विदिशा, दशपुर आदि नगरों, ब्रह्मावर्त, कनखल आदि तीर्थों तथा वेत्रवती, गम्भीरा आदि नदियों को पार कर हिमालय और उस पर बसी अलका नगरी तक मेघ का मार्ग है।

 1- मल्लिनाथ तथा चरित्रवर्द्धन चित्रकूट को रामगिरि मानते हैं ।
2- हीरालाल शुक्ल आन्ध्रप्रदेश राज्य के खम्मम जिले में रामगिरि को मानते है।
3-पार्जीटर छत्तीसगढ के मैदान को रामगिरि मानते हैं ।
4- श्री मिराशी नागपुर के पास रामटेक को ही रामगिरि मानते हैं ।
मेघदूत में वर्णित रामगिरि पर्वत आधुनिक नागपुर में स्थित माना जाता है।  मेरे विचार से मेघदूत में जो स्थिति दी हुई, उससे वह नागपुर ही के पास होना चाहिए